Tuesday, 8 December 2020

 अब लगता है कि महिलाओं को आत्म-परीक्षण की जरुरत है।

अपने-आप से , आईने से और पुरुष की निगाह से वह दिन में कई-कई बार यह सवाल क्यों पूछती है --मै कैसी दिख रही हूँ ? साफ-सुथरी रहें, परिष्कृत रहें, गरिमामय परिधान पहनें, लेकिन सुन्दर, गोरी,आकर्षक दिखने की चाहत क्यों ?

हाथ मिलाकर अभिवादन करना आम हो चला है, पर कस्बाई नगरों में यदि कोई लड़का-लड़की से हाथ मिलाता है , कनखियों से उधर देखने का मोह क्यों नहीं छूटता ?....
कोई सहकर्मी कुर्सी खींचकर बैठता है, तो हम २  इंच ही सही पीछे क्यों हो जाते है ? सहकर्मी, सहकर्मी है , उसे 'पुरुष सहकर्मी'' मानना और स्वयं को ''स्त्री'' मानना क्या सदैव उचित है ?

तमाम जगहों पर जहाँ भी कोई कतार लगती है , हमें अलग से कतार की जरुरत क्यों महसूस होती है ? सारे पुरुषों की हर समय एक ही भावना तो नहीं होती और सामान्यतया सार्वजनिक स्थानों पर जो लोग आते हैं , उन्हें सिर्फ अपनी बारी का इंतज़ार रहता है, लेकिन अलग रहकर हम उन्हें याद दिलाते हैं, तुम पुरुष हो, हम स्त्री।
एक ओर हम अधिकारों की बातें करते हैं, दूसरी ओर सुविधाएँ चाहते हैं। लगातार हम यह अनुभव कराते रहते हैं कि ''तुम अलग हो, हम अलग हैं ''व्यवहार में एक सहजता का अभाव दिखाई देता है।

स्त्रीत्व का अभिमान करें, स्त्रीत्व की रक्षा करें, मान करें,सम्मान करें , लेकिन उसे लगातार जताने की क्या आवश्यकता है ? महिला स्वयं ही खुद को व्यक्ति मानने के लिए जब तक राजी नहीं होगी, तब तक पुरुषों को दोषी ठहराने का उसे क्या हक़ है ?

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