लटक गया लोकपाल....
२९ दिसंबर
पेरोल के सिर्फ कुछ घंटे बाकी !
कल फिर वही नौकरी की चाकी !!
२५ दिसंबर
जब मैं युवा थी...माँ से कहती थी...हम लोग हैं ना ? हमारी चिंता करो...सारी दुनिया के बारे में क्यों सोचती हो...पर ममत्व शायद हर औरत का स्थायी भाव होता है और चिंता करना उसका प्रिय शगल...
२२ दिसंबर
मराठी चेनल साम टीवी पर रोज रात ८.३० बजे मराठी की बेहतरीन साहित्यिक कथाओं पर एक अच्छा धारावाहिक शुरू हुआ है...प्रसिद्ध अभिनेत्री मृणाल कुलकर्णी इसकी निर्माता है और सतीश राजवाडे जैसे कुशल दिग्दर्शक ने इसे दिग्दर्शित किया है...शुरुवात ग.दि.मादगुलकर की कथा "वेग" से हुई है........दूरदर्शन के जमाने में "एक कहानी","दर्पण","नीम का पेड़",तमस" आदि साहित्यिक कृतियाँ देखी थीं.........पर एक लम्बा अरसा बीत गया.......टीवी खोलने का एक अच्छा बहाना तो मिला........वर्ना बौद्धिकता के नाम पर वही.......राजनीतिक चर्चाएँ और मनोरंजन के नाम पर महंगी साड़ियाँ पहन कर घर के काम-काज करती महिलाएं या बार-बार वही-वही फ़िल्में.......
२१ दिसम्बर
दुःख और बेचैनी किसी भी बात पर हो सकती है....रात को दूध में जामन लगाया और सुबह उसे देखा तो वैसा-का-वैसा...दही जमा ही नहीं...दुःख हुआ कि सुबह का मेन्यु बिगड़ गया...ना चावल के साथ कढ़ी बन पाई ना परांठों के साथ रायता ....और दिन भर बेचैनी रही कि बरसों-बरस से जो काम करती आ रही हूँ उसमें क्या गलती हुई ?
१९ दिसंबर
पैर छूने पर इतना बवाल क्यों मचा हुआ है ? पैर छूना हमारी संस्कृति है...बड़ों का सम्मान करने का एक तरीका है..वरिष्ठों का अभिवादन पश्चिमी तरीके से हाथ मिलाकर या महज गर्दन हिलाकर किया जा सकता है तो पैर छूकर क्यों नहीं ????....इसे चापलूसी की संज्ञा क्यों दी जाती है ....?
१९ दिसंबर
अकेला होने से ऊब नहीं होती....ऊब से अकेलापन उपजता है...
१६ दिसम्बर
हम बड़ी-बड़ी घटनाओं को ईश्वर के आधीन मानकर स्वीकार कर लेते हैं...जैसे किसीके पिता का असमय गुजर जाना, बेटी के विवाह में बाधाएं आना, युवा बेटे की बेरोजगारी आदि....पर छोटी-छोटी बातों में हमें झुंझलाहट होने लगती है....जैसे जिस दिन जल्दी जाना हो उसी दिन महरी का छुट्टी मानना ... ढेर सारे कपड़े वाशिंग मशीन में डालते ही बिजली चली जाना...अखबारवाले द्वारा रोज के अख़बार की जगह दूसरा डालना...
१६ दिसम्बर
१६ दिसम्बर
लगभग ८० साल पहले ,युवा पत्नी और दो छोटे बच्चे होने के बावजूद मेरे पिता ने अत्यंत स्वाभिमान से यह घोषणा की थी - मैं नौकरी नहीं करूंगा-बावजूद इसके कि उनके पास कोई बड़ा आर्थिक सम्बल भी नहीं था....आज मेरी ऐसी कोई भी मजबूरी नहीं है...पर नौकरी छोड़ने का साहस नहीं जुटा पा रही हूँ...स्वाभिमान मूल्यहीन हो गया है या कालातीत ?....
१३ दिसंबर
शबे-मालवा को तरस गए हैं...सालों पहले मई -जून की गर्मियों में भी ओढकर सोना पड़ता था ...मेरी एक बुजुर्ग रिश्तेदार ने मुझसे कहा था- तुम्हारे ग्वालियर में पंखे और कूलर रखने का फैशन है क्या ? और अब यहाँ आधे दिसम्बर में भी स्वेटर नहीं निकला है...
१० दिसंबर
आज मायक्रोवेव में रतालू भूनकर खाया
माँ का चूल्हा और हाथों का स्वाद याद आया...
९ दिसंबर
स्वअनुशासन के तहत रविवार को मैं टीवी अमूमन नहीं देखती...मेरे दामाद ने मुझे फोन पर बताया कि देवानंद का निधन हो गया है...मुझे वह जमाना याद आ गया,जिस ज़माने में देवानंद नायक हुआ करते थे... और सास-दामाद के बीच सीधा संवाद नहीं होता था...यदि बहुत ही जरुरी हुआ तो सास दरवाजे की ओट में खड़ी रहती थी और दामाद दरवाजे के उस पार....
५ दिसंबर
वो लड़का प्रेस के कपड़े लेकर आया था ...कहने लगा --आंटी आपकी वह महरून साड़ी प्रेस करने में बहुत दिक्कत हुई...उसके डिज़ाइन का समुशन चिपक रहा था...मैंने पूछा -क्या चिपक रहा था ? कहने लगा---समुशन..समुशन..मैंने पूछा--ये क्या होता है ? बोला--वो चिपकाते हैं न ? मैंने कहा--अच्छा ...साल्यूशन ? बोला---हाँ...वो ही...आप लोग अलग बोलते हो...वो आंटी पढ़ाने जाती है ना..वो इस्कूल को स्कूल बोलती हैं...और वो सायकल पर टांग मारकर चला गया....मै चुप..अवाक्...
२८ नवंबर
मैंने कभी नहीं सुना कि किसी गृहणी ने कभी कहा हो--आज मैंने सारे घर का काम किया या किसी शिक्षक ने कहा हो-आज मैंने पढाया या किसी दफ्तर के किसी कर्मचारी ने अपने काम का प्रचार किया हो ,लेकिन हमारे नेता,जन प्रतिनिधि जरा-से काम का ना सिर्फ प्रचार-प्रसार करते हैं,बल्कि अनावश्यक रूप से उसे महत्वपूर्ण भी बनाते हैं....सडकें ,पुल या फ्लाय ओवर बनाना,बोरिंग करवाना,बगीचे लगाना,प्याऊ का निर्माण आदि काम ,जो उनके कर्त्तव्यों में शामिल है,बड़े ही ताम-झाम से किये जाते हैं..इन जन सुविधाओं का पहले शिलान्यास होता है,उसका एक कार्यक्रम,प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मिडिया में उसकी ख़बरें,फोटो आदि आते हैं,लाखों का खर्च होता है,फिर निर्माण और उसके लोकार्पण में यही सब कुछ....कई बार तो लोकार्पण के इंतजार में लोगों को सुविधाओं से वंचित कर दिया जाता है....इन सब बातों का भी विरोध होना चाहिए...जो काम दिनचर्या का हिस्सा है उस पर अनावश्यक रूप से समय,पैसा और शक्ति बर्बाद की जाती है...इनका औचित्य क्या है ? यहाँ तक कि मुक्ति-धाम जैसी जगहों को भी बख्शा नहीं जाता...हाल ही में हमारे शहर में सांसद और विधायक के बीच मुक्तिधाम पर हुए व्यय को लेकर जो वाकया हुआ वह तो निश्चित तौर पर शर्मनाक था....ऐसे आयोजन तुरंत बंद किये जाना चाहिए और प्रसार माध्यमों ने भी इन्हें कतई महत्व नहीं देना चाहिए...सब कुछ सामन्तवादी लगता है और जनता बेचारी इंतजार करती रह जाती है कि कब आये सरकार हमारे द्वार...
२२ नवंबर
कभी-कभी दिनभर की थकान के बाद रात को दुबारा कम्प्यूटर पर बैठने की इच्छा नहीं होती ...
फिर यह सुबह का समय अच्छा लगता है....
फेसबुक पर अपने मित्र-परिवार को देखकर दिन-भर मन खिला-खिला रहता है....
१८ नवम्बर
अभी दस मिनिट पहले एक ठगी से बच गई...लोहे का गेट खडकाने की आवाज सुनी तो दरवाजा खोला..देखा पुलिस थी...दो लोग...बोले बाहर आइये कुछ जानकारी चाहिए...मेरा बेटा पत्रकार है और जब भी उसकी डयूटी संसद भवन में लगती है तो पुलिस पूछताछ के लिए आती है...अभी २१ नवम्बर से संसद का अधिवेशन है तो मै समझी शायद इसीलिए पुलिसवाले आये हैं....मुझे थोडा आश्चर्य हुआ ,इतनी जल्दी कैसे जाग गए...अक्सर सत्र समाप्ति तक वे आते हैं...फिर भी अविश्वास नहीं था...मैं जैसे ही बाहर गई ,उन्होंने एक रजिस्टर बढाया ...बोले इस पर अपना नाम और मोबाइल नम्बर लिख दीजिये ...मैंने पुराने अनुभवों की वजह से पूछा ...सचिवालय का पत्र कहाँ है ...वे चौंक गए ,फिर बोले ..पत्र नहीं है ,अभी तो सर्वे चल रहा है...मैंने पूछा -कैसा सर्वे ? तो बोले---पहले नाम-पता लिखेंगे..फिर कुछ पैसे आपको देना है...मैंने कहा---आप कौन है ? कहाँ से आये हैं ? अपना कार्ड दिखाइए...तो कहने लगे --चौराहे पर भंडारा होगा...धार्मिक काम है, आप जैसे बुजुर्गों का आशीर्वाद चाहिए और कुछ रकम भी..मैंने कहा--कुछ नहीं मिलेगा और मै दरवाजा बंद कर आ गई...इस सब में एक गलती हुई..पैसे लाने के बहाने मुझे अंदर आकर पुलिस और पडौसियों को सूचित करना था..
१३ नवंबर
जब हम छोटे थे तब बड़ों की अंग्रेजी समझ में नहीं आती थी..वे लोग ब्रिटिश अंग्रेजी पढ़ते थे..तीन tense और उनके चार-चार प्रकार पढ़ना और उनका नियम बद्ध इस्तेमाल करना....उनकी बातचीत में शैली,किट्स.बायरन या शेक्सपियर के उद्धरण हुआ करते थे....जब मै हायस्कूल में थी तब आज के कुख्यात मुलायमसिंह यादव,लालूप्रसाद यादव,स्वामी अग्निवेश आदि ने बहुत ही प्रभावी ढंग से "अंग्रेजी हटाओ" आन्दोलन चलाया था...और तब लगा कि अंग्रेजी अब कम से कम उत्तर भारत से तो हट ही जाएगी...उस समय हम छात्रों को बहुत अच्छा लगा ...पर बाद में उसके दुष्परिणाम भुगतना पड़ें...धीरे-धीरे अपने प्रयासों से किसी तरह अंग्रेजी सीखी,....पर अब फिर से संकट महसूस हो रहा है...नई पीढ़ी की भाषा को समझने का ...वे time को tym ,goodnight को gni8 , and को सिर्फ n आदि लिखते हैं और अब फिर भाषा सिखने की नौबत आ गई है...
७ नवंबर
आज सुबह-सुबह अखबारवाले से झडप हो गई..कल उसने मेरे यहाँ एक भी अख़बार नहीं डाला...जैसे-तैसे पडौसी के एक अख़बार को मैंने सुबह ९ बजे मांगकर पढ़ा..आज जब अखबारवाले लड़के से पूछा तो पहले तो वह मुकर गया की ऐसा नहीं है..फिर बड़ी लापरवाही से बोला ---लिख लेना अख़बार नहीं आये थे...पैसे काट लेना..मैंने कहा--अरे मै पढ़ नहीं पाई उसका क्या ? फिर मैंने सोचा..वह जान ही नहीं सकता उस खालीपन को जिसे मैंने चाय पीते समय महसूस किया...चाय कितनी भी अच्छी बनी हों बिना अख़बार के फीकी लगती है....ऐसी कितनी सारी बातें होती हैं जिन्हें हम समझ ही नहीं पाते हैं...माँ की चिंताओं को भी माँ हुए बगैर समझा नहीं जा सकता....नौकरी करते हुए प्रबन्धन को गाली देना आसान होता है, पर कुर्सी पर बैठे व्यक्ति की भी अपनी मजबूरियां होती है....पांच अंकों में वेतन पाने वाला बैंक का बाबू १ तारीख को पेंशनर्स की भीड़ देखकर खीजता है...वह सोच ही नहीं पाता कि मात्र १४० रूपये पानेवाला बूढ़ा २ तारीख से ही अगले १ तारीख की बाट जोहने लगता है... आदमी से पिटकर भी उसी के साथ रहने की कामवाली बाई की मजबूरी ,एक पढ़ी-लिखे संभ्रात घर की औरत नहीं समझ सकती...उसे लगता है कि ऐसे पति को वह छोड़ क्यों नहीं देती...दिन में दस बार मोबाईल पर बात करवानेवाले वाहन-चालकों को बिना कोई दंड दिए छोड़ना ट्रैफिक पुलिस की मजबूरी होती है...हम उसे सिर्फ गालियाँ देते हैं...पर कभी यह नहीं सोचते कि वह प्रभावी व्यक्तियों द्वारा कभी भी दण्डित किया जा सकता है...आखीर उसे भी अपनी नौकरी की चिंता करनी होती है...वह भी घर परिवार वाला व्यक्ती होता है ...और उस पर भी सीमित संसाधनों में उसे गुजर-बसर करना होती है...कल अख़बार नहीं पढ़ा...पर ऐसा बहुत कुछ सोचने के लिए समय मिल गया....शुक्रिया...हॉकर बेटे...शुक्रिया...
६ नवंबर
वो एक मोबाइल कंपनी से था. पोर्टेबिलिटी के लिए आग्रह कर रहा था....पांच मिनिट के वार्तालाप में उसने आठ बार कहा कि "सर" से बात कराइए...."सर" को समझा देता..."सर" से पूछ लीजिये...वगैरा-वगैरा...इन विक्रेताओं को यदि यह पता ना हो कि वे किससे बात कर रहें हैं तो शायद वे इंदिरा नुई, चंदा कोचर,किरण बेदी,सुषमा स्वराज, जैसी विदुषियों से भी कह दें कि ---प्लान आप समझ नहीं पाएंगी,"सर" से बात करा दीजिये....
२ नवंबर
Happy Dipawali या शुभ दीपावली में वह मज़ा नहीं है जो यह पूछने में है कि हो गई तैय्यारी ?...या क्या-क्या बन गया ?... फिर ये उत्तर कि.....अरे अभी कहाँ....आपका हो गया सब ?.....
२३ अक्टूबर
मैं सोने के छोटे-से टुकड़े को भी बड़ी हिफाजत से , लॉकर में सम्हालकर रखती हूँ,पर मेरे शब्द अस्त-व्यस्त से कागजों पर बिखरे रहते हैं और कागज उड़ते रहते हैं यहाँ-वहाँ.......सम्पत्ति की साज-सम्हाल में ये पक्षपात क्यों,......क्यों करती हूँ मैं ?
१८ अक्टूबर
आज शाम 4.35 बजे दूरदर्शन की राष्ट्रीय वाहिनी पर मेरा कविता-पाठ....
नारियल बन से गुजरते हुए
एक सन्नाटा ही तो था
जो मेरा अपना था
और वहीं हवा की नमीं
उतर गई गहराइयों तक मेरे भीतर
शायद बरस पड़े
किसी और सन्नाटे में ....
१५ अक्टूबर
माँ जैसी बड़ी बहन ने बेहद प्यार से भेजा श्रीखंड जगजीतसिंह के सामने हार गया....कल रात नहीं खाया गया मुझसे....
११ अक्टूबर
साल भर चलता रहता है हैप्पी ये... हैप्पी वो ठेठ १ जनवरी से लेकर २५ दिसम्बर तक ...फिर मदर्स डे,डाटर्स डे, और ना जाने क्या-क्या... कल दशहरे पर ढेर सारे एसएमएस ,नजदीकी लोगों के फोन और फिर फेसबुक पर भी शुभकामनायें...पहले त्योहारों पर २/४ बड़े-बूढों के पैर छूकर जो आशीर्वाद मिलते थे ,उनसे पूरी जिन्दगी आराम से कट जाती थी ...पर अब इतने सारी शुभकामनाओं के बावजूद किसी को भी सुकून क्यों नहीं है ?
७ अक्टूबर
रात पडौस में चोर आया था,वे लोग शहर के बाहर थे....उनके यहाँ जाते-जाते वह मुझे बाहर से बंद कर गया और उनका दरवाजा तोड़ने के लिए मेरी टंकी का पाइप उखाड़ ले गया.... दरवाजा तो रोज ही अंदर से बंद रखती हूँ फिर भी मुझे लगातार सलाह मिल रही है कि मै सम्हलकर रहूँ.... याने क्या ?
२२ सितंबर
काम के समय,छुट्टी और त्योहारों के बीच जब बिजली गुल हो जाती है तो मन करता है कि म.प्र.वि.कम्पनी के मुख्य अभियंता.कार्यकारी अभियंता,अधिक्षण यंत्री आदि को घर बुला लूं ,चटनी और मसाले पीसने के लिए एक को थमा दूँ सिल-बट्टा,दूसरे के सामने लगा दूं कपड़ों का ढेर,तीसरे को पकड़ा दूं रस्सी और बाल्टी कुँए से पानी लाने के लिए,इस बीच खुद पका लूं बिना माइक्रोवेव के विशुद्ध भारतीय खाना और जब बिजली आ जाये तो इन सब सेवकों को २०-२० रूपये चाय-पानी के लिए देकर ,आराम से पैर पसारकर देखूं टीवी या फेसबुक पर बतियाऊ अपने मित्रों से.....मेरे देश की लडकियों...अपनी माँओं,बुआओं,मौसियों,मामियों,चाचियों की सेहत की खातिर . अब सॉफ्ट-वेयर इंजीनियरिंग छोडो .....जरा इलेक्ट्रिकल की ओर मुड़ो.. बेटियों,सब तुम्हें दुआ देंगी !
१९ सितंबर
सुबह उठते ही एक हाथ में टूथब्रश लेकर मै गैस पर चाय चढ़ा देती हूँ ताकि ब्रश करते ही मुझे चाय तैयार मिल जाय....फिर सामने की झोपड़ियों से सुबह-सुबह निकलते धुंए से मुझे चिढ क्यों है ?
१८ सितंबर
आजकल कलम मुझसे नाराज है..कभी-कभी ठुनकती है...चलते-चलते रुक जाती है...कहती है सारा काम करता है ना वो तुम्हारा कम्प्यूटर ? फिर मेरी क्या जरूरत है ? करवा लो उसीसे ....मै तो बेचारी २ रुपयों में भी आ जाती हू पर वो तुम्हारा लाडला हजारों का..उसकी पूछ-परख तो ज्यादा ही करोगी....करो...मुझे कुछ नही कहना...मैं उसे समझाती हूँ ...अरे सारे काम नही होते उससे...बाज़ार जाते समय कोई सूची बनानी हो,दूधवाले का हिसाब करना हो या कोई अपना मोबाइल नम्बर फ़ोन पर लिखवा रहा हो तो कोई कम्प्यूटर की नोटबुक थोड़े ही खोलता है....किसी को कुछ लिखना हो तो वह कलम मांगता है ...कम्प्यूटर नही...और महत्व की बातों के लिए तो अभी भी तेरी ही जरूरत पडती है..और रानी बिटिया कही पर हस्ताक्षर करना हो तो कम्प्यूटर के मान्य नही होते ...और सुन जब मन में कुछ उमड़ता-घुमड़ता है तो अक्षर तेरे साथ ही झर-झर बहते हैं...मेरी माँ से लेकर गणेशजी के महाभारत लिखने तक तेरा इतिहास जाता है ...तू तो तू ही है...मेरी लाडली है...भलेही २ रुपयों की, पर हमेशा मेरे साथ रहती है ...बिना किसी अतिरिक्त बोझ के....ना तेरे लिए कोई अलग से जगह चाहिए ,ना तुझे कन्धों पर उठाना पड़ता है....(पर रात के इस पहर में भी वह मुझसे रूठी है और चलने से साफ इंकार कर रही है)
१३ सितंबर
वह मनुष्य है...उससे कुछ भी करा लो ...वह कोई इलेक्ट्रोनिक वस्तु नही है और इसीलिए प्रोग्राम्ड भी नही है.....एक छोटा-सा वाक्य ......भैया जरा ये कर दोगे क्या......बस भैया कहते ही वह आज भी खुश हो जाता है....उसे किसी राखी की जरूरत नही है.....वह मजदूर से माली बन जाता है...माली से गाड़ी साफ करनेवाला या फिर हरकारा....कुछ भी....कुछ भी बन जाता है....वो किसी चीज को छूकर देखना चाहे तो उसे डराया भी जा सकता है.....अरे अरे क्या करते हो ? वह आज भी मेमसाब से सहमता है ....हसरत से देखता है लदी हुई गाडियों...भरी हुई थैलियो को ....वह मनुष्य है...करंट नही मारता.....इसीलिए उससे कुछ भी करा लो कुछ भी ....
४ सितंबर
एक बड़ी सारी जिन्दगी अकेले गुजर जाय तो किसी को कुछ परेशानी नही है , लेकिन यदि एक बड़ा-सा मकान अकेले की मिल्कियत हो तो लोगो की आँखों में तकलीफ साफ-साफ पढ़ी जा सकती है.…
३१अगस्त
कांग्रेस सरकार के आदि पुरुष का एक कामयाब नुस्खा,जो पिछले ६४ सालों से चला आ रहा है,फिर आजमाया गया है.....मूल समस्या से लोगों का ध्यान बटाना....महँगाई , लोकपाल बिल...ये मुद्दे अब पीछे चले जायेंगे और अन्ना और उनके सहयोगियों की गिरफ्तारी ....इस से जन-आक्रोश भड़केगा .....सारा ध्यान उसी ओर लगा रहेगा....सरकार आराम से ८/१० दिन इसमें निकाल देगी....और फिर लोग उबकर अपने काम-धंधे से लग जायेंगे तो राजा,कनिमोज़ी, कलमाड़ी जैसे लोगो को पनाह देने के लिए सरकार दुबारा चुस्त-दुरुस्त हो जाएगी......वाह ! लोकतंत्र.....वाह! सरकार
१६ अगस्त
१६ अगस्त
हमारे जैसे लोग जो स्वतंत्र भारत में जन्मे..हमने अंग्रेजी हुकूमत के बारे में सिर्फ सुना है लेकिन अब उसके कुछ अंश को महसूस भी कर सकते हैं ....विरोध बिलकुल भी मंजूर नहीं...भले ही यह सबसे बड़ा लोकतंत्र हो.....विरोध का,आन्दोलन का दमन करने के लिए १००१ तरीके सरकार के पास मोजूद है ....वज़ीरे-आलम बहुत ईमानदार है ...ऐसा सभी मानते हैं...सिंहासन पर बैठकर कुछ न कर पाना उनकी मजबूरी हो सकती है,लेकिन यदि वे सचमुच ईमानदार हैं तो सिंहासन छोडकर ,ईमानदार और वाजिब लोगो का साथ क्यों नही देते ? सत्ता का मोह इतना विवश होता है और वह भी वानप्रस्थ की उम्र में ? उनकी ईमानदारी के लिए ....चल जमूरे ताली बजा .....
१५ अगस्त
हाल ही में वरिष्ठ कवि चंद्रकांत देवताले ने एक साक्षात्कार में कहा है कि ''कुत्तो से सावधान कि बजाय अब मनुष्यों से सावधान का बोर्ड लगाने की जरूरत है''...देवतालेजी जैसे सरलमना और संवेदनशील व्यक्ति को जब ऐसा महसूस होता है .....तब यह समझना जरूरी है.....कि अब रुककर सोचने का समय आ गया है......
१५ अगस्त
कल राखी की छुट्टी मनाकर आज मेरे यहाँ काम पर आई लड़की के हाथों में रची खुबसूरत मेहँदी देखकर मैंने उससे कहा --आज सिर्फ सफाई कर ले..बर्तन मैं कर लूंगी..उसने कुछ संदेह से मेरी ओर देखा और पूछा-क्यों आंटी ? उसे लगा मैं उससे शायद एक काम छीन रही हूँ...तो उसे समझाते हुए मैं बोली अरे तेरे हाथो की मेहंदी खराब हो जाएगी न...इसलिए...उसका जवाब था---पहली मेहँदी छूटेगी तभी तो नयी लगा पाऊँगी ......अचानक और अनायास वह मुझे जीवन-दर्शन सिखा गई....
१४ अगस्त
कंप्यूटर पर रहें चाहे सड़क पर उतरें....जरुरत स्व-अनुशासन की है...सब चलता है...या २/४/५/१० रूपयों में क्या बिगड़ता है...ये प्रवृत्ति छोड़ना पड़ेगी । ..चाहे वाह आरटीओ एजेंट हो ... टिकट बुकिंग एजेंट हो या सब्जीवाला, फलवाला, किरानेवाला, रिक्शावाला हो .... यहां तक की पवित्र समझे जाने वाले प्रतिष्ठान अस्पताल या स्कूल ... हम अपना काम निकालने के लिए प्रतिदिन और हर कदम पर रिश्वत देते हैं...हमें यह समझना होगा कि रिश्वत का मतलब सिर्फ सरकारी दफ्तर नहीं है....
१२ अगस्त
पहले विज्ञापनों में मॉडल्स , फिल्म अभिनेता/अभिनेत्रियाँ या क्रिकेट खिलाडी दिखते थे..... फिर जावेद अख्तर,जगजितसिंग जैसी हस्तियाँ दिखी तो थोडा आश्चर्य हुआ....पर वे भी ग्लेमर की दुनिया से सम्बन्धित थे.....बाद में किरण बेदी का दिखना ......कुछ अजीब लगा पर हम पचा गये........लेकिन अब पंडित बिरजू महाराज........इतने परम आदरणीय व्यक्ति को विज्ञापन में देखकर बस एक विस्मय या यों कहे कि दिमाग ने कुछ भी सोचने से इंकार कर दिया........पर्दे पर दिखना क्या इतना जरुरी है ? या धन की चाहत सबसे ऊपर हो गई है ?.......
५ अगस्त
अमिताभ बच्चन वसीयत बनाने का विचार कर रहे हैं ...मेरे मन में भी अपनी कुछेक हजार रुपयों की संपत्ति की वसीयत करने का ख्याल कुछ दिन पहले आया था.....कुछ तैय्यारी भी कर ली थी.......पर अब सोचती हू रुक जाऊ.....अमितजी के सामने कौन बनेगा करोडपति से होनेवाली आय है और मेरा भी नया वेतन-समझोता आने ही वाला है......वे अभी अपनी निवृत्ति के बारे में नहीं सोच रहे हैं और मेरी भी सेवा-निवृत्ति में देर है.....फिर क्या जल्दी है ? इस बीच संपत्ति बढ़ गई तो उन्हें अभिषेक-श्वेता के बारे में दुबारा सोचना पड़ेगा और मेरे बच्चे भी मेरी और आशा से देखेंगे.....सो फ़िलहाल वसीयत का विचार निरस्त.....आखिर प्रेरणा हमे बड़े लोगो से ही तो मिलती हैं न ?...मेरे बच्चों हो सके तो मुझे क्षमा करना.....
४ अगस्त
वह कभी भी मुँह मोड़कर चली जाती है
उसकी याद बड़ी शिद्दत से आती है
बताओ कौन ?........बाई,बारिश और बिजली
३ अगस्त
हमें शहर की सड़कों पर मवेशी नहीं चाहिए, पडौस में किसी गरीब की झोपड़ी नहीं चाहिए,घर में कन्या नहीं चाहिए,परिवार में बुजुर्ग नहीं चाहिए,तो फिर हमें क्या चाहिए ?.......
१ अगस्त
बड़े घोटाले और भ्रष्टाचार (मेरा आशय सिर्फ आर्थिक भ्रष्टाचार से नहीं है) कम से कम सामने तो आ रहे है, लेकिन छोटे स्तर पर हमारे आस-पास भी बहुत कुछ घटित हो रहा है और उसे हम अनजाने में स्वीकारते भी जा रहे है....जो ज्यादा खतरनाक है.…
२९ जुलाई
कब तक दिमाग का खायेंगे ? कभी तो नसीब साथ दें.....
२६ जुलाई
रोमांचक यात्रा का अनुभव लेना चाहते है तो मेरे शहर में आप आमंत्रित है....दो वाहनों के बीच में से और ६ इंच से भी काम जगह में से उलटी दिशा से आकर निकल जाने का साहस मेरे शहर के सायकल सवार कैसे करते है यह देखने लायक होता है.....बाइकर्स की सर्पिल चाल भी विलक्षण होती है और रिक्शावाले दो कार के दोनों तरफ खुले साइड मिरर के बावजूद बचते- बचाते हुए जिस ढंग से रिक्शा चलाते है ....उससे दिल की धडकने तो बढती है पर उन्हें साक्षात दंडवत करने की इच्छा भी होती है......बिलकुल पतली गली से किसी भी राहगीर की पर्वाह न करते हुए बड़ी-सी बस निकालने का कौशल तो सम्भवतया इसी शहर के चालको में है.... और कार चालक वे तो भगवान से लायसेंस लेकर आते है ...आधी सडक घेरकर तिरछी गाड़ी खड़ी करना तो कोई इनसे सीखे ....तो बहनों और भाइयो ....एक बार मेरे शहर का जायजा जरुर लीजिये..... इन सबके साथ और भी बहुत कुछ देखने को मिलेगा ......मसलन पानी के टेंकर,ट्रेक्टर ,ट्र्क,मिनी बस , वेन आदि--आदि ....और अंत में......ये सारे अनुभव बिलकुल मुफ्त में ......कोई छुपे हुए शुल्क नही...कोई शर्त या नियम लागू नही...
२४ जुलाई
रोज रिक्शा से आती-जाती हूँ . रिक्शेवाला ईधन बचाने के लिए अंदर के रास्ते से ले जाता है,जो एक निम्न मध्य वर्ग की बस्ती है.बारिश से बचने के लिए उसने रिक्शे के एक तरफ रेग्जिन लगा रखा है स्वाभाविक रूप से मुझे इकतरफा दृश्य दिखते हैं , वह औरतों के काम का समय होता है .लगभग सभी घरों में घर के बाहर कोई कपडे धोते,कोई बर्तन मांजते दिख जाती है ,तो कही कोई दादी-माँ सब्जी सुधारते या पोते को खिलाते,पर आज अचानक रेग्जिन के एक फटे कोने से बाहर की ओर मेरी नजर चली गई और उस तरफ वाले दृश्य भी दिखाई दिए . वे मकान थोड़े संपन्न थे और इसी वजह से वहा दृश्य-भिन्नता थी .वहा स्कूल के लिए तैयार बच्चे थे ,सजी-संवरी उनकी माँएं थीं , तो कुर्सी पर बैठी दादी-माँ.......
हम अक्सर ऐसा ही करते है,एक ही ओर दृष्टी डालकर एक ही तरह की नजर बना लेते हैं और सोचते हैं कि हमे सब पता है.....
२२ जुलाई
प्राचीन काल में श्रवणकुमार अपने माता-पिता को तीर्थ यात्रा पर ले गया था , बाद के सालो में २/३ परिवार या यात्रा कंपनियों के माध्यम से उन्हें तीर्थयात्रा पर भेजा जाने लगा ,पर अब माता-पिता यात्रा पहले ही कर लेते हैं और उनकी संताने पहले खुद एक नए "तीर्थ" को....किसी विदेश को तलाशते हैं,जा बसते हैं और बुला लेते हैं अपने 'मम्मी -पापा' को .....अभिभावकों के चेहरे पर जो चमक आती है वह किसी भी पार्लर में जाकर नही आ सकती और किसी तीर्थ स्थान पर जाकर तो कदापि नहीं।
१४ जुलाई
तेज दौड़ने में क्या रखा है,कल कोई और तुमसे तेज दौड़ लेगा ..जरुरी यह है कि अपनी चाल में वह अदा पैदा करो कि भले ही कोई तुमसे आगे निकल जाय या कोई पीछे रह जाय ,पर तुम्हारे कदम के साथ कदम मिलाकर कोई न चल सके..........उस्ताद बड़े गुलाम अली खां साहेब
१२ जुलाई
भला व्यक्ति कहलाने के लिए सिर्फ अच्छा स्वभाव ही काफी नही होता ....
४ जुलाई
जो आज है वह सत्य नही है, ....जो कल था वह भी सच नही था......आनेवाले कल के बारे में तो कोई भी नही जानता....फिर क्या है ,सत्य? ......मुझे नही पता....
२ जुलाई
यूं तो रोज ही अखबार मनहूस खबरों से भरा रहता है और उन खबरों को दरकिनार कर अगला पेज खोलने का बोथरेपन से दिल और दिमाग दोनों अभ्यस्त हो चुके है ....... पर आदरणीय शालिनीताई मोघे के गुजर जाने की खबर को नजर-अंदाज़ नहीं किया जा सका .......एक व्यक्तित्त्व नहीं ....एक युग गुजर गया.....उनको सादर श्रद्धांजलि 🙏🙏
१ जुलाई
पडोस में मकान का नवीनीकरण चल रहा है . एक दिन एक मजदूर का शिद्दत से इंतजार हो रहा था . पता चला कुछ हिस्सा तोड़ना है और वह तोडनेवाला मजदूर है जो सफाई से उतना ही हिस्सा तोड़ेगा जितना तोड़ना है .... वाह.. अभी तक ''तोड़ना'' को मै एक ख़राब क्रिया के रूप में जानती थी...अकस्मात ज्ञान में इजाफा हुआ और यह क्रिया एक हुनर में बदल गई.
२९ जून
भारत के लोग अपनी बोली और भाषाओं की कद्र करें या न करें मगर अमेरिका इनका महत्त्व समझता है.यही कारण है कि अब वहाँ हिंदी के साथ-साथ भारत की बोलियों और स्थानीय भाषाओं को भी सम्मान दिया जा रहा है.अमेरिका ने व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति के स्टाफ की नियुक्ति प्रक्रिया में अंतरराष्ट्रीय भाषाओं की सूची में राजस्थान की मारवाड़ी भाषा को भी शामिल कर लिया है.
२८ जून
हवा पानी और प्रकाश का क्या सम्बन्ध है ? ये भी भला कोई पूछने की बात है ? लेकिन पिछले करीब ५० साल से ये प्रश्न मेरे दिमाग मे है और मै इसका उत्तर खोज रही हू. जैसे ही किसी झाड़ की १ या २ डालिया हिलने लगती है या पानी की कुछ बुँदे धरती की भाप को बाहर निकालती है हमारे म.प्र की लाइट यानि म.प्र.वि.क. की बत्ती गुल हो जाती है . यह जब म.प्र.वि. मंडल था तब और अब कम्पनी हो गया है तब भी .इंजीनियर्स की २-२ पीढ़िया निकल गई लेकिन स्थिति वैसी की वैसी ही है.कल तो बारिश थम गई और चाँद भी निकल आया लेकिन म.प्र.वि सोता रहा और हम जागते रहे रात १ बजे तक किस-किस से और कहा तक लड़ेंगे ?
८ जून
मैंने सुबह-सुबह अख़बार पढ़ना बंद कर दिया है। अधिकतर सारे पेज मनहूस ख़बरों से भरे रहते हैं और दिनभर एक उदासी,गुस्सा,आक्रोश में बीतता है। शाम को पढ़ती हूँ, ताकि अपडेट रह सकूँ और थोड़ा-बहुत जो भी अच्छा छपता है, उसे सुबह के लिए बचा लेती हूँ। बुराइयों से बच नहीं सकते, लेकिन सुबह और पूरा दिन तो कम से कम अच्छा निकलता है।
१८ मई
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