२०१५

 माँ कहती थी दिया बत्ती के समय दरवाजा खुला रखना चाहिए ,लक्ष्मी आती है । दरवाजा से माँ का तात्पर्य सामने के दरवाजे से होता था, लेकिन माँ का विश्वास गलत था । मैंने तो लक्ष्मी पुत्रों के यहाँ लक्ष्मी को अक्सर पिछले दरवाजे से आते देखा है ।
३१  दिसम्बर

मौसम विभाग की सूचनाएं तो अक्सर गलत निकलती हैं, हमें तो मौसम की जानकारी घर में रखे घी से ही मिल जाती है...
३० दिसम्बर

माँ जब भी गाजर का हलुआ या ऐसा ही कुछ बनाती तो मुझे लगता वो भाई को ज्यादा देती हैं और भाई सोचता मैं ज्यादा लाडली हूं , पर हमने कभी माँ से नहीं पूछा कि माँ तूने खाया कि नहीं ?
देर से उपजा ज्ञान !!
२९ दिसम्बर

यहाँ प्रतिदिन चलने वाली नित नई नौटंकियों का खूब लुत्फ उठाया जा सकता है , लेकिन देश की नागरिक होने की वजह से सब कुछ देख सुनकर सिर्फ कोफ्त होती है ।
२८ दिसम्बर


सारे प्रकरण के दौरान वह लड़का कहीं नहीं दिखा, न ही उसका कहीं जिक्र आया जिसने ज्योति सिंह पांडे का साथ दिया था ।(निर्भया का मित्र)
२३ दिसम्बर


चैनल्स जोर शोर से प्रश्न उठा रहे हैं कि कानून बदलने के लिए 3 साल तक जन प्रतिनिधियों ने पहल क्यों नहीं की ?
यही प्रश्न उनसे भी पूछा जाना चाहिए, आखिर चौथा स्तंभ कहा जाता है ।
और...और यही प्रश्न हमसे, समाज से भी पूछा जाना चाहिए कि जो उबाल अभी आ रहा है, वह इतने दिन कहाँ था ?
मैं भी दोषी, तुम भी दोषी । प्रतिनिधियों से सवाल करने की आदत हमें भी विकसित करना होगी ।
२१ दिसम्बर

सुधार गृह में भी वह मजे में ही था । वहाँ क्या सजा थी जो रिहा हो गया । उसे तो हिंस्त्र जानवरों के बीच जंगल में छोड़ देना चाहिए ।
२०  दिसम्बर

कानून बदला नहीं जा सकता कहनेवाले जरा उन घरों में झांककर देखें जहाँ लड़कियां हैं, उन माँ-बाप से बात करके देखे तो पता चलेगा कि रोजमर्रा की जिंदगी कितनी दहशत में जी रहे हैं वे लोग.बच्ची चाहे दुधमुंही हो या युवा, भय हर जगह है, किसी प्रकरण को निर्भया नाम देने से क्या होता है ? और जिसकी सजा ख़त्म होने की बात की जा रही है, उसने क्या वाकई सजा भुगती है ? उसकी तो बाकी जिंदगी भी आराम से गुजर जाएगी.
अब ऐसा लगने लगा है कि सारे कानून गुनहगारों को बचाने के लिए ही बनाए गए हैं और सारी सरकारें, सारे न्यायालय इस हेतु प्रतिबद्ध हैं......
२०  दिसम्बर

बड़े करीने से, मेहनत से साफ सुथरे और सजाए संवारे घर का हुलिया, एक उधमी बच्चा जैसे दो मिनिट में बिगाड़ देता है, वैसे ही दस महीने नाना जतन से संभाल कर रखे वजन को , ठंड दो महीनों में चौपट कर देती है ।
गाजर का हलुआ, आलू के परांठे, मटर की कचौरी, गजक, गुड़ की रोटी, मेवे के लड्डू.... शैतान बच्चों की सूची काफी लंबी है
१९  दिसम्बर  

बरसों से निष्क्रिय व्यक्ति को सम्मानित करने की क्या वजह हो सकती है ? सर्वोच्च सम्मान प्रदान करने के कुछ मापदंड हैं या नहीं ?
१४  दिसम्बर  

विधायिका के लिए भी ''काम नहीं तो वेतन नहीं'' नियम लागू होना चाहिए....
१०  दिसम्बर  

पहले मुझे लगता था, दुनिया में मूर्खों की कमी नहीं है, लेकिन अब मेरी राय बदल गई है । जब से फेसबुक और व्हाट्स एप का उपयोग करने लगी हूं, मुझे लगता है, दुनिया में पागलों की कमी नहीं है ।
८ दिसम्बर  

आज ''रायता फैलना'' का प्रात्यक्षिक देखा. दोपहर में टेबल पर खाना लगाया.उसी समय मोबाईल बजा.हाथ लम्बा कर उसे उठाने लगी तो रायते के चम्मच में कुर्ती की बांह फंसी और रायते का डोंगा ----ये जा,वो जा....
६ दिसम्बर  

सुबह का खाना बनते बनते शाम के खाने की चिंता करना ही सच्चा नारी धर्म है ...
३ दिसम्बर  

कल ठंड को कोसा था, आज पूरे जोश खरोश के साथ हाजिर ....और गर्मी लाइन अटैच ....
३ दिसम्बर  

पहले सुना था Sky is the limit. अब मुहावरा बदल गया है । 100 is limit, 5000 is limit... and so on ...
३ दिसम्बर  

जिस दिसम्बर में ठण्ड से कुड़कुड़ाते थे, उसी दिसंबर में अभी तक एक भी स्वेटर, यहाँ तक कि हल्की पतली शॉल की भी जरुरत नहीं पड़ी है, बल्कि पंखे की दरकार अनुभव होती है ....यही ग्लोबल वार्मिंग है क्या
२ दिसम्बर   

भतीजी का फोन आया --बुआ, सराफे जाना है, आप आएंगी क्या ? , दूसरे दिन भांजी का घनघनाया--मौसी, तू आ रही है न सराफे ?
अच्छा लगता है, जब युवा लोग अपनी मौज मस्ती में शामिल करते हैं....कुछ युवा-युवासा लगता है.....
( इंदौर का सराफा चांदी-सोने से ज्यादा खाने के ठियो के लिए प्रसिद्द है....)
३० नवम्बर  

कार्ल मार्क्स ने कहा था-- धर्म अफीम की तरह होता है, लेकिन वर्तमान में ''तथाकथित'' वाम पंथी धर्म को जहर की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं, जबकि यदि वे अपने आदी पुरुष का अवलम्बन करें तो तकलीफ कम हो सकती है, क्योंकि अफीम कुछ अंशों में दवा का काम भी करती है.....
२५ नवम्बर  

असहिष्णुता का शोर मचाना भी एक तरह की असहिष्णुता है ....
२४ नवम्बर  

आजकल अपने आप को नास्तिक या वामपंथी कहना भी, बुद्धिजीवी कहलाने का एक अस्त्र बन गया है .....
२२ नवम्बर  

यह सुनते-सुनते कितने बरस बीत गए कि कनाड़िया रोड के अतिक्रमण हटाए जाएंगे. इस बीच अतिक्रमण हटे तो नहीं, बल्कि बढ़ते चले गए. पहले कितनी ही बार बेतहाशा भीड़ की वजह से रास्ते में देर लगती थी इसलिए घर से जल्दी निकलने की आदत बना ली. जब पिपलिया हाना वाली सड़क नहीं बनी थी, तब पलासिया या जीपीओ की ओर जाने का यही एकमात्र रास्ता था.बाद में लगभग दस वर्ष पूर्व जब बस चलना शुरू हुई, तब ट्रैफिक जाम होने लगा, उसे भी भुगता.इन सारी वजहों से पहले दुपहिया और बाद में चौपहिया वाहन चलाना बंद कर दिया.बीच बीच में खबरें आती थीं कि कनाड़िया मार्ग 100 फ़ीट चौड़ा हो जाएगा, तब राहत महसूस होती थी.
कल जब इस मार्ग का मंजर देखा तो बहुत बुरा लगा. तमाम परेशानियों के बावजूद, ऐन दीपावली के समय अतिक्रमण रोधी दस्ते का इस तरह विध्वंस अच्छा नहीं लगा. नियमों का,कानून का पालन होना चाहिए,पर मानवीयता से परे जाकर नहीं.
प्रशासन द्वारा यह ध्यान रखा जाना चाहिए था कि कानून मनुष्य के लिए हैं, मनुष्य कानून के लिए नहीं है
५ नवम्बर  

जब बिजली की असमय आँख मिचौली शुरू हो जाय तो समझ जाना चाहिए कि त्यौहार बिलकुल नजदीक है
४ नवम्बर  

घर की साफ़-सफाई के लिए जरूरी है कि त्यौहार और मेहमान एक निश्चित अंतराल पर आते रहें ....
३१ अक्टूबर   


मैं कर्म कांडी तो नहीं,पर आस्तिक जरूर हूँ.मेरा विश्वास है कि ज्यादातर परम्पराओं,प्रथाओं आदि के पीछे वैज्ञानिकता होती है. मैं मानती हूँ कि उपवास रखने से हमारा अपना भला हो सकता है लेकिन आज तक यह समझ नहीं पाई कि किसी और की आयु कैसे बढ़ती है ? और इस मानसिकता को भी नहीं समझ पाई कि अपने लिए किसी को दिनभर भूखा-प्यासा देखकर कोई गदगद कैसे हो सकता है ?
२९ अक्टूबर   

एक खबर के अनुसार विधवा के लिए ''कल्याणी'' सम्बोधन की अनुशंसा की गई है. इससे उनकी सामाजिक परिस्थिति में क्या फ़र्क़ पड़नेवाला है ? पहले भी हरिजन,अनुसूचित जाति, दृष्टिहीन, मूक-बधिर,विकलांग जैसे शब्द प्रचलन में लाए गए, लेकिन इससे समाज की मानसिकता में क्या अंतर आया है ?
२७  अक्टूबर   


"मां ! इस बार मैं अकेली इंदौर जाऊंगी" नातिन ने कहा ।
अब नानी पर हक जताने लगी है नवासी ...
२१ अक्टूबर   

हर वर्ष की तरह इस बार भी साल भर के लिए दो बोरी तुअर दाल खरीद ली थी । अब गोदरेज कही जाने वाली लोहे की अलमारी में से साड़ियां बाहर हैं और बोरियां ठूंसी पड़ी है । 
२१ अक्टूबर   

जब मैं दूसरों का लिखा पढ़ने के लिए समय नहीं निकाल पाती हूं तो अपने लिखे पर कोफ्त होने लगती है ।
१९ अक्टूबर  

एक खबर है कि इंदौर में डेंगू का कहर -- ये सफाई अभियान का परिणाम है । कल से घर में साफ सफाई बंद क्योंकि डेंगू के लार्वा साफ जगह पर पनपते हैं ।
१७ अक्टूबर  

एक फॉर्म भरना था । नाम, जन्म तिथि, पता के बाद व्यवसाय था । हम औरतों को तो अक्ल होती नहीं है ऐसा बहुसंख्य लोग सोचते हैं । फॉर्म भरवानेवाला बहुसंख्यक का प्रतिनिधि ही था। बड़े ध्यान से देख रहा था कि मैं क्या लिख रही हूं। पहले तो उसने मेरे सफेद बालों पर नजर डालकर पूछ ही लिया था कि लिखना-पढ़ना आता है कि नहीं ?
व्यवसाय में जब मैं सेवा निवृत्त का स बना रही थी वह तपाक से बोला -- क्या लिख रही हैं ?
मैंने कहा -- सेवा निवृत्त । 
तो कहता है गृहिणी लिखिए।
मैंने पूछा सेवा निवृत्त पुरूष क्या लिखते हैं ?
जवाब आया आदमियों की बात अलग होती है
फिर एक प्रश्न -- आंटी, अंकल नहीं हैं क्या ?
मैं -- क्यों ?
उनसे भरवा लेता । smile emoticon
कथा का सार -- स्त्री शक्ति की बात अगले १०० साल तक भूल जाना ही बेहतर है ।
एक शेष प्रश्न -- मैं सेवा निवृत्त हूं या गृहिणी ?
१५ अक्टूबर  
 
जातियों का उदगम व्यवसाय आधारित माना जाता है जैसे सुतार, लुहार, मोची, माली आदि फिर इस कृषि प्रधान देश में किसान कोई जाति क्यों नहीं बनी ?
१३ अक्टूबर  

शक्ति स्त्रीलिंग है और उसका प्रदर्शन पुल्लिंग । ये भेदभाव सब जगह मौजुद है ।
१२ अक्टूबर  

सम्मान लौटानेवाले साहित्यकारों को शहीद का दर्जा दिया जाना चाहिए और यदि वे ईमानदारी से सम्मान राशि आदि लाभदायी पदार्थ भी लौटाते हैं तो अशोक चक्र से सम्मानित किया जाना चाहिए.....इतिहास उनके इस महान त्याग को सदैव याद रखेगा .
११ अक्टूबर  

आज किसी कारणवश गूगल पर उज्जैन तलाश रही थी तो कवियों की सूची दिख गई. उस पर क्लिक किया तो महद् आश्चर्य .....महाकवि कालिदास तो खैर थे ही नहीं, पर वर्तमान काल के कवियों में भी डॉ शिवमंगल सिंह सुमन, चंद्रकांत देवताले जैसे नाम भी गायब हैं और अल्ले गल्ले दसियों कवि हैं .....नई पीढ़ी तो कुछ तलाशना हो तो यहीं तलाशती हैं, वह इन कवियों को जान ही नहीं पाएगी .....जय बाबा गूगल....
११ अक्टूबर  

बेरोजगार युवा "अॉन लाइन सम्मान कलेक्शन सर्विस" शुरू कर सकते हैं । ये व्यवसाय अगले ४ साल तो निश्चित चल सकता है । बेचारे सम्मान धारक परेशान हो रहे हैं। कोई महाराष्ट्र में है तो कोई केरल में, सबको सुविधा हो जाएगी ।
१० अक्टूबर  

मेरे पिताजी को और मुझे लगता है पिछली पीढ़ी के लगभग सभी को यह आदत थी कि १ तारिख को भुगतान के अलग अलग लिफाफे बनाकर रखते थे, मसलन किराना, दूधवाला आदि. उसकी एक वजह यह भी थी कि सामान्य मध्यम वर्ग की आय कम थी और कर्जदार होना अच्छा नहीं माना जाता था. अब हम लोग तो कर्ज में ही जीते हैं और जितना ज्यादा कर्ज,उतना ज्यादा रसूख. मैंने पिताजी की इस आदत को, बेशक कर्ज की तरह,पर कायम रखा है, . यानि जैसे ही मेरे क्रेडिट कार्ड की बिलिंग तारिख आती है, मैं एक दिन बैठकर सारे भुगतान ऑन लाइन कर देती हूँ. इस तरह अलग अलग ''लिफाफों'' में तय शुदा राशि चली जाती है और मुझे पता रहता है कि अब महीना कैसे गुजारना है.एक डायरी में रोज का व्यय लिखने की आदत भी उन्हीं की तरह बना रखी है.इसका मखौल भी उड़ाया जाता है,पर अनगिनत फायदे हैं, सो मैं उस ओर ध्यान नहीं देती. हालांकि आय पिताजी के मुकाबले कई हजार गुना ज्यादा है, पर मैं उतनी ही निश्चिन्त और व्यवस्थित रहती हूँ, जितना वे रहते थे.
खर्चे वही,सोच नई.......
१० अक्टूबर  

कल वरिष्ठ कथा लेखिका मंगला रामचंद्रन को, हिंदी साहित्य समिति में ''डॉ श्याम सुंदर व्यास सम्मान'' से नवाजा गया. अच्छा लगा. बड़ा ही आत्मीय और सधा हुआ कार्यक्रम था. सब बड़े संतुष्ट भाव से लौट रहे थे. निकास द्वार पर कवि प्रदीप 'नवीन' खड़े थे और हरेक को एक लिफाफा पकड़ा रहे थे.लिफाफे पर लिखा था---घर ले जाकर पढ़ें----एक स्वाभाविक उत्सुकता से सब लिफाफा हाथ में लिए बढ़ गए. मैंने घर आकर सबसे पहला काम उस लिफाफे को खोलने का किया.मुझे पक्का यकीन है कि अधिकांश लोगों ने यही किया होगा. जैसा कि प्रदीप जी हर प्रसंग को काव्यात्मक बनाने में माहिर हैं, उन्होंने उस लिफाफे में पर्यावरण बचाने और पेड़ पौधे लगाने की अपील अपनी काव्य पंक्तियों से की थी.
अब इसमें नया क्या था ? नया था उनका तरीका. वे यदि पर्चे बांटते तो कुछ लोग वहीँ पर सरसरी नजर डालकर छोड़ जाते, कुछ बिना पढ़े कार में पटक देते, कुछ लोग यदि घर ले भी जाते तो जरुरी नहीं कि वे पढ़ते ही , लेकिन उनके इस अभिनव प्रयोग से सब लोग निश्चित तौर पर उसे घर ले गए होंगे.लिफाफा खोला होगा और घर पर बैठकर हरेक ने आराम से पढ़ा भी होगा, क्योंकि उस कार्यक्रम में सभी सुधिजन थे.
प्रयास करते रहने के इस अभिनव प्रयोग के लिए प्रदीप जी बधाई के पात्र हैं...
१० अक्टूबर  

मैं अगले जन्म में मिलनेवाले सारे सम्मान , पुरस्कार, स्मृति चिन्ह,ताम्रपत्र, अभिनंदन पत्र, आने जाने का किराया, रहने खाने का खर्च आदि लौटा रही हूं। बाद में जैसे जैसे याद आएगा वैसे वैसे और भी कुछ बचा हो तो लौटा दूंगी।
७ अक्टूबर  

जो लोग लडकियों को सताते हैं, बंधनों में रखते हैं, तमाम पाबंदियां लगाते हैं, पढने नहीं देते, किसी के भी पल्ले बांध देते हैं, प्रेम विवाह की अनुमति नहीं देते, यदि वह ऐसा विवाह कर लें तो उसकी हत्या कर देते हैं, ऐसे लोगों से तो भ्रूण हत्या करने वाले ज्यादा ईमानदार प्रतीत होते हैं। वे अपनी मंशा पहले ही जाहिर कर देते हैं।
टीप :-- मैं भ्रूण हत्या की समर्थक नहीं हूं। यह व्यंग्य है और इसे कृपया उसी रूप में ग्रहण करें।
६अक्टूबर  

अपने स्त्रीत्व पर बहुत इतराई हूँ मैं और मातृत्व पर गर्वित, गौरवान्वित भी हुई हूँ, लेकिन अब एक पुरुष की तरह जीना चाहती हूँ.....आराम कुर्सी पर बैठकर अख़बार पढ़ते हुए, नाक पर खिसक आए चश्में में से झांककर आदेशनुमा अनुरोध करना चाहती हूँ---एक कप चाय और मिलेगी ? चाहती हूँ कि कोई यह पूछें --- खाना लगा दूँ और मैं बोलूं बस पांच मिनिट. ये लेख जरा सा बाकी है....ख़्वाहिश तो यह भी है कि लिख रही हूँ मैं कोई कविता उस समय दरवाजे की तो ठीक, मेरे मोबाईल की घंटी बजे तब भी मैं कहूँ---देखना जरा कौन है ..... शाम को अपनी सेहत के लिए घूमने जाऊं और लौटूं तो कोई तत्परता से पकड़ा दे पानी का गिलास ......
सूची लम्बी है.....अभी तो क्या कभी भी इतना तक होने की गुंजाईश नहीं है ....
५ अक्टूबर  

न फेअरनेस क्रीम से, न सन स्क्रीन लोशन से
चेहरे पर चमक आती है,महरी के लौट आने से
४ अक्टूबर  

कुछ नाटकों की कई प्रस्तुतियां होती हैं और फिर उन्हें सफल मान लिया जाता है। सफाई अभियान एक ऐसा ही नाटक है ।
३ अक्टूबर  

महाराष्ट्रीय परिवारों में पहले एक परंपरा थी कि परिवार के बडे पुत्र का नाम दादाजी के नाम से रखा जाता था ।
पितरों को हमेशा याद रखने की और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की इससे आसान विधि और क्या हो सकती है ?
१ अक्टूबर    

कल कॉलोनी के गणेश जी को प्रसाद चढाने के लिए एक महिला घर से हलुआ बनाकर लाई थीं। प्रसाद बांटने के लिए दोने भी लेकर आईं थीं। एक किशोरी एक एक को दोना दे रही थी और वे हॉट केस से उसमें प्रसाद रखती जा रही थी ।
4/5 साल की एक छोटी बच्ची के हाथ में जैसे ही दोना आया , उसने अपनी मां से पूछा--
"ये क्यों दिया है ? "
"बेटा ! इसमें प्रसाद देंगे ।"
"आज पानी पूरी देंगे ? "
छोटे लोग--प्यारी बातें .....
२५  सितम्बर 

जब किताबों की भूमिका लिखने के प्रस्ताव आने लगे तो समझ जाना चाहिए कि लालकृष्ण आडवाणी बनने के दिन नजदीक हैं.....
२४  सितम्बर 

मैं अपनी कार्य प्रणाली के बूते बैंक कर्मियों का हमेशा पक्ष लेती रही हूँ. आज पहली बार पता चला ग्राहक होना क्या होता है.कम से कम ९/१० व्यक्तियों से सम्पर्क के बाद सही व्यक्ति के पास पहुंची, लेकिन वहां से भी जवाब मिला --मेडम २/३ दिन लगेंगे. आप एक्स स्टाफ हैं , समझ सकती हैं.
अब इसके बाद बोलने के लिए कुछ बचा ही नहीं.
२३  सितम्बर 

संपन्नता तो है, समृद्धि अभी बाकी है ...
२० सितम्बर 

धारावाहिकों में त्यौहार इतनी लंबी अवधि तक और इतने शानदार तरीके से मनाते हैं कि ऐसा लगने लगता है मानो हम गरीबी रेखा से नीचे जी रहे हैं ....
१९  सितम्बर 

फेसबुक, व्हाटस एप जैसे माध्यमों पर अति सक्रियता , स्वभाव को प्रतिक्रियावादी बनाती है ।
१४  सितम्बर 

बारिश के दिनों में और झमाझम बारिश के बाद भी शबे मालवा का सुकूनभरा अहसास न हो तो उसे ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं ।
१४  सितम्बर 

आज सुबह से एक अवैयक्तिक समस्या में उलझी थी। लगभग 10-12 लोगों से लगातार साढे चार घंटे फोन पर बतियाना हुआ। इन टेलीफोनिक बैठकों के बाद सहसा अपने "मांझी" होने का अहसास हुआ ।

मुख्य पद तो कोई दे नहीं रहा, बस बैठक करते रहो ।
१३ सितम्बर 

मराठीभाषियों को स्थानीय भाषा में "बारीक" ( कंजूसी की हद तक मितव्ययी) कहा जाता है, लेकिन आज तक किसी मराठी साहित्य सम्मेलन में कोई रोक टोक नहीं हुई और न ही कभी किसी सम्मेलन में सीमित संख्या या प्रवेश शुल्क जैसे कोई प्रावधान किए गए। लाख- सवा लाख लोग आसानी से जुट जाते है।
सन 2000 में इंदौर में हुए सम्मेलन में करीब 80000 लोग आ गए थे, जबकि यह शहर महाराष्ट्र से दूर है ।
११  सितम्बर 

बेटा बोला- माँ शहर में लूट-पाट बहुत हो रही है, आप घूमने जाते समय हाथ में मोबाईल लेकर मत जाया करो. उसका कहना सही था. मोबाईल यानी आधी जिंदगी उसमें रहती है और जाने-अनजाने कितना सारा निजत्व भी उसमें रहता है. मैंने मोबाईल ले जाना छोड़ दिया. थोड़ा बारिश जैसा अंदेशा हो रहा था, तो छाता हाथ में ले लिया और अकस्मात ख़याल आया कि मोबाईल इतना महंगा तो नहीं पर छाता भी यदि कोई छीन ले तो सीधे-सीधे हजार रुपयों का फ़टका ........और मैंने हाथ से छाता कसकर पकड़ लिया ....जो छाता कभी सुरक्षा की गारंटी होता था, मुझे असुरक्षा का अहसास करा गया...
७ सितम्बर 

मुझे आजतक कोई पुरस्कार नहीं मिला वर्ना मैं उसका त्याग जरूर करती, भले ही पुरस्कार देनेवाले का किसी मसले से कोई संबंध नहीं होता तब भी। त्याग से व्यक्ति महानता की श्रेणी में आता है ।
४ सितम्बर 

जिन घरों में कुत्ता होता है,वहां जाने में मुझे बहुत डर लगता है.कुत्तों से ज्यादा उनके मालिकों से डरती हूँ,जो यह कहते हैं---आ जाइए! कुछ नहीं करेगा.......
१ सितम्बर   


इतने साल बैंक में नौकरी की लेकिन यह नहीं पता था कि बैंकर दिखने के लिए कपडे, रिन से धुले होना जरूरी है ।
२८ अगस्त

मोह को कचरा मानने पर ही अपरिग्रह संभव है ।
२७ अगस्त

एक निर्णय लेकर उस पर जब क्रियान्वयन हो जाता है तो बडी संतुष्टि होती है, फिर वह चाय बनाकर पीने का निर्णय ही क्यों न हो । अंततः क्रियान्वयन महत्वपूर्ण है । :)
२७ अगस्त

पेरोल की अवधि सजा की अवधि में सम्मिलित होती है या जितने दिन का  पेरोल मिलता है वह अवधि सजा की अवधि में बढ जाती है  ?
२६ अगस्त

मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि यदि सबको आरक्षण देने का सरकारी  नियम बना तो मैं किस कोटे में आऊंगी ? मायके से देशस्थ ऋग्वेदी ब्राह्मण, ससुराल में चितपावन कोकणस्थ ब्राह्मण । मातृभाषा की वजह से महाराष्ट्रीय  हूं पर महाराष्ट्र से बाहर रहती हूं इसलिए बृहन्महाराष्ट्रीय  कहलाती हूं। ऊपर से वरिष्ठ नागरिक भी हूं। 

समझने की कोशिश कीजिए मेरी हार्दिक समस्या है ।
२६ अगस्त

साल भर में धारावाहिक देखने की ऐसी आदत लग गई है कि उस समय टीवी नहीं भी खोला तब भी विज्ञापनों के जिंगल्स कानों में बजने लगते हैं । 
२६ अगस्त

इतने साल बैंक में नौकरी की लेकिन यह नहीं पता था कि बैंकर दिखने के लिए कपडे, रिन से धुले होना जरूरी है ।
२८ अगस्त 

एक निर्णय लेकर उस पर जब क्रियान्वयन हो जाता है तो बडी संतुष्टि होती है, फिर वह चाय बनाकर पीने का निर्णय ही क्यों न हो । अंततः क्रियान्वयन महत्वपूर्ण है । 
२७ अगस्त 

मोह को कचरा मानने पर ही अपरिग्रह संभव है ।
२७ अगस्त 

मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि यदि सबको आरक्षण देने का सरकारी नियम बना तो मैं किस कोटे में आऊंगी ? मायके से देशस्थ ऋग्वेदी ब्राह्मण, ससुराल में चितपावन कोकणस्थ ब्राह्मण । मातृभाषा की वजह से महाराष्ट्रीय हूं पर महाराष्ट्र से बाहर रहती हूं इसलिए बृहन्महाराष्ट्रीय कहलाती हूं। ऊपर से वरिष्ठ नागरिक भी हूं।

समझने की कोशिश कीजिए मेरी हार्दिक समस्या है ।
२६ अगस्त 

साल भर में धारावाहिक देखने की ऐसी आदत लग गई है कि उस समय टीवी नहीं भी खोला तब भी विज्ञापनों के जिंगल्स कानों में बजने लगते हैं 
२६  अगस्त 

दिल्ली के लोग क्या बिना प्याज के दाल-सब्जी बनाना नहीं जानते ? तभी वहाँ के बिचारे सरकारी कर्मचारियों को काम धाम छोडकर प्याज के लिए कतार में लगना पडा ।
२१  अगस्त 

सबसे ज्यादा वे लोग ही महिलाओं का अवमूल्यन करते हैं, जिन्हें कुकर की सीटी ठीक से गिनकर सही समय पर गैस बंद करना भी नहीं आता ।
१९  अगस्त 

अब सब कुछ वैसा ही होता है, जैसी उम्मीद होती है और शायद इसी को अनुभव कहते हैं ।
१६  अगस्त 

मेरे पिताजी लोकमान्य तिलक के भक्त थे, बल्कि यह कहना चाहिए कि पत्रकारिता की प्रेरणा उन्हें लोकमान्य से ही मिली और वे ही उनके आदर्श थे. मैं भी बचपन से लोकमान्य तिलक का बहुत आदर करती हूँ.उनको देखने का तो सवाल ही नहीं, पर पिताजी का साथ भी समझ आने से पहले ही छूट गया तो कभी उनकी ओर से लोकमान्य के बारे में सुनने का अवसर नहीं मिला.
आज जी मराठी पर ''लोकमान्य : एक युग पुरुष '' फिल्म आनेवाली थी.बेटे को कल रात अकस्मात पता चला कि उसे भी इस बार 15 अगस्त की छुट्टी है, वह खुश था कि अब वह ''लोकमान्य : एक युग पुरुष '' देख पाएगा .....
क्या ये चीजें भी पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती हैं ?......
१५   अगस्त 

भाषण से निराशा हो रही है। बी ए की कक्षा में पढा " तुलनात्मक अध्ययन" याद आ रहा है। हमने और उन्होने .....
१५ अगस्त 

स्वतंत्र भारत में मेरी पीढ़ी ने बहुत आशा से जन्म लिया था और हैरान,परेशान,असहाय्य,हतप्रभ अवस्था में हमें अपना जीवन व्यतीत करना पड़ा.....मेरी अगली पीढ़ी भी लगभग इसी अवस्था में अपनी आधी आयु पूरी कर चुकी है......अब आज के दिन ईश्वर से यही प्रार्थना कि मेरे देश के सत्तासीनों और नेताओं को थोड़ी हमारे हिस्से की शर्म,हमारे हिस्से का विवेक, हमारे हिस्से का मेहनत का जज्बा, हमारे हिस्से की संवेदनशीलता,हमारे हिस्से की बुद्धि, हमारे हिस्से की ईमानदारी, हमारे हिस्से का संतोष,हमारे हिस्से का धीरज,और हमारे हिस्से का वह सब जिससे उनमें कुछ जिम्मेदारी का भाव आ सके, कुछ करने की इच्छा पैदा हो, ताकि हमारी अगली पीढ़ी कुछ चैन से, कुछ सुकून से जी सके और उनके मन में इस देश के प्रति ढेर सारा अभिमान और गर्व जागृत हो सके. मेरी तीसरी पीढ़ी भी बिलकुल तैयार है, मुख्य प्रवाह में आने के लिए मुहाने पर खड़ी है......हे ईश्वर ! मेरी इतनी सी बिनती है.....ठीक से जी तो नहीं पाई, पर मेरे देश को ऐसा बना दे कि वास्तविक स्वतंत्र लोकतंत्र में मैं अपनी आँख मूंद सकूँ.....हे ईश्वर ! मैं सदैव आभारी रहूंगी.....
१५ अगस्त 
डॉक्टर,इंजीनियर, एडवोकेट ये पदवियां तो देखी थीं, पर अभी एक पत्रिका आई है, जिसके पते में लिखा है .... साहित्यकार अलकनंदा साने ...... मतलब साहित्यकारों के अच्छे दिनों की शुरूआत हो गई है । 
१३ अगस्त 

अब कोई भी इतना दमदार दिखाई नहीं देता जो यह कहे कि सिंहासन खाली करो अब जनता आती है ।
१३ अगस्त 

मूर्खतापूर्ण धारावाहिक देखना कम चुनौतीपूर्ण नहीं है और ऐसी अनेक चुनौतियों का सामना मैं प्रतिदिन करती हूं ।
१३ अगस्त 

मम्मी मैंने इसे नहीं मारा ,पहले इसने मारा
मम्मी ये मुझे चिढाता है
मम्मी ये भी मुझे चिढाती है
अरे! चुप हो जाओ कितना लडते हो ? 
मम्मी हम लड नहीं रहे, लोकसभा --- लोकसभा खेल रहे हैं ।
१२ अगस्त 

जिंदगी में कम से कम एक बार, दिन चढे तक सोते रहने की इच्छा है।
११ अगस्त 

रोज इस समय बिजली नहीं रहती । मुझे खुशी है कि कुछ तो है, जो नियम से होता है ।
८ अगस्त 

Be the first to like this के लालच में पता नहीं कितने Status like कर जाती हूं ।
७ अगस्त 

हरदा हादसे की वजह से गाडियां स्थगित हुईं, कुछ का रास्ता बदला गया । शुक्र है कि चार घंटे देर से ही सही, पर सही सलामत आज घर पहुंच गई। पूरे रास्ते में सिवाय पानी के कुछ नहीं था। न बस्तियां दिख रही थीं, न खेत। बहाव इतना तेज कि एसी की चाक चौबंद खिडकियों से भी पानी की आवाज आ रही थी। पूरे समय यही लगता रहा कि पता नहीं घर पहुंचेंगे कि नहीं ! मोबाइल का नेटवर्क नहीं था तो और असहाय अनुभव हो रहा था। न चाय मिली, न खाने को कुछ मिला। किसी के पास बिस्कुट का पैकेट था, किसी के पास भुने चने, सब मिल बांटकर उसी से काम चला रहे थे। पानी बचा रहे इसलिए सब एहतियात के तौर पर एक एक ही घूंट पी रहे थे ।
हम सीधे तौर पर प्रभावित नहीं थे तो ये हाल था, प्रभावितों का क्या हुआ होगा ?
५ अगस्त  

और उनकी इच्छा के विरूद्ध लोकसभा और राज्यसभा भी स्थगित ....सादर श्रद्धांजलि डॉ कलाम...
३०  जुलाई 


चैनलों के लिए डॉ कलाम से ज्यादा जरूरी है, विज्ञापन।
३०  जुलाई 

अखबारों में एक पेज का बडा हिस्सा फिल्मी सितारों के यात्रा वर्णन पर बिगाडा जाता है। पढकर ऐसा लगता है मानो इनके अलावा और कोई कहीं जाता ही नहीं है। विज्ञापनों का भी कोई अनुपात नहीं है जबकि प्रेस परिषद ने बाकायदा नियम बनाए हैं। रोज ही मूर्ख बनने का अहसास होता है।
------ विवशताओं में बंधी एक मध्यम वर्गीय
२९ जुलाई 

बहुत कम लोग होते हैं जिनके प्रति वास्तव में आदरभाव होता है, ऐसे ही थे वे जिनके जाने से सचमुच बुरा लगा, बिलकुल अंदर से ।
नमन  डॉ कलाम...
२७ जुलाई 

भरी बारिश में सबसे ज्यादा सुकून वाशिंग मशीन का ड्रायर देता है ।
२५  जुलाई 

लोकसभा जब स्थगित होती है तो वैसा ही लगता है जैसे घर में शोर मचा रहे बच्चों को मां ने खेलने के लिए बाहर भेज दिया हो.....
२३ जुलाई 

फरार होनेवाले लोग क्या रिजर्वेशन पहले से करवाकर रखते हैं ?
१४  जुलाई 

मेरा मन इन दिनों म.प्र. जैसा हो रहा है ....अजब - गजब !...... डर लग रहा है, कहीं कोई घोटाला न कर बैठूं .....
१२  जुलाई 

लगभग बयालीस साल पहले की बात है. मैं ग्वालियर से बड़ी बहन के यहाँ इंदौर आई थी . इंदौर की बारिश के बारे में बहुत सुना था. जिस दिन पहुंची, उस दिन खूब तेज पानी बरस रहा था.करीब एक महीना रही, पानी एक भी दिन बंद नहीं हुआ और तब पहली बार ''झड़ी''शब्द सुना और देखा भी. अब तो बूंदों को तरस जाते हैं ...
१२  जुलाई 

हम दोनों का एक सपना था कि सेवा निवृत्ति के बाद ऐसा मकान बनाएंगे जिसमें खूब बडा बगीचा हो, चिडिया हों, तितलियां हों और फिर वहाँ कुर्सी डालकर ढेरों किताबें पढें ।
पर ईश्वर जो भी करता है अच्छा ही करता है । अब फेसबुक और व्हाटस एप के लिए क्या करना है बगीचा और कुर्सियां ? वो छुटकू तो सब जगह साथ रहता है , चाहे रसोई हो या सोने का कमरा ।
६  जुलाई 

कल एक बैंक सखी ने पति की सेवा निवृत्ति पर छोटा सा सम्मिलन रखा था ...अच्छा कार्यक्रम था....उनके बच्चों ने कुछ सांस्कृतिक, साहित्यिक पेशकश भी की ....नितांत आत्मीय और अनौपचारिक आयोजन .....गुड,गुड फील हो रहा था, तभी एक और पुरानी सखी मिल गई ...६/७ साल बाद ....अच्छा लगा , पर बातें वहीँ पुरानी ....अरे तुम बाल रंगती क्यों नहीं हो ? ....या फिर अपनी बेटी की परेशानियों का जिक्र उनमें भी कोई नयापन नहीं ...बेटी भी करीब चालीस साल की , सभी को आनेवाली घर-गृहस्थी की सामान्य परेशानियां ....किसी अन्य को --कोई और साडी नहीं मिली ?....थोड़ी देर बाद कोफ़्त होने लगी , जबकि हम बाकी लोग एक दूसरे से मिलकर खुश हो रहे थे , उनसे धीरे-धीरे सबने दूरी बना ली .....

उम्र का असर शरीर और मन पर न हों ये तो ठीक है , पर बुद्धि पर भी नहीं ?
५ जुलाई 

काली चींटियां पूरी दक्षता से रोज निकलती हैं पर बारिश है कि फिर भी नहीं आती ।
५ जुलाई  

एक बात सीखना रह गई !
"मैं, मैं और मैं "
३० जून 

सब कुछ मन माफिक नहीं होता लेकिन सब कुछ मन के विरूद्ध भी तो नहीं होता फिर सारा जीवन ये हाय हाय क्यों ?
२८ जून 

५०/६० साल पहले ग्रेजुएट होते ही नौकरी के प्रस्ताव आते थे । मैं सेवानिवृत्त  हुई तबसे मेरे पास ग्रुप एडमिन के प्रस्ताव आ रहे हैं ।
२६ जून 

कभी कभी लगता है घर में भी एक मेनेजर होना चाहिए जो मुझसे काम करवा ले और एक क्लर्क होना चाहिए जिससे मैं काम करवा सकूँ ...
२१ जून 

हमारे सेवक हैं, पर हम पर राज करते हैं.....हम हर चीज का दाम चुकाते हैं, पर उनके उपभोक्ता नहीं है ......उन्हें कभी भी गिराने की ताकत हमारे पास है , पर ऊंचाई पर वे खड़े हैं ......डरना उनको चाहिए,डर डरकर हम जीते हैं ... भूत-प्रेत की तरह ऐसे खतरनाक विचार आते हैं ......
१७ जून 

बचपन में पहाडे याद करने का फायदा तो होता है ।
जब कोई कहता है बस ! दस मिनिट तो मैं उसे तुरंत दस दूना बीस कर लेती हूं । मानसिक शांति का एक आसान उपाय ....
१५ जून 

दिन में दो/ तीन लोगों से बात कर, दो/तीन लोगों के विरूद्ध राग निंदा अलापने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है ।
१४ जून 

पता नहीं ये मानसून है या प्रि मानसून , बरस तो सावन जैसा रहा है ।
अपना सबक ठीक से याद करके आता भाई !
१४ जून 

सबसे पहले तो हमें इस सोच से बाहर निकलना होगा कि हिंदी या अन्य कोई भी भारतीय भाषा खतरे में है।एक भाषा के विकास का अर्थ दूसरी भाषा का विनाश कतई नहीं है,बल्कि जितनी ज्यादा भाषाएँ हमें आती है उससे सम्प्रेषणीयता बढ़ जाती है।हमारा ज्ञान और प्रज्ञा विकसित होती है।मुख्य बात यह है कि किसी भी बात की अति ख़राब होती है । कुछ लोग अनावश्यक रूप से अंग्रेजी में बोलते हैं या अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल करते हैं और ये ही लोग हिंदी को तोड़ते मरोड़ते हैं । इन लोगों से जब हिंदी का आग्रह किया जाता है तो ये  लौह पथ गामिनी या द्वि चक्र धारिणी जैसे शब्दों का उदाहरण देकर हिंदी को कठिन बताते हैं । आज कोई भी भाषा अपने मूल रूप में नहीं है ,भाषा के विकास के लिए यह आवश्यक भी है , अन्यथा ऑक्सफोर्ड में घी या अन्य हिंदी शब्द नहीं जोड़े जाते .जरुरत सिर्फ एक सम्यक दृष्टिकोण की है।
१३ जून 

आमने-आमने बैठकर ठहाके लगाने में जो मजा आता है, वह सौ स्माइली में भी नहीं आता
११ जून 

हम महिलाओं का अनुभव रहता है कि जब भी झाड़ू लगाओ , हवा हमेशा विपरीत दिशा में बहती है . चाहे पोर्च हो या पिछवाड़े का आँगन ....
अरविन्द केजरीवाल की परेशानी मेरे जैसी महिला आसानी से समझ सकती है....
९ जून 

सार्थ रामचरित मानस,सार्थ श्रीमद्भगवत गीता, सार्थ ज्ञानेश्वरी, सार्थ दासबोध, लेकिन जीवन न तो सार्थ और न ही सार्थक ।
८ जून 

मेगी पर रोक है पर उसके विज्ञापन टीवी पर जारी है ....
४ जून 

परसो भा. स्टे. बैंक  ने ब्याज दरें कम की , तुरंत रात में एक फोन ---''मॅडम ! अब कितनी हो गई ?''
''मैं ठीक ठीक नहीं बता सकती, अब मैं रिटायर्ड हूँ"
''इतने साल नौकरी की है, बता नहीं सकती ?''
''नहीं'' खट से फोन बंद .....
दो दिन पहले एक साहित्यिक कार्यक्रम में थी. एक उवाच --''आज अम्बेडकर जयंती के लिए राहुल गांधी आए हैं न, रास्ते बंद हैं, इस वजह से लोग नहीं आ पाए '' द्वितीय उवाच--''आज अम्बेडकर जयंती थोड़े ही है (मुझे जरा अच्छा लगा ) वह तो दिसंबर में आती है (मैं धड़ाम से नीचे, जन्मतिथि और पुण्य तिथि का अंतर कब समझेंगे)
उसके भी दो दिन पहले ---''ये सफाईवाले कचरा ले जाते हैं, आधा उठाते हैं/आधा गिराते है, जलाते क्यों नहीं है ?''

मेरी गलती ये है कि इतने दिनों तक मैं इन सबको प्रबुद्ध और जागरूक मानती थी .....
४ जून 

कल एक मित्र से बात हो रही थी, वे बता रहे थे कि आजकल निजी क्षेत्र में काम कितना ज्यादा होता है और छुट्टी मिलने में कैसी दिक्क़त आती है  और माहौल ऐसा बना दिया जाता है कि छुट्टी लेने में शर्म आने लगती है।  उस समय तो हँसी  में बात आई गई हो गई , पर सचमुच ऐसा ही हो गया है। बैंक में नौकरी के दौरान पदोन्नति लेने की ''गलती'' कर ली, चाबी मेरे पास रहती थी।  छुट्टी लेना हो तो पहले से बताना पड़ता था ,चाहे वह ''आकस्मिक अवकाश''की श्रेणी में आता हो। वरिष्ठता क्रम में जिसे चाबी सौंपनी हो, वह स्वयं तो छुट्टी पर नहीं है,यह देखना भी मेरा ही काम रहता था।  सबसे बुरा अनुभव तो तब आया, जब मेरे भाई का देहांत हो गया।  जब मैंने छुट्टी के लिए कहा तो पहले तो हमम.... हाँ देखते हैं......और आखिर में -- मेडम ! पहला हफ्ता है ...... मुझे भी फिर गुस्सा आ गया।  मैंने कहा - ठीक है अभी जा रही हूँ,तो वहां सारे रिश्तेदार मिलेंगे, उनको बता दूंगी, बैंक का नियम है, कोई भी पहले पखवाड़े में नहीं मरे.....मेरे ऐसा कहते ही वे अकबका गए, फिर माफ़ी मांगने लगे..... अपने हक़ के लिए या तो नीचे उतरना पड़ता है या फिर बोलने में शर्म आने लगती है...
२ जून 

अब प्रधानमंत्री खुद कह रहे हैं कि अच्छे दिन आ चुके हैं , तो मान लेती हूं ।
क्या करूं ? बचपन में मां ने सिखाया था बडों की बात मानना चाहिए ।
१ जून   

मुझे उस व्यक्ति की तलाश है जिसने व्हाट्स एप पर पहला समूह बनाया ।
२७ मई 

भारत भवन भोपाल में म.प्र. शासन द्वारा गत 14 मई से ''महाराष्ट्र महोत्सव'' का आयोजन किया गया,जिसका आज अंतिम दिन है.इस महोत्सव में शास्त्रीय संगीत,नाटक,लोक नृत्य, कविता पाठ,चित्रकला प्रदर्शनी अर्थात कला एवं संस्कृति के लगभग सभी अंग शामिल किए गए.पूरे सप्ताह भर चलनेवाले इस आयोजन में देश भर के मराठीभाषी कलाकारों को बुलाया गया, लेकिन प्रदेश के किसी भी व्यक्ति को, कलाकार को इसमें शामिल करने से परहेज रहा.प्रदेश के सबसे बड़े शहर इंदौर में ही मराठी भाषियों की संख्या लगभग चार लाख है. ग्वालियर,जबलपुर,भोपाल,बुरहानपुर आदि स्थानों पर भी मराठीभाषी बहुतायत से है.इतनी बड़ी तादाद में मौजूद प्रदेश के इन नागरिकों में एक बड़ी संख्या उच्च गुणवत्ता वाले एवं राष्ट्रिय/अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकारों की भी है .कुछ नाम ही गिनाए जाना काफी है शास्त्रीय गायक डॉ शशिकांत ताम्बे,शोभा चौधरी,सुनील मसुरकर, तबला वादक हितेन्द्र दीक्षित,विलास खरगोनकर, संगीता अग्निहोत्री, पखावज वादिका चित्रांगना आगले, नाट्यकर्मी,अभिनेता, दिग्दर्शक श्रीराम जोग,राजन देशमुख,विवेक सावरीकर,मूर्तिकार शशिकांत मुंडी,कवि अरुण शिरढोणकर, सुधीर बापट,अरुणा खरगोनकर, पत्रकार/संपादक अनिलकुमार धड़वईवाले ,अश्विन खरे,नृत्यांगना जयश्री ताम्बे,सविता गोडबोले आदि कई लोग हैं और इनके अलावा भी अनेक नाम हैं,जिन्हें आमंत्रित किया जा सकता था, लेकिन शासन की सर्वज्ञात कार्य प्रणाली ने प्रदेश के लोगों को इस तथाकथित "महत्वपूर्ण एवं प्रतिष्ठित'' आयोजन से दूर रखा.
आयोजन के दौरान एक वरिष्ठ अधिकारी बोले --देखिए हम इतने अच्छे आयोजन करते हैं, लेकिन लोग आते नहीं हैं.....कैसे आएंगे ? आखिर आत्मसम्मान भी कोई चीज होती है ....
कवि सम्मेलन में आए एक वरिष्ठ कवि ने बातचीत के दौरान उनको मिलनेवाले मानधन की राशि बताई तो मैं चौंक पड़ी. पिछले 30 / 35 सालों से जो लोग कविता पाठ कर रहे हैं, उनको अब तक मिली कुल राशि भी उस राशि के आसपास तक नहीं होगी ......बाहर से आए लोगों को सुनना, समझना अच्छा लगता है......लेकिन .....
१९ मई 

व्हाट्स एप मुझे पुराने मोहल्लों जैसा लगता है . जरा ऑन लाइन हुए कि कोई न कोई सम्पर्क बना लेता है, जिन्हें वास्तव में कुछ जरुरी बात करना होती है,ऐसे लोग कम ही होते हैं .
मोहल्लों में ऐसा ही होता था, खिड़की-दरवाजा खुला दिखा कि कुछ लोग तांक-झांक शुरू कर देते थे .
फेसबुक मध्यम वर्ग की कॉलोनियों जैसा है. अपनापा है, पर एक सीमा रेखा भी है.शालीन,सुसंस्कृत,काम से काम रखनेवाले नौकरी पेशा लोगों से भरी कॉलोनी जैसा.
और ट्वीटर मानो आभिजात्य वर्ग . नपा-तुला बोलेंगे, नपा-तुला हंसेंगे,हमेशा व्यवस्थित तैयार,बने-ठने, दरवाजे पर दो-तीन गाड़ियां लटकाएं लोग ...
१३  मई 

बुद्धि ह्रदय की दुश्मन है ....
१३  मई 


टीवी , इंटरनेट और इसकी तमाम सोशल साइट्स से उद्विग्नता बहुत जल्दी और बहुत ज्यादा बढ़ती है ....यूं तो मुझे ये सब पसंद हैं, पर कोई भी त्रासदी या बड़ी घटना होती है तो चारों ओर से एक ही ''हल्ला बोल'' शुरू हो जाता है. मेरी याददाश्त की पहली बड़ी घटना चीन का भारत पर हमला था , तब घर में रेडिओ भी नहीं था. पिताजी की पोस्टिंग सारंगपुर में थी और अख़बार इंदौर से आता था, तो वे बेसब्री से घूम-घूमकर उसका इंतज़ार करते थे, लेकिन चौबीस घंटों में मानसिक आवेग निश्चित ही कम हो जाता था , अब तो चौबीस घंटे वही बातें आघात करती रहती हैं ...
९ मई 

पहले राजस्थान सरकार ने महाराणा प्रताप के बारे में निर्णय लिया था अब उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रताप जयंती पर 9 मई को अवकाश घोषित किया है। 
राजनीति के लिए नए नए मुद्दे मिल ही जाते हैं ।
७ मई 

आज दोपहर फुटपाथ पर चलने के लिए जो आत्मविश्वास जागृत हुआ था , शाम होते होते लुप्त हो गया । 
मैंने फिर सडक के बीच चलना ही ठीक समझा ।(सन्दर्भ : सलमान खान hit n run case)
६ मई 

मराठी की प्रसिद्ध लेखिका स्व.दुर्गा भागवत वृद्धावस्था के बारे में कहती हैं-"मुझे बुढ़ापा अच्छा लगता हैं.शरीर थकता है,कान दांत,आँखें कमजोर हो जाते हैं पर इन सबकी वजह से फायदा ही होता है.मनुष्य अंतर्मुख होता है.कुछ अधिक विचारशील हो जाता है.उसका लोगों से संपर्क कम हो जाता है और इस कारण फालतू की बातचीत,व्यर्थ समय नष्ट होना आदि समाप्त हो जाता है.रोज कुछ नया सीखने की इच्छा हो तो सीखा जा सकता है,कुछ नया करना हो तो उसके लिए भी समय मिल जाता है.प्रकृति का सौन्दर्य निहार सकते हैं,जीने का सच्चा आनन्द इसी अवस्था में मिलता है और आप सुख का अनुभव करते हैं...."
(आदरणीय दुर्गा भागवत ने उक्त बातें अपनी आयु के ८७ वें साल में एक साक्षात्कार में कही थी.वे देश की ऐसी पहली साहित्यकार थी ,जिन्होंने आपातकाल का विरोध किया था )
५ मई 

हिन्दू, मुस्लिम,ईसाई धर्म में जो स्थान वेद ,कुरान या बाइबल का है, बौद्ध धर्म में वही स्थान पिटकों का है। भगवान बुद्ध ने अपने हाथ से कुछ नहीं लिखा था। उनके उपदेशों को उनके शिष्यों ने पहले कंठस्थ किया, फिर लिख लिया। वे उन्हें पेटियों में रखते थे। इसी से नाम पड़ा, 'पिटक'। पिटक तीन हैं:-
1) विनय पिटक,2) सुत्त पिटक और 3) अभिधम्म पिटक
हिन्दू-धर्म में गीता का जो स्थान है, बौद्ध धर्म में वही स्थान धम्मपद का है। गीता जिस प्रकार महाभारत का एक अंश है, उसी तरह धम्मपद सुत्त पिटक के खुद्दक निकाय का एक अंश है।
'को नु हासो किमानन्दो निच्चं पज्जलिते सति।
अंधकारेन ओनद्धा पदीपं न गवेसथ॥'
धम्मपद में दिए गए इस श्लोक का तात्पर्य है कि यह हँसना कैसा? यह आनंद कैसा? जब नित्य ही चारों ओर आग लगी है। संसार उस आग में जला जा रहा है। तब अंधकार में घिरे हुए तुम लोग प्रकाश को क्यों नहीं खोजते?
ईसा से 563 वर्ष पहले बुद्ध का जन्म हुआ था . लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व धम्मपद में उठाए ये प्रश्न क्या आज भी सामयिक नहीं लगते ?
४ मई 

1994-95 की बात है . तब मैं एक राष्ट्रीयकृत बैंक में थी. सुबह-सुबह कॅश काउंटर पर एक ग्राहक से झगड़ा हो गया था. रोज का ग्राहक था. परम्परानुसार अपनी नगदी छोड़ गया था और बाद में उसमें 10 की एक गड्डी कम निकली थी. उस समय हजार रुपयों के मायने काफी ज्यादा होते थे. करीब साढ़े बारह बजे अंतत:सब निपटाकर मैं पानी पी रही थी , तभी 60 - 62 साल के एक सज्जन सामने से आते दिखे.बेतरतीब खिचड़ी बाल,आँखों पर काली मोटी फ्रेम का चश्मा , कुरता पजामा और कंधे पर लटका शबनम झोला .मुझे खाली बैठा देखकर वे बोले--कॅश विभाग किधर है ? मैंने बिना कुछ बोले हाथ से दिशा-निर्देश कर दिया.बैंक कर्मचारी और ग्राहक के बीच व्यवहार का वह एक आदर्श उदाहरण था.
वे चले गए. उन्हें जिनसे मिलना था, उनकी पुत्री को वे सज्जन जानते थे और पुत्री के नाम से ही वे पूछ-ताछ कर रहे थे. देश की सबसे बड़ी बैंक की, प्रदेश के सबसे बड़े शहर की मुख्य शाखा. करीब पौने तीनसौ लोगों का स्टाफ, जहाँ स्टाफ के ही सारे लोग एक-दूसरे को नहीं जानते थे , वहां किसी स्टाफ सदस्य की बेटी को कौन जानता ? वे सज्जन भी पहली बार शाखा में आए थे , उन्हें जरा भी अंदेशा नहीं था कि वहां इतनी अफरा-तफरी होगी. निराश होकर वे निकल रहे थे, तभी उनके ही शहर से स्थानांतरित होकर आए मेरे एक सहयोगी ने उन्हें पहचान लिया और उनकी समस्या जानकर कहा --''आप जिनका नाम लेकर पूछ रहे हैं, उस बिटिया को तो मैं नहीं जानता , पर हमारी शाखा में एक मॅडम हैं , वे भी लिखती हैं , शायद आपकी कुछ मदद कर सकें.''
इतना कहकर मेरे सहयोगी उन सज्जन को मेरे पास ले आए और सारी बात बताई.दरअसल वे मुझे ही ढूंढ रहे थे. वे स्वरांगी को जानते थे और उन्हें इतना पता था कि स्वरांगी की माँ बैंक में हैं.उन्हें एक खाता खुलवाना था. उन दिनों खाता खुलवाने के लिए किसी का परिचय होना जरूरी होता था. मैंने उनसे कुछ ज्यादा पूछा नहीं, उन्होंने भी कुछ नहीं बताया.वह आपसी विश्वास का दौर था और महिला-पुरूष ज्यादा बात नहीं करते थे. मैंने उन्हें एक कुर्सी दी और चपरासी से बोला एक खाता खोलने का फॉर्म दे दो और दोबारा काउंटर पर चली गई. जब वह भरा हुआ फॉर्म मेरे पास आया तो पता चला वे सरल,निरभिमानी सज्जन चंद्रकांत देवताले जी थे . परिचय कर्ता वाले खाने में अपने हस्ताक्षर करके जब मैं उनके पास गई तो खुश थी, विस्मित थी, लज्जित थी, विभ्रम था कैसे आवभगत करूँ ,गर्वित थी और पता नहीं कितने भाव थे .....
उसके बाद तो वे मेरे लिए दादा हैं.मेरे घर के कितने ही प्रसंगों में वे शामिल हुए हैं पर आज भी जब उनसे मुलाकात होती है, उनसे हुई वह पहली मुलाकात मुझे अनायास याद आ जाती है.
३ मई 

मां कहती थी --- दो मिनिट रूक कर किसी की बात सुन ली तो क्या बिगडता है ?
किसी की जरा तारीफ करने में क्या जाता है ?
किसी के लिए दुआ करने में कुछ खर्च होता है क्या ?
जब मां ये सब कहती थी तब जुकरबर्ग का इस धरती पर अवतरण नहीं हुआ था और हम लोग फेस को अलग, बुक को अलग पढते थे ।
जिसको लाइक करते थे उस पर अपनी पसंदगी जाहिर करना अपराध की श्रेणी में आता था और हार्दिक तथा शुभकामना शब्द आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्द कोष में पाए जाते थे ।
१ मई   

असहमति से नहीं , उसे छिपाने वालों से डर लगता है।
२९ अप्रैल 

अपने को औरत से मां बना लिया 
अब तुम पर गुस्सा नहीं प्यार आता है ।
२८ अप्रैल 

गाँव-कस्बों के लोगों का व्यवहार आज भी आत्मीय लगता है , ओढ़ा हुआ नकली अपनापन नहीं ....(मैं स्वयं भी शहरी हूँ , इससे बरी नहीं)
२७ अप्रैल 


सेवा निवृत्ति के बाद ठीक वैसा ही अहसास था जैसे स्कूल के बाद कॉलेज जाने में होता है ....कुछ दिन बड़ा मुक्त-मुक्त ....यानी जुलाई से दिसम्बर तक जैसा लगता है वैसा ही और जनवरी में समझ में आ जाता है कि चाहे स्कूल हो या कॉलेज पढाई से मुक्ति नहीं .......अब मुझमें वह जनवरी वाला भाव आ गया है .....पढाई तो करना पड़ेगी .....
निवृत्त तो सिर्फ नौकरी से हुई हूँ ....
२७ अप्रैल 

अगर गजेन्द्र की आत्महत्या के बाद सभा चलती है और इतनी बड़ी विपत्ति के बाद ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह होता हैं ...एक में मुख्यमंत्री और दूसरे में प्रधानमंत्री ...दोनों अलग-अलग दलों के ...तो दोनों में फ़र्क़ क्या है ?
२६ अप्रैल 

आत्महत्या के लिए उकसाना अपराध है और आत्महत्या होते देखना ?
२३ अप्रैल 

आज सुबह मेरे घर के नजदीक के एक अस्पताल से एक युवक आया . अस्पताल जाना-माना है . वह बोला --मेडम हम सारी जांचों पर छूट दे रहे हैं. फिर उसने अलग-अलग बताया कि किस जांच पर कितनी छूट वगैरा. मेरे मना करने पर बोला ---senior citizen की जांच हम घर पर आकर भी कर सकते हैं -- बी पी, डायबिटीज, ई सी जी , पैथोलॉजिकल जांच सब कुछ .
मैंने कहा - नहीं हाल फ़िलहाल तो मुझे कोई बीमारी नहीं है
तो गुस्से और अविश्वास के साथ बोला ---नहीं करवाना तो मत करवाइए लेकिन.....(झूठ तो मत बोलिए)
कोई बीमारी न होना भी अपराध है ..
१६  अप्रैल 

हजारों वर्ष पहले एक राजकुमार महल छोडकर गए और बुद्ध बनकर लौटे ...... बस ऐसे ही याद आ गया इतिहास ..... बुद्ध जयंती नजदीक है और आज किसी युवराज के लौटने की खबर थी ।
१४  अप्रैल 

अभी तो बारिश जुलाई-अगस्त जैसी हो रही है और मेरा कैलेंडर अप्रैल दिखा रहा है ......शायद बदलना भूल गई, बहुत भुलक्कड़ होती जा रही हूँ ......वरना मौसम ने पहले कभी ऐसी गलती की हो याद नहीं आता .....
१३  अप्रैल 

आज सुबह सुबह देश की एकता पर भरोसा हो गया .
गाजियाबाद के एक मित्र बात करना चाह रहे थे . मैंने उनसे कहा --अभी नहीं, मेरे मोबाईल की बैटरी लो है और सुबह से लाइट भी नहीं है . वे ठहाका मारकर हँस पड़े. मैंने वजह पूछी तो बोले यहाँ भी नहीं है .
बात ख़त्म हुई ही थी कि एक संदेश आ गया चेन्नई से --- दीदी आपसे अभी बात करना तय हुआ था , पर सुबह से लाइट नहीं थी, अभी आई है , पीने का पानी भरकर बात करती हूँ.
११ अप्रैल 

पहले सुबह उठकर घर की सफाई करते थे अब रात को जागकर मेसेज बॉक्स और व्हाट्स एप साफ करते हैं । कुल मिलाकर जीवन भर सफाई अभियान ।
१० अप्रैल 

कई बार ऐसा होता है कि हम दिनभर घर की साफ़-सफाई और तमाम दूसरे कामों में उलझे रहते हैं और जब रात को आराम करने जाते है तो पता चलता है ---अरे! बिस्तर की चादर बदलना तो रह ही गया---

इस दूसरी पारी में चिर विश्रांति से पहले भी यही अनुभव हो रहा है कि जीवन की आपा-धापी में चादर बदलना तो दूर कितनी सारी सलवटें तक ठीक नहीं हो पाई हैं....
९ अप्रैल 

खूब पढ़ो,खूब बड़े बनो, खूब खुश रहो, खूब फलो-फूलो,खूब नाम कमाओ .....बचपन से सुन रही हूँ लेकिन आज तक ये समझ में नहीं आया कि इस 'खूब' की परिभाषा और सीमा क्या है ....
८ अप्रैल 

मैंने वजन इतना ढीठ किसी को नहीं देखा ........ सुबह गर्म पानी के साथ नींबू-शहद, फल-सब्जी, सलाद,सब्जी के जूस, साबुत अनाज, सीरियल्स, नॉन स्टिक बर्तन, घूमने जाना, प्राणायाम,योगासन .....पूरी फ़ौज़ सामने खड़ी हों तब भी यदि उसे नहीं हिलना हो तो टस से मस नहीं होता .....आत्मघाती आतंकवादी की तरह बम साथ लिये-लिये पूरी जिंदगी निकाल देता है .....
७ अप्रैल 

सामने चाहे कंप्यूटर हो या हाथ में मोबाइल , समय देखना हो तो नजर अब भी दीवार घडी पर जाती है ।
७ अप्रैल 

फेसबुक का श्रेय जुकरबर्ग को बेकार ही दिया जाता है । हमारे देश में चौपाल पहले से मौजूद थी । पुरानी आदत है, हमारी अपनी चीज परदेस से घूमकर आती है तो हमें ज्यादा अच्छी लगती है ।
४ अप्रैल 

आज अपना एक अनुभव बांटना चाहती हूँ . हम कुछ मराठी भाषी कवि, ''आम्ही रचनाकार'' नाम से एक समूह चलाते हैं . इसमें हमारा यह प्रयास यह होता है कि ऐसे रचनाकर्मियों को अवसर देना जो लिख रहे हैं, अच्छा लिख रहे हैं लेकिन संकोचवश , अवसर न मिलने की वजह से या किसी और कारण से सामने नहीं आ पाए हैं . एक निश्चित अंतराल के बाद कार्यक्रम आयोजित कर क्रमानुसार उनमें से २/३ को मंच प्रस्तुति का अनुभव देते हैं . कल मेरे पास एक महिला का फोन आया . वे बोलीं ''काफी समय से लिख रही हूँ , पर इतने साल तक घर-गृहस्थी में ही उलझी रही . मुझे आपके समूह में शामिल होना है.'' मैंने उन्हें सारी जानकारी दी और कहा --संयोग से अभी ५ अप्रैल को ही हमारी मासिक बैठक है , आप आइए . वे एकदम घबरा गईं और कहने लगी --''आप मुझे मंच पर तो नहीं बुलाएंगी ?''
कितना मासूम सवाल था और एक तरफ कई ऐसे लोग हैं जो सैंकड़ो बार मंच पर जा चुके हैं ,तब भी मंच की लालसा बनी रहती है .....
४ अप्रैल 

स्वंतंत्रता के पीछे-पीछे ही मैं भी देश में आ गई .....देश के और मेरे दोनों के ही सुधरने के आसार कम ही है ..
३ अप्रैल 

इस मूर्ख तंत्र में मैं अब भी जिंदा हूं ।
इस बात पर मैं बेहद शर्मिंदा हूं ।।
१ अप्रैल  

बुद्धिजीवी इतनी तो अकल रखते हैं
समझ आए न आए गर्दन तो हिलाते हैं ।
३० मार्च

सरकार ने एक नियम बनाना चाहिए कि.क्रिकेट में रूचि न हो तो आधार कार्ड नहीं बनेगा , पेन कार्ड नहीं बनेगा, बैंक में अकाउंट नहीं खुलेगा , ३३ % पेंशन काटकर मिलेगी , मकान के लिए लोन नहीं मिलेगा , सब्जी का मूल्य १०% ज्यादा चुकाना पड़ेगा , दो कि.मी. पैदल चलने के बाद ही ऑटो रिक्शा में बैठने की पात्रता होगी .वरिष्ठ नागरिक को मिलने वाली सारी सुविधाओं से वंचित .....आदि आदि
आज बहुत अकेली पड़ गई हूँ ....ये नियम बनें तो ही मुख्यधारा में आ पाऊँगी ...
२९ मार्च

साडी जितनी पुरानी होती है , उसका बखान उतने ही गर्व से किया जाता है और वह यदि माँ या सासु माँ की हो तो चेहरा अपने आप खानदानी दिखने लगता है , लेकिन सलवार सूट या अन्य आधुनिक परिधानों का ऐसा नहीं है .....वो यदि पुराने पहने हो तो उनके साथ साथ पहननेवाला भी अघोषित रूप से काल बाह्य करार दिया जाता है .....
२७ मार्च

सुविधाएं , ज्यादा असुविधा उत्पन्न करती है ....
२६ मार्च

जिसको दिसंबर/जनवरी में बुला रहे थे , मिन्नते कर रहे थे , वह अब आई है ....आई भी तो सीधे 38 की रफ़्तार से और आते ही तेवर दिखाना शुरू .....
२५ मार्च

वे और उनका परिवार दुनिया के व्यस्ततम परिवारों में से एक , इतना कि तीज त्यौहारों पर भी मिलना तो दूर फोन पर बात करने की भी फुर्सत नहीं । इसलिए मेरे पहल करने पर मुझ निकम्मी को हर बार एक उलाहना सुनना पडता है --- आया करो कभी कभी । और अब एक पुछल्ला भी जुडा रहता है -- रिटायर हो न अब तो ? (मतलब और फालतू )
66 ए हटने के बाद मेरी पहली भडास ....
२४ मार्च

सन १९६६ में मनोज कुमार वाली "शहीद" रिलीज हुई थी तब आठवीं में थी मैं, मिडिल बोर्ड । उस उम्र में एक आदर्श की छबि मन में होती है । परीक्षा से कुछ ही दिन पहले फिल्म देखी थी । भगतसिंग पर थी इसलिए अनुमति मिल गई थी , वर्ना तब घर पर भी एक सेंसर बोर्ड हुआ करता था । भगतसिंग दिल दिमाग पर छाए हुए थे (आज भी हैं) । हिंदी में निबंध लिखना था ---- एक राष्ट्रीय नायक, मैं भगतसिंग पर लिखकर आ गई । हिंदी के मास्टर जी ने (तब हम यही कहते थे) पूछा निबंध किस पर लिखा ? मैंने बताया तो बोले बेवकूफ (तब ऐसा ही बोलते थे) गांधी जी या नेहरु जी पर लिखना था अब नंबर कट जाएंगे । 
जब परिणाम आया तो पूरे स्कूल की सारी कक्षाओं में मैं प्रथम थी जिसके लिए मुझे खास पुरस्कार स्वरूप किताबें मिलीं , जो आज भी, पचास साल बाद भी मेरे पास हैं।
२३ मार्च

फ्रिज खोलने पर उसकी बत्ती जलती है और तुरंत अपना मस्तिष्क भी रोशन हो जाता है कि क्या बनाना है ....
२२ मार्च

त्यौहार वाले दिन यदि बिजली नहीं गई तो मैं समझूंगी कि अजब गजब मध्य प्रदेश में नहीं हूं । पंद्रह दिन अच्छी भली थी , शिवरात्रि के बाद आज फिर सुबह से ही गुल ।
२१ मार्च

उम्र चाहे जो हो, कुछ चीजें जीवनभर दुखदायी होती हैं , जैसे डिब्बे में बची आखिरी पूरण पोळी या बेसन का लड्डू । कुछ चीजों की खुशी भी अतुलनीय होती है , मौसम का पहला आम या प्याज के पकौडों का पहला घान ।
१९ मार्च

चुप्पी का अर्थ आंख और कान का भी बंद होना नहीं होता ।
१९ मार्च

समन जारी होने के बाद मनमोहन सिंग ने कहा है कि वे दुखी है । अब पुलिस शायद पहले यह पता लगाएगी कि वे खुश कब थे .... 
११ मार्च

कुछ साल पहले हम साल भर का अनाज, दालें, चावल, तेल आदि भर कर रखते थे । अब सोच रही हूं साल भर के लिए बादाम खरीद लूं । अभी तक बादाम का विज्ञापन पत्रिकाओं में, टीवी पर देखती थी , लेकिन आज एक विज्ञापन से पता चला की बादाम नियमित खाने से स्वाईन फ्ल्यू से बचा जा सकता है ।
मतलब अब बादाम जीवनावश्यक हो गया ।
११ मार्च

लगभग २५ साल पहले या शायद उससे भी पहले मैं "प्रभात किरण" के लिए रिपोर्टिंग करती थी। उस समय उसका कार्यालय राजबाडा पर हुआ करता था । रंगपंचमी के दिन दिनभर नहीं जा पाती , इसलिए सुबह दस बजे के करीब अपनी कॉपी देने चली गई। गेर का माहौल बन गया था , पर लुना जैसी मोपेड पर ८ कि मी जाकर मैं सही सलामत लौट आई । दुर्व्यवहार तो दूर लोगों ने खुद होकर रास्ता दिया और रंग का एक छींटा तक मुझ पर नहीं था।
उस समय ऐसी नैतिकता थी ।
११ मार्च

एक ही दिन में थकान हो गई .... लो ! संभालो अपने शेष 364 दिन ।
९ मार्च

डेढ़ घंटे बाद वह तथाकथित विशिष्ट दिवस शुरू हो जाएगा और उसके बाद शुभकामनाओं और बधाइयों का अर्थहीन सिलसिला .....मेरी पीढ़ी की तो जैसे गुजरना थी गुजर गई , अब इन भावनाओं से कोई फर्क नहीं पड़नेवाला और मेरे बाद की पीढ़ी को भी इनकी जरुरत नहीं है .....काफी सक्षम पीढ़ी है ....और उत्साह बहुत ही उछाल मार रहा हो तो उनके साथ एक सामान्य व्यवहार बारह महीने , तीसों दिन अपेक्षित है .....न तो कृपया महिमा मंडित करें और न अपमानित .....फिलहाल इतना ही ...... 
७ मार्च

आज मेरी दो पोस्ट पर आई टिप्पणियाँ देखकर कुछ तो संतोष हुआ कि " हमारे ये तो एक चम्मच भी इधर से उधर नहीं करते" वाली स्थिति तो कम से कम नहीं ही है ।
चलिए और सौ साल इंतजार कर लेते हैं ।
७ मार्च

जरूरी नहीं कि जब शेफ बनना हो तभी खाना बनाना सीखा जाय । हर घर में यह सुविधा बारहों महीने तीसों दिन निशुल्क उपलब्ध है ।
जनहित में जारी ....
७ मार्च

एमटीआर इंस्टेंट फ़ूड कंपनी का एक विज्ञापन आता है ....महिला रसोई में है और चारों तरफ से नाश्ते की फरमाइशें आती हैं .....इडली, वड़ा, उत्तपम,डोसा ....और महिला ख़ुशी-ख़ुशी सबकी फरमाइश पूरी कर देती है.....ये तो एक विज्ञापन है , जिसमें उन्हें इंस्टेंट फ़ूड का महत्व बताना होता है , लेकिन आम घरों में भी महिला की यही स्थिति है , ......वह सबकी फरमाइशें पूरी करती है , पर उसे क्या पसंद है यह न तो उससे कोई पूछता है और न वह बताती है ..... २०/२२ साल यदि शादी के हो जाते हैं तो अमूमन वह यह भूल जाती है कि उसे क्या पसंद है और क्या नापसंद .....
यूँ ही महिला दिवस पर अस्मिता जाग गई .....
७ मार्च

कल एक डिपार्टमेंटल स्टोर, जिसे रिक्शा वाला मॉल कह रहा था , गई थी। मुझे जो चावल चाहिए थे वे वहाँ नहीं थे। वहाँ खडी सेल्स गर्ल दूसरे चावल दिखाते हुए बोली -- आंटी ये ले लीजीए "डेली वेअर" के लिए अच्छे हैं ।
५ मार्च

रात को सोते समय सबसे ज्यादा कोफ्त तब होती है, जब whatsapp पर बहुत देर तक किसी का typing ...typing आता रहता है।
न सोते बनता है, न जागते ।
४ मार्च

"मुश्किलों की सौगात".... एबीपी न्यूज में बेमौसम बारिश को दिया गया विशेषण ।
इससे ज्यादा सकारात्मकता और क्या हो सकती है कि मुश्किलें भी सौगात लगे ।
२ मार्च

पडौसी की मां ठेठ ग्रामीण है । आज मुझसे मिलने आईं, तो मुझे मिले सम्मान और स्मृति चिन्ह देखकर बोलीं - बच्चे अपने इनाम यहीं छोड गए ? जब मैंने बताया ये तो मेरे हैं तो उधर से जवाब आया - इस उमर में भी हंसी ठट्ठा अच्छा कर लेत हो ।
१ मार्च 

पैनलिस्ट की नौकरी अच्छी है। ज्यादा कुछ नहीं सोचना या तो समर्थन करना है या विरोध ।
२८ फरवरी 

नेट महंगा, टेलिफोन बिल ज्यादा आएगा,केबल टीवी भी महंगा ।
दीन-दुनिया से दूर रहो और बढने वाली जीडीपी के गुण गाओ ।
२८ फरवरी 

आज जो मैं दिख रही हूँ , उसका अंतिम दिन है . कल मैं एकदम बदल जाउंगी.चमत्कारी बजट आनेवाला है मितरो ......
२८ फरवरी 

सुबह से दो-तीन लोगों को डांट लगाई । सामाजिक दायित्व निभाने से अद्भुत मानसिक शांति अनुभव हो रही है । 
२७ फरवरी 

सुबह-सुबह यदि फेसबुक खोल लिया तो रसोईघर झांक-झांककर देखने लगता है , ....
२४ फरवरी 

150 ग्राम मिठाई खाने से उतनी कैलोरी नहीं मिलती, जितनी " अरे! तुम तो बिलकुल वैसी/वैसे ही हो" ये सुनकर मिलती है ।
२३ फरवरी 

अस्तित्व का संघर्ष फेसबुक पर भी है !!!....
२१ फरवरी 

संतरों के मौसम में संतरा खाने से ज्यादा मजा तो एक दूसरे को पकड-पकडकर , आंखों में छिलकों का रस निचोडने में आता था ।
१९ फरवरी 

“जब छोटे लोगों की परछाई बड़ी होने लगे, तो समझ लीजिये कि सूर्य डूबने को है।”
-----लिन युटांग, लेखक और अनुवादक (1895-1976)
१८ फरवरी 

खिडकी से झांकना मत । हाथ बाहर नहीं निकालना .....
एसी कार, बस,ट्रेन या हवाई जहाज में सफर करनेवाले बच्चों को इन शब्दों का शायद अर्थ भी समझ में नहीं आएगा , लेकिन किसी समय सफर की तमाम चीजों के साथ ये वाक्य भी अनिवार्य होते थे. ...मुझे याद है, एक बार ग्वालियर से इंदौर आ रही थी . बस शुरू हुई . माँ, भाई,भाभी सब हाथ हिलाने के लिए बाहर खड़े थे और उनको दृष्टी से ओझल होने तक देखने के मोह में मैंने अपनी गर्दन बाहर निकाली, तो माँ ने इशारे से मुझे अंदर होने के लिए कहा .....ये उस समय की बात है जब मैं एक छोटी बच्ची की माँ बन चुकी थी .....
१७ फरवरी 

सात को चुनाव हुए, दस को निर्णय आया, चौदह को मुख्यमंत्री बने, तेईस को विधायक शपथ लेंगे और उसके पांच दिन बाद फरवरी समाप्त ।
देखा कैसे चुटकियों में एक महीना निकल गया ! ऐसे ही तो दिन बीतते हैं, फिर आप लोग कहते हो काम नहीं हुआ 
१६ फरवरी 

भारतीय महिलाओं की चीजें संभालकर रखने की आदत भारत-पाक मैच के समय काम आती है । दिवाली के बाद ऊपर पटाखे ऐसे ही थोडे रखवाए जाते हैं ।
१५ फरवरी 

एक संवाद कई बार सुनने में आता है - ये औरत जात पर कलंक है। 
कभी कोई संवाद पुरूष के लिए क्यों नहीं लिखा जाता कि वह पुरूष जात पर कलंक है ।
१२ फरवरी 

गंदी गालियां महिलाओं को लेकर दी जाती है और तथाकथित पढा लिखा वर्ग अपनेआप को इससे बरी मानता है , पर हालिया राजनीतिक उठापठक के बाद यही वर्ग जिस भाषा में गरिया रहा है , उसे सुसंस्कृत तो नहीं कहा जा सकता। 
केजरीवाल नई बहू, कांग्रेस विधवा, भाजपा सौत । वाह ! दूसरी कोई उपमा नहीं मिल रही । 
औरत आसानी से उपलब्ध होनेवाली 'वस्तु' जो है । हम भारतीय महिलाएं धन्य हो गई।
११ फरवरी 

हम महाराष्ट्र से बाहर रहनेवाले मराठी भाषी आधा समय मुंबई की ओर और आधा समय दिल्ली की ओर देखते रहते हैं।
कभी मातृभाषा मराठी हिलोरे लेती है, कभी मातृभूमि भारत ।
११ फरवरी 

बाकी सब ठीक है , पर संविधान में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए , जिससे विपक्ष के सदस्यों की संख्या भी निश्चित हो सके । लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष भी होना जरूरी ही नहीं अनिवार्य घटक है । एकतर्फा जीत भविष्य में घातक हो सकती है ।
१० फरवरी 

साल भर से दिल्ली में सरकार नहीं, छ: महीने से जम्मू कश्मीर में सरकार नहीं, हफ्ते भर से बिहार में सरकार नहीं । देश फिर भी चल रहा है ।
१० फरवरी 

मेरी बेटी जब छोटी थी और ''आई''(माँ) कहकर दौड़ती हुई मेरे पास आती थी और अब खुद उसकी बेटी भी इतनी बड़ी हो गई है ....
लेकिन तब से अब तक संतूर साबुन का विज्ञापन नहीं बदला है .....मॉडल्स बदल गए अवधारणा वही है .....कॉलेज गर्ल लगती है ......मम्मी ?
९ फरवरी 

यदि अंत में डी डी नेशनल या भारती के शरण में ही जाना है , तो सैंकड़ों/ हजारों के पैकेज लेने का मतलब है अपने आप को मूर्ख साबित करना है और ऐसा मैं कई बार करती हूं .
८ फरवरी 

आज न्यूज चैनल देखना तो बेकार है , सो घूमते घामते कुकरी चैनल पहुंची । वहाँ चाय बनाना सिखा रहे थे । बिलकुल शुरू से .... आपको जितनी चाय बनाना हो, उतना पानी नाप लीजीए ।
हाहाहा .... इतना तो सात साल की मेरी नातिन भी जानती है ।
७ फरवरी 

दिल्ली एक छोटा सा राज्य और उसके विधानसभा चुनाव , समाचारों का एक अंश मात्र होना चाहिए थे, पर सारे चैनलों का स्वास्थ्य उन्हीं पर टिका है , सो पूरे देश की जनता को यह स्वास्थ्य वर्धक भोजन बिला वजह परोस रहे हैं ।
इसका दिनभर करते रहिए चर्वण , कोई मीन मेख निकाले बिना ।
२ फरवरी 

बादाम के एक विज्ञापन में, टेबल पर करीब आधा किलो बादाम रखे दिखते हैं और खानेवाले एकदम मुट्ठीभर के खा लेते हैं। ....मुझे उस घर की तलाश है।
२८ जनवरी 

कम से कम और ज्यादा से ज्यादा की कोई सीमा नहीं होती ....
२८ जनवरी 

ध्वनि प्रदूषण फैलाना, आचार संहिता का उल्लंघन नहीं होता क्या ?
२७ जनवरी 

लोकतान्त्रिक तरीकों से जनसामान्य को अभिव्यक्त करनेवाला गणतंत्र दिवस पर चला गया ......आर. के. लक्ष्मण को श्रद्धांजलि .....
२६ जनवरी 

दिनभर बादल यहाँ छाए हैं और बारिश सिडनी में हो रही है .....वसुधैव कुटुंबकम ......
२६ जनवरी 

अमेरिका कितनी भी प्रगति कर ले , सूर्योदय तो मेरे देश में ही पहले होगा ।
२५ जनवरी 

आज से लोग अगले दो दिन की छुट्टी के मूड में आ गए हैं , पांच दिनी कार्य शैली में तो आज भी छुट्टी है ....मुझे अपनी नौकरी आज बेइंतहा याद आ रही है ....वो भी क्या रोमांचक दिन हुआ करते थे छुट्टियों का इंतज़ार और फिर उनका आ पहुंचना.....
२४ जनवरी 

पहले लड़कियां तुलनात्मक रूप से छोटी होती थी , तो ससुराल जाते समय रोती बहुत थी .तब उन्हें समझाते थे ---जा बेटी ! अभी चली जा , हम जल्दी ही तुझे लेने आएंगे .
अब ठण्ड और बारिश को यही कहने की इच्छा हो रही है ...
२२ जनवरी 

मैं सोने के छोटे-से टुकड़े को भी बड़ी हिफाजत से , लॉकर में सम्हालकर रखती हूँ,पर मेरे शब्द अस्त-व्यस्त से कागजों पर बिखरे रहते हैं और कागज उड़ते रहते हैं यहाँ-वहाँ.......सम्पत्ति की साज-सम्हाल में ये पक्षपात क्यों,......क्यों करती हूँ मैं ?
२१ जनवरी 

बहुत दिन नहीं हुए, डॉ प्रकाश आमटे के जीवन पर आधारित फिल्म मराठी में रिलीज हुए। उसके बाद हाल ही में २ जनवरी को लोकमान्य तिलक पर बनी फिल्म रिलीज हुई और अब २३ जनवरी को बालासाहेब ठाकरे पर बनी फिल्म रिलीज हो रही है। इन तीनों की आपस में कोई तुलना नहीं है, लेकिन तीनों विश्व प्रसिद्ध विभूतियां हैं ।
सवाल यह है कि यदि मराठी में इस तरह का काम हो सकता है तो हिंदी में क्यों नही होता ? एक महत्वपूर्ण बात और कि डॉ प्रकाश आमटे की भूमिका नाना पाटेकर जैसे प्रसिद्ध कलाकार ने निभाई तो शेष दो, सुबोध भावे और उमेश कामत भी मराठी के स्थापित कलाकार हैं ।
२० जनवरी 

अरे ओ आम आदमी ! तू तो आर के लक्ष्मण के कार्टून में ही अच्छा था । यहां तो जगह नहीं है भैया ! ओबामा-वोबामा, चुनाव-बिनाव, सेंसर-वेंसर बहुत रेलमपेल है भाई !
१८ जनवरी 

ओबामा के साथ १६०० लोग आएंगे , इतने तो हमारे यहां बारात में भी नहीं जाते ।
१८ जनवरी 

अगले जन्म मोहे राजनीतीज्ञ कीजो...
१७ जनवरी 

आज एक काव्य - गोष्ठी में लेखक/चित्रकार प्रभु जोशी ने बड़ी मार्के की बात कही ---- जो आज्ञाकारी होता है उसे प्रज्ञावंत मान लिया जाता है . वाकई जो हाँ में हाँ मिलाता है , वह समझदार कहलाता है और आगे चलकर समझदार साबित भी होता है .....
११ जनवरी 

कल जब मैंने चेतन भगत के लेख का यहाँ विरोध किया तो बहुत सारे लोगों ने चेतन भगत को अमहत्वपूर्ण मानते हुए इसे गैर जरुरी समझा , लेकिन मेरा यह मानना है कि चूहा कितना भी छोटा हो यदि वह लगातार खोदता रहे तो दीवार को खोखला कर सकता है , इसलिए किसी भी हमले को छोटा नहीं समझना चाहिए . ''अभी तो कुछ नहीं है न , जब होगा तब देखा जाएगा '' वाली मानसिकता की मैं पक्षधर नहीं हूँ. बारिश के आसार हो तभी छत के कवेलू जाँच लेना चाहिए .

बहरहाल हिंदी पोर्टल वेबदुनिया ने इस मुद्दे की गंभीरता को समझा और मेरे तथा अन्य प्रबुद्ध व्यक्तियों के विचारों को आज प्रकाशित किया है .
९ जनवरी 

आज के दैनिक भास्कर में एक लेख के जरिए लेखक चेतन भगत ने लिखा है कि हिन्दी को आगे बढ़ाना है तो देवनागरी के स्थान पर रोमन को अपना लिया जाना चाहिए।
मैं चेतन भगत से बिलकुल भी सहमत नहीं हूँ. देवनागरी एक वैज्ञानिक लिपि है और हमारी हिंदी की ( इसमें मराठी को भी रखा जा सकता है, मराठी भी देवनागरी में लिखी जाती है ) विशेषता है कि हम जैसा बोलते हैं वैसा ही लिखते हैं.इससे भाषा का इस्तेमाल आसान हो जाता है . हिंदी को रोमन में लिखने से शुद्धता और भावाभिव्यक्ति में खलल पैदा हो सकता है .रोमन में यदि ''मान'' लिखना हो या ''माँ'' दोनों की वर्तनी एक ही होती है --- maan . इस तरह के दूसरे उदाहरण भी मिल जाएंगे.ऐसे में हमारी भाषा को किस तरह बचाकर रखा जा सकता है ?
हमारी भाषा हिंदी को रोमन में लिखने के पीछे उनका एक तर्क यह भी है कि नए उपकरणों से जो हिंदी लिखी जाती है , वह transliteration है , जबकि यह पूर्ण सत्य नहीं है . कम्प्यूटर पर अलग-अलग हिंदी फॉण्ट उपलब्ध है , ज्यादातर अख़बारों ने अपने फॉण्ट विकसित कर लिए हैं , वहीँ मोबाईल और टैब पर हिंदी के न सिर्फ ५२ अक्षर बल्कि हर अक्षर की पूरी बाराखडी उपलब्ध है.चेतन भगत को यह जानकारी नहीं होगी यह तो संभव नहीं है , लेकिन अपने कथ्य के समर्थन में और युवा पीढ़ी को खुश करने के लिए, अधूरी जानकारी देकर जन सामान्य को बरगलाने का घोर निंदनीय कृत्य उन्होंने किया है.
चेतन भगत के इस आलेख का पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए .
८ जनवरी 

जब से अक्षर ज्ञान हुआ लगभग तभी से सुबह-सुबह अख़बार पढ़ना दातुन करने जितना जरुरी रहा .कितनी भी विपरीत परिस्थिति रही हो , एक नज़र तो डाल ही लेती हूँ, लेकिन आज भूल गई . हैरान हूँ. अभी थोड़ी देर पहले पढ़ा....मैं जिसे भूल जाना चाहती हूँ , वह ''उम्र''लगातार अपने होने का अहसास कराती रहती है.......दुष्ट ....
७ जनवरी 

10-12 साल पहले जब मोबाइल लिया था तो सोच यह थी कि बच्चों से , रिश्तेदारों से, मित्रों से बात करना सुविधा जनक हो जाएगा। अब ये सब तो निश्चित समय पर नपी तुली बातें करते हैं, पर बाकी सारा दिन प्रायवेट बैंकों, रियल इस्टेट कंपनियों, क्रेडिट कार्ड कंपनियों आदि के लिए मोबाइल समर्पित रहता है।
५ जनवरी 

बैंक में नौकरी के दौरान मेरा प्रदर्शन अच्छा रहा है। कुछ पुरस्कार वगैरह भी मेरे खाते में दर्ज है । पद्म पुरस्कार के लिए मैं अपनी फाइल वित्त मंत्रालय को भेज रही हूं।
५ जनवरी 

ट्रेन में चढते चढते जो हिन्दी पत्रिका दिखी खरीद ली.समय काटने के लिए । बाद में सामने की बर्थ पर करीब करीब हम उम्र एक महिला आई । मुझे बेकार के प्रश्न उत्तर में दिलचस्पी नहीं होती, तो मैंने अपनी पत्रिका निकालकर पढना शुरू कर दिया। थोडी देर बाद देखा वे भी पढ रहीं थीं । किताब का नाम था "ज्ञानेश्वरी" गीता प्रेस का हिन्दी अनुवाद। अब मुझे कुछ शर्मिंदगी सी लग रही है ।
२ जनवरी 




































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