आज का समय कवि के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है । एक तो कविता लिखना और फिर उसे टाइप करके मोबाइल में सहेजना । 😊😊😊
२९ दिसंबर
मुझसे लगभग 25-30 वर्ष छोटे एक परम ज्ञानी आज ढेर सारा ज्ञान दे गए कि अपनी उम्र का खयाल रखते हुए मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं ! पिछले अनेक सालों से वे गाहे-बगाहे मुझे अपने ज्ञान से लाभान्वित करते रहते हैं। किसी को जरूरत हो तो बताएं । उनका नंबर मेरे पास है । 😊😊😊
२३ दिसम्बर
ठंड के दिनों में खाने पीने की इतनी विविधता उपलब्ध रहती है कि रसना चटोरी कहती है, वानप्रस्थ से सीधे बाल्यावस्था में पलट जाओ ...
१० दिसंबर
बैंकों में काम में देरी या लगातार आनेवाली छुट्टियों पर हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों को बहुत कष्ट होता है, लेकिन लोकसभा पिछले 16 दिनों से नही चल रही है और अभी और 4 दिनों के लिए स्थगित हो गई है तो किसी को कोई परेशानी नहीं है । विपक्ष भी चाहे किसी भी दल का हो , ऐसा लगता है कि वे सिर्फ हंगामा करने के लिए ही संसद में जाते हैं ।
९ दिसम्बर
भ्रम क्या है ---हर काम के लिए बाई रख लो , आराम मिलेगा ।
३ दिसम्बर
नोट बंदी से एक तात्कालिक फायदा यह हुआ कि घर में पॉलीथिन की आवक कम हो गई ।
२ दिसम्बर
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे ज्यादा दुरूपयोग सोशल साइट्स पर हो रहा है । इस देश में सबसे पहले इतिहास पढ़ना अनिवार्य किया जाना चाहिए । तब पता चलेगा कि 100 साल पहले बोलने की क्या कीमत चुकाना पड़ती थी ।
१ दिसम्बर
न प्राणायाम से, न ध्यान से ।
सुकून मिलता है नेट बंद करने से ।।
१ दिसम्बर
बेसिन में हाथ धोने के बाद हर बार आईने में अपने को निहारना, मोह है या माया ?
२७ नवम्बर
जब छोटी थी तब
बढ़ते बहुत थे
झड़ते नहीं थे
अब
झड़ते बहुत हैं
बढ़ते नहीं हैं
गति से मेरा तालमेल कभी हो ही नहीं पाया !!!
२५ नवम्बर
अरे संतूर भैया, बहुत हुआ अब मम्मी की गोद से उतर जाओ ! आजकल तो दादी नानी की भी उम्र का पता नहीं चलता ।
२५ नवम्बर
हम अक्सर दोगला जीवन जीते हैं । दस्तक कहीं और देते हैं , संवाद किसी और से करते हैं।
२४ नवम्बर
डॉक्टर कहते हैं कि दिन में ६ बार खाना चाहिए.सूप, सलाद,अंकुरित दालें यह सब रोज होना चाहिए. इनके अलावा दोनों समय पूरा खाना, सुबह भरपेट नाश्ता, शाम की चाय के साथ हल्का फुल्का कुछ आदि,आदि .....साथ में सुबह कम से कम ४५ मिनिट घूमने जाएं , घर पर व्यायाम करें , प्राणायाम करें वगैरा ...यदि इन नियमों का पालन किया तो वजन संतुलित रहेगा और आप स्वस्थ.
इसका अर्थ यह हुआ कि हर २/३ घंटे में कुछ खाना है यानि बनाना भी है. अब यदि १०/१२ घंटे बनाने में और २/३ घंटे खाने में गुजार देंगे , सवा से डेढ़ घंटे घूमना , व्यायाम आदि में तो भैया स्वस्थ रहकर करेंगे क्या ? सीधे बिस्तर पर जाकर सोना ही बाकी रह जाता है.....:) :) :)
अब कोई यह राय न दें कि पहले से तैयारी हो तो बनाने में क्या देर लगती है ? पर तैयारी में लगनेवाले समय और ऊर्जा का क्या ?
२१ नवम्बर
आजकल मिलावट इतनी है कि खरी खरी सुनने के लिए कोई राजी नही होता , खरी-खोटी सुनाना पड़ती है ।
१४ नवम्बर
देव उठनी ग्यारस को भगवान विष्णु सोकर उठे तो उन्होंने देखा कि लक्ष्मी हमेशा की तरह पैरों के पास बैठी है.वे बोले -- अरे तुम यहीं बैठी हो ? लक्ष्मी को भी याद आया कि वह तो चंचल है . वह उठी और बैंकों की ओर चल पड़ी.....
१० नवम्बर
बेहद तल्लीन होकर आप मालिनी राजुरकर या पं. जसराज को सुन रहे हैं और बीच में ही सलमान खान का कोई बेहूदा विज्ञापन देखना पड़े , इससे बड़ा दुर्भाग्य कोई नहीं ।
८ नवम्बर
सच्चे वीतरागी तो वे हैं जो बाहर से लाये फल , मिठाई, भोजन के सुंदर सुंदर 'यूज एंड थ्रो' वाले डिब्बे , कभी काम आएंगे यह सोचकर संभालकर नहीं रखते, बल्कि हाथों-हाथ फेंक देते हैं । 😀😀😀
६ नवम्बर
साल भर चलता रहता है HAPPY ये... HAPPY वो ठेठ १ जनवरी से लेकर २५ दिसम्बर तक ...फिर मदर्स डे,डाटर्स डे, और ना जाने क्या-क्या... पहले त्योहारों पर २/४ बड़े-बूढों के पैर छूकर जो आशीर्वाद मिलते थे ,उनसे पूरी जिन्दगी आराम से कट जाती थी ...पर अब इतने सारी शुभकामनाओं के बावजूद किसी को भी सुकून क्यों नहीं है ?
५ नवम्बर
Heavy Traffic का रोना वे लोग ही रोते हैं , जो स्वयं उसका हिस्सा होते हैं । बाहर निकलो ही मत भाई ! काहे का ट्रेफिक, न काहे का हेवी
२ नवम्बर
गुझिया बनाने के लिए कलेजा लगता है, यह तुम क्या जानो ....... ......... बाबू
२८ अक्टूबर
हमारे यहाँ तथाकथित प्रगतिशील लोग BC और AC पर हर बात को तौलते हैं . जो BC है वह सब सिर्फ मान्यता, मिथक, पौराणिक, अवैज्ञानिक आदि है और जो AC है वह प्रामाणिक,सत्य, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक है. सारी थोथी बातें करेंगे और वैयक्तिक जीवन में इन्हीं ''मिथकों'' पर आधारित पूजा पाठ, वार त्यौहार सब चलता है.
जी चाहता है इन मिथ्याभिमानी, दुराग्रही लोगों को BC में धकेल दूँ ...और फिर उन्हें मिथकीय चरित्र कहूं .....
२४ अक्टूबर
हमारे पूर्वज वाकई दूर दृष्टि रखते थे । अरस्तू के जमाने में इंटरनेट नहीं था , फिर भी वे आसानी से कह गए कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है ।
२२ अक्टूबर
आज मेरी मोबाइल कंपनी के ग्रह नक्षत्र शायद आर्थिक लाभ के अनुकूल नहीं है । सुबह से जितने भी फोन लगाए, किसी से भी बात नही हो पाई है ।
१९ अक्टूबर
एक खबर के अनुसार आज जयललिता का फोटो सामने रखकर तमिलनाडु में कैबिनेट की बैठक हुई ।
अभी तक तो सिर्फ ईश्वर को हाजिर नाजिर माना जाता था, अब मुख्यमंत्री भी उस श्रेणी में आ गए ?
१९ अक्टूबर
पहले मेरा बच्चा , अपने बच्चे के लिए कहा जाता था अब वह माय बेबी हो गया है और मेरा बच्चा किसी को भी कहा जाता है.पालतू कुत्ते तक तो ठीक,कल मैंने एक युवती को मोबाईल से कहते सुना ---बैटरी सिर्फ २०% ? अभी चार्जर पर लगाती हूँ...अरे ,मेरा बच्चा ! :) :) :)
१६ अक्टूबर
सैराट की इतनी चर्चा हुई, लेकिन उसका अंत बिलकुल भी समर्थनीय नहीं है । यह तो एक तरह से एक गलत प्रथा को प्रोत्साहित करना हुआ ।
१६ अक्टूबर
दिवाली में घर की सफाई के साथ साथ पर्स की भी सफाई होने लगती है और दिवाली के दिन तक तो दिमाग भी साफ हो जाता है ।
१५ अक्टूबर
एटीएम से 50 के नोट निकलना काफी समय से बंद हो गया था , अब 100 के नोट भी कभी-कभार मिलते हैं । इससे हमारी क्रयशक्ति कम हो रही है । रोजमर्रा की छोटी मोटी चीजें बेचनेवालों के पास 100 के छुट्टे मिलना ही मुश्किल था अब उनके पास 500 का नोट लेकर किस मुंह से जाएं ?
१३ अक्टूबर
ये जो खाद लेकर आया हूं , अच्छी ''सर्विस" देगी -- माली बाबा उवाच ।
अंग्रेजी की लाइलाज घुसपैठ !!!
१० अक्टूबर
भूगोल मुझे विषय के रूप में कभी समझ में नहीं आया । भारत एक समशीतोष्ण देश है यानी क्या इस माथापच्ची में उम्र निकल गई । आखिर प्रकृति ने ठान लिया कि मुझे समझा कर ही मानेगी । आजकल दिन भर गर्मी, शाम को बारिश और रात को ठंड , मौसम समशीतोष्ण हो गया है ।
८ अक्टूबर
हम शक्ति का सम्मान करते हैं , लेकिन उसे बर्दाश्त करना हमारे लिए मुश्किल है , बेहतर है कि वह चार कदम पीछे ही रहे ।
७ अक्टूबर
कल एक संस्था की बैठक थी.नई कार्यकारिणी का गठन होना था.वर्तमान अध्यक्ष महोदय बीच में कुर्सी डालकर विराजित हो गए.पहले एक व्यक्ति ने कहा --अंकल अध्यक्ष तो आप ही रहिए.उन्होंने थोड़ा सा नाटक किया , ना नुकुर की फिर राजी हो गए.बाद में वे एक एक का नाम पुकारते रहे. ये उपाध्यक्ष,ये सचिव,ये उप सचिव,ये कोषाध्यक्ष,ये सह कोषाध्यक्ष,कुल ११ लोग चाहिए थे. एक ने उसी बीच कहा ---बाकी चार ? तो अध्यक्ष महाराज बोलते हैं. महिलाओं को भी तो रखना ''पड़ेगा''. उनके दो नाम मैं बाद में बताऊंगा और दो पुरुष भी घोषित हो गए.
मुझे ''पड़ेगा'' पर आपत्ति थी.तो अत्यंत ''उदारता पूर्वक'' मुझे उपाध्यक्ष पद देने की पहल की गई.मैंने कहा मुझे कोई पद नहीं चाहिए और न ही मैंने इस हेतु से बात उठाई है.वैसे भी मैं आजकल इंदौर में कम ही रहती हूँ.लेकिन पदों की घोषणा के समय किसी महिला के नाम पर विचार तक नहीं किया गया.
टीप :-- ये सभा अत्यंत उच्च विद्या विभूषित सदस्यों की थी और हम मूर्ख महिलाएं समानता की उम्मीद में हैं.
३ अक्टूबर
देश का सबसे विश्वसनीय और नम्बर एक होने का दावा करनेवाला प्रमुख अख़बार, जो गत लगभग २५ वर्षों से हिंदी को भ्रष्ट और नष्ट करने की मुहीम में ईमानदारी से जुटा है, ने एक नया शब्द गढ़ाहै, ''नॉन उपवास फ़ूड'' .... इस अर्थ में हमारे यहाँ पहले एक शब्द चलता था--सकरा. एक शब्द में सारे अर्थ आ जाते थे, लेकिन वह ठेठ शब्द है, बोली भाषा का है, हिंदी का है, हमारे महान अख़बार को कैसे चलता ? सो उन्होंने तीन शब्दों का एक समुच्चय बना दिया , ताकि ''डिफिकल्ट वर्ड की हेल्प से यूथ को अट्रेक्ट किया जा सके''.
३० सितम्बर
जी के जंजाल को अंग्रेजी में व्हाट्स एप कहते हैं...
२८ सितम्बर
यदि सुबह से बिजली न हो तो बजाय पड़ौसी के घर तक दौड़ने के , केलेंडर देखना ज्यादा अच्छा है.हो सकता है कोई छोटा त्यौहार हो, जिसे आप भूल गए हों. विद्युत् मंडल कभी नहीं भूलता, बाकी दिन भले एक मिनिट भी प्रवाह बंद ना हो, उनके लिए त्यौहार वाले दिन बंद रखना जरुरी होता है.
१५ सितम्बर
इन दिनों मराठी धारावाहिकों में गणेश पूजा चल रही है. प्रत्येक धारावाहिक का प्रत्येक पात्र गणेश जी की मूर्ती के सामने खड़ा होकर लंबे लंबे वाक्यों में अपनी अभिलाषा व्यक्त करता है. मैं तो इतनी मंद बुद्धि हूँ कि बाकी समय भले ये सोचने में निकल जाता है कि ये होना चाहिए, वो होना चाहिए, लेकिन भगवान के सामने कुछ भी याद नहीं आता.
१० सितम्बर
अखबार, मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी में सुबह से ऐसे उलझे रहते हैं, मानो इनके उपयोग का कोई सख्त कानून हो और उसका उल्लंघन करने पर फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा ।
८ सितंबर
गणेश चतुर्थी तो फिर भी बड़ा और सर्वमान्य दिन है, लेकिन आजकल हर दिन को मनाने और शुभकामना सन्देश भेजने का जिस तरह चलन निकल पड़ा है, मुझे डर है कहीं अब कोई श्राद्ध पक्ष की शुरुआत पर और सर्वपितृ अमावस्या को शुभकामना न भेज दें.......
५ सितम्बर
गाने;बजाने वाले दोस्तों के लिए एक मशवरा! प्रोग्राम आए-न आए,आप बुलाए जाएं;न बुलाए जाएं, अपना रियाज़ निरन्तर जारी रखिये। लाइव शोज़ में वही काम आता है जो आपने ३६५ दिन के रियाज़ में जमा किया है। कला मर्मज्ञ Sanjay Narhari Patel की वॉल से
और इसमें मैं ये जोड़ना चाहती हूँ
इन गाने बजाने वालों में साहित्यिकों को भी शामिल कीजिए. अच्छी से अच्छी कविता , ख़राब पाठ की वजह से बिगड़ जाती है. लोग भाषण भी तैयार नहीं करते और फिर असंगत बोलते चले जाते हैं. इन विधाओं के लिए भी रियाज़ की जरूरत होती है. ज्यादातर लोग इस बात को न समझते हैं और न ही मानते हैं.
२६ अगस्त
लगभग तीन महीने पहले शुरू की गई''उज्ज्वला योजना'' के अंतर्गत भारत सरकार गरीबी रेखा से नीचे परिवारों को मुफ्त में एलपीजी कनेक्शन उपलब्ध कराएगी.इस योजना का एक मुख्य उद्देश्य महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देना और उनकी सेहत की सुरक्षा करना बताया गया है। योजना के विज्ञापन में एक वाक्य है ''महिलाओं को मिला सम्मान''. कुल मिलाकर सरकार भी इसी बात कि पक्षधर है कि खाना बनाना सिर्फ स्त्रियों का काम है.एक और पीढ़ी को चूल्हे चौके में झोंकने की पूरी तैयारी है.
अब जब सरकार ही इसे महिला के सम्मान के रूप में प्रचारित कर रही है तो परिवार के बाकी सदस्यों की क्या मज़ाल कि वे रसोई के दरवाजे से झाँक लें .......
२० अगस्त
पिछले लगभग २५/३० सालों से तथाकथित महत्वपूर्ण कवि, ''इस ख़ौफ़नाक समय में'' यह खौफ़नाक समय'' जैसे जुमलों का जिस तरह लगातार इस्तेमाल कर रहे हैं, उस गति से तो अभी तक भूचाल आना चाहिए था, प्रलय होना चाहिए था और सब कुछ नष्ट हो जाना चाहिए था.ऐसा कुछ भी नहीं हुआ . ये 'जागरूक' लोग समय को ठीक करने के लिए स्वयं कुछ भी करते दिखाई नहीं देते फिर भी इनकी चेतावनियों से चैतन्य होकर समय को तो कम से कम अपने आप सुधर जाना चाहिए था. न समय सुधरा, न ये स्वयं बदले. जुमले भी अपनी जगह कायम हैं.
१२ अगस्त
आयु पूर्णत्व की दिशा में गमन कर रही है
काया कुछ क्लांत हो चली है
देह को भोजनोपरांत अपरान्ह में क्षणिक विश्राम की आवश्यकता अनुभव होती है
कृत्रिम शीतल वायु के चलते ही नयन निद्रिस्त होने लगते हैं
दूरध्वनी मौन अवस्था में होती है
हे वत्स ! उस काल खण्ड में मुझे पुकारा न करो
मेरी वाणी प्रत्युत्तर देने में असमर्थ होती है.
१० जून
ससुराल की तकलीफों से घबराकर बेटी के आत्महत्या करने के बाद जो माँ बाप विलाप करते हैं, उनसे मुझे बिलकुल सहानुभूति नहीं होती, बल्कि बहुत गुस्सा आता है । अलग अलग कारण बताकर बेटी की शिकायतों को नजर अंदाज़ करने के बाद रोने का कोई अधिकार उन्हें नहीं होता ।
४ जून
मुख़्तार माई के साथ हुए नृशंस अपराध की खबर तो मालूम थी , पर इतने सालों बाद उसकी आत्मकथा ''इन द नेम ऑफ़ ऑनर " का मराठी अनुवाद पढ़ने पर लगा कि हम पढ़ी लिखी महिलाएं अन्याय, अत्याचार, दमन जैसे शब्दों का इस्तेमाल बड़े तैश में आकर करती हैं, पर दर असल हम जानते ही नहीं है कि इन शब्दों का असली अर्थ क्या है ? इस किताब को पढ़ते समय पता चलता है कि औरत होना क्या है और औरत होना कितना बड़ा जुर्म है,पाप है...इसे पढ़ते हुए रोंगटे खड़े होने का वास्तविक अनुभव भी होता है.....
(मुख़्तार माई पाकिस्तान के मीरवाला नामक गाँव की एक महिला है, वह एक गरीब खेतिहर परिवार से थी. समृद्ध और दबंग मस्तोई जमात के लोगों को शक होता है कि मुख़्तार के १२ वर्षीय भाई ने उनकी जमात की एक २० वर्षीय लड़की से बात करने का अपराध किया है और उसकी सजा के बतौर २८ वर्षीय मुख़्तार माई के साथ सामूहिक बलात्कार का आदेश ग्राम पंचायत देती है.बलात्कार के बाद उसे नग्नावस्था में फेंक दिया जाता है. उसके बाद वह संघर्ष करती है और अपराधियों को सजा दिलाती है. सन २००२ में हुई इस घटना ने पूरे विश्व में हलचल पैदा कर दी थी)
३जून
सोनिया गांधी को हिंदी बोलते देखा, अच्छा लगा । बिना कागज के मुहावरेदार हिंदी , तारीफ की जाना चाहिए ।
३१ मई
ये जश्न दल की ओर से है या सरकार की ओर से ? और यदि सरकार की ओर से है तो क्या सरकार को हमारा धन इस तरीके से खर्च करने अधिकार है ?
२८ मई
मैं जब नौकरी में थी तब कुछ लोग शाखा प्रमुख (शाखा प्रबंधक , सहायक महा प्रबंधक आदि) को रोज सलाम बजाना, उनके जन्म दिन को याद रखकर अभिवादन करना आदि अपना परम कर्तव्य मानते थे.(अब भी जारी होगा ही और सभी विभागों , कार्यालयों में भी) नब्बे के दशक में कम्प्यूटर आ गए, तो बैंक की अलग अलग साइट्स बन गईं . उनमें एक आतंरिक साइट भी बनी, जिसमें प्रत्येक कर्मचारी की जानकारी अद्यतन रहती है. इस साईट ने काम और आसान कर दिया.''साहब का जन्मदिन है, इस महीने, इस हफ्ते,आज " आदि उल्टी गिनती शुरू होने लगी और मेरे जैसे कर्मचारियों के लिए ''पता नहीं था,मालुम नहीं था, ओह सॉरी'' जैसे जुमले उछालना मुश्किल हो गया.खैर.
आज यह सब इसलिए याद आ गया कि अब फेसबुक,व्हॉट्स एप्प आदि समूहों के प्रशासकों के मामले में भी इस तरह की ड्यूटी बजाना समूह सदस्यों को अपना आद्य कर्तव्य लगने लगा है.करीब दो महीने पहले एक समूह के प्रशासक के विवाह की वर्षगांठ थी.एक सुस्त सदस्य को आज याद आया.कोई बात नहीं, बधाई दी वहां तक भी ठीक है, लेकिन गिड़गिड़ाकर माफ़ी मांगने जैसा अपराध तो नहीं है यह.
लेकिन दास्य भाव दिल-औ-दिमाग पर छाया हो तो कोई क्या करे ? उनके लिए क्या नौकरी और क्या सामाजिक साइट्स सबके लिए एक ही समभाव होता है ..
१९ मई
रवीश कुमार के अनुसार जो बहादुर होता है, वही कवि होता है ।
वाह ! ये तमगा पाकर गौरवान्वित हूं ।
१८ मई
अब हमारी पीढ़ी के सामने कम से कम ये सवाल तो नहीं है कि रात को नींद नहीं आ रही तो क्या करें ? जिन्न की तरह नेट हाजिर है ---क्या हुक्म है आका ?
समय समय पर अभिभावक की तरह आगाह भी करता है - Do you really want to......
कभी किसी अच्छे मित्र की तरह कुछ पढ़ने को दे देता है तो निरीह प्राणी की तरह भड़ास को भी बर्दाश्त कर लेता है.
ये नेट न होता तो हम क्या करते ? रामचरित मानस / श्रीमद् भगवत गीता पढ़ने या माला फेरने की मानसिकता तो बची नहीं है.पोटली में सत्तू बांधकर तीर्थ यात्रा नहीं कर सकते, न तो ओटला बचा है और न ही बहू की बुराई करने की परम्परा.रिश्तेदारों या परिचितों के यहाँ भी आजकल कोई भी यूँ ही उठकर नहीं चला जाता
न कपड़ों को थेगले लगाने हैं , न गेहूं छानना है, न फटकना -बीनना है, न अचार पापड़ बनाना है, न बड़ी तोडना है.छोटे छोटे बच्चे आजकल प्ले स्कूल चले जाते हैं.जीवन से कितनी सारी चीजें बाहर हो गईं......
वाकई ये नेट न होता तो हम क्या करते ?
११ मई
व्हाट्स एप्प पर एक तथाकथित साहित्यिक समूह है , जिसे मैं तीन बार छोड़ चुकी हूँ, पर प्रशासक महोदय फिर फिर जोड़ लेते हैं, सो अब उस पर चुपचाप पड़ी रहती हूँ.बीच-बीच में तांक झांक कर वहां की सामग्री को डिलीट करना मेरी दिनचर्या में शामिल है. आज दिनभर नहीं जा पाई, अभी देखा तो 675 सन्देश.सहज जिज्ञासा हुई कि ऐसा क्या हो गया ? देखा तो किसी ने किसी की रचना की तारीफ़ की थी तो शुक्रिया, फिर शुक्रिया के जवाब में नमस्कार की मुद्रा में हाथ , फिर उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप में नमस्कार, उसके उत्तर में एक स्माइली , फिर स्माइली के जवाब में अंगूठा.इसके बाद प्रशासकीय टिप्पणी--
शुक्रिया.... भाई
धन्यवाद ....जी
वाह बढ़िया ---दीदी
क्या बात है ---भैया
सर जी लाजवाब
फिर उसके प्रत्युत्तर में वही शुक्रिया,नमस्कार......और....और.....
रक्त चाप के मानक 120 /80 के मुकाबले 675 बहुत ज्यादा होता है....शुक्र है कि मुझे ह्रदयाघात नहीं हुआ......
१० मई
किसी धार्मिक आयोजन का टीवी के किसी चैनल पर सरकारी विज्ञापन कर अंत में हाथ जोड़कर , आयोजन में शामिल होने की अपील करने का,क्या किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री को वैधानिक अधिकार है ?
----मूढ़ मति में उपजा एक प्रश्न .
मूढ़ मति यूं कि लाखों लोग जो उस आयोजन में प्रतिदिन शामिल हो रहे हैं तो वे बुद्धिमान ही होंगे . शासकीय मद से जो धन खर्च हो रहा है, उसकी तारीफ़ करने वाले भी बुद्धिमान ही होंगे. प्रशासन कितनी मुस्तैदी से प्राकृतिक आपदा का सामना कर रहा है, उसके गीत गाने वाले बुद्धिमान ही होंगे.
मेरी ही मति मारी गई है जो ऐसे प्रश्न मेरे दिमाग में आ रहे हैं और मैं उन्हें यूँ सार्वजनिक रूप से पूछ रही हूँ.
१० मई
Hope less की Superlative degree क्या होती है ? कई बार जरूरत महसूस होती है ।
६ मई
वीडियो कोच बस में फिल्म देखना, प्रश्न पत्र के मात्र 5 अंकों वाले अनिवार्य प्रश्न जैसा लगता है ।
२९अप्रैल
सिंहस्थ या कुंभ क्या सरकारी आयोजन होते हैं ? पूरा तंत्र झोंक दिया जाता है ।
१३ अप्रैल
जिस महिला को दिनभर फ्रिज में कुछ रखने और फ्रिज से कुछ बाहर निकालने में कोई उज़्र नहीं होता, उस महिला का दैनिक संघर्ष कुछ अंशों में कम हो जाता है .....
१२ अप्रैल
जब संस्थाओं में कार्यकर्ताओं की जगह पदाधिकारी ले लेते हैं तब संस्था संस्थान हो जाती हैं और वहाँ की कुर्सियां सिंहासन ।
--- प्रसिद्ध मराठी कवि कुसुमाग्रज
१० अप्रैल
चौराहों पर यातायात पुलिस के साथ साथ एक मनोचिकित्सक भी नियुक्त किया जाना चाहिए, जो अनावश्यक और जोर जोर से हॉर्न बजानेवालों का इलाज कर सके ...
१० अप्रैल
अपना जीवन हो या अपनी कविता, दोनों के प्रति तटस्थ दृष्टिकोण आवश्यक है . ....
४ अप्रैल
सबसे ज्यादा दुखद होता है, अपने से कई वर्ष छोटे किसी व्यक्ति के लिए 'थे' लिखना । पं. भगवती शर्मा, काश! मेरे इस प्रारब्ध को आप बदल पाते .....
१ अप्रैल
एंटी एजिंग और एंटी रिंकल क्रीम में एजिंग और रिंकल किसी तानाशाह की तरह लगते हैं तो एंटी बेचारा लुटा पिटा सर्वहारा.....
३१ मार्च
किसानों को प्रशिक्षित किए जाने की आवश्यकता है । भैया , कर्ज लो और देश छोडकर भाग जाओ । इतना भी आत्मसम्मान किस काम का कि मरने की नौबत आ जाय ।
३० मार्च
आज एक समूह में प्राणियों के बारे में अनुभव लिखना थे, उनको यहाँ भी साझा करने से रोक नहीं पाई .
हमारे घर पर तो नहीं पर मेरे पड़ौसी के घर एक कुत्ता था,जो वे उसको २/३ महीने की आयु का लेकर आये थे. उसका नाम था पेप्सी. अपने मालिक के साथ हमारे घर की चौकसी भी करता था. किसी की मजाल नहीं थी कि हमारे फाटक को कोई हाथ भी लगा दे.हम लोग जब घर आते थे तो हर व्यक्ति के लिए भौंकने का उसका अलग तरीका होता था, सो हमें अंदर से ही पता चल जाता था कि कौन आया है. मेरे बेटे से उसे विशेष लगाव था. बेटा जब नौकरी के लिए दिल्ली गया तो पेप्सी ने एक नई हरकत शुरू की. मैं घर आती तो वह उनके फाटक को उलाँघकर हमारे यहाँ आता और बेटे की बाइक को सूंघ सूंघकर मेरी ओर प्रश्नार्थक नजर से देखता.पांच महीने बाद जब छुट्टी में बेटा आया तो पेप्सी ख़ुशी के मारे इतना उछल रहा था कि हम लोग हैरान थे.
दूसरा अनुभव तो और भी मजेदार है. मेरे मायके में एक तोता था.जिसका पिंजरा नीचे के आँगन में टंगा रहता था. माँ का कमरा ऊपर था और वह वृद्धावस्था की वजह से एक बार ही नीचे आती थी.नीचे आने के बाद वह भाभी को आवाज देकर कहती --कुसुम मी आले ग . कुछ समय बाद वह तोता माँ को पहचानने लगा और माँ के पहले ही पूरा वाक्य तो नहीं पर भाभी के लिए बोल पड़ता -कुसुम, कुसुम . जब तक माँ उसके पिंजरे के पास जाकर एक बार खड़ी नहीं होती, उसका कुसुम, कुसुम चलता रहता. एक दिन मेरे भतीजे ने उसकी नकल उतारी तो इतना नाराज हो गया और इस तरह चिल्लाने लगा मानो कोई विपत्ति आ गई.हमें लगा कहीं बिल्ली तो नहीं है ?
एक बिल्ली हमारे यहाँ आती थी.उसने कोई नुक्सान कभी नहीं किया.बस पिछली खिड़की से आकर आगे की खिड़की से निकल जाती थी. हमारा घर यानि उसका बाय पास रोड. मेरी बेटी स्वरांगी छोटी थी और किसी भी बिल्ली से बहुत डरती थी, ये उस बिल्ली ने भांप लिया था. वह आगे की खिड़की तक पहुँचने के बाद पीछे मुड़कर जरूर देखती और यदि स्वरांगी दिख जाती तो उसे चिढ़ाने के लिए जान बूझकर ''म्याऊँ'' करती और चली जाती.
३० मार्च
अंत भला सो सब भला @ का रे दुरावा smile emoticon
जी मराठी के एक धारावाहिक के समाप्त होने पर लिखे इस स्टेटस को कई लोगों ने लाइक किया, उनमें Kirti Killedar भी थी ।
कौन कीर्ति किल्लेदार ? इस धारावाहिक के शीर्षक गीत की गायिका ।
तो ? वह मूल रूप से इंदौर की है ।
तो फिर ? उसने काफी मेहनत से यह हासिल किया है ।
(मेहनत तो सभी को करना पड़ती है।)
उसकी इस सफलता के पीछे परिवार का सहयोग है । (परिवार के सहयोग के बिना सफलता मुश्किल ही होती है, इसमें नया क्या है)
अब आया असली मुद्दा । उसके कैरियर के लिए पिता Shyam Killedar ने अपनी पांच अंकों वाली अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी और वे उसके साथ हर समय, हर जगह बने रहे । कीर्ति की माँ, वृद्ध श्वसुर की देखभाल के लिए इंदौर में ही रही । Shyam भाई का एक पैर मुंबई में और एक पैर इंदौर में रहता था और यह सब एक दशक से भी ज्यादा समय तक चला । ये सब मोटी मोटी बातें हैं, छोटा छोटा पता नहीं कितना होगा !
और सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है कि जब किल्लेदार दंपत्ति यह सब कर रहे थे तब "बेटी बचाओ, देश बचाओ" यह नारा दूर दूर तक कहीं नहीं था ।
२९ मार्च
सिर्फ ध्वनि प्रसारक यंत्र ही ध्वनि प्रदूषण की सीमा में क्यों आते हैं ? आजकल गाड़ियां और खास तौर पर बाइक चलानेवाले लड़के इतनी तेजी से गाडी चलाते हैं कि उसकी भी आवाज तेज होती है . अस्पताल के पास हॉर्न नहीं बजाना ये तो शायद वे जानते भी नहीं हैं....ज्यादातर लोग नेटवर्क की परेशानी की वजह से अंदर से निकलकर बाहर आ जाते हैं और मोबाईल पर घंटों जोर जोर से बतियाते हैं ......जगह जगह निर्माण कार्य चलता है. उन मशीनों की आवाज आती रहती है, वहां काम कर रहे मजदूर तेज आवाज में आपस में और मोबाईल पर बात करते हैं साथ में मोबाईल पर गाने भी बजते हैं...घरों में भी पानी के पम्प, वाशिंग मशीन, मिक्सर, माइक्रोवेव ओवन, टीवी आवाज के साथ चलते हैं...और जितने सदस्य होते हैं वे सारे मोबाईल पर बात करते हैं ....इस सारे प्रदूषण के बारे में कब सोचा जाएगा ...
२६ मार्च
लगभग दो साल पहले का स्टेटस है, जो सही साबित हो गया .... ऑक्सफोर्ड का तो नहीं पता पर आज फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर ज्यादातर लोग मुझे ताई कहते हैं, जबकि पहले मैं मैडम या आंटी थी ...
अलकनंदा साने
आज हमारी ताई सुमित्रा महाजन का टीवी पर अनुराधा प्रसाद साक्षात्कार ले रहीं थीं , अमूमन पूरे समय वे उन्हें ''ताई'' कहती रहीं . शायद अब ताई यह शब्द वैश्विक हो जाय , ऑक्सफोर्ड के शब्दकोष में आ जाय ......
२६ मार्च
कामवाली बाई का छुट्टी पर जाना, घर के प्रति दायित्वों को पुनर्जागृत करने में सहायक होता है ...
२५ मार्च
कहा जाता है कि पापी पेट का सवाल है, जबकि पेट स्वयं ही एक सवाल है, उसके कंधे पर बंदूक नहीं रखी जानी चाहिए....
२५ मार्च
अलमारी के कपड़ों का मोह तो छूटता नहीं, चादर कैसे रख पाएंगे ज्यों की त्यों !!!
२२ मार्च
बेटी शादी के मंडप में या ससुराल जाने पर पराई नहीं लगती.
जब वह मायके आकर हाथ मुंह धोने के बाद बेसिन के पास टंगे नैपकिन के बजाय अपने बैग के छोटे से रुमाल से मुंह पौंछती है तब वह पराई लगती है. जब वह रसोई के दरवाजे पर अपरिचित - सी ठिठक जाती है तब वह पराई लगती है. जब वह पानी के गिलास के लिए इधर उधर आँखें घुमाती है तब वह पराई लगती है. जब वह पूछती है वाशिंग मशीन चलाऊँ क्या तब वह पराई लगती है. जब टेबल पर खाना लगने के बाद भी बर्तन खोल कर नहीं देखती तब वह पराई लगती है.जब पैसे गिनते समय अपनी नजरें चुराती है तब वह पराई लगती है.जब बात बात पर अनावश्यक ठहाके लगाकर खुश होने का नाटक करती है तब वह पराई लगती है..... और लौटते समय 'अब कब आएगी' के जवाब में 'देखो कब आना होता है' यह जवाब देती है तब हमेशा के लिए पराई हो गई सी लगती है.
लेकिन गाड़ी में बैठने के बाद जब वह चुपके से अपनी कोर सुखाने की कोशिश करती है तो वह परायापन एक झटके में बह जाता है ...
१७ मार्च
दो दिन पहले मैंने बहू के साथ अपना छाया चित्र लगाया था, जिस पर बहुत सारी टिप्पणियाँ आईं, लेकिन सबसे बढ़िया ,सामयिक और जरूरी टिप्पणी वरिष्ठ पत्रकार Ramesh ZawarSir की थी । उन्होंने लिखा
सास भी कभी बेटी थी!
१६मार्च
वे क्या पहनेंगे और किस रंग का पहनेंगे, यह उनका अंदरूनी मामला है । वह Top news या Breaking news कैसे हो सकता है ? जबकि गाहे बगाहे हम उनके विरोध में निंदा राग भी छेड़ते रहते हैं ।
१३ मार्च
राज ठाकरे के अनुसार चलें तो महाराष्ट्र से बाहर रहने वाले हम जैसे मराठी भाषियों को , वहाँ ग्यारंटेड रोजगार मिलना चाहिए ।
१० मार्च
सिर्फ एक दिन ? ये तो 33℅ से भी कम है !!!
८ मार्च
क्या चाहिए था
और क्या मिला
सवाल यह नहीं है !!!
सवाल यह है
कि जो मिलना चाहिए था
वह क्यों नहीं मिला ???
शेष ३६४ दिनों के लिए .........
८ मार्च
कल एक कार्यक्रम में युवा कवयित्री ने कुछ कविताएं सुनाईं । फिर कहने लगी -- मैडम आपका मार्ग दर्शन चाहिए । मैंने कहा -- जरूर, कभी घर आओ ।
ये वरिष्ठ होने का भ्रम है या खुर्राट होने का लक्षण ?
७ मार्च
पहले देवदास, फिर बाजीराव मस्तानी में पत्नी और प्रेमिका का नृत्य और अब मराठी के एक पौराणिक धारावाहिक "जय मल्हार"में यही प्रयोग होने वाला है ।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है भाई !
५ मार्च
दिल्ली सरकार की उपलब्धियों का गुणगान करने वाले विज्ञापन , मराठी चैनल्स पर दिखाने का क्या औचित्य है ?
मुंबई वालों की नजर दिल्ली की ओर रहती है, लेकिन दिल्ली वालों की नजर मुंबई की ओर ?
३ मार्च
आज सुबह मुझे कहीं जाना था. सुबह से मैं कुछ ऐसी उलझनों में रही कि तैयार होने में देर हो गई. सोचा - अब भगवान जी के नहाने/धोने की छुट्टी, सिर्फ अगरबत्ती जला दूंगी. और बाथरूम में घुस गई.तभी मोबाईल बजा . जिनसे मिलने जाना था उन्हीं का फोन था . क्षमा याचना के स्वर में कह रहे थे -- मेडम , क्या आप ग्यारह के बजाय बारह बजे आ सकती हैं ? मैं अचानक कहीं व्यस्त हो गया हूँ ........मैंने हामी भरते हुए तुरंत अपना निर्णय बदला अपने स्नान के बाद ठाकुर जी को भी नहला धुला दिया ......
ईश्वर का भी भाग्य होता है और उसमें जो बदा होता है , वही होता है .
२ मार्च
एक स्पंज का प्रावधान भी किया जाना चाहिए था । बजट के पेज पलटने के लिए बार बार थूक नहीं लगाना पड़ता ।
२९ फरवरी
कुछ घरों में दूध मुंहे बच्चों को भी आप सम्बोधित किया जाता है और घर में काम करने वाले बड़ी उम्र वालों को तू तकारे से बुलाया जाता है ....
ये कैसी मानसिकता होती है ????.....
२८ फरवरी
घरेलू महिलाएं अक्सर कहती हैं कि वे कुछ नहीं करती । वे सही कहती हैं । पूरा दिन लगे रहो तो घर के कामकाज कोई खास नहीं होते ।
एक वर्ष बाद उपजा ज्ञान ।
२७ फरवरी
किसी को पिटते देखने में क्या खुशी मिलती है लोगों को ? और वो भी उसे खेल का नाम देकर । और ऐसे प्रशंसक भी किस काम के, जो जान लेवा हमला भी चुपचाप देखते रहे ।
२६फरवरी
ताई की जगह बहनजी को बिठा देना चाहिए । किसी को बोलने ही नहीं देंगी और सारे प्रस्ताव आराम से पारित हो जाएंगे ।
शुरू हो गया स्थगित स्थगित का खेल । विधानसभा चुनाव तक की बात है फिर तो बहनजी भी रोहित को भूल जाएंगी ।
२४ फरवरी
मेरा सामान्य ज्ञान जरा कमजोर है , जानना चाहती हूं कि
१. क्या हैदराबाद जे. एन.यू द्वारा शासित है ?
२. यदि मेरी कालोनी में कोई घटना होती है तो क्या हमें यह अधिकार होगा पुलिस को कालोनी के अंदर आने से रोक सकें ?
२३ फरवरी
आज सह्याद्री चैनल ने मराठी साहित्य सम्मेलन को प्रसारित किया । मेरी कविता भी प्रसारित हुई।
२० फरवरी
कभी मुझे लगता है भाजपा/रा स्व संघ सही है, कभी लगता है कांग्रेस सही है । कभी लगता है सीपीएम सही है , कभी लगता है आप सही है । कभी नीतीश सही लगते हैं, कभी लालू । और कभी तो बहनजी, अम्मा भी सही लगती हैं ।
ऐसी ही ढुलमुल हूं मैं ।
यह सच्चे देश प्रेमी को परिभाषित करता है या नहीं , पता नहीं , पर सच्चे भारतीय की निशानी जरूर है ।
१९ फरवरी
भला बुरा कैसा भी समय हो, चुप्पी साधने वाले अंतत: सही साबित होते हैं ।
आत्म ज्ञान
१९ फरवरी
मुझे हनुमंतप्पा पर गर्व है, साथ ही उन पर भी गर्व अनुभव करती हूं, जो उन्हें जीवित निकाल कर लाए और उन पर भी जिन्होंने उन्हें बचाने की हर चंद कोशिश की ।
सादर श्रद्धांजलि !!!......
११ फरवरी
पिछले दिनों एक पारिवारिक आयोजन हेतु बनारस जाना हुआ, वहां दुर्गा घाट इलाके में नाना फड़नवीस का बाड़ा देखने का अवसर भी मिला, लेकिन यह जानकर दुःख हुआ कि उस बाड़े की सुध न पुरातत्व विभाग को है और ना ही इतिहासकारों को, जबकि गंगा घाटों को सजाने संवारने में स्वयं प्रधानमंत्री रूचि ले रहे हैं. पुणे की किन्हीं पार्वतीबाई चौगुले ने उस बाड़े को अधिकृत कर लिया है और वहां अब मात्र पारिवारिक, सामाजिक आयोजन होते हैं.
१० फरवरी
कुछ लोग चाहते हैं कि आत्महत्या करनेवालों के लिए सारा देश रोएं , जबकि ये लोग अपने ही परिवार के बारे में नहीं सोचते । किसी के अबोध बच्चे होते हैं, कोई नवोढा़ पत्नी को छोड़ जाता है और कहीं जरा जर्जर माँ बाप होते हैं । ऐसे आत्म केंद्रितों के लिए अनावश्यक सहानुभूति की लहर फैलाई जाती है ।
२५ जनवरी
" मारो और मर जाओ " को सीखने और सिखाने वाले कितने हतभागी हैं , जो जानते ही नहीं है कि "जिओ और जीने दो" में असीम सुख है ।
१४ जनवरी
पिछले हफ्ते अक्का (मेरी बड़ी बहन उम्र ८३ वर्ष) सुबह सुबह अचानक जोर जोर से कराहने लगी. उनके हाथ में तेज दर्द उठा था. कमजोरी की वजह से थोड़ी देर बाद सांस भी फूलने लगी, उनका नाती पास में ही रहनेवाले ह्रदय रोग विशेषज्ञ डॉ. नितिन साहू को बुला लाया. डॉ. साहू ने उनकी हालत देखी तो अस्पताल में भर्ती करने का सुझाव दिया और उन्होंने ही नजदीक के अस्पताल में फोन कर एम्बुलेंस भेजने के लिए कहा. वहां एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं थी. अक्का की स्थिति ऐसी नहीं थी कि दरवाजे तक भी जा सकें. डॉ. साहू ने तुरत निर्णय लिया और अक्का को गोद में उठाकर खुद की कार में अस्पताल ले गए.....
कभी कभी आनेवाले ऐसे सुखद अनुभव विश्वास जगाते हैं....वर्ना पेशा कोई भी हो लगभग हर पेशेवर व्यापारी हो गया है.......
१४ जनवरी
जी मराठी पर "आम्ही सारे खवैये" नामक एक कुकरी शो आता है । उसका संचालन वरिष्ठ अभिनेता प्रशांत दामले करते हैं । उस दौरान वे कहते हैं -- मुझे कुछ काम नहीं है, पर मुझे विश्रांति (ब्रेक) लेना है और मैं लूंगा ।
जीवन मे भी इसी तरह बेवजह विश्रांति लेना चाहिए ।
६ जनवरी
अभी पिछले हफ्ते जब छुट्टियां थी, पिछवाड़े के मकान में बच्चों की धमा चौकड़ी मची रहती.मुझे दिखता तो कुछ नहीं था, पर दिनभर उनकी आवाजें सुनना अच्छा लगता था. एक दिन किसी बच्चे ने कुछ शैतानी की तो एक बड़ी
लड़की ने कहा --रुक, अभी तेरा नाम तेरी मम्मी को बताती हूँ.
बच्चे का मासूम जवाब ---मम्मी को पता है मेरा नाम ..
५ जनवरी
कल एक व्याख्यान सुनने का अवसर मिला. बाइक से विश्व भ्रमण करनेवाले प्रवीण कारखानिस ने ''मी पाहिलेला पाकिस्तान''( पाकिस्तान --जैसा मैंने देखा) इस विषय पर बोलते हुए कई दुर्लभ और अनोखी जानकारियां दी. एक महत्वपूर्ण जानकारी के अनुसार पाकिस्तान एक मात्र ऐसा देश है, जहाँ हर शहर में वीजा जारी होता है.पास पोर्ट वे अपने पास रख लेते हैं और २४ घंटे के भीतर पुलिस स्टेशन पर रिपोर्ट करना होता है.किसी इमारत या परिसर में जिस दरवाजे से अंदर दाखिल होते हैं, उसीसे बाहर निकलना अनिवार्य है, ताकि बाहर निकलने की पुष्टि हो सके.
और उसी देश से कई लोग हमारे यहाँ अंदर तक चले आते हैं, पता ही नहीं चलता..
४ जनवरी
भारत की पहली शिक्षिका सावित्री बाई फुले का आज जन्मदिन (३ जनवरी १८३१-१० मार्च १८९७) है. आज हम महिलाऐं जिस तरह से सर उठाए घूम रही हैं, उसके पीछे सावित्रीबाई का सतत संघर्ष है.मात्र १७ वर्ष की आयु में पुणे के भिड़े वाड़ा में उन्होंने ६ बच्चियों को लेकर स्कूल खोला .१ जनवरी १८४८ से १५ मार्च १८५२ तीन वर्ष की इस छोटी सी अवधि में, अनेक विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए उन्होंने १८ स्कूल खोले . साथ साथ उन्होंने बाल विवाह, विधवा केश वपन के विरोध में पूरी ताकत से आवाज उठाई.भारतीय स्त्री की दशा सुधरने के लिए १८५२ में ही उन्होंने ''महिला मंडल'' की स्थापना की.उनकी स्मृति को सादर नमन.
३ जनवरी
क ख ग घ को पहचानो
अलिफ को पढ़ना सीखो
नुक्कड़ नाटकों से सामाजिक चेतना जगाने वाले
रंगकर्मी सफदर हाशमी का आज स्मृति दिन है ।
२ जनवरी
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