लोकसभा का यह सत्र शानदार रहा। पहले तमाम सांसद निलम्बित हुए और अन्त में स्वयं लोकसभा ही निलम्बित हो गयी।
इसी को शायद लोकतंत्र कहते हैं।
२१ दिसम्बर
आज सुबह से इंदौर का मौसम ऐसा है कि मुझे अपने मायके ग्वालियर की याद आ रही है। विवाह के बाद इंदौर आयी तब न तो यहाँ तेज गर्मी पड़ती थी और न ही हड्डी कम्पाने वाली ठण्ड। जरा-सी सर्दी बढ़ते ही स्वेटर पहनने वाले लोगों को मैं आश्चर्य से देखती थी और वे बिना स्वेटर वाली मुझे चकित होकर देखते थे। मुझे याद है कि मेरी छोटी ननद ने मुझसे पूछा था - भाभी, ओस क्या होती है ? मैंने बता तो दिया पर ओस को अनुभव नहीं करवा पायी। मायके में हरेक के लिए रजाई, कम्बल अलग - अलग होते हैं, यह सुनकर पड़ौसन को अचम्भा हुआ था। चूल्हा या सिगड़ी हर शाम खाना बनाने के लिए तो ठीक है, हाथ - पैर सेंकने के लिए अलाव या कुण्डी जलाना यहाँ कल्पना से परे था।
इसी इंदौर में आज सुबह कोहरा इतना घना था कि लगा खिड़की खोल दी तो अन्दर आ जायेगा।
समय-समय की बात...।
२९ नवम्बर
कौन बनेगा करोड़पति में एक बालक द्वारा अमिताभ बच्चन से अशोभनीय प्रश्न पूछे जाने पर कल मैंने लिखा था। उस पर जानकारों ने बताया कि वह सब तयशुदा होता है। यह तो और भी खतरनाक है। इसका विरोध होना ही चाहिए।
◾अमिताभ बच्चन स्वयं इतने समर्थ हैं कि सबसे पहले उन्होंने ही इस स्तरहीनता का विरोध करना चाहिए / चाहिए था । ऐसा भी नहीं है कि उनके सामने रोजी-रोटी का सवाल खड़ा हो जाता।
◾पहले जिसे चौथा स्तम्भ कहा जाता था, उस मुद्रित माध्यम के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की भी कुछ जिम्मेदारी बनती है, लेकिन तमाम अखबार राजनीतिक उठापटक, लूटपाट, बलात्कार जैसी खबरों से भरे रहते हैं। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम तो ज्यादा निराश करते हैं।
◾लेखक वर्ग का भी सामाजिक विषयों से कोई लेना-देना दिखायी नहीं देता है। आत्म मुग्धता में डूबे इस वर्ग को टाँग खिंचाई से ही फुर्सत नहीं मिलती।
◾दर्शक/श्रोता ऐसे प्रसंगों पर तालियाँ बजाकर सबसे ज्यादा गैर जिम्मेदाराना व्यवहार करते हैं।
◾ऐसी घटनाओं, परिस्थितियों के लिये वर्त्तमान जीवन शैली का सौ प्रतिशत कार्य कारणभाव है। स्वतंत्रता के नाम पर अति मुक्त वातावरण घरों में दिखायी देता है। आचरण में, व्यवहार में, वार्तालाप में कहीं भी न कोई बन्धन रह गया है और न ही अनुशासन बचा है।
◾अतः हम सबका दायित्व है कि ऐसी बातों पर, घटनाओं पर विरोध दर्ज करें, ताकि थोड़े-बहुत अंकुश की सम्भावना बनी रहे।
२५ नवम्बर
इन दिनों "कौन बनेगा करोड़पति" बच्चों के लिए चल रहा है। एक तेरह वर्षीय प्रतिभागी बच्चे ने हॉट सीट पर पहुँचने के बाद अमिताभ बच्चन से कहा -मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। अमिताभ बच्चन की स्वीकृति के बाद उसने पूछा - - स्कूल में आपका किसी से क्रश हुआ था ? मैं तो दंग रह गयी। दादा की उम्र के किसी व्यक्ति से कोई बच्चा इस तरह का सवाल कैसे पूछ सकता है ? उसके पहले आये सिख बच्चे को बैसाखी के बारे में जानकारी नहीं थी। ये बच्चे कहाँ जा रहे हैं ? इन्हें कैसे संस्कार मिल रहे हैं ? या मिल ही नहीं रहे हैं ?
२४ नवम्बर
आज कुछ पढ़ रही थी, उसमें एक सन्दर्भ में यह उल्लेखित हुआ।
Arunachala Gounder v. Ponnusamy, (2022) 11 SCC 520 The Supreme Court held that the self-acquired property of a Hindu male dying intestate i.e., without writing a will, would devolve by inheritance and not by succession. Further, the Court said that such property shall be inherited by the daughter, in addition to the property of the coparceary which was obtained through partition. The Court observed that if a woman dies intestate, then any ancestral property passed onto her from her father would be bestowed upon the heirs of her father and similarly the property passed onto her from her husband’s family would be bestowed to her husband’s heir...
#इसका #गुगलीय #अनुवाद #यह #है
अरुणाचल गौंडर बनाम पोन्नुसामी, (2022) 11 एससीसी 520 सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बिना वसीयत के मरने वाले हिंदू पुरुष की स्व-अर्जित संपत्ति, बिना वसीयत लिखे, विरासत द्वारा हस्तांतरित होगी, उत्तराधिकार से नहीं। इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि ऐसी संपत्ति बेटी को विरासत में मिलेगी, जो कि बंटवारे के माध्यम से प्राप्त सहदायिक संपत्ति के अलावा होगी। न्यायालय ने कहा कि यदि कोई महिला बिना वसीयत किए मर जाती है, तो उसके पिता से मिली पैतृक संपत्ति उसके पिता के उत्तराधिकारियों को दी जाएगी और इसी तरह उसके पति के परिवार से मिली संपत्ति उसके पति के उत्तराधिकारी को दी जाएगी... .
पिता के और पति के उत्तराधिकारी यानि कौन ? भाई और बेटा ? यदि मैं ठीक समझ पा रही हूँ तो इसमें संवैधानिक समानता का उल्लंघन हुआ जान पड़ता है।
मैं जानना चाहती हूँ।
२१ नवम्बर
कवि/कवयित्रियों के लिये एक सुखद समाचार। ब्रिटेन की प्लेमाउथ और नॉटिंघम ट्रेंट यूनिवर्सिटी में हुए शोध के अनुसार कविता लिखना, पढ़ना या सुनना अकेलापन दूर करता है।
कवि बिरादरी का अक्सर मज़ाक उड़ाया जाता है। साहित्य के क्षेत्र में भी जितना मान-सम्मान उपन्यासकार, कथाकार को मिलता है, उतना कविताकार को नहीं मिलता। वे अवांछित होते हैं।
कभी-कभी पारिवारिक समारोहों में मजे लेने के लिए नवोदित कविताकार को कहा जाता है कि कुछ सुनाओ, किन्तु वास्तव में कुछ सुना नहीं जाता।
दो/तीन सत्रों में चलनेवाले साहित्यिक समारोहों में अध्यक्ष, मुख्य वक्ता आदि के अलावा परिसंवाद, कथाकथन आदि के सहभागियों के साथ सूत्र संचालकों तक के नाम होते हैं, लेकिन "कवि सम्मेलन" इस शीर्षक तले अधिकतर समारोहों में कवियों के नाम नहीं होते। इस समाचार से हो सकता है कि कुछ ज्ञान चक्षु खुल जाय।
८ नवम्बर
प्रति वर्ष दीपावली के समय सिर्फ भौतिक सफाई होती है। अन्तर्मन की गन्दगी गाद होकर बोझ बढ़ाती है। गृहस्थाश्रम से वानप्रस्थाश्रम में जाने के लिये एक वैक्यूम क्लीनर की तलाश जारी है।
५ नवम्बर
समाचारपत्रों का वजन बढ़ना शुरू हो गया है, जो १३/१४ नवम्बर को यकायक कम होकर वास्तविक स्वरूप में आ जायेगा। इस हफ्ते हमारा भी वजन बढ़ने लगेगा, जिसे कम करने में छः महीने लग जायेंगे। ईश्वर की महिमा अपरंपार है।
५ नवम्बर
जीवन के भूकम्प मजबूत बनाते हैं, पर धरती के भूकम्प कमजोर करते हैं। जरा-सी देर में आँखों के सामने क्या- क्या घूम जाता है।
#ताजातरीन #अनुभव
४ नवम्बर
माझ्या माहितीप्रमाणे लग्न झालेल्या बायकांपैकी फक्त मराठी भाषिक स्त्रीयाच आपल्या नावापुढे सौभाग्यवती लावतात पण त्या करवा चौथ करतात असे कधी वाचण्यात आले नाही. म्हणजे अगदी रील वगैरे बनविण्यासाठी नटणं थटणं सुद्धा नाही. काय कारण असावे ?
२ नवम्बर
कौन बनेगा करोड़पति में आये दो प्रतिभागी इसरो में कार्यरत हैं। उनसे जब भाषा का विकल्प पूछा गया तो उन्होंने हिन्दी को चुना, जबकि उनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं है। यह अतुलनीय, अनुकरणीय और अविस्मरणीय है।
२ नवम्बर
ज्ञान की थाती और करोड़पति बनने की अभिलाषा लेकर जानेवाले, अमिताभ बच्चन को देखकर पागलों जैसा व्यवहार करने लगते हैं। कहते हैं कि समय के अनुसार बहुत कुछ बदल जाता है, लेकिन पच्चीस वर्ष यानि लगभग एक पीढ़ी गुजर जाने के बाद भी मूर्खतापूर्ण व्यवहार के दृश्य नहीं बदले हैं।
३१ अक्टूबर
बढ़ती बुजुर्ग जनसँख्या के बारे में इन दिनों इतना पढ़ने में आ रहा है कि अपनी जीवितावस्था पर लज्जा आने लगी है।
एक कहावत भी याद आती रहती है - -
काम के न काज के
धड़ी भर अनाज के
धड़ी - पाँच सेर (किलो)
#टीप अभी इस बात की पूरे विश्व में बहुत चर्चा हो रही है कि बुजुर्गों की आबादी बढ़ती जा रही है। इस आबादी का अनुत्पादक होना, समस्या का मूल है।
३१ अक्टूबर
श्री नारायण मूर्ति ने दो दिन पहले जो वक्तव्य दिया है, उसकी काफी आलोचना हो रही है। इसे काम करनेवालों के विरोध में बताया जा रहा है। विकसित देशों में काम के घण्टे कितने कम होते हैं, इसकी जानकारी दी जा रही है। परिवार के साथ अधिकाधिक समय बिताना कितना जरूरी है, ये सिद्धान्त प्रचारित किये जा रहे हैं आदि आदि..।
नारायण मूर्ति ने क्या इस बारे में नहीं सोचा होगा? उनका व्यक्तित्त्व क्या इतना उथला है?
३० अक्टूबर
शरद पूर्णिमा पर छत पर फ़ैली चांदनी और इलायची - जायफल की सुगंध से महकता औटाया हुआ दूध ...एक अनौपचारिक संगीत सभा भी होती थी , जिसे जो आता हो और जो सुनाना हो वह मुक्त भाव, मुक्त कंठ सुनाया करता था...महिलाएँ परिवार के बड़े बच्चे का, (लड़का/लड़की कोई भी हो) टीका करती , आरती उतारती और उसे नेग देती...छोटे बच्चों का टीका तो होता ,पर नेग नहीं मिलता और उनका सारा ध्यान दूध की ओर रहता... 😁 मैं परिवार में सबसे छोटी थी, इसलिए सब याद है।
वे अमृतमय दिन बीत गए, रीत गए...
और आज तो ग्रहण है। चन्द्रमा से भी अमृत की सम्भावना नहीं है।
२८ अक्टूबर
नवरात्रि के अवसर पर दैनिक भास्कर के मुंबई - नागपुर संस्करण के लिये, "नारी शक्ति : पौराणिक काल से आज तक" पर संक्षेप में विचार माँगे गये थे। वे २३ अक्टूबर के अंक में प्रकाशित हुए। धन्यवाद दीप्ति कुशवाह।
तदनुसार मेरे विचार :
पौराणिक कथाओं से लेकर आज दिनांक तक स्त्रियों का सामाजिक योगदान अनुपम रहा है, लेकिन सामान्यतः स्त्री को उसका प्रतिफल नहीं मिलता है। यद्यपि परिवर्तन प्रारम्भ हो चुका है, किन्तु उसकी गति धीमी है एवं कुछ विशेष प्रसंगों पर ही स्त्री की उपस्थिति मान्य होती है।
लगभग सौ वर्षों पूर्व हुई एक घटना के बाद ८ मार्च को प्रतिवर्ष महिला दिवस मनाया जाता है, जिसे सामाजिक माध्यमों के द्वारा अत्यधिक प्रसारित किया गया। इस तरह से दिवस मनाकर स्त्री के प्रति आभार प्रकट करने की आवश्यकता सम्भवतः शतकों पूर्व भी अनुभव की गयी होगी। इसी कारण पौराणिक ग्रंथों का आधार देकर नवरात्रि कोअवलम्ब बनाया गया। जो भी हो, स्त्री समाज में अपना स्थान बनाने में धीरे-धीरे ही सही परन्तु सफल हो रही है और इसी में उसका मान-सम्मान एवं यश परिलक्षित होता है।
गार्गी, मैत्रेयी, कात्यायनी की तरह बुद्धिमति स्त्री वर्त्तमान में हर क्षेत्र में अपने पाँव जमा रही है। बीसवीं शताब्दी तक जो क्षेत्र उसके लिये वर्जित माने जाते थे या वह स्वयं उनमें प्रवेश करने से पीछे हटती थी, उन सारे क्षेत्रों में महिलाओं ने अपनी धाक जमा ली है। कोरोना काल में जब परिवारों में रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हो गया था, उस समय घरेलू महिलाओं ने जिस कौशल से घर-परिवार को सम्भाला, वह अभूतपूर्व है।
मैं एक स्त्री हूँ और इस बात पर मुझे गर्व अनुभव होता है कि पहले मात्र मातृत्त्व के आधार पर किसी महिला की वंदना होती थी, लेकिन आज वह अल्प रूप में ही सही व्यक्ति के रूप में भी वंदनीय हो रही है।
२५ अक्टूबर
लश्कर (ग्वालियर) के छत्री बाजार में परदादा का बनवाया हुआ बाड़ा था। सामने छत्री मैदान था। छत्री मैदान में बड़े-बड़े कार्यक्रम होते रहते थे। हमारे छज्जे पर बैठकर हम सब देख सकते थे। वहीं पर राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अटल जी जैसे वक्ताओं को सुनने का सुअवसर मिला। सन १९७५ में भारत ने विश्व हाॅकी चषक जीता था। जिनके गोल की वजह से यह उपलब्धि मिली थी, वे हाॅकी खिलाड़ी शिवाजी पवार छत्री बाजार में ही रहते थे। मलयेशिया से लौटने के बाद उनका स्वागत समारोह छत्री पार्क में हुआ। समारोह से पहले बाजे-गाजे के साथ शोभायात्रा निकली। ऐसे अनेक दुर्लभ अवसर छत्री बाजार में रहने की वजह से अनायास प्राप्त हुए।
ऐसा ही अविस्मरणीय अनुभव प्रति वर्ष होनेवाली रामलीला का है। रिश्तेदार, परिचित, हम भाई-बहनों और लगभग हम उम्र भतीजों का मित्र वर्ग, इतना ही नहीं अपरिचित लोग भी हमारे छज्जे से रामलीला देखते थे। कभी-कभी हमें बैठने को जगह नहीं मिलती थी। माँ से कुछ कहने पर एक ही जवाब मिलता था - - तो क्या हुआ ? वे अपने मेहमान हैं।
दशहरे के दिन रावण दहन देखने, साथ ही माँ को सोना पत्ती देने व पैर छूने के लिये कई परिवार आते थे। उनका मुँह मीठा करने के लिये माँ की तैयारी दो दिन पहले से ही चालू हो जाती थी। रावण दहन के बाद सब छज्जे से उतरकर नीचे आते और उनकी आवभगत शुरू हो जाती। रिश्ते में जो दामाद होते थे, उनकी तीमारदारी अलग से। उसके पहले छज्जे पर बैठे अपरिचितों के लिये दरी बिछाना, उन्हें पानी के गिलास देना वगैरा चलता रहता था और इस सबके बीच जो समय मिलता, उसमें दहन क्रिया भी देख सकते थे। कोई शिकायत नहीं, कोई तानाकशी नहीं, कपड़ों की तुलना नहीं, खाने में ना-नुकुर या नखरे नहीं। सब कुछ राजी-खुशी निपटता था।
वे भी क्या दिन थे!
२४ अक्टूबर
आज यदि रावण होता तो लोकतंत्र, न्याय व्यवस्था, दण्ड संहिता आदि के साथ पुलिस हिरासत में, कारागार में, न्यायालय में आता-जाता रहता, मजे से खाता-पीता, उसके छायाचित्र छपते और कुछ समय बाद बरी या रिहा हो जाता। यह भी हो सकता था कि रावण को बाइज्ज़त छोड़ने के लिये अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बनाया जाता। उसका वध तो कदापि नहीं होता।
वैसे भी आजकल जितने और जैसे अपराध हो रहे हैं, उनके सामने रावण का अपराध कोई मायने नहीं रखता। रावण दहन की परम्परा बन्द कर दी जाना चाहिए।
२३ अक्टूबर
भगवान श्रीराम बहुत भाग्यशाली थे। लक्ष्मण जैसा अनुगामी भाई था, हनुमान जैसा समर्पित भक्त था, सीता जैसी परिपक्व पत्नी थी, रावण जैसा विद्वान शत्रु था और लंका पर विजय प्राप्ति के बाद जयघोष करने के लिये #ध्वनि #विस्तारक #यंत्र #नहीं था।
हास-परिहास को उसी रूप में लिया जाय तो बेहतर होगा।
२१ अक्टूबर
फेसबुक पर भ्रमण करते हुए एक दशक से अधिक हो गया है। अनुभव यह कहता है कि शुरू के २/४ वर्षों में मित्र-संख्या कम थी, किन्तु उस समय जो भी मित्र बने उन में से अधिकांश के साथ आज भी सम्पर्क और तदनुरूप सम्बन्ध भी बने हुए हैं, लेकिन बाद में यह दृश्य लगातार दिखता रहा कि जिन्होंने मित्रता अनुरोध भेजा उनमें से अधिकांश उसकी स्वीकृति के तुरन्त बाद गायब हो गये। फिर वे कभी, कहीं, किसी और जगह उनकी हरी बत्ती से दिखते हैं तो पता पड़ता है कि अच्छा, महोदय/महोदया हमारी भी सूची में हैं।
उन्हें संभवत : संख्या से लगाव है और मेरे जैसे मूर्ख एवं भावुक फेसबुकिये समझते हैं कि उन्हें हमारे व्यक्तित्त्व के प्रति आदर है।
अब एक नयी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसके अन्तर्गत मित्रता अनुरोध करनेवालों को एक घोषणापत्र देना होगा कि अनुरोध स्वीकार किये जाने के बाद कम से कम एक वर्ष तक , जिससे मित्रता अनुरोध किया है, उसकी भित्ति पर ७५ प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य होगी, अन्यथा तुरन्त प्रभाव से उनकी मित्रता समाप्त हो जायेगी।
१७ अक्टूबर
प्रधानमंत्री आत्म निर्भर भारत की बात करते हैं और घर पर आनेवाली सहायिका निर्भरता का पाठ पढ़ाती है।
१६ अक्टूबर
पौधों को भी जताना पड़ता है कि किसी दूसरे पौधे के घर ताक-झाँक नहीं करना है। सीधे रस्ते चलो, उसी में भलाई है। बेलों पर तो बारीक नज़र रखना पड़ती है। किसी दिन यदि कोई बेल किसी पेड़ की ओर झुकती दिखायी दी और उसके कान नहीं मरोड़े तो अगले दिन झुकाव, लिपटने में बदल जाता है एवं उसके अगले दिन तो छुड़ाना मुश्किल हो जाता है। बेल यहाँ - वहाँ से किरच कर आत्महत्या की धमकी देती लगती है।
कुल मिलाकर सीख मिलती है कि रोज का काम रोज करना चाहिए।
१५ अक्टूबर
आज मुझसे किसी ने पूछा है कि शुद्ध हिन्दी को नाॅर्मल हिन्दी में कैसे Convert (ये अकेला रोमन में) कर सकते हैं ? साथ में एक टिप्पणी है कि आप हमेशा हिन्दी में लिखती हैं और वह भी शुद्ध नहीं नाॅर्मल हिन्दी में, इसलिए आपसे पूछा।
क्या बताऊँ ? मेरे पास तो कोई जवाब नहीं है।
१३ अक्टूबर
हड़बड़ाहट में यदि इंडिया को भारत किया जा सकता है तो कैलाश व्यू प्वाइंट को सोच समझकर "कैलाश दर्शन" किया जा सकता था।
किसी भाषा प्रेमी को सत्संग में रखते तो यह ज्ञान प्राप्त हो जाता कि व्यू और दर्शन में भावनिक अन्तर होता है।
१२ अक्टूबर
चुनाव की तिथियाँ घोषित करने के क्या नियम हैं ?
मिजोरम में ७ नवम्बर, मध्य प्रदेश में १७ नवम्बर, छत्तीसगढ़ में ७ और १७ नवम्बर को चुनाव होंगे। १३ नवम्बर को लक्ष्मी पूजन है। इसका अर्थ यह हुआ कि चुनाव प्रक्रिया से सम्बन्धित सभी सरकारी कर्मचारी, अन्य प्रतिष्ठानों के कर्मचारी, पुलिस विभाग, पत्रकार आदि न तो स्वयं और न ही उनके परिजन त्योहार का आनन्द उठा पायेंगे।
धनतेरस से दिवाली की शुरूआत हो जाती है और सामान्यतः भाई दूज के बाद आनेवाले दो चार दिनों तक चलती है। सारे विभागों में नियुक्तियाँ भी देश भर से होती है, उनमें बिहार वासी भी होते हैं, जहाँ छठ पूजा का अलग महत्त्व है।
क्या इन सब बातों का ध्यान नहीं रखा जाना चाहिए ?
९ अक्टूबर
खाना बनाते - बनाते साठ वर्ष से अधिक समय बीत गया। बनाना पसन्द है, तब भी अब मन नहीं करता। क्या बनाऊँ यह सोचकर ही थकावट अनुभव होती है। इस सबका किसी न किसी से बातचीत में भी उल्लेख होता रहता है, तो सुझाव भी आते हैं। टिफिन मँगवा लिया करो, घर पर किसी से बनवा लिया करो या उसकी सहायता ले लिया करो आदि आदि...।
इसी बीच राजस्थान का एक समाचार पढ़ने में आया कि सरकार की ओर से गरीबों और जरूरतमंदों को ८ रू. में खाना मिलेगा। एक विदेशी दम्पत्ति का खुश खुश फोटो भी छपा। यह सब देखकर लगा कि अपने शहर में इतनी चकल्लस करने से तो बेहतर है, राजस्थान में ही बस जाऊँ।
इस दिशा में सोच ही रही थी कि आज अपने प्रदेश का, अतुलनीय मध्य प्रदेश का समाचार पढ़ा। मात्र पाँच रूपये में पूरी थाली।
कहावत सुनी थी कि भगवान जब देता है छप्पर फाड़कर देता है। पता नहीं किसे देता है, किन्तु एक बात पक्की है कि चुनाव सामने हो तो दलगत भेदभाव नहीं होता। हर दल आकाश फाड़कर देता है।
८ अक्टूबर
आप सबकी शुभकामनाओं के साथ
मालव भूषण सम्मान हेतु चयन हुआ है ।
लोकमान्य नगर निवासी मंडल द्वारा इंदौर में ३० सितम्बर और १ अक्टूबर को अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। इस सम्मेलन के अन्तर्गत विविध साहित्यिक कार्यक्रमों के अलावा मराठी भाषा के संवर्द्धन एवं विकास के लिये विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्तियों को मालव भूषण, मालव गौरव, भाषा सारथी उपाधियों से सम्मानित किया जायेगा।
संरक्षक श्री अजय वैशंपायन ने बताया कि जयंत भिसे, अश्विन खरे, अरविन्द जवळेकर, विवेक हिरदे, अलकनन्दा साने, उषा वैशंपायन को मालव भूषण सम्मान प्रदान किया जायेगा।
३० सितम्बर
इन दिनों बेटे के यहाँ हूँ, ठेठ उत्तर भारत में। टाऊनशिप में गणपति विसर्जन चल रहा है। श्री गणेश की स्तुति में संस्कृत, मराठी, हिन्दी आदि भाषाओं में गीत बज रहे हैं। विसर्जन यात्रा में अधिकांश हिन्दी भाषी हैं, जो देश के विभिन्न प्रदेशों से यहाँ आकर बसे हैं और इन परिवारों की स्त्रियाँ जुलूस के आगे गुजरात का गरबा कर रही हैं।
देश की इतनी सुन्दर एकात्मकता इससे अधिक क्या होगी ?
२८ सितम्बर
आज गणेश विसर्जन पर धूम रहेगी....गणपति बाप्पा मोरया,पुढच्या वर्षी लवकर या... (अगले बरस तू जल्दी आ ) ....
क्यों आना चाहिए गणपति बाप्पा ने अगले बरस जल्दी ???....
असुरक्षा के माहौल और रोटी-पानी की जद्दो-जेहद में जुटे लोगों को देखने ???...पानी के लिए तरसते और पानी की वजह से जान गँवाती जनता को देखने ???... यहाँ-वहाँ बिखरे पड़े घोटाले और उनकी जाँच का नाटक करनेवाली एजेंसियों को देखने ???...बेशर्म राजनेताओं और मक्कार नौकरशाहों को देखने ???.... लाल बत्ती की गाड़ियों में बैठकर हवाई जहाज में उड़नेवालों को देखने ???....बरसों-बरस घिसट रही योजनाओं को देखने ???....भटके हुए आन्दोलनों और उनमें अटके व्यक्तित्वों को देखने ???.... देश भर में खुदी पड़ी सडकों को देखने ??....सड़कों पर फैले कचरे को देखने ??....औरतों के साथ होने वाले अपराधों को देखने ???....आखिर ऐसा क्या है हमारे पास जो हम बाप्पा को अगले बरस जल्दी से जल्दी दिखाना चाहते हैं ???...
२८ सितम्बर
एक समूह में प्रश्न था कि SBI बैंक के कर्मठ कर्मचारी 2:30 PM तक अपनी सीट पर उपलब्ध नहीं हैं, इन पर किस प्रकार की कार्यवाही की संभावना हो सकती है?
प्रश्नकर्ता क्या सुबह से २. ३० बजे तक बैंक में थे या ढाई बजे पहुँचे थे ? यदि ढाई बजे पहुँचे थे तो सामान्यत: वह भोजनावकाश होता है।
गाली देना आसान होता है। जिनको शिकायत है, वे पूरा दिन तो क्या एक घण्टा काउंटर पर नहीं बैठ पायेंगे। जिन निजी बैंकों की तारीफ की जाती है , उनकी ग्राहक संख्या कितनी है ? जो ग्राहक हैं, वे किस वर्ग के होते हैं ? पढ़े-लिखे उच्च वर्ग की खातिरदारी करना और गरीबी रेखा से भी नीचे के अनपढ़ ग्राहक को सेवा देने में जमीन आसमान का अन्तर होता है।
२१ सितम्बर
आज एक मराठी रचना में फाॅर्महाउस के लिये 'शेतघर' शब्द पढ़ा। मराठी में शेत का अर्थ खेत होता है। मेरा अनुभव है कि अधिकांश हिन्दी भाषी इस तरह नये शब्द गढ़ने के बारे में सोचते तक नहीं हैं। इसके विपरीत जो शब्द हिन्दी में हैं, उनका भी उपयोग सामान्यतः नहीं करते हैं। वे द्विचक्र वाहिनी और लौहपथ गामिनी कैसे अव्यावहारिक अनुवाद हैं, इसी पर अभी तक अटके हुए हैं। मराठी में पिछले कई वर्षों से क्रिकेट की पूरी शब्दावली है और उसका उपयोग समाचार पत्रों में और आँखों देखा हाल सुनाने में भी किया जाता है।
कुछ लोगों को यह जानकर धक्का लग सकता है कि आजकल जो शब्द प्रचलित हैं उनमें से अनेक शब्दों को मराठी भाषियों ने गढ़ा है। दूसरी बार भी धक्का लग सकता है कि इन शब्दों को स्वातंत्र्य वीर वि. दा. सावरकर के साथ-साथ न. चिं. केळकर, ना. सी. फड़के जैसे विद्वजनों ने रचा है।
१५ सितम्बर
मैं जिस फेस क्रीम का इस्तेमाल करती हूँ, उस पर कुछ छूट चल रही है। किशोर वयीन नातिन ने देखा तो उसने वह लिंक हमारे पारिवारिक समूह पर नहीं बल्कि व्यक्तिगत मुझे भेजकर अवगत कराया।
ये नयी पीढ़ी है और मैं गद् गद् हूँ।
९ सितम्बर
विश्व बैंक के अनुसार भारत ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में ५० साल का काम ६ साल में किया है।
यानि अब विश्व बैंक भी भक्तों की श्रेणी में आ गया
९ सितम्बर
परम अवांछित समाचारों के लिये समाचार पत्रों में स्थान होता है, लेकिन मालिनी राजुरकर जैसी विदुषी गायिका के लिये नहीं।
विनम्र श्रद्धांजलि
७ सितम्बर
माना कि 'इंडिया' अंग्रेजों की देन नहीं है, लेकिन यह शब्द हमारा भी नहीं है। राजनीति विभक्त हो सकती है किन्तु नागरिकों ने उनके आधार पर विभक्त नहीं होना चाहिए। हम जैसे अंग्रेजी और अंग्रेजियत के प्रभाव में रहते हैं, ठीक वैसे ही राजनीतिज्ञों के आभा मंडल से घिरे रहते हैं। यही इस सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की विडम्बना है।
७ सितम्बर
इंडिया को भारत लिखने से उन पत्रकारों को कष्ट हो रहा है, जिन्होंने हिन्दी के भरोसे ही जीवन-यापन किया है, जबकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि यह असंवैधानिक नहीं है।
वे लेखक जो हिन्दी के कारण जाने जाते हैं, खिल्ली उड़ाते हुए पूछ रहे हैं कि क्या अब हिन्दी राष्ट्रभाषा बनेगी ?
हिन्दी जिनकी मातृभाषा है, उन्हें भय है कि क्या अब शुद्ध हिन्दी में बात करना होगी ?
किसी व्यक्ति से, किसी दल से, किसी सिद्धान्त से, किसी नीति से विरोध हो सकता है, लेकिन इस तरह का दोगलापन समझ से परे है।
६ सितम्बर
चन्द्रयान अभी उतरा भी नहीं है लेकिन स्त्रियों के चेहरे पर, गालों पर चुटकुले यान की गति से भी तेज चल पड़े हैं।
मानसिक रोगियों का इलाज किया जा सकता है, पर मानसिकता का क्या कर सकते हैं ?
विडम्बना यह है कि बुद्धि के कारण सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त पुरूष ही नहीं, महिलाएँ भी इसमें सम्मिलित हैं।
२३ अगस्त
मैं रोज सुबह टहलने जाती हूँ तब एक समवयस्क व्यक्ति दिखते हैं, जिनके हाथ में फूलों से भरी थैली रहती है।
आज उनके एक परिचित मिल गये और उन्होंने उनसे पूछा - दादा, इतनी सुबह फूल कहाँ मिल गये ?
" सुबह - सुबह कहाँ कोई मिलता है ?
घूमने निकलता हूँ तो लोगों के घरों से तोड़ लेता हूँ।"
"रोज ?"
"हाँ, और क्या ? मुझे इतने साल हो गये। मैंने आज तक एक भी फूल खरीदा नहीं है।"
इस बहादुरी के लिये उनका नागरिक अभिनंदन करने का मन हो रहा है।
१७ अगस्त
स्वतंत्रता दिवस की पूर्व सन्ध्या पर राष्ट्रीय पुस्तक मेले में आयोजित कवयित्री सम्मेलन की अध्यक्षता और कविता पाठ का अवसर प्राप्त हुआ।
१५ अगस्त
हमारे #अत्यन्त #लोकप्रिय #राष्ट्रीय #समाचारपत्र के अनुसार स्वतंत्रता की कीमत पर विभाजन हुआ। मेरे विचार से इसका अर्थ यह हुआ कि विभाजन आवश्यक था, स्वतंत्रता नहीं।
बाकी तो महान समाचारपत्र ही जाने।
१४ अगस्त
आज मेरे सामान्य ज्ञान का परीक्षण हुआ और उसमें मैं उत्तीर्ण भी हो गयी। यह एक परम आनन्द का क्षण था। खुशी इस बात की भी थी कि एक लम्बी अवधि के पश्चात कोई परीक्षा देने का सफल अनुभव प्राप्त हुआ।
मुझसे पूछा गया कि स्वतंत्रता मिली उस समय प्रधानमंत्री कौन थे और अभी प्रधानमंत्री कौन हैं ?
जब मैंने उत्तर दिये तो वह सही माने गये, लेकिन मुझे चेतावनी मिली कि सिर्फ नरेन्द्र मोदी नहीं बोलना है, श्री नरेन्द्र मोदी कहो!
अलग-अलग विषयों पर मुझसे और प्रश्न पूछे गए। फिर एक कहावत को पूर्ण करने के लिए कहा गया। लगभग दस पन्द्रह मिनिट यह ऑनलाइन परीक्षा चल रही थी ।
सबसे अच्छी बात यह है कि अन्त में मुझे उत्तीर्ण घोषित किया गया।
दरअसल नन्ही पोती को कल सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता में भाग लेना है और उसका प्रायोगिक परीक्षण आज मुझ पर किया गया। बहुत मजा आया।
१३ अगस्त
यह एक मराठी समाचारपत्र की खबर है, जिसके अनुसार वरिष्ठ नागरिकों को यदि कोई परिजन परेशान करता हो तो वे दिये गये क्रमांक पर संपर्क कर सकते हैं।
संवाददाता और साथ में सम्पादक की मानसिकता देखिये! शीर्षक है कि सूनबाई तुम्हाला त्रास देते का ? अर्थात क्या बहू आपको परेशान करती है ? शीर्षक में मात्र बहू लिखने की क्या आवश्यकता थी ? बेटे क्या दूध के धुले होते हैं ? अभी कुछ दिन पहले भोपाल में तो एक बेटी ने माँ-बाप के साथ बेरहमी से मारपीट की।
शीर्षक को आकर्षक बनाने के लिये इस तरह किसी एक को लक्ष्य बनाना क्या उचित है ? और लक्ष्य बनाना ही था तो बेटे को क्यों नहीं ? तलवार स्त्री की गर्दन पर ही क्यों लटकायी जाती है ?
४ अगस्त
सन २००० मध्ये इंदौरला अ. भा. मराठी साहित्य संमेलन झाले होते तेव्हा मी स्थानिक वृत्तपत्रासाठी ना. धो. महानोर यांची मुलाखत घेतली होती. मला अतोनात दडपण आले होते पण त्यांच्या बाजूने मला अगदी निगर्वी, सहज वागणूक मिळाली. मी आदल्या दिवशी सादर केलेली कविता देखील त्यांच्या लक्षात होती. ती मुलाखत खूप यशस्वी झाली.
विनम्र श्रद्धांजली 🙏
३ अगस्त
एक सत्र में लोकसभा /राज्यसभा अधिकतम कितनी बार स्थगित की जा सकती है ? संविधान में इसका भी उल्लेख किया जाना चाहिए।
३ अगस्त
स्त्री की सार्वजनिक अवमानना के विरोध में कठोर कदम उठाये जाना अत्यावश्यक है। यह सिर्फ राजनीतिक मसला नहीं है। इस पर सामाजिक अंकुश बेहद जरूरी है।
लोग कितने गर्त में जायेंगे ? सैद्धांतिक विरोध के साथ दलगत राजनीति हो सकती है, लेकिन दलदल की राजनीति कदापि स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। सम्बन्धित प्रमुखों ने भी अपराधियों पर कड़ी कार्रवाई करना चाहिए।
उज्जैन की घटना यद्यपि मणिपुर या बंगाल की तरह नहीं है, लेकिन उससे कम भी नहीं है। इसका व्यापक विरोध होना ही चाहिए।
#उज्जैन #में #काँग्रेस #नेत्री #के #विरोध #में #अश्लील #नारेबाजी #का #समाचार #है।
३ अगस्त
संयुक्त परिवार प्रणाली में घर में बहुत सारे बच्चे होते थे। जब एक बच्चे को डाँट पड़ती थी, तब वह तुरन्त किसी और के बारे में याद दिलाता था कि उसको तो नहीं डाँटा।
यह सही है कि राजनीति में किसी भी दल को अपनी गलती याद नहीं रहती, लेकिन एक संवेदनशील मुद्दे पर जिनसे प्रश्न पूछे जा रहे हैं, वे बच्चों की तरह दूसरे की ओर ऊँगली उठाये यह ठीक नहीं लगता।
लोकतंत्र की अपेक्षा राजतंत्र स्थापित कर दिया जाना चाहिए।
#मणिपुर
२७ जुलाई
या तो स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार करेंगे या फिर दलित के साथ। ये आसान लक्ष्य होते हैं। इन दिनों जिस तरह की घटनाएँ लगातार हो रही हैं, उनको देखते हुए 'दुर्व्यवहार' शब्द छोटा लगता है। 😢😢
२५ जुलाई
यदि स्वार्थ सिद्धी नहीं हो रही हो तो कठोर कदम उठाना तो दूर, पद से त्यागपत्र देने की नैतिकता भी विलुप्त हो गयी है।
२३ जुलाई
संघर्ष कहीं भी,
कभी भी, कैसे भी हो यह तय है कि शिकार स्त्री का ही किया जायेगा... 😢
#मणिपुर
२१ जुलाई
पहले ऐसा लगता था कि काम समाप्त ही नहीं होते। बच्चों का और अपना भी पालन - पोषण , नौकरी, अतिथि आगमन, चक्की-चूल्हा सब समेटते - समेटते सुबह से रात कब हो जाती, पता ही नहीं चलता था।
अब ऐसा अनुभव होता है कि बस, दो ही काम बचे हैं।
कोई चाहे तो मार्गदर्शन,
नहीं तो मौन धारण कर अवलोकन 😀😀
१२ जून
जीवन चलते - चलते बीता और वह भी धूप में। बाल सफेद हो गये। अनुभवी होने का प्रमाणपत्र मिल गया। अब एसी से निकलो और एसी में बैठो, यही दिनचर्या होती जा रही है। ऐसी सूरत में बालों ने फिर से काला होना चाहिए, पर काले रंग की छाया तक नहीं दिखती।
बालों का यह रवैया ठीक नहीं लगता।
८ जून
मन्दिर और शान्ति अब भूली - बिसरी अवधारणा हो गयी है। व्यापार और दिखावा मुख्य हो गया है।
१ जून
कल 'सूत्रधार' ने कविता कोना के उपक्रम में देशभक्ति पर साहित्य रचनेवाले कवि स्व. श्रीकृष्ण सरल की कविता के पोस्टर अनावरण एवं तत्पश्चात काव्य पाठ हेतु मुझे आमंत्रित किया।
श्रीकृष्ण सरल ने क्रांतिकारियों के व्यक्तित्त्व और कृतित्त्व पर रचनाएँ लिखीं और स्वयं के खर्चे से १२५ पुस्तकों का प्रकाशन किया। वे स्वयं को 'शहीदों का चारण' कहते थे।
इस महत्त्वपूर्ण आयोजन में मुझे सम्मिलित करने हेतु मैं सूत्रधार के संचालक आदरणीय Satya Narayan Vyas जी की हृदय से आभारी हूँ।
२१ मई
बेटी #स्वरांगी #साने की यूट्यूब वाहिनी पर माँ अर्थात स्वयं मेरे साक्षात्कार का प्रसारण।
मातृ दिवस पर इससे अच्छा उपहार कौन-सा होगा ?
इसी संदर्भ में बताना चाहूँगी कि स्वरांगी अपनी वाहिनी के माध्यम से हिन्दी साहित्य और उसकी विरासत को युवा वर्ग तक पहुँचाने में जुटी हुई है। वह मानती है कि युवाओं को साहित्य से परिचित करवाने के लिए माध्यमों का स्वरूप और तरीका भी बदला जाना आवश्यक है।
१३ मई
कोई समाचारपत्र यदि उसकी स्थापना का उत्सव मना रहा है तो क्या राज्य शासन उसे प्रायोजित कर सकता है ? ऐसा प्रावधान है ?
दैनिक भास्कर इंदौर संस्करण के ४० वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में कुछ आयोजन हो रहे हैं। प्रायोजकों में एक नाम म. प्र. शासन का भी है। दैनिक भास्कर ने ऐसा क्या अभूतपूर्व कार्य किया है जिसके लिए राज्य शासन अभिभूत होकर सहायता कर रहा है ? यह कोई जनोपयोगी कार्य नहीं है, बल्कि इस अखबार ने भाषा के सत्यानाश का काम बढ़-चढ़कर किया है। राजकोष कोई वैयक्तिक सम्पत्ति नहीं है कि उसका इस तरह मनमाना उपयोग किया जाय।
१ मई
चुनाव आयोग के अन्तर्गत एक भाषा विभाग गठित किया जाना चाहिए और प्रत्येक दल के प्रत्येक प्रत्याशी के पास वहाँ प्रशिक्षण प्राप्त कर "मूलभूत सुसंस्कृत भाषा ज्ञान का प्रमाणपत्र" अनिवार्य रूप से होना चाहिए।
यह प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए भ्रष्टाचार की सौ प्रतिशत सम्भावना है, अतः विजयी प्रत्याशी यदि बाद में असंस्कृत भाषा का प्रयोग करता है तो चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। साथ ही इस कृत्य के लिए आयोग के जिम्मेदार अधिकारी को दण्डित किया जाना चाहिए।
मुझे पूरा विश्वास है कि इसे सहज रूप से मान्यता मिल जायेगी, पर एक छोटा-सा प्रश्न बचता है कि यह सब करेगा कौन ? 😁
२९ अप्रैल
सौ वर्षों से अधिक पुरानी, किन्तु अभी भी अत्यधिक सक्रिय इंदौर की #महाराष्ट्र #साहित्य #सभा के वार्षिक आयोजन "शारदोत्सव" के अन्तर्गत कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ। यह कवि सम्मेलन साधारण नहीं था। एक अनुपम और असाधारण परिकल्पना के साथ इसे आयोजित किया गया था। इसी कारण मैं इसे हिन्दी में लिख रही हूँ, ताकि अन्य भाषा-भाषी भी इससे अवगत हो सकें।
"कवितेतून कविता" (कविता में से कविता) इस शीर्षक से हुए इस कवि सम्मेलन की संकल्पना महाराष्ट्र साहित्य सभा के पदाधिकारी एवं जाने-माने कवि #मदन #बोबडे की थी, जिसे म. सा. सभा के अध्यक्ष #अश्विन #खरे, सचिव #प्रफुल्ल #कस्तुरे, लेखिका #वसुधा #गाडगीळ और अनेक सहयोगियों ने मिलकर साकार किया। इस संकल्पना के अनुसार आमंत्रित ११ कवियों को पिछली पीढ़ी के मराठी कवियों में से किसी एक को चुनकर , उस कवि/कवयित्री के बारे में बताना था, साथ ही उनकी एक कविता भी सुनाना थी। तत्पश्चात उसी विषय को लेकर स्वरचित कविता सुनाना थी। एक उदाहरण से स्पष्ट करुँगी। मैंने आदरणीय इंदिरा संत को कवयित्री के रूप में चुना था। मैंने उनका परिचय, उनकी काव्य यात्रा आदि के बारे में बताया , फिर उनकी ''बारिश'' पर लिखी एक कविता सुनाई। मैंने चूँकि इंदिरा जी की बारिश कविता सुनाई थी, अत: मुझे बारिश पर ही स्वरचित कविता सुनाना थी।
कवयित्री इंदिरा संत के बारे में जानकारी तथा उनकी कविता प्रस्तुत करने से लेकर अपनी कविता प्रस्तुत करने तक, यह एक अद्भुत,रोमांचकारी अनुभव रहा, जिसे विस्तृत रूप से साझा करने से मैं अपने आप को रोक नहीं पा रही हूँ।
२८ अप्रैल
अप्रैल में ऐसी तपती धूप कि सुबह सात-आठ बजे भी बाहर निकलने का मन न हो, उसी अप्रैल में ठण्डी हवा के साथ तेज बारिश से तो यही लगता है कि
भगवान दादा को स्मृतिभ्रम हो गया है।
२७ अप्रैल
किसी कवि सम्मेलन में आप आमंत्रित कवयित्री हैं और वहाँ कविता को तो शानदार दाद मिले, लेकिन साड़ी के बारे में कोई कुछ न कहे, तो थोड़ा अधूरापन, खालीपन लगता है।
२४ अप्रैल
जवळ जवळ वीस वर्षांनी भेट झाली पण कवीवर्य अशोक नायगावकर सरांनी मला ओळखलं. नाव सांगावं लागलं नाही. ह्याहून मोठं पारितोषिक ते काय असणार ?
११ अप्रैल
बहुत सारे लोग सुबह घूमने नहीं जाते। बहुत सारे लोग सुबह चाय नहीं पीते। बहुत सारे लोग सुबह समाचार पत्र नहीं पढ़ते। यहाँ तक कि बहुत सारे लोग सुबह दातून तक नहीं करते।
ऐसे सारे लोग सुबह आखिर क्या करते हैं ? यह प्रश्न एक लम्बे समय से परेशान कर रहा है।
१० अप्रैल
इस सप्ताह किसी न किसी के मुँह से वर्ष समाप्ति यह शब्द (हमारी राष्ट्रीय बोली में Year Ending) सुनने में आ रहा है, जो नौकरी के दिनों का स्मरण कराता है।
वर्ष समाप्ति के समय बैंक से लौटने में अक्सर देर हो जाती थी और इन्हीं दिनों हम मराठी भाषियों का महत्त्वपूर्ण त्योहार गुढीपाडवा, फिर रामनवमी आते थे। इसी बीच बच्चों की परीक्षाएँ भी रहतीं थीं। उस समय मेहमान भी सचमुच 'अतिथि' हुआ करते थे। गृह सहायिका गणगौर अवकाश पर रहती थी। गर्मी भी पड़ने लगती थी।
यह उन दिनों की बात है, जब बैंकों का संगणक युग प्रारम्भ नहीं हुआ था।
यह उन दिनों की बात है, जब त्योहार इवेंट नहीं होते थे।
यह उन दिनों की बात है, जब बच्चे टीवी, मोबाईल में नहीं सिर्फ पढ़ाई में जुटे रहते थे।
यह उन दिनों की बात है, जब मेहमान काम में हाथ बँटाते थे और घर में बना रोज का सादा भोजन करते थे।
यह उन दिनों की बात है, जब गृह सहायिका भी एक पारिवारिक सदस्य जैसी होती थी।
और यह उन दिनों की बात है, जब मार्च - अप्रैल में आसमान में बादल नहीं, सूरज पूरे ओज के साथ बना रहता था...!!!
३० मार्च
तुमच्याकडे जे असेल ते पाठवा . दर्ज्याची काळजी नसावी. लवकर पाठवा म्हणजे झालं . 😀😃
एक विनोदी सूचना मिळाली आहे. विशेषांकाचे नाव मुद्दाम गाळले आहे कारण मुख्य हेतू आनंद घेणे आहे, उगाच वाद विवाद नको.
महिला विश्व २०२३ (एप्रिल,में) या विशेषांकासाठी साहित्य मागविण्यात येत आहे.
त्यानुषंगाने साहित्य पाठविताना खालील बाबी आवश्यक विचारात घ्याव्यात.
१. कविता प्रकाशित झाल्यास किमान १ (एक) अंक विकत घ्यावा लागेल. लेख प्रकाशित झाल्यास किमान २ (दोन) अंक विकत घ्यावे लागतील.
२. साहित्य पाठविताना पुर्ण पत्ता, मो. नं. , मेल आयडी, पासपोर्ट फोटो आवश्य देणे. प्रथम आलेल्या चाळीस (४०) कवितांना प्राधान्य व पाच/सहा (५/६) लेख, परिक्षण, रसग्रहण, व्यक्ती परिचय, मुलाखत पाच/सहा (५/६) कथा, ललित इ. साहित्याला प्राधान्य.
३. अंकाच्या मुखपृष्ठावर महिलांच्या फोटो मागविण्यात येत आहे. निवडक फोटोला अंकाचे मुखपृष्ठ म्हणून वापरण्यात येईल. त्यासाठी निवडीचे अधिकार संपादक मंडळाकडे राखीव असतील. निवड झालेल्या व्यक्तीस पाच अंक विकत घ्यावे लागतील.
४. आपल्या कार्याचा प्रचार आणि प्रसार आमच्या अंकात जाहीरात देऊन करू शकता.
अजूनही अनेक अटी आहेत पण ह्या मजेशीर आहेत.
कविता/लेखन/फोटो तर द्याच आणि प्रकाशित झाले तर अंक पण विकत घ्या. अंकांची संख्या देखील निरनिराळी आहे. शिवाय दर्ज्याशी काही घेणे देणे नाही. पहले आओ, पहले पाओ।
२३ मार्च
मुझे अपना देश,अपना प्रदेश,अपना शहर बहुत अच्छा लगता है। जैसे-जैसे आयु बढ़ रही है पुनर्जन्म का विचार भी मन में आता है, तो मेरा विचार पक्का होता जा रहा है कि न सिर्फ इसी देश - प्रदेश में बल्कि इसी शहर में जन्म लूँगी। जब तक मेरा पुनर्जन्म होगा, तब तक लड़कियों की साक्षरता दर निश्चित रूप से और बढ़ चुकी होगी। अतः मैं पढ़ूँगी और विद्युत अभियांत्रिकी (बोली भाषा में इसे Electrical Engineer कहते हैं) में पदवी प्राप्त कर शोध भी करूँगी।
शोध का विषय होगा - - प्रति दिन सुबह - सुबह विद्युत आपूर्ति बन्द होने के कारण तथा यह परम्परा अविरत शुरू रखने की आधुनिकतम विधि।
१७ मार्च
सामाजिक पटल पर आने के बाद कुछ मराठी भाषियों के सौजन्य से मुझे व्यापक रूप से "ताई" (बड़ी बहन) सम्बोधन मिला। इंदौर और आसपास मराठी संस्कृति का बोलबाला रहा है, अतः यहाँ के अन्य भाषा-भाषी भी उसे समझते हैं। वे सब भी मुझे ताई कहने लगे।
यहाँ तक तो ठीक था, लेकिन लगभग मेरी पीढ़ी के किन्तु दूरस्थ वासी इस एकारान्त सम्बोधन को जब उनकी संस्कृति के अनुसार "ताई जी" (पिता की बड़ी भाभी) बना देते हैं तो मुझे यकायक वृद्ध से वयोवृद्ध हो जाने की अनुभूति होने लगती है।
१३ मार्च
फल - सब्जी परम्परागत रूप से नल के नीचे बहते पानी में या किसी बर्त्तन में पानी लेकर अच्छी तरह धोते आये हैं, लेकिन जल्द ही यह पिछड़ेपन की निशानी होगा। अमेजाॅन पर ढाई हजार रुपये से अधिक कीमत का एक उपकरण मात्र फल-सब्जियों की सफाई के लिये उपलब्ध है।
बाजार पता नहीं कहाँ - कहाँ घुसा चला आयेगा !
१२ मार्च
एक दिवस नहीं, पूरा जीवन चाहिए।
८ मार्च
पहले हम मिल - जुलकर त्योहार मनाते थे अब Festival organize होते हैं, ताकि मिलना-जुलना हो सके।
६ मार्च
अ. भा. बृहन्महाराष्ट्र मंडळाचे ७१ वे वार्षिक अधिवेशन नुकतेच इंदौरला पार पडले. त्या निमित्त आमंत्रित कवयित्री म्हणून सन्मान झाला आणि कविता सादर करण्याची संधी मिळाली.
६ मार्च
ये जो पुस्तक मेले में रोज रोज हमारे फेसबुक सखा/सखियों की पुस्तकों का विमोचन हो रहा है और हमारे जैसे जिनकी न पुस्तक प्रकाशित हुई, न विमोचित हुई और न ही हमें किसी ने बुलाया, निरपेक्ष भाव से सबके छायाचित्रों को लाईक कर रहे हैं, बधाइयाँ और शुभकामनाएँ दे रहे हैं, उन्हें पूरी पुस्तक न सही, पर कम से कम मुखपृष्ठ तो घर बैठे मिलना चाहिए।
क्या राय है मितरो ?
३ मार्च
सुबह - सुबह बिजली जाना आम हो गया है। किसी दिन नहीं जाती है तो मैं अपने मोबाईल में लोकेशन जाँचती हूँ कि कहीं शहर से बाहर तो नहीं हूँ।
२ फरवरी
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