२०१८

अपने बच्चों की जो कारगुजारियाँ दण्डनीय अपराध हुआ करती थीं, नाती-पोतों तक आते-आते वे बाललीलाओं में बदलकर क्षम्य हो जाती हैं । 
८ दिसम्बर 
वैसे देखा जाय तो हम सब में कुछ न कुछ अक्षमता होती है , लेकिन अपनी बाह्य सक्षमता के बूते पर अपने आप को सक्षम मानकर हम इतराते रहते हैं और कभी उनके बारे में नहीं सोचते जो बाह्य रूप से कुछ  मायनों में कमजोर होते हैं , लेकिन उनमें से ज्यादातर आंतरिक रूप से बेहद दृढ होते हैं ।

#संदर्भविश्वविकलांगदिवस

३ दिसम्बर

इतना मोह किसी भी चीज का नहीं होना चाहिए कि उसके बिना सब कुछ व्यर्थ-सा लगे । बंधन मुक्त होना ही अपरिग्रह है ।
२९ अक्टूबर

जब घरों के अंदर से धूल, कबाड़ , रंग की खुशबू बाहर आने लगे तो समझिये कि दिवाली समीप है

और सामान्य रूप से दो /तीन घंटे या इससे अधिक बिजली गायब होने लगे तो समझिये कि दिवाली एकदम समीप है । 
२५ अक्टूबर

 रूक्मा बाई इन दिनों लम्बी छुट्टी पर गई है । उसकी जगह बहू ललिता आ रही है । ललिता असाधारण प्रतिभा और क्षमता की धनी है । झाडू लगाते हुए उसी झाडू से घर की तमाम चीजें , यहाँ तक कि भारी-भरकम सोफा भी हिला सकती है । उसके जाने के बाद हो सकता है कि अखबार रसोई में और झाडू हाॅल में मिले । पच्चीस साल से संभालकर रखी क्रॉकरी की कोई जोड़ी बिछड़ जाय । सब्जी के छिलके किसी गमले में और स्काॅच बाइट वाशिंग मशीन के अंदर विराजमान हो । यह मुश्किल से एक हफ्ते की प्रगति है । परसो मैंने उसे खूब डांट लगाई और बोला -- कल से मत आना । कहने में क्या जाता है , एक दिन में मेरी हालत खराब हो गई ।

कल सुबह वह अपने आप ही आ गई । कहती है कि मुझे आपका स्वभाव पता चल गया है । मैं तरीके से काम करूंगी तो आप नहीं डांटेंगीं , बल्कि प्यार ही करोगी ।

इतनी असाधारण बुद्धि ! एक दूसरे के बारे में कहाँ तो हम पूरी जिंदगी नहीं जान पाते हैं और ये लड़की मात्र पांच दिनों में मेरा स्वभाव जान गई । 
१६ अक्टूबर

किसी नौकरी पेशा पर कोई आरोप लगता है तो उसे तुरंत प्रभाव से निलंबित कर दिया जाता है , लेकिन मंत्री आरोप लगाने वाले को ही कठघरे में खड़ा कर सकते हैं । आखिर वे कोई आम आदमी थोड़े ही होते है ।
१६ अक्टूबर

हिन्दी में कितना भी जोर से चिल्लाकर , कितनी भी बार , कितने भी लम्बे लम्बे वाक्य  बोलो -- तेरे घर में माँ बहन नहीं है क्या ? , तेरे में कीड़े पड़े , नर्क में जायेगा वगैरा वगैरा  , कोई फर्क नहीं पड़ा,  लेकिन अंग्रेजी के  दो शब्द , सिर्फ दो शब्द Me too ने बवाल मचा दिया ।

आखिर अंग्रेजी  हमारी अघोषित राष्ट्रभाषा जो है ।
१२ अक्टूबर

वे तो तब भी बोलीं थीं , बहरों ने अब सुना । #मी टू
१२ अक्टूबर

मी टू को लेकर अजीब-सी भ्रान्ति है कि यह पुरुषों के विरोध में अभियान है, जबकि यह कुछ पुरुषों द्वारा स्त्रियों पर  किये जा रहे अन्याय के विरुद्ध एक आवाज है.यह एक कृत्य का विरोध हैं, किसी समूह का नहीं.  ज्यादातर पुरुष यह समझने में  भी शायद विफल हैं कि घर से बाहर निकली कोई भी स्त्री यदा कदा ही सुरक्षित लौटती हैं, वह प्रतिदिन के हादसों को अपनी नियति मान कर बताती नहीं हैं, इसलिए यह समझ लिया जाता हैं कि उसके साथ कुछ नहीं होता हैं. यह भी समझ से परे है कि  कुछ पुरुष इसे लेकर बहुत वैयक्तिक क्यों  हो रहे हैं ? स्त्री और पुरुष दोनों  समाज के अंग हैं और दोनों की सहभागिता, विकास, आपसी सामंजस्य, प्रेम, सौहार्द्र से ही एक स्वस्थ समाज की रचना होती है. स्त्रियाँ और हमारे परिवेश की स्त्रियाँ इस अभियान की वजह से एकाएक मुखर हो गई है और पुरुष वर्ग शायद इसे पचा नहीं पा रहा है. बरसों बरस और उम्र के हर पड़ाव पर वे भुगतती रही हैं और अपनी जुबान उन्होंने अनेक कारणों से बंद रखी है. अब वे जागृत हुईं हैं और  उन्हें व्यक्त होने के लिए एक मंच मिला है, तो लावा फूट रहा है. यह कभी तो होना ही था. ये अभियान अगली पीढ़ी के लिए कितना सुखदायी होगा , यह भी सोचा जाना चाहिए. जो हम सब ने झेला, बर्दाश्त किया, वह  अब और किसी को न भुगतना पड़ें, यह कोशिश स्त्री-पुरुष दोनों को मिलकर करना होगी.  यदि पुरुष  स्त्री को अपनी प्रतिद्वंद्वी समझेगा तो वह एक  बार फिर अकेली पड़ जाएगी और तब स्थिति शायद ज्यादा विकट, ज्यादा भयावह होगी.
११ अक्टूबर

एक अस्त्र और आ गया , धर्म का । मी टू इसलिये क्योंकि तनुश्री क्रिश्चियन है । गजब के क्रियाशील लोग हैं !
११ अक्टूबर

सारी महिलाएँ झूठी हैं । सिर्फ नाम कमाने के लिए बोल रही हैं ।  आज तक किसी औरत के साथ कभी अन्याय हुआ है भला ? अन्याय तो उन पर हो रहा है , जिनके नाम सामने आ रहे हैं । संभलकर रहना भाई ! इस  बहाने कोई पुरानी दुश्मनी न निकाल लें । संदर्भ-- मी टू आंदोलन
११ अक्टूबर 

कैसी समानता, कौन-सी समानता ? इक्कीसवी शताब्दी में भी मनुष्य तक नहीं मानी जाती हैं हम। हम जो पढ़ी-लिखी हैं , नौकरी कर रही हैं , कंप्यूटर चला रही हैं ।

हमें अब अपने खुश रहने पर शर्म आने लगी है ।
१० अक्टूबर

स्त्री के लिए कुछ कहा तो आपत्ति, भाषा के बारे में कुछ कहा तो आपत्ति, किसी अन्य सामाजिक विषय पर आपत्ति। बस! फोटो लगाते रहें और इस सामाजिक माध्यम पर बने रहने का संतोष पायें ।
९ अक्टूबर

कुछ पढ़त मूर्ख स्त्री के समर्थन में लिखे हुए को पुरूष विरोधी मान लेते हैं । ऐसे कूढ़ मगज़ ही स्त्री का किसी न किसी तरह से शोषण करते हैं ।
८ अक्टूबर

ज्यादातर  कथाकार उपन्यास भी लिखते हैं , लेकिन कवि लम्बी कविता भले लिख ले , अब महाकाव्य लिखते दिखाई नहीं देते । ऐसा क्यों ?
४ अक्टूबर

फेसबुक का कोई दरवाजा हो तो मैं यह लिखना चाहूँगी कि अंग्रेजी को कृपया बाहर छोड़कर आयें ।
२ अक्टूबर

इंदौर को २०१९ में  भी यदि स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत पुरस्कार मिलता है , तो शहर के प्रत्येक उस नागरिक को मुआवजे के बतौर मुफ्त श्रवण यंत्र दिया जायेगा , जिसे "हल्ला बोल हल्ला" गीत मुखाग्र याद होगा । साथ ही जिसकी श्रवण शक्ति सबसे कमजोर होगी उसे "धैर्य और सहनशीलता" सम्मान दिया जायेगा । 

#स्वच्छ_भारत_अभियान_गांधी_जयंती_विशेष
२ अक्टूबर

आज सुबह जैसे ही नींद खुली ,याद आया कि कल ३० सितंबर और साथ में रविवार है , अर्थात शासकीय कार्यालय और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में अवकाश रहेगा , तो राजभाषा मास की अधिकृत समाप्ति आज ही होगी ।

उसी समय  एक प्रश्न भी मन में आया कि मेकॉले के पहले हमारे देश वासी क्या इशारों में बातचीत करते थे ?  यदि किसी भाषा का उपयोग करते थे , तो बोलचाल में  हमें सिर्फ मेकॉले की भाषा के शब्द ही क्यों याद आते हैं ?
२९ सितम्बर

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार  शबरीमाला मंदिर में अब महिलाएँ भी प्रवेश कर सकेंगी। ५ न्यायाधीशों में से ४ ने इसके पक्ष में और १ ने विरोध में मत दिया । विडंबना यह है कि विरोध महिला न्यायाधीश की ओर से हुआ ।
२८ सितम्बर

जली-कटी सुनी तो बहुत सारे लोगों ने होगी , लेकिन आज मैंने खायी । 

सब्जी (काटना ही पड़ती है) , जल गयी थी । 😁😁
२८ सितम्बर

हम महाराष्ट्रीय परिवारों में (दूसरों का मुझे पता नहीं)   मातामह श्राद्ध की परंपरा है । बेटी को संतान (बेटा-बेटी कुछ भी) होने पर वह अपने माता-पिता का श्राद्ध कर सकती है । सर्व पितृ अमावस्या को या घट स्थापना के पहले यह श्राद्ध किया जाता है । किस दिन करना है इसका उल्लेख  पंचांग में प्रतिवर्ष होता है । 

इस प्रगतिशीलता पर मुझे गर्व है ।
२५ सितम्बर

भोंडी आवाज के साथ बेसुरा गानेवाले ही , माइक पर सामूहिक आरती क्यों गाते हैं ?
२३ सितम्बर

#स्मृति

हमारे पुराने मकान के ठीक सामने  राशन की  एक दुकान थी,जहाँ से हम वक्त-जरुरत सामान ले लिया करते थे...मेरे पति उन दिनों अप-डाउन करते थे तो हफ्ते के हफ्ते ,हर रविवार उसके पैसे चुका देते थे..
मेरा बेटा चारेक साल का था,तब मेरी बहन आई हुई थी,वह उन्हें हाथ पकड़कर दुकान ले गया और दुकानदार से बोला- चाचा!ये मेरी मौसी हैं,ये कुछ मांगे तो दे देना और तुरंत मौसी की ओर मुखातिब होकर बोला-मौसी ! आप पैसे मत देना बाबा दे देंगे...

ऐसे ह्रदय स्पर्शी दृश्यों की हम अब कल्पना भी नहीं कर सकते....
१५ सितम्बर

मैं अधिकतर हिन्दी में ही लिखती हूँ , लेकिन जब कोई विषय मराठी या मराठी भाषियों से सम्बंधित होता तो कभी-कभी मराठी में भी लिखती हूँ । उस समय कोई न कोई 'कृपया हिन्दी में बताईए' या 'कुछ भी समझ नहीं आ रहा है' जैसी  टिप्पणी अवश्य करता है । 

इस तरह की दिक्कत मुझे भी आती है , जब कोई अंग्रेजी में लिखता है , क्योंकि इस विदेशी भाषा में मेरा हाथ जरा तंग है , किन्तु मैं कभी भी ऐसी टिप्पणी नहीं कर पाती जिससे यह पता चले कि मुझे अंग्रेजी नहीं आती , क्योंकि  अंग्रेजी नहीं आना यानि अनपढ़ यह हमारे देश में प्रचलित एक अलिखित परिभाषा है।

 इसके विपरीत उच्च शिक्षित लोग क्षेत्रीय भाषा तो दूर , हिन्दी नहीं आती यह भी बड़े गर्व से बताते हैं ।

#हिन्दी# #दिवस# #दिखावा#
१३ सितम्बर

सैंडविच, पिज्जा आदि आधे काटकर परोसे जाय तो सजावट कही जाती है और परंपरागत महाराष्ट्रीय थाली में परोसी आधी रोटी उपहास का पात्र बनती है । 

घर का जोगी जोगड़ा , आन गाँव का सिद्ध . ......
१० सितम्बर

लगभग चालीस वर्ष पूर्व 'चल मेरी लूना' के साथ दुपहिया चलाना शुरू किया था । वाहन चलाने का सिलसिला ७/८ साल पहले मारूति 800 इस चौपहिये पर आकर रूका , लेकिन कभी भी गलत दिशा में चलाने की न तो इच्छा हुई, न हिम्मत और न ही जरूरत महसूस हुई । 

आज सुबह पैदल चलते हुए किसी कारण से दाहिने तरफ चलना पड़ा । अक्सर मैं अपने-आप को बचाते हुए चलती हूँ ।सामने से आ रहे  वाहन चालक आज मुझे बचा रहे थे । मजा आ गया । 
७ सितम्बर

आज कौन बनेगा करोड़पति में डाॅ . प्रकाश और मंदाकिनी आमटे आमंत्रित थे । उन्होंने बताया कि पिछले ४५ सालों से आदिवासियों के बीच काम कर रहे हैं , लेकिन आज तक एक भी बलात्कार नहीं हुआ है । वे गरीब हैं , किन्तु कोई भी भीख नहीं मानता ।
७ सितम्बर

अंग्रेजी में हाथ तंग है,लिहाजा अखबार हिन्दी का ही पढ़ने को बाध्य हूँ , लेकिन जिस तरह की भाषा अखबारों में होती है ,उसे देखते हुए लगता है कि अगले कुछ वर्षों में हिन्दी सीखने की नौबत  आ सकती है ।
३ सितंबर

पुलिस , प्रशासन

पत्रकार , चिकित्सक

और ......

और ......

गृहिणी को कभी छुट्टी नहीं होती !
२६ अगस्त

सूप बनाना हो तो मैं लौकी के खूब बड़े बड़े टुकड़े कुकर में चढ़ा देती हूँ , लौकी गल भी जाती है। कल यही प्रयोग कद्दू के साथ करके देखा , वह नहीं गला । 

स्त्रीलिंग- पुल्लिंग में भेद हर जगह विद्यमान है । 
२५ अगस्त

पैसा आणि प्रसिद्धि मिळत असेल तर महेश काळे सुद्धा 'निरागसपणे' नाचू शकतो . 

कल समाचारों से पता चला कि संतूर लक्स को पीछे छोड़कर एक पायदान ऊपर चढ़ गया है । अब मुझे उन बच्चों की चिन्ता हो रही है , जिनकी माँएं संतूर लगाती हैं ।
उन्हें दिन में कितनी बार 'मम्मी' कहते हुए दौड़कर आना पड़ेगा ?
२३ अगस्त

स्वच्छ भारत अभियान में इंदौर के नागरिकों ने  स्वच्छता के सारे मापदण्डों का पालन किया , उसके लिए तो वे प्रशंसा के पात्र हैं ही , साथ ही 'हल्ला बोल हल्ला' इस गीत को तेज आवाज में भोर से लेकर आधी रात तक बिना किसी शिकायत के सुना और अभी भी सुन रहे हैं , इसके लिए अलग सम्मान के भी अधिकारी हैं । 
२३ अगस्त

आओ कहा तो आयेंगे नहीं , जाओ कहा तो जायेंगे नहीं , रूको कहा तो रूकेंगे नहीं ।

मौसम हो या इंसान, सबकी  एक ही फितरत होती है ।
२३ अगस्त

तली हुई चीजों में अपना कोई खास स्वाद नहीं होता । तलने की सुगंध और साथ में रखी चटनी ही वे चीजें खाने को प्रेरित करती हैं और सारा दोष बिचारे समोसे , कचौरी , मंगौड़ों, पकौड़ों के माथे आता है । 

हर जगह यही आलम है । असली गुनहगार साफ बच निकलते हैं । 
२१ अगस्त
यदि आप पहुँचने की जगह पहुंचते हैं तो कोई बात नहीं , फँसने की बजाय फंसते हैं , तब भी कोई बात नहीं , लेकिन जब आप हँसने के स्थान पर हंसते हैं तो सोचना पड़ता है कि आप मनुष्य हैं या हंस ?
१७ अगस्त 
कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है । हमारी विद्युत कंपनी इस सूक्ति पर विश्वास करती है । अगले वर्ष की गर्मियों के लिए पानी चाहिए तो इस वर्ष की बारिश में बिजली नहीं मिलेगी । सीधी बात , कोई लाग लपेट नहीं ।
दो में से क्या तुम्हें चाहिए -- बिजली या पानी ? तय कर लो । यदि बारिश की कामना है तो चलो ! उजाले से अंधेरे की ओर ....
१७ अगस्त 
दक्षिण भारत के नेताओं के समय कुछ ऐसा जन समूह दिखता है , लेकिन उसमें एक उन्माद होता है ।
इतना शांत जन सैलाब उस व्यक्तित्व को  प्रतिबिंबित कर रहा है ।
जो व्यक्ति पिछले दस साल से परिदृश्य से बाहर था , उसके लिए इतना बड़ा जन सैलाब और वह भी अधिकतर युवा जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें देश  और राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है ।
सच्चे अर्थों में महामानव , काल के कपाल पर विराट हस्ताक्षर
१७ अगस्त 

घर के बड़े बुजुर्ग कुछ न करें , मात्र बैठे रहें तब भी हिम्मत बनी रहती है । आज वह हिम्मत टूटती लग रही है ।
अपने अथक प्रयासों से हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रवेश करवाने वाले वे एकमात्र नेता थे ।
अटल सत्य को जीवन में कई बार स्वीकार किया है , लेकिन अटल जी के बारे में सोचना भी मुश्किल लग रहा है । 😢
सादर नमन, अटल जी !
१६ अगस्त
रात भर झमाझम बारिश हुई । मैं अच्छे से ओढ़कर सो गई । विद्युत विभाग भी सो गया । सुबह ५.३० बजे मेरी और उनकी नींद एक साथ खुली ।

 उन्हें याद आया कि रात भर बारिश हुई और बिजली चालू थी । यह तो जनता के साथ घोर अन्याय है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तो इस तरह का अन्याय कदापि नहीं होना चाहिए। 

अब इस अन्याय का विद्युत विभाग को पश्चाताप हो रहा है । प्रायश्चित स्वरूप सुबह ५.३० बजे से वितरण बंद है । 😊😊😊
१६ अगस्त

हमारे यहाँ राष्ट्र भक्ति का भाव सबके मन में है , लेकिन उस भाव का जतन कोई और करे , यह भावना भी साथ-साथ चलती है ।
१५ अगस्त 

उत्साह भरोसेमंद नहीं होता , कभी भी छोड़कर चला जाता है । आलस भक्त होता है । कितना भी भगाओ, दुत्कारो फिर फिर लौट आता है , इसीलिये बहुत लाड़ला है मेरा । मैं उसके बिना नहीं रह सकती ।
१५ अगस्त 

#सावधान#

मेरे घुटनों में खराबी आ गई है !

( सुना है कि औरतों का दिमाग घुटनों में रहता है , इसलिये .....)

८ अगस्त

मित्रता एक मात्र ऐसा रिश्ता है , जो अनौपचारिक होता है। पीठ पर धौल जमाओ , चाहे बिना पूछे थाली में से कौर उठाकर खाओ , मित्रता ही होती है जो बनी रहती है । पश्चिम में  रिश्तों को टिकाऊ बनाने के लिए शायद जुगत करना पड़ती है , पर हमारे यहाँ तो ऐसा नहीं है । सामान्यतया रिश्ते बरसो बरस चलते हैं । बाकी सारे रिश्ते भी दिवस के फेर में उलझे हैं ही , मातृ दिवस , पितृ दिवस आदि आदि । मित्रता को तो कम से कम इस औपचारिकता में न बाँधते । 

हर बात की नकल करने से न तो विश्व बैंक का ऋण माफ होने वाला है और न ही पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद रूकना है । वीजा के नियम भी नहीं बदलने वाले और न ही रूपये की कीमत बढ़ने वाली है ।

हाँ , नकल करने से पहले यदि कुछ रूककर सोच लेंगे तो बहुत कुछ बदल सकता है ।
५ अगस्त

आये दिन बोरवेल में बच्चा गिरने की खबरें आती रहती हैं और फिर वहाँ सेना तैनात होती है । किसी की भी जान बचाना निःसंदेह जरूरी है , लेकिन यह सेना का दुरुपयोग नहीं है ? बोरिंग खोदकर खुला छोड़ देनेवालों से रक्षा मंत्रालय ने तगड़ा दंड वसूलना चाहिए ।

सेना की ऊर्जा और हमारे द्वारा दिये जानेवाले कर , मूर्खों की कारगुजारी पर खर्च करना कहाँ की बुद्धिमत्ता है ?
२ अगस्त

वह छुटकी अक्सर पिता के साथ आते-जाते मिल जाती है । शुरू में दो-तीन बार पिता ने सिखाया - दादी से नमस्ते कहो , तबसे दिन में कितनी ही बार दिखने पर हर बार वह मीठी-मीठी, दादी  नमस्ते  बोलती । कल शाम को वह माँ के साथ थी । लिफ्ट में मैंने और उसकी माँ ने मामूली बात की । लिफ्ट से निकलने के बाद माँ ने आदतन 'बाय आंटी' कहा तो छुटकी की ओर से आदेश आया -- दादी से नमस्ते कहो ! 😁😁
३० जुलाई

कई बार  होता है कि खाना शुरू करते हैं , तभी दरवाजे की घंटी बजती है या किसी का फोन आ जाता है या फिर कोई महत्वपूर्ण संदेश चमकता है ।

 ऐसे मौकों पर दाल-चावल  जरूर सोचते होंगे कि बीच में ये कंकर कहाँ से आ गया ? 😁😁
२८ जुलाई

जब खाना बनाना सीखा था तब गैस पर कढ़ाई चढ़ाकर उसमें तेल डालती थी और फिर सेंकना, भूनना , तलना आदि क्रियाएं चलती थी , लेकिन अब फ्राइंग पॅन चढ़ाकर उसमें ऑइल डालती हूँ और विभिन्न खाद्य सामग्री को सोते करती हूँ, फ्राय करती हूँ , डीप फ्राय करती हूँ । 
समय के साथ मेरे रंग रूप में परिवर्तन आया वैसे ही खाना बनाने का तरीका भी बदल गया । 😁😁😁
२६ जुलाई 

अस्सी के दशक में जब मैं प्रेस रिपोर्टर थी, तब घर लौटने में कई बार रात के 10/11 बज जाते थे । उन दिनों लड़कियाँ तो क्या लड़के भी इतनी देर तक सामान्यतौर पर घर से बाहर नहीं रहते थे । किसी पान की गुमटी पर इक्का दुक्का कोई दिखता था। वे मेरी ओर कौतूहल से देखते थे, किसी की खराब नज़र से भी सामना हो जाता था । ऐसे समय पल्लू में छिपा मंगलसूत्र बाहर निकालना काफी होता था । वह व्यक्ति तुरंत अपनी नज़र घुमा लेता था । 

अभी जो लोग महिलाओं को हिम्मत जुटाने की , देवी का रूप धारण करने की , मार्शल आर्ट सीखने आदि की समझाइश देते हैं , वे पुरूष को पुराने दिनों का चारित्र्य अपनाने की सीख क्यों नहीं देते ? 

मैंने अपनी युवावस्था में 17 वर्ष  तमाम पुरूषों के बीच अकेले काम किया । सड़कों पर अकेली घूमी । रात बेरात अकेली घर लौटी , लेकिन  एक भी बार मुझे कोई खराब अनुभव नहीं आया । शहर में तो फिर भी थोड़ी बहुत रौनक, चहल-पहल, आवाजाही होती थी लेकिन  पलासिया क्षेत्र तब शहर से बाहर हुआ करता था और मेरा घर वहाँ से करीब ढाई किलोमीटर अंदर था । इतना भर होता था कि पलासिया के बाद लूना की गति बढ़ जाती थी और सुनसान सड़क पर कोई अनजान पुरूष भी दिखे तो डर नहीं , बल्कि राहत महसूस होती थी ।

इस तरह का विश्वास आज किसी पुरूष को देखकर क्यों नहीं जागता ? जो लोग महिलाओं को महिषासुर मर्दिनी होने की सीख देते हैं , वे कुछ सीख पुरूषों को भी दें । समाज और उसकी जिम्मेदारी दोनों घटकों पर है । जो स्वस्थ मानसिकता 40 वर्ष पहले थी , उसे एक पीढ़ी ने कैसे गंवा दिया , अब यह सोचना भी जरूरी है ।
२३ जुलाई

पीछे की ओर निम्न मध्य वर्ग की बस्ती है । कल रात को एक घर में चोरी हुई । चोर जानता था कि दरवाजे को बाहर की तरफ से तिरछा करके अंदर की कुंडी खोली जा सकती है । उसने पति का मोबाइल उठा लिया और पत्नी का उठाने ही वाला था कि आहट से उस महिला की नींद खुल गई । वह चिल्लाई तो चोर भाग गया । 

सुबह उसी की चर्चा जोर जोर से चल रही थी । अधिकांश महिलाओं का जोर इस बात पर था कि भले ही चोर पत्नी का भी मोबाइल ले जाता , लेकिन उसे चिल्लाना नहीं चाहिये  था । चोर उसके साथ जोर जबरदस्ती करता तो ? पास में बच्ची भी तो सो रही थी । उसके साथ भी कुछ हो सकता था । 

महिलाओं की चिन्ता जायज थी । महिलाएँ हर समय और हर जगह कितना असुरक्षित अनुभव करती हैं , इसका यह एक दुखद उदाहरण है ।
२३ जुलाई

युगों युगों से खड़े हैं तो    आराम की जरूरत आपको भी पड़ती ही होगी । हम कभी आवाज दें तो सुन लिया करें, बस यही अनुरोध है ।
२३ जुलाई

अपनी मांगें मनवाने के लिये जो लोग दूध,फल,सब्जी आदि व्यर्थ फेंकते हैं, उन्हें भी भीड़ के द्वारा उपद्रव (माॅब लिंचिंग) कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए ।
२० जुलाई

मैं मराठी भाषी हूँ, लेकिन हिन्दी में अभिव्यक्त होना  सरल, सहज लगता है और उस लिहाज से हिन्दी मुझे मातृभाषा लगती  है । किन्तु मेरे देश में मुझसे कई गुना अधिक ऐसे लोगों की तादाद है, जिनकी मातृभाषा अंग्रेजी लगती  है । 😊😊
२० जुलाई

टीवी धारावाहिकों की गरीब औरतें कलकत्ता,महेश्वरी, बाघ,चंदेरी आदि की सूती साड़ियाँ पहनती हैं , जबकि हमें तो इनका रख रखाव तक महँगा लगता है ।
१७ जुलाई

अभी मौसम कुछ ठंडा हो गया है , तो दिनभर पैरों में मोजे पहने रहती हूँ और रात को सोते समय उतार देती हूँ । कल रात को लाइट बंद करने से पहले भूल गई तो अंधेरे में ही मोजे उतारे और तकिये के नीचे दबा दिये । सुबह उठने पर देखा तो गायब । पलंग पर रखी किताबों में तो नहीं दब गए ? ओढ़ने की चादर में ? पलंग के नीचे ? खूब ढूंढा , कहीं नहीं मिले। हारकर दूसरे पहन लिये । सुबह से ही दुखी हो गई । दुख दो थे , एक तो  रात भर में मोजे कहाँ चले गये ? दूसरा , सुबह बिना नहाये धुले हुए मोजे पहनना पड़े । धुले हुओं ने मेरे बारे में पता नहीं क्या सोचा होगा ?

खैर, नहा धोकर नाश्ता किया और रोज की तरह जरा देर के लिये पलंग पर लेटी तो  तकिया कुछ अजीब सा लगा । उसको उल्टा-पुल्टा किया फिर भी बात बनी नहीं । आखिर पड़े पड़े ही उसे फेंका और पास से दूसरा उठा लिया । 

अभी जैसे ही उठी तो उस तकिये की गिलाफ में से रात के मोजों का एक अंगूठा झांक रहा था । 😊😊

हे बुढ़ापे ! तुझे सलाम .....
१४ जुलाई

प्रति सप्ताह असंभव के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा देने वाला स्वयं अपनी लड़ाई हार गया । अपने से कनिष्ठ जब इस तरह अकस्मात चले जाते हैं तो उन्हीं के शब्दों में "विश्वास करना असंभव है , पर करना ही होगा ।" दैनिक भास्कर के समूह संपादक कल्पेश याग्निक का अवसान यानी एक युग का अंत है.....

श्रद्धांजलि .....
१३ जुलाई

#स्टार# #वाहिनी# की अनुकरणीय पहल

२३ जून २०१६ को मैंने ये लिखा था 

"फ़िल्में हों या टीवी धारावाहिक, स्त्रियों पर हाथ उठाना, उनसे दुर्व्यवहार, चली जा मेरे घर से जैसे वाक्य दिखाना आम बात है.  घरेलू हिंसा कानूनन अपराध है. सेंसर बोर्ड के कई नियम हैं , उन्हीं नियमों के अंतर्गत स्क्रीन पर धूम्रपान या शराब के बारे में टिप्पणी लिखी आती है , वैसी ही टीप घरेलू हिंसा के लिए क्यों नहीं लिखी जाती ? आज तक इस बारे में  क्यों नहीं आवाज उठाई गई ? खुद सेंसर बोर्ड भी इस बारे में जागरूक नहीं है." 

आज उस पर हुआ क्रियान्वयन देखा । छाया चित्र देखें ।

पिछले साल मैंने कौन बनेगा करोड़पति में प्रतिभागियों द्वारा अमिताभ बच्चन के पैर छूने पर, उनके द्वारा मना करने को गलत कहा था क्योंकि बड़ों के पैर छूना हमारी संस्कृति का हिस्सा है । उस पर भी २/३ दिन बाद अमल हो गया था । 

हम लोग अक्सर सामाजिक माध्यमों और टीवी के कार्यक्रमों की निंदा करते हैं , पर हम हमेशा सही नहीं होते , यह समय समय पर साबित होता रहता है ।
१३ जुलाई

कोई पारिवारिक मांगलिक अवसर हो या कोई सामाजिक सांस्कृतिक कार्यक्रम , आजकल कोई किसी को निमंत्रण देने नहीं जाता । सब लोग सिर्फ कार्ड बाँटने जाते हैं ।
#भाषा# #क्षरण# मार्फत समाज
१० जुलाई 

अभी यूँ ही अपना जीवन वृत्त (प्रोफाइल) देख रही थी तो सोचा क्यों न इसे हिन्दी में लिखा जाय.फेसबुक ने भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त तो स्वीकार कर लिया , लेकिन worked at में भारतीय स्टेट बैंक को यह कहकर नकार दिया कि your  company  name  is  not  valid  ..... 

मुझे बड़ा गुमान था  कि मैंने भारत के सबसे बड़े और विश्व में  पांचवे क्रम पर स्थित एक सरकारी बैंक में काम किया है.
६ जुलाई 

पिछले साल नातिन आई थी तो उसने मेरे पुराने मोबाइल में कुछ गेम्स डाऊनलोड किये थे । आज सोचा दिनभर टीवी देखने की बजाय वे गेम खेले जाय । टीवी देखने की आदत पिछले ३५ साल से है , गेम्स पहली बार खेले तो आँखें दुखने लगी । बेचारे बच्चे सारा सारा दिन कैसे खेलते हैं ?  😁😁
२२ जून 

जीवन के अंतिम पड़ाव पर बाह्य रूप में काफी कुछ नकली हावी हो जाता है । नकली आँखें , नकली दांत , नकली यानी रंगे बाल या विग , नकली कान , नकली हाथ-पैर आदि आदि , जबकि उम्र के इस दौर में देह और मन की यात्रा शुद्धता की ओर होना चाहिए , लेकिन मन भी नकली व्यवहार करता है । नकली हँसी,नकली खुशी, नकली संतुष्टि और नकली सन्यास। मोह-माया में फँसा मन इन सारी दुविधाओं से पार हो ही नहीं पाता और बारंबार पीछे मुड़ मुड़कर, ऐसे देखता है जैसे पहली बार विद्यालय जानेवाला  कोई छोटा बच्चा । पीएचडी हासिल करने के बाद अ अनार का और आ आम का कोई पढ़तमूर्ख भी याद नहीं करता , करना भी नहीं चाहिए । 
मन से बड़ा बैरी कोई नहीं होता ।
२२ जून 

पहली घंटी बजती है -साॅरी आंटी ! सुबह-सुबह आपको परेशान कर रही हूँ । आप घर पर ही हैं न ? आज मेरी बाई देर से आयेगी, ये चाबी उसे दे देंगी , प्लीज ?
दूसरी घंटी -- आंटी , आंटी आप घर पर ही हैं न ? गैस की टंकी आना है । उसको मैंने संडे का बोला था , पर आया नहीं । चाबी दे दूं ? आप रखवा देंगी ?
तीसरी घंटी -- आंटी , आप घर पर ही हैं न ? वो ड्राइवर चाबी दे जायेगा । बाकी शाम को बात करती हूँ ।
थोड़ी थोड़ी देर बाद फिर तीन घंटी -- बाई , ड्राइवर , गैस 
शाम को धन्यवाद ज्ञापन के लिए फिर तीन घंटियाँ ।

इन तीन घंटियों के बदले कितना कुछ मिलता है ।
 लिफ्ट में सिर्फ आधा किलो सब्जी भी हाथ में हो तो एक हाथ आगे बढ़ता है -- लाओ आंटी ! मुझे दे दो ।
आंटी आपका एसी नहीं चल रहा था तो बताना था । मैं चाबी दे जाती । दोपहर में कितनी गर्मी थी , इधर ही आराम कर लेती ।
आंटी तबियत ठीक नहीं है क्या ? थकी थकी- सी लग रही हैं ? खाना खाया कि नहीं ? चाय काॅफी कुछ बना दूं ?
१९ जून 
"सांसारिक मोह माया से मुक्त"  संत इस शब्द की यह एक साधारण परिभाषा पता थी , लेकिन इन दिनों एक संत दुष्कर्म की सजा भुगत रहे हैं , एक संत इस आरोप के साथ फरार है , एक ने अपनी इहलीला समाप्त कर ली है । क्या इन्हें और इनके जैसे ही अन्य व्यक्तियों को संत  कहा जाना चाहिए ? संत की उपाधि इन्हें कौन देता है ? क्या इसाईयत की तरह हिन्दू धर्म में भी कुछ मापदण्ड हैं ?  या कुछ लोगों की देखादेखी बाकी लोग भी इसी उपाधि से पुकारने लगते हैं ? या असाधारण व्यवहार वाले किसी भी व्यक्ति को हम साधारण बोलचाल में संत कह देते हैं , यह उसीका नतीजा है ?
मुझे पता है कि इस परिच्छेद को पढ़कर कुछ लोगों को उबाल आ जायेगा  , किन्तु मेरे मस्तिष्क को ये कुछ प्रश्न लगातार मथ रहे हैं , जिन्हें  ये  निरर्थक, बेतुके , वाहियात, अहंतापूर्ण , गिरोहवादी वगैरे वगैरे लगते हों , उन्हें ये लगा करें । मुझे जो कहना है वह मैं कहती रहूंगी ।
१४ जून 
वे एक खुश मिज़ाज महिला हैं , लेकिन कल उनके घर गईं तो कुछ उखड़ी-सी लगी । मैंने पूछा तो बोलीं -- कुछ नहीं , इन दिनों खर्चा बहुत हो रहा है । तभी उनकी बेटी बोली -- मौसी , माँ बेकार परेशान होती रहती है । पैसा खर्च करने के लिए ही तो होता है । उन्होंने प्रतिवाद करते हुए धीरे-से कहा -- खर्च करना और खर्च होना अलग अलग होता है बेटा ! 
सचमुच , शब्दों का अपना महत्व होता है ।

७ जून 

बरसों से चले आ रहे पुरूष सत्तात्मक समाज के काल बाह्य हो चुके या काल बाह्य करने योग्य सोच, रीति-रिवाज, परम्पराएँ, चलन, कथन , मुहावरे, कहावतें आदि के बारे में लिखने का अर्थ सीधे-सीधे पुरूष विरोधी मान लिया जाता है , जबकि जो भी महिला लिखती है उसका भी घर परिवार , पिता , भाई , पति , पुत्र होते हैं , इस बात को आसानी से या  जानबूझकर भुला दिया जाता है । यहाँ तक कि हमारी देशज परम्पराओं और संस्कृति के अनुरूप सामाजिक माध्यमों पर भी 
 दीदी, बहना, आंटी , ताई, माताजी, दादी , भैया, दादा , अंकल जैसे नितांत पारिवारिक संबोधन महिला पुरूष एक दूसरे को देते हैं और निभाते हैं , लेकिन कुछ लोग खासकर पुरूष एक नकारात्मक सोच के साथ  स्त्री विरूद्ध पुरूष वातावरण बना देते हैं ।
प्राचीन व परम्परागत बातों का कोई विरोध नहीं है , वे तत्कालीन समय के अनुसार सोच समझकर ही बनाई गई होंगी , लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि उनके बारे में पुनर्विचार किया ही न जाय । 
पत्थर मारने या गोबर फेंकने से न कोई स्त्री रूकी है और न ही रुकेगी ।
६ जून 
सदा सुहागन रहो , यह आशीर्वाद है या शाप ? शाब्दिक अर्थ तो यही हुआ न कि पहले तुम्हें मृत्यु प्राप्त हो !
५ जून 
वह लड़की बस में चढ़ी ही थी कि बस चल पड़ी । उसका संतुलन बिगड़ गया । एक /दो लड़कियों ने उसे संभाला । महिलाओं ने पूछा बेटी कहीं चोट तो नहीं आई ? दो/तीन पुरूषों ने ड्राइवर को डांट लगाई लेकिन उस लड़की का सवाल था --मेरा मोबाईल ? 
वहीं पड़ा था , मिल गया । 
पुरानी कहानियों में एक राजा हुआ करता था , जिसके प्राण तोते में बसते थे । अब प्रजा के प्राण मोबाईल में बसते हैं । 
५ जून 

पिछले पन्द्रह दिनों से जल वितरण में कटौती चल रही है , गाहे-बगाहे बिजली चली जाती है, दो दिन बैंकों की हड़ताल थी , सीएनजी  उपलब्धता में कमी की वजह से ऑटो रिक्शा नहीं मिल रहे , कल से किसानों की हड़ताल की वजह से दूध , सब्जी , फल वगैरह की अनुपलब्धता संभावित है । 

शायद सभी ने यह मान लिया है कि जीने के लिए सोशल मीडिया ही काफी है ।
३१ मई

पानी की तरह पैसा बहाना, इस मुहावरे का प्रयोग बंद होना चाहिए । इससे यह प्रतिध्वनित होता है कि पानी तो बहाने की ही चीज है। अब  पैसे की तरह पानी की बचत का सिद्धांत प्रचलन में आना चाहिए । जब तक पानी को संपत्ति नहीं माना जायेगा , तब तक उसके राष्ट्रीय संपत्ति होने की अवधारणा गले नहीं उतरेगी ।
२६ मई

एक सामान्य वार्तालाप -- आप क्या करती हैं ?
कुछ नहीं , हाऊस वाइफ हूँ।
अब इसमें से 'कुछ नहीं' हटाने की आदत डालना चाहिए। गर्व से कहो "मैं गृहिणी हूँ और सब करती हूँ ।"
२५ मई

मुझे उन स्त्री पुरूषों से ईर्ष्या होती है , जो अपने ही घर में मेहमान की तरह निर्लिप्त भाव से रहते हैं ।
२५ मई

कुछ लोगों को यह पढ़कर विश्वास नहीं होगा कि अस्सी
 के दशक की शुरुआत में जब मैंने मोपेड खरीदी,पेट्रोल 5 रू लीटर था। तब लगता था कि बाप रे 100 रू महीने का खर्च बढ़ जायेगा।
२२ मई
सुबह-सुबह  उघाड़े बदन, सिर्फ बरमूडा पहनकर, पोर्च या बालकनी में जो लोग कसरत करते हैं उनके लिये किसी संस्था, धर्म गुरू, राजनेता आदि का कोई निर्देश ???
२२ मई

चलिये ! स्वच्छता में तो दोबारा प्रथम क्रमांक आ गया , लेकिन बाकी बातों का क्या ? अभी भी कितने ही घरों में पानी नहीं पहुंचता है, फल सब्जी के ठेले आड़े-तिरछे कहीं भी खड़े रहते हैं , यातायात संकेतक बंद हो तो कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होती , पुलिस भी नहीं दिखती , रिक्शा चालक बिना मीटर के चलते हैं और मनमाना किराया लेते हैं , भवन निर्माण की सामग्री यत्र-तत्र सर्वत्र दिखाई देती है, चुपके-चुपके पॉलीथीन की थैलियों का उपयोग जारी है ........ और ये सूची लम्बी है ।
१९ मई

बचपन की शरारतों में भविष्य का कितना सारा आकलन छिपा रहता था । जैसे खेलेंगे भई खेलेंगे नहीं तो खेल बिगाड़ेंगे 
१७ मई 

मैंने भाजपा के समर्थन में कुछ लिखा तो भाजपाई  हो गई, भाजपा के विरोध में कुछ लिखा तो कांग्रेसी हो गई. वामपंथ के विरोध में कुछ लिखा तो दक्षिणपंथी हो गई.ईश्वर के बारे में अपने विचार व्यक्त किये तो वामपंथी या नास्तिक हो गई.स्त्री के लिए कुछ कहा तो तुरत पुरुष विरोधी तमगा मिल गया. साहित्य  जगत में उठती बैठती हूँ , उस जगत की कोई बात कही तो साहित्य में राजनीती लाने का लांछन लगा. मुस्लिमों के पक्ष में खड़ी रही  तो हिन्दू और हिंदुत्व  विरोधी (जबकि हिन्दू और हिंदुत्व दो अलग बातें हैं) कहलाई. 

कुल मिलाकर यह कि एक सामान्य नागरिक या व्यक्ति के रूप में सारे आयामों के बारे में  सोचना नहीं चाहिए. कट्टर बने रहना चाहिए और यदि सोच भी रहे हैं तो उसे खुले मन से व्यक्त नहीं करना चाहिए. 

आडम्बर में जीने की कला ही जीवन की कला है. यह मर्म बहुत पहले समझ आ गया था, पर उस पर अमल करना संभव नहीं हो पाया यही अंतिम सत्य है.
१६  मई

श्रम विभाजन शुरू से ही गलत आधार पर हुआ है. परिवार  जब सबका है तो श्रम का विभाजन भी घर के काम और बाहर के काम इस तरह होना चाहिए, न कि स्त्री के काम और पुरुष के काम.
१६  मई 

अलग अलग धर्म क्षेत्रों के अलग अलग घोष वाक्य होते हैं जैसे जय माता दी , जय जय रामकृष्ण हरि , ज्ञानबा तुकाराम आदि । अब मानसरोवर का घोष वाक्य होगा -- नमो , नमो …
१५ मई

बालकवि बैरागी चूंकि कांग्रेस से सम्बद्ध थे अतः अन्य विचारधारा वाले "साहित्यकार" और उनके "साहित्यिक" समूहों ने श्रद्धांजलि देना भी मुनासिब नहीं समझा ...

 ढीठता की कोई सीमा नहीं होती ।
१४ मई

प्रदर्शनकारी कलाओं यथा नाटक,धारावाहिक, फिल्म आदि में बौने, हकलानेवाले, किन्नर वगैरा शारीरिक कमी के पात्रों को हास्य पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. किसी की कमी  को  हँसी का विषय कैसे बनाया जा सकता है ? और सामान्य जनों को उस पर खिलखिलाकर हँसी कैसे आती है ?
१० मई

वे   डेढ़ वर्षीय बेटे को लेकर अपने एक सहयोगी के घर गईं ।  बेटे से सहयोगी की  चार माह की बेटी का परिचय करवाया -- देखो! तुम्हारी गर्लफ्रेंड है । क्या इतने छोटे बच्चे के मन में इस तरह के बीज बोना  उचित है ?
६ मई 

मुझे सामान्यतया धारावाहिक देखना पसंद है ,क्योंकि बीच में महीना / पन्द्रह दिन नहीं देखें तो  कहानी भी आगे नहीं बढ़ती है। बस, एक-दो पात्र घटते बढ़ते हैं । यदि कहानी मेरे लिए रूकी रहती है तो इतना बर्दाश्त करना मेरा भी फर्ज बनता है।
५ मई 

यात्रा में हूं । जुड़वा २ चल रही है । फिल्म में कुछ ही घंटे पहले पैदा हुआ बच्चा करवट ले लेता है । ऐसे सुपर बच्चे कहाँ होते हैं ? 😊😊
४ मई

ईश्वर के बाद यदि कोई सर्व व्यापी है तो वह  है बाल. रसोई से लेकर स्नानगृह तक और बैठक खाने के सोफे से लेकर शयन कक्ष के पलंग तक कहीं भी पाए जाते हैं.मच्छर, तिलचट्टे, छिपकली आदि की तरह उनको नष्ट नहीं किया जा सकता , वे ईश्वर की तरह ही अविनाशी होते हैं. 😀😀😀
१ मई 
मजदूर दिवस बीत गया. एक बात कई दिनों से कौंध रही है. आते जाते अक्सर सड़क पर अलग अलग काम करते मजदूर दिख जाते हैं. बाकी मौसम में तो ठीक, लेकिन  एसी कार में बैठे बैठे, भरी गर्मी की दोपहर में  उन्हें काम करते देख अपने आप पर शर्म आने लगती है. क्या गर्मी के दिनों में उन्हें भोर में ४.०० बजे से काम पर लगाकर ११.०० बजे तक छुट्टी नहीं दी जा सकती ? उन्हें पसीना पसीना देखकर अंग्रेजों के कोड़े याद आते हैं और अनायास आँख भर आती है. मजदूरी करके पेट भरना कोई गुन्हा तो नहीं है.
१ मई
तवे से आखिरी रोटी उतारने के बाद आज भी उतनी ही राहत महसूस होती है, जितनी पहली बार रोटी उतारने पर अनुभव हुई थी। 
२८ अप्रैल 

उसने खाना नहीं खाया ।
वह कुर्सी पर बैठा है ।
वह रो रहा है । कितना महिमामंडन !! पहले भी यह होता रहा है कि किसी ने बिरयानी खाई, किसी ने चने की दाल और सूखी रोटी खाई । दरी पर सोया, मटके का पानी पिया । 

वितृष्णा होने लगी है । मन होता है, सारे संचार माध्यमों से अपने-आप को बरी कर लिया जाय ।
२५ अप्रैल

उन महिलाओं को अब आगे आना चाहिए जिनके घर-परिवार के पुरूष इन घिनौनी हरकतों में संलिप्त हैं । उन महिलाओं के सशक्त होने की जरूरत है , जैसे कई स्थानों पर शराब बंदी के लिए महिलाएँ खुलकर आगे आईं और गांव को शराब मुक्त किया । हमारी सामाजिक संरचना ऐसी है कि जिन परिवारों के पुरूष ऐसे अपराध करते हैं , वहाँ भी परिवार की महिलाएँ ही अपराध बोध से ग्रसित होती होंगी । उन्हें समुपदेशित कर बाहर लाना होगा , ताकि वे उन पुरूषों को लांछित, प्रताड़ित कर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाल सकें । तभी एक महिला का आंचल खींचकर , दूसरी महिला के आंचल में छिपने की अपराधी की मानसिकता को छेदा जा सकेगा ।
२१अप्रैल

पीड़ित १२ वर्ष से कम हो तो अपराधी को मृत्युदंड और १२ वर्ष से अधिक हो तो अपराधी को छूट । अपराधी की सजा न हुई,आयकर के स्लैब हो गये । पहले भी एक न्यायाधीश ने , महिला की रजोनिवृत्ति हो चुकी है, इस आधार पर अपराधी को छूट दे दी थी । ये कैसी विचित्र सोच है ?
२१अप्रैल

यह बात बड़े जोर-शोर से कही जा रही है कि लड़कियाँ आत्म रक्षा के तरीके सीखें यानि लड़के/पुरूष तो जैसे हैं , वैसे ही रहेंगे । लड़कियाँ अपनी चिंता खुद करें । 

बचाव के ऐसे तरीकों की बजाय पुल्लिंग की वर्तमान में  मानसिकता बदल जाने और उस बदली हुई मानसिक स्थिति का अध्ययन किया जाना भी जरूरी है । पहले काका, मामा , बाबा, दादा उनके संबोधन के अनुरूप ही व्यवहार करते थे , अब ऐसा क्या हो गया है कि सारे रिश्ते सिर्फ पुरूष में बदल गये हैं ? इन पर सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक स्तर पर गहरा अध्ययन किया जाना चाहिए । 

चूहा मार दवाई घर में रखने की बजाय , चूहा घर में आये ही नहीं , यह व्यवस्था की जाना इस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है ।
१७ अप्रैल 

आज बैंक गई थी । वहीं से सेवानिवृत्त हूँ, लेकिन सामान्यतया कतार में लगती हूँ । मेरे आगे एक वरिष्ठ महिला थीं जो लगातार बोल रही थी , कभी काउंटर क्लर्क से तो कभी कतार में लगे लोगों से । कोई क्लर्क से भी कुछ पूछे तो जवाब वे ही दे रही थीं । मुझे चिढ़ होने लगी थीं क्योंकि मैं जानती हूँ कि इस तरह बकबक करनेवाले ग्राहक कितने कष्टकारी होते हैं लेकिन मैं चुप रही कि अब कुछ भी कहने का हक मुझे नहीं है । मेरा काम जरा लंबा था तो देर लग गई । बाहर आई तो वे ऑटो रिक्शा के इंतजार में खड़ी थीं । मुझे देखा तो फिर पूछताछ शुरू --- काम हुआ कि नहीं ? मैं कहाँ रहती हूँ ? घर कैसे जाऊंगी ? घर में कौन-कौन है ? वगैरा वगैरा । अब मेरा सब्र टूट रहा था , तभी उनका अगला सवाल आ गया -- आपका नाम क्या है ? मैंने नाम बताया तो वे उछल पड़ीं । अरे ! आप अलकनंदा जी हैं ? आपकी मराठी कविताएँ पढ़ती रहती हूँ और आकाशवाणी पर सुनती भी हूँ । मुझे बहुत पसंद आती हैं । बहुत अच्छा लगा आपसे मिलकर आदि आदि । 

उनका बतरस और मैं असहाय, सुनने को विवश । अब तो गुस्सा भी नहीं कर सकती थी ।
५ अप्रैल 

सन ८७ में जब बस से भोपाल से इंदौर आ रही थी तो पूरी बस में मैं एकमात्र महिला थी जो अकेली सफर कर रही थी और लोग मेरे प्रति असहज थे। अब यह देखकर बहुत अच्छा लगता है कि  अधिकांश महिलाएँ पूरे आत्मविश्वास से अकेले सफर करती हैं और सहयात्रियों का व्यवहार भी सहज रहता है ।
४ अप्रैल 

सबला जीवन हाय तेरी यही कहानी ।
हाथों में की बोर्ड, कंधे पर भाजी तरकारी ।।
१ अप्रैल 
मच्छरों को बहुत सारी गलतफहमी है कि बालकनी उनकी तफरीह के लिए है, कुर्सियाँ उन्हीं के लिए रखी रहती हैं, पेड़-पौधों की शुद्ध हवा भी उनके लिए है और चाय-नाश्ता उनकी आवभगत के लिए होता है ।
२९ मार्च 

प्लास्टिक मुद्रा के इस युग में भी कभी-कभी ......रसोई के डिब्बों में रकम छुपाकर,बचाकर  रखने का तरीका,.... कारगर  लगता  है …

२५  मार्च

भले ही आपका लेखन,तमाम धार्मिक और पौराणिक उदाहरणों से भरा हो ,किंतु यदि आप उसमें सत्तापक्ष, सर्वहारा, इस भयावह समय में जैसी शब्दावली का छौंक लगाते हैं ,तो आप प्रगतिशील की श्रेणी में आते हैं।
१७ मार्च 
एक नाटक के कई कई प्रयोग होते हैं । गायक/गायिका उन्हीं रागों को, उन्हीं गीतों को बार-बार प्रस्तुत करते हैं । कपड़ों का फैशन पलट पलटकर आता रहता है । मकान भी सामान्यतया एक जैसे होते हैं । गृहिणियां सालों-साल वही पकवान बनाती हैं । ऐसे तमाम उदाहरण दिये जा सकते हैं और इन पर किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होती ।

लेकिन एक कवि पर हमेशा यह दबाव होता है कि वह हर बार नई कविता सुनाये । ये तो बहुत नाइंसाफी है भिया !!
११ मार्च 

मराठी में एक कहावत है -- मनगटात जोर असेल तर काहीही करता येतं अर्थात  कलाई में जोर हो तो कुछ भी हो सकता है ।

सत्य है । यदि चारेक सौ मैसेज हटाना हो तो कलाई मजबूत होना ही चाहिए ।😁😁😁
४ मार्च 

हम अमेरिका के सामने इतना झुके झुके रहते हैं ,लेकिन अमेरिका से यह न हुआ कि हमारे लिये सादर प्रणाम या पैर छूने वाली इमोजी बना दे।
२३ फरवरी 

"Different different temples का different different importance होता है ।" 

आज शाम "मातृभाषा" में सुना संवाद 😁😁😁

२१ फरवरी 

बैंकों के निजीकरण की बात समय-समय पर उठती रहती है । राष्ट्रीयकृत बैंकों को सरकारी बैंक कहकर हेय दृष्टि से देखा जाता है । नियमों में बंधे बैंककर्मी जो जवाब ग्राहक को देते हैं, उनका मजाक भी उड़ाया जाता है । हाल ही में उजागर हुए घोटाले के बाद इन सबने फिर जोर पकड़ा है , लेकिन समस्या की तह तक कोई नहीं जाता / जाना नहीं चाहता । हर बार आरोपी के रूप में मंझोले अधिकारी और कर्मचारी सामने लाये जाते हैं , जबकि उनकी स्थिति एक ओर खाई दूसरी ओर कुआँ जैसी होती है । मुझे अपने कार्यकाल के दौरान हुए  वाकये याद आ रहे हैं.

१. करीब २५ साल पहले  मैं जिस शाखा में थी, वहाँ कोई घोटाला हुआ था. उस ग्राहक का खाता सील कर दिया गया था. उसके माता-पिता के खातों पर लाल स्याही से नोट लगा था( तब कम्प्यूटर नहीं थे) --सहायक महाप्रबंधक की अनुमति बिना लेन देन न किया जाय.  एक दिन  उस ग्राहक के पिता चेक लेकर आये. उन्हें पैसे निकालना थे. उस समय टोकन दिए जाते थे. काउंटर क्लर्क ने  नोट देखकर टोकन देने से इंकार कर दिया और उनका चेक बैंक कार्य प्रणाली के अनुसार चेक रेफर रजिस्टर में रखकर सहायक महाप्रबंधक के केबिन में भिजवा दिया. वे कहीं मीटिंग में बाहर गए थे. प्रभारी अधिकारी को निर्णय लेकर रजिस्टर में नोट लिखना  था, लेकिन वे चेक अपने हाथ में लेकर काउंटर पर गए और क्लर्क से मौखिक रूप से आग्रह करने लगे कि टोकन जारी कर दे. काउंटर क्लर्क ने इस पर आपत्ति ली और मना कर दिया तो उसे निलंबन की धमकी दी गई. बाद में   तुरंत प्रभाव से उन्होंने उसे वहाँ से हटाकर ऐसी जगह भेज दिया जहाँ काम का बोझ बहुत ज्यादा था. यदि काउंटर क्लर्क द्वारा मौखिक आदेश को मानकर टोकन दे दिया जाता तो उसकी नौकरी खतरे में आ जाती.

२. दूसरा वाकया तो और भी भीषण था. उन दिनों एटीम में धन राशि बैंक कर्मी ही ले जाते थे. एक दिन एक एटीम के बाहर रकम लूट ली गई. पुलिस ने उलटे बैंक कर्मी और गार्ड को गिरफ्तार कर हवालात में डाल दिया. उस कर्मचारी को छुड़ाना तो दूर , हवालात में देखने तक कोई नहीं गया. न बैंक अधिकारी, न सहयोगी और न ही कर्मचारियों के मसीहा बन घूमने वाले यूनियन  नेता. जबकि वह बैंक कर्मी ईमानदार और लगनशीलता के लिए प्रसिद्द था. १५ दिन बाद जब जमानत पर छूटकर बैंक आया तो सहकर्मी अछूतों की तरह व्यवहार कर रहे थे. 

३.एक घटना में एक अधिकारी की गलती सिर्फ इतनी थी कि उन्होंने सहकर्मी पर विश्वास कर  किसी वाउचर पर हस्ताक्षर कर दिए थे. पुलिस उन्हें शाखा से हथकड़ी डालकर किसी पेशेवर अपराधी तरह ले गई.  जमानत पर छूटते ही उन्होंने आत्महत्या कर ली. विडम्बना यह थी कि  उनकी सेवा निवृत्ति करीब थी और पूरा कार्यकाल साफ़ सुथरा रहा था.  

ये तो बड़ी घटनाएं थीं . रोजमर्रा के कामों में नियमों के विरुद्ध  छोटी-मोटी घटनाओं से कई बार हर बैंक कर्मी का सामना होता है. उससे कहा जाता है-- अरे कर दो, कुछ नहीं होगा.लेकिन जब कुछ होता है तो सब पल्ला झाड़ लेते हैं. घोटाला हो या गबन सामान्यतया कोई भी बैंक कर्मी जानते बुझते नहीं करता, क्योंकि अधिकांश समय वह चौकन्ना होकर काम करता है, अधिकांश को अपनी नौकरी, अपना सम्मान प्रिय होता है, अपने  परिवार की उसे चिंता होती है. बैंक और बैंक कर्मियों को लेकर जो भ्रांतियां हैं, जो दुराग्रह हैं उनके बारे में कुछ ठहरकर यदि सब लोग  सोचें तो पता चलेगा कि बैंक की नौकरी नटनी के करतब जितनी ही खतरनाक है और वहाँ काम करनेवालों को भर्त्सना नहीं, सहानुभूति, समानुभूति की आवश्यकता है. बैंकों का निजीकरण, विलय समस्या का समाधान नहीं है. काम करनेवालों पर आनेवाला ऊपरी दबाव हटाए जाने की आवश्यकता है.

२० फरवरी 

बचपन में माता-पिता की और बुढ़ापे में चिकित्सक की बात मानने में ही भलाई है ।

बस ! यूंही । 😊😊

१६ फरवरी 

पीएनबी कांड पर रणदीप सुरजेवाला प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे । तदनुसार नियमों को ताक पर रखकर घोटाला किया गया है । 

घोटाले के भी कोई नियम होते हैं क्या ?

१५ फरवरी 

युवा अक्सर पूछते हैं कि मां सही है या माँ ? आँख या आंख ? रात्रि या रात्री ? तब जवाब यही आता है कि संगणक की वजह से ये संशय उत्पन्न होता है. यह सब देवनागरी और हिंदी/मराठी  के साथ ही होता है या अन्य लिपियों/भाषाओँ में भी ये दिक़्क़त है ? और यदि है तो इतने वर्षों बाद भी मानक भाषा का उपयोग क्यों नहीं हो पा रहा है ? भाषा के प्रति ये उदासीनता क्यों है ?

१० फरवरी 

मेरी पोती कल से नाराज है । झबले , टोपी, नॅपी, डायपर , मिल्क पावडर , बाॅटल किसी भी चीज का बजट में उल्लेख नहीं है । उसे उम्मीद थी कि नॅपी के अधिक उपयोग से मिल्क पावडर और बाॅटल की खरीदारी पर कुछ छूट मिलेगी, बेरोजगारी के आधार पर गाय का दूध मुफ्त मिलने की भी उसे आशा थी , पर वह भी न हो सका । 

कल देर रात तक वह उदास थी , रोती रही । आखिर मैंने उसे समझाया -- हम नौकरी पेशा हैं और मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखते हैं , तब वह कुछ संभली , लेकिन अभी भी दुखी है । बजट की याद आते ही रोने लगती है ।

२ फरवरी 

सुस्वादु भोजन और नर्म मुलायम रोटी, सिर्फ हाथ का कमाल नहीं ,बल्कि मन की अवस्था भी होती है ।

२८ जनवरी 

महज डेढ़ माह की नन्ही पोती रात 1 बजे तक पूरी सजगता से पूर्ण जागृत अवस्था में रहती है । कभी माँ की गोद, कभी दादी की या फिर कभी दोनों पर उदार होकर बिस्तर पर पड़े - पड़े पोतड़ों का भरपूर उपयोग कर सबको काम पर लगा देती है । इसी बीच उसे याद आता है कि पिता की भी तो कोई जिम्मेदारी होती है , तो रो-रोकर इतनी हलकान होती है कि पिता को मजबूरन उसे उठाये-उठाये पूरे घर के 10-20 चक्कर लगाना पड़ते हैं । पिता की गोद में सवार होकर तसल्ली से पूरे घर का निरीक्षण करना उसे अपना कर्तव्य लगता है । कुछ संतुष्ट दिखाई देने पर जब उसे बिस्तर या पालने में स्थानापन्न कर दिया जाता है तो बड़ी देर तक किसी पर्दे या दीवार को  इस कदर अपलक निहारती है कि हम समझ जाते हैं कि सफाई व्यवस्था में हमसे भारी भूल हुई है । इतने सारे कामों के बाद जब निढाल होकर उसकी पलकें भारी होकर आँखें मूंदने लगती हैं तो हम भी अपना बिस्तर ठीक करने लगते हैं । लेकिन उस समय सिर्फ पौने बारह हुआ चाहता है और हमारी समझदार नन्ही जानती है कि सोने से पहले दूध पीना चाहिए । तब दुग्ध पान के लिए पहले धीमी और बाद में तेज आवाज में मांग रखी जाती है । बारह से साढ़े बारह दुग्ध पान फिर पोतड़े बदलने की जरूरत महसूस होती है और घड़ी का कांटा एक की ओर बढ़ता है । हम राहत की साँस लेते हुए सोचते हैं कि ठंड का मौसम है , सुबह आठ बजे तक तान देंगे पर हमारी कोमल पंखुरी ब्राह्म मुहूर्त में खिलने के फायदे जानती है और इसीलिए अपनी तेज और लगातार आवाज से हमें जगाकर ही दम लेती है । दिन चढ़ने लगता है और हमें  काम पर लगाकर हमारी राजकुमारी ठाठ से पूरा दिन आराम फरमाती है । उस भोले, प्यारे मुखड़े पर हम वारे न्यारे हो यह भूल जाते हैं कि हमारी नींद तो पूरी हुई ही नहीं , कि उठते समय हम थके हारे थे  कि हमें तो आठ बजे तक सोना था , कि  ...... कि .......कि .....
२६ जनवरी

परिचय छः महीने पुराना भी न हो और कोई महिला रसोई तो ठीक अंदर के कमरे तक चली आती है, तो उसके पढ़े-लिखे होने पर शक होता है ।

८ जनवरी 

 


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