२०२२



कौबक (कौन बनेगा करोड़पति) में आनेवाली अधिकांश युवतियाँ, महिलाएँ इतनी बकबक क्यों करती हैं यह समझ में नहीं आता, यद्यपि पुरूष सहभागी भी ऐसा करते हैं, लेकिन उनकी संख्या अपेक्षाकृत काफी कम होती है। इसीलिए शायद इसे अंग्रेजी के केबीसी से सम्बोधित किया जाता है। कौ ब क कहा तो पता नहीं कितनी बकवास होगी। ३० नवम्बर कौन बनेगा करोड़पति में एक प्रतिभागी महिला ने अमिताभ बच्चन द्वारा पूछे गये व्यक्तिगत प्रश्न के उत्तर में कहा - - वैसे तो हमारा संयुक्त परिवार (वह तो अंग्रेजी में बोली थी joint family) है, लेकिन मैं, मेरे पति और बेटी अलग फ्लैट में रहते हैं। मुझे इसका अर्थ समझ में नहीं आया। २१ नवम्बर

आज किसी ने जिज्ञासा व्यक्त की कि बैंकों में भोजनावकाश रिजर्व बैंक के नियमों के अन्तर्गत आता है क्या ? मैंने प्रतिप्रश्न किया कि बाकी सारी जगहों पर भूखे-प्यासे रहकर काम किया जाता है क्या ? वे बुरा-सा मुँह बनाकर बड़बड़ाये कि मैंने गलत व्यक्ति से पूछ लिया। निशाना साधने के लिये बैंक कर्मी ही दिखायी देते हैं क्या ? ८ नवम्बर उच्च वर्गीय, उच्च मध्यम वर्गीय जब भी कहीं जाते हैं तो सही ठिकाना नहीं बताते। वे यूएस, यूके, कनाड़ा, कॅलिफोर्निया, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जर्मनी, फ्रांस आदि जाते हैं। ऐसे ही निम्न वर्गीय, निम्न मध्यम वर्गीय भी होते हैं। वे हमेशा "गाँव" जाते हैं। ईमानदारी तो सिर्फ मध्यम वर्ग में होती है। बेधड़क शहरों के नाम बताते हैं। वे इंदौर जाते हैं, भोपाल जाते हैं, ग्वालियर, जबलपुर, देवास, उज्जैन, पुणे, मुंबई, दिल्ली, लखनऊ, पटना, बनारस, चंडीगढ़, अमृतसर, चेन्नई, हैदराबाद, गोहाटी, अगरतला, रांची, कलकत्ता जाते हैं। वे गाँवों को भी सिर्फ गाँव नहीं कहते। देपालपुर, भीकनगाँव, बड़वानी, नेपानगर कहते हैं। वे बामौर, दतिया, डबरा जाते हैं। गंजबासौदा, चाचौड़ा, सेंधवा कहने में उन्हें कोई झिझक नहीं होती। यहाँ तक कि वे "फाॅरेन" भी नहीं जाते। वे न्यूयार्क जाते हैं, लन्दन जाते हैं। बोस्टन जाते हैं, शिकागो जाते हैं। वे मेनचेस्टर, लंकाशायर, सिडनी, पेरिस जाते हैं। मध्यम वर्गीय सचमुच बहुत यानि बहुत ही ईमानदार होते हैं। ४ नवम्बर अधिकतर सामान्य लोग सोचते हैं कि उन्हें कष्ट कम हो, भले किसी और को उसी कारण ज्यादा हो तो चलेगा। घरेलू सहायिका के विषय को छोड़कर मैं भी ऐसी ही एक सामान्य महिला हूँ। मेरी सहायिका जब भी यह कहती है कि जरूरी काम है, दो-तीन दिन नहीं आऊँगी तब मैं मान लेती हूँ कि तीन के पहले का दो निरर्थक है। वह निश्चित रूप से तीन दिन नहीं आयेगी। हो सकता है कि चौथे दिन भी नहीं आये। इसलिए मैं उसके लिये चौथे दिन का काम भी कम से कम रखती हूँ। मैं यह सोचती हूँ कि आने पर चाहे उसे काम कम करना पड़े और उसके आने से पहले मेरे ऊपर ज्यादा भार हो, चलेगा किन्तु वह नहीं आयी तो...!!! ३ नवम्बर यह इक्कीसवीं शताब्दी का भारत है। शिव प्रतिष्ठान के संस्थापक संभाजी भिड़े से मुंबई में एक महिला पत्रकार ने कोई प्रश्न पूछा तो उन्होनें उत्तर दिया कि पहले बिन्दी लगाओ फिर मैं बात करूँगा। समाचारों के अनुसार संभाजी भिड़े मंत्रालय में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उप मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस से सद्भावना भेट के लिये गये थे। उनकी इस बैठक की जानकारी लेने के लिये एक महिला पत्रकार ने कोई प्रश्न पूछा तो उन्होनें उपर्युक्त जवाब दिया। वे बोलें कि इस देश की प्रत्येक स्त्री भारतमाता के स्वरूप होती है। भारतमाता विधवा नहीं है, इसलिये तुम पहले बिन्दी लगाओ बाद में मैं बात करूँगा। महिलाओं ने क्या करना चाहिए और क्या नहीं यह दूसरे लोग ही तय करेंगे। महिलाओं की बिन्दी का वैधव्य से क्या सम्बन्ध है ? बिन्दी तो छोटी लड़की तक लगाती है और किसने लगानी चाहिए और किसने नहीं यह वह स्वयं सोचेगी , यह उसका नितान्त निजी मामला है। महिलाओं की निजता पर लगातार आक्रमण होता रहता है। अभी पुणे के जिला न्यायालय द्वारा एक फतवा जारी कर 'सिर्फ' महिला वकीलों के बाल ठीक करने पर आपत्ति जताई गयी। तथाकथित महिला संगठन ऐसे अधिकांश अवसरों पर चुप्पी साध लेते हैं। ३ नवम्बर आज मैं जीवित हूँ या नहीं ? कह नहीं सकती। बैंक होकर आऊँगी, तभी पक्का बता पाऊँगी। नवम्बर के महीने में वहाँ से जीवित होने का ठप्पा लगना बहुत आवश्यक होता है। १ नवम्बर
किसी भी आपराधिक घटना के बाद अपराधी के साथ-साथ उन प्रत्यक्षदर्शियों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए जो अपराध को रोकने की अपेक्षा उस दौरान वीडियो बनाने में जुट जाते हैं। कानून जब बने तब मोबाईल नामक (कु) यंत्र अस्तित्व में नहीं था, अतः अब संशोधन किया जाना आवश्यक है। ३० अक्टूबर उनके नाना करीब ९० साल पहले देश छोड़कर चले गये थे और तत्कालीन भारत के जिस गाँव के थे वह भी अब पाकिस्तान में है, किन्तु हमारे संचार माध्यम, समाचार माध्यम, सामाजिक माध्यम "वसुधैव कुटुम्बकम" पर अटूट विश्वास जताते हुये न केवल भारतवंशी, बल्कि भारतीय कहकर आनन्द सागर में डुबकी लगा रहे हैं। यदि देशप्रेम इतना ही हिलोरें ले रहा है तो भारत का दामाद कहें, भारतवंशी तो वे कतई नहीं हैं । इस तरह के प्रचार से यह हो सकता है कि इस वर्ष "भारतवंशी " उपराष्ट्रपति के लिये अमेरिका के राष्ट्रपति भवन में दीपावली मनायी गयी वैसे ही शायद बर्मिंघम महल में अगले वर्ष दीपोत्सव का आयोजन किया जाय। (सन्दर्भ : ऋषि सुनक) २६ अक्टूबर जब घर में इधर - उधर खाली थैलियाँ दिखें और अखबार के पन्ने कम हो जाय तब समझ जाना चाहिए कि त्योहार समाप्ति की ओर है। २५ अक्टूबर कहते हैं कि बचपन और बुढ़ापा एक समान होता है। मेरे बचपन में जोर-शोर से यह चर्चा चलती थी कि पं. नेहरू के बाद कौन ? काँग्रेसियों की गाँधी परिवार के प्रति निष्ठा देखकर इन दिनों मुझे यह चिन्ता होने लगी है कि राहुल गाँधी के बाद कौन ? १८ अक्टूबर

बदरंग कटी-फटी जीन्स - - वाह वा, वाह वा! बदरंग कटी-फटी सलवार (पजामा) - - छीः, छीः! अक्टूबर
हम वरिष्ठ जनों को बहुत सारी जगह उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। हमारे दृष्टिकोण से कहीं कोई सुविधा नहीं होती। हमारा उल्लेख नहीं होता। ये सब बहुत सामान्य है, हम भी बहुत कुछ चीजों से स्वयं ही अलग-थलग हो जाते हैं, असुविधा के आदि हो जाते हैं, लेकिन दैनिक/साप्ताहिक राशिफल में भी हमारा ध्यान नहीं रखा जाता, इसका दुख होता है। बाकी कुछ हो न हो भविष्य तो हमारा भी होता ही है। दाम्पत्य में प्रेम बढ़ेगा, नौकरी में अनुकूल वातावरण रहेगा, आय में बढ़ोतरी होगी, पीली वस्तु का दान कीजिए जैसी बातें हमारे किसी काम की नहीं होती । हमारे लिये तो यह होना चाहिये कि इस सप्ताह पेट की तकलीफ़ कम हो जायेगी । आप हल्का अनुभव करेंगे। घुटनों का दर्द बढ़ सकता है। बारिश चल रही है। तले हुये भोजन से मोह नहीं पालें। फल, सब्जी का अधिक सेवन करें। रात को हल्का खायें। हो सके तो हल्दी या घी डालकर गर्म दूध पियें। इस हफ्ते से सुबह घूमने जाने की फिर से शुरूआत करें। प्राणायाम योगासन करते रहें। किसी दिन दोपहर की नींद के बाद कपड़ों की अलमारी साफ कर पुराने कपड़े दान करें। नये कपड़ों का लाभ होगा। अपने बच्चों के खाते में थोड़ी - बहुत राशि अंतरित करने की आदत बनाये रखें । सुख-शान्ति मिलेगी। फेसबुक, ट्विटर, इंन्स्टाग्राम जैसे हरेक माध्यम पर घुसपैठ न करें। एकाध काफी है। अध्ययन, पठन-पाठन में मन लगायें। मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। ९ अक्टूबर कल एक बहुत ही दुखद घटना हुई। रोज की तरह शाम को पोती अपनी माँ के साथ टहलने गयी थी। लौटते में मचल - मचलकर सुन्दर गुब्बारा खरीदा। गर्मी बहुत थी। गुब्बारे को भी गर्मी बर्दाश्त नहीं हुई और वह नन्ही के हाथ से छूटकर सीधा पँखे पर जा बैठा। बैठते ही उसके प्राण पखेरू उड़ गये । दुख इतना घना था कि कुछ भी नहीं सूझ रहा था। न खाने का मन हो रहा था और न ही रोज की तरह टीवी देखा जा रहा था। नींद भी कोसो दूर थी। आखिर माँ ने ही स्थिति सम्भाली और दोबारा वैसा ही गुब्बारा दिलाने के वादे के बाद दुख के बादल छँटे। जब मन-मस्तिष्क कुछ शान्त हुआ तो नयी चिन्ता ने घेर लिया। ये गर्मी कब तक रहेगी ? गुब्बारा फिर से पँखे पर जाकर तो नहीं बैठेगा ? ४ अक्टूबर


उत्सवों के सामाजिक स्वरूप में होनेवाले शोरगुल से उसका वैयक्तिक आनन्द नष्ट हो जाता है। ३ अक्टूबर हमारे देश में अधिकांश विभूतियों को दलगत, जातिगत, धर्मगत सीमाओं में बाँध दिया गया है। ऐसी पृष्ठभूमि में इस तरह के समाचार आश्वस्त करते हैं। आगामी १२ दिसम्बर को वियतनाम की राजधानी में स्थित हो ची मिन्ह विश्वविद्यालय के परिसर में #डॉ. #बाबासाहेब #आंबेडकर की १५ फुट ऊँची प्रतिमा स्थापित की जायेगी, जिसे "सिम्बाॅल आॅफ नाॅलेज" नाम दिया गया है। इस प्रतिमा को स्थापित करने का उद्देश्य यह है कि ज्ञान प्राप्ति की दिशा में नयी पीढ़ी को उनसे प्रेरणा मिले। ३ अक्टूबर

राहुल गांधी का सहज, सरल व्यवहार एवं लोगों में घुलमिल जाने का तरीका देखकर लगता है कि उन्हें राजनीति की बजाय किसी सामाजिक उद्देश्य से जुड़ जाना चाहिए। वे वहाँ अधिक सफल हो सकते हैं।
# टिप्पणियों में सभ्य भाषा अपेक्षित है।
# जिन्हें हिन्दी नहीं आती, वे अपनी  विद्वत्ता कृपया अपने तक ही रखें।
२०  सितंबर 

माझ्या नातीला हळूहळू अक्षर ओळख होत आहे. ती वाचताना चुकते. एखादे अक्षर सोडून पुढचं वाचायला लागते.ती अजून बरीच लहान आहे. शिकेल.
असेच आपल्या देशाचा एक मोठा  मुलगा मोरोपंतांचे काव्य वाचत होता. त्याला ह्या ओळी खूप आवडल्या.
केल्याने देशाटन पंडित मैत्री सभेत संचार।
शास्त्रग्रंथविलोकत, मनुजा चातुर्य येतसे फार।।'
परंतु तोही माझ्या नातीसारखा  काही शब्द सोडून वाचायला लागला. पंडित मैत्री आणि शास्त्रग्रंथ वगैरे विसरला. फक्त देशाटन व सभेत संचार लक्षात राहिले.  मनुजा चातुर्य येतसे फार हा भ्रम मात्र टिकून राहिला.
१८ सेप्टेंबर 

चीतों की घर वापसी का उद्देश्य मेरी अल्प बुद्धि को समझ में नहीं आया।
१८ सितंबर 

हिन्दी को याद करने की आवश्यकता कभी अनुभव नहीं हुई। वह २४×७×३६५ मन-मस्तिष्क में रहती है।
उसका दिवस मनाने की औपचारिकताओं से सम्बन्धित कुछ हास्यास्पद घटनायें जरूर सितम्बर शुरू होते ही स्मरण आने लगती हैं।
१३ सितंबर 

ट्रैफिक नियमों में परिवर्तन और सख्ती, वाहन की जाँच के नवीनतम तरीके आदि ढूँढे जा रहे हैं। कोई साधारण वाहन चालक होता तो कार्रवाई शुरू कर अस्पताल में भी पुलिस होती। हमारे लोकतंत्र के अपने नियम हैं। (सन्दर्भ सायरस मिस्त्री दुर्घटना ) ७ सितंबर बचपन से लेकर अभी तक काश्मीर से कन्याकुमारी सुनते आ रहे थे। कन्याकुमारी से काश्मीर पहली बार सुना। (सन्दर्भ -- राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा) ७ सितंबर

श्री गणेशोत्सव के आमंत्रण पत्र में सम्पूर्ण कार्यक्रम अंग्रेजी में देखकर मन हुआ कि पूँछू - - आरती भी अंग्रेजी में होगी क्या ? विवाह समारोह के निमंत्रण पत्र में,सिर्फ स्वागत समारोह की बात छोड़ दें, किन्तु सारी पारम्परिक विधियाँ देखकर भी यही पूछने का मन होता है कि सप्तपदी के मंत्र अनूदित कर लिये हैं क्या ? ३ सितम्बर आय एन एस विक्रान्त..... बहुत गर्व अनुभव हो रहा है। आज इस अवसर पर नौसेना ध्वज पर छत्रपति शिवाजी महाराज की राजमुद्रा को अंकित किया गया है। अभी तक ध्वज पर यूनियन जैक का एक चिह्न चला आ रहा था। २ सितम्बर लगभग दो वर्ष पहले टीवी देखना छोड़ दिया, लेकिन कोई आदत या यों कहें लत आसानी से छूटती नहीं है। टीवी तो अभी भी नहीं देखती, लेकिन एक बीच का रास्ता मिल गया। मोबाईल पर दो मराठी धारावाहिक और हिन्दी, मराठी दोनों भाषाओं में कौन बनेगा करोड़पति डाऊनलोड करके देखती हूँ। अब हर सुबह टहलना, ब्रश, चाय, अखबार के साथ एक काम और बढ़ गया है। कभी-कभी यह याद नहीं आता कि डाऊनलोड किया या नहीं ? फिर वह भी देखना पड़ता है। यदि नहीं किया हो तो दोपहर बाद क्या करूँगी ? यह चिन्ता अलग से सताती है। हे ईश्वर! कुल मिलाकर चैन कहीं भी नहीं है। २५ अगस्त मित्रता सूची में पर्याप्त संख्या हैं, पाँच हजार के करीब। इन ग्यारह वर्षों में यह संख्या कब से पार हो जाती, लेकिन मैं समय-समय पर बिदाई करती रहती हूँ और अनुरोध स्वीकृति भी तौल - मापकर करती हूँ। फिर भी People you may know में कुछ परिचित नाम देखकर हमेशा विस्मय होता है - - अरे! ये अभी तक कहाँ थे ? २२ अगस्त प्रजातांत्रिक राष्ट्र के निवासी होने के नाते सन २००४ में, उद्योगपति एवं पूर्व सांसद नवीन जिंदल के प्रयासों से प्रत्येक नागरिक को झण्डा फहराने का अधिकार मिला हुआ है, जिसे इस वर्ष अधिक व्यापक स्वरूप दिया गया । इसी तरह चुने हुए प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार भी मिलना चाहिए। पंजाब में अब विधायकों को जन सामान्य की तरह एक ही निवृत्ति वेतन (पेंशन) दिये जाने का निर्णय हुआ है। अभी तक उन्हें प्रत्येक कार्य काल का अलग - अलग निवृत्ति वेतन मिलता था। यह सभी राज्यों में लागू किया जाना चाहिए। ऐसे निर्णयों से ही हमारा राष्ट्र सही अर्थों में लोकतांत्रिक राष्ट्र बन सकेगा। १५ अगस्त
 
संजीव कपूर ने उनकी वंडर शेफ कम्पनी के माध्यम से, आटा गूँधकर रोटी बनाने की मशीन उतारी है। इस मशीन की कीमत "मात्र" एक लाख दो हजार रुपये है। यदि ५ हजार रुपये अग्रिम देकर इस मशीन को अभी अपने लिये सुरक्षित कर लेते हैं, तब भी वह करीब ८० हजार की है। इतनी राशि में तो एक सामान्य परिवार में कम से कम ४-५ वर्षों के लिये किसी को आजीविका मिल सकती है । ११ अगस्त नोकरीतून निवृत्त झाल्या झाल्या आठवण आली की वडील दुपारी वामकुक्षी घेत असत. मी लगेच त्याचे पालन सुरू केले. पण ते रात्री जेवण झाल्यावर शतपावली देखील करत असत ह्याचा त्या वेळी सोयिस्करपणे विसर पडला. इतक्या वर्षांनी आज आत्ता आठवलं. विचार केला की बराच उशीर झाला आहे. उद्या पासून नक्की. बघू या कसं काय जमतं. ८ अगस्त

पचहत्तर वर्ष बाद भी राष्ट्रमंडल में बने रहने का क्या अर्थ है और क्या औचित्य है ? ५ अगस्त मेरी बेटी जब छोटी थी, साभिनय एक बाल गीत गाती थी। इस गीत के माध्यम से श्यामा नामक एक लड़की की दिनचर्या सामने आती थी। वह बाल गीत ऐसा था - - - श्यामा जब छोटी थी उसकी आदत ऐसी थी श्यामा जब बड़ी हुई उसकी आदत ऐसी थी
अब मेरी पोती भी उसी ठसक के साथ यही गीत गाती है। फर्क सिर्फ इतना है कि अंग्रेजियत के चलते श्यामा का अब धर्म परिवर्तन हो गया है - - -
मिस मैरी जब छोटी थी उसकी आदत ऐसी थी.....
#यह #मात्र #सामाजिक #परिवर्तन #को #इंगित #करने #की #दृष्टि #से #लिखा #है। इसे कृपया धार्मिक या राजनीतिक स्वरूप देने की चेष्टा नहीं करें। ३ अगस्त

सुबह टहलते समय कभी-कभी, चप्पल अथवा जूते पहने किसी भाई या बहना की घिसट घिसटकर, फटर फटर चलने की आवाज दूर से आती है, तो मन होता है कि उसे पुकारकर कहूँ-- दौड़कर आओ और मुझसे आगे निकल जाओ ! १८ जुलाई

हमारे लगभग सभी समाचार माध्यम (प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों) उनके समाचारों में किसी भारतीय को जगह दे या न दे, भारतवंशी को जरूर प्रमुखता से स्थान देते हैं। १५ जुलाई कुछ बातें अवचेतन में इतनी गहरी पैठ बनाये रहती हैं, जिसका हमें पता तो नहीं ही रहता, हम उनके बारे में कभी सोचते तक नहीं हैं। कल पोती के साथ लूडो खेलने बैठी। उसने पासा चला और उस पर छ: अंक आते ही मुँह से बरबस निकल गया - बेटा, छ: आया है एक बार और खेलो ! लूडो या इस तरह के खेल खेले या देखे को कम से कम पैंतीस-चालीस साल बीत चुके हैं। बच्चे छोटे थे, तब कभी उन्हें खेलते देखा होगा। ज्यादातर तो वे परिवार के, रिश्ते के हम उम्र भाई-बहनों या अपने दादा-दादी के साथ ही खेलते थे। नौकरी, मेहमानों की आवाजाही, संयुक्त परिवार आदि के उस जमाने में बच्चों के साथ खेलने की नौबत कम ही आती थी, पर पासे के आँकड़े जेहन में बस गये। १२ जुलाई

हमारे यहाँ बारिश पहले विद्युत विभाग से सम्पर्क कर पूछती है कि बिजली बन्द करने के लिए तैयार हो ना ? ऐसा नहीं होना चाहिये कि मैं आऊँ और मेरी कोई पूछपरख ही न हो। एक-दो बून्दें गिरी कि अँधेरा होना चाहिए। घरों में, कार्यालयों में, कारखानों में, रास्तों पर सभी जगह और ये पूरी वर्षा ऋतु में याद रखना है। लोगों को पता होना चाहिए कि दो में से एक ही कोई मिलेगी। जनता की आदत बिगाड़ना नहीं है । ११ जून जब अपने बच्चों को कोई पुरस्कार या सम्मान मिलता है, तो उसकी खुशी अलग ही होती है।स्वयं को मिले सम्मान से ज्यादा गर्व अनुभव होता है। बेटी #स्वरांगी #साने को अंतरराष्ट्रीय स्तर की पत्रिका के #सम्पादक #मण्डल में सम्मिलित किये जाने के बाद प्रखरता से यही अनुभूति हुई। ११ जून कुछ थोड़ी पुरानी-सी बात है। एक सुबह आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी #संतोष #अग्निहोत्री का फोन आया । वे बोले - "अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में एक कार्यक्रम करना है और मैं चाहता हूँ कि आप उसके लिये एक आलेख लिखें।'' कार्यक्रम की रूपरेखा इतनी सुन्दर थी कि मेरे पास स्वीकार करने के अलावा कुछ बचा ही नहीं। उन्होंने विस्तार से बताया कि यह कार्यक्रम उन महिलाओं पर केन्द्रित होगा, जो परम्परागत रूप से पुरूषोचित कहलाने वाले वाद्ययंत्रों को साधिकार बजाती हैं। इस जानकारी को कुछ साहित्यिक स्वरूप देकर मुझे लिखना था। शास्त्रीय संगीत की इन वादिकाओं में पखावज वादिका #चित्रांगना #रेसवाल, तबला वादिका #संगीता #अग्निहोत्री, संतूर वादिका #वर्षा #अग्रवाल और बांसुरी वादक #स्मिता #रेड्डी जैसे सिद्धहस्त नाम थे। प्रस्ताव इतना मनमोहक था कि मैंने उसे स्वीकार कर लिया और वह आकाशवाणी द्वारा #अखिल #भारतीय #स्तर पर #वार्षिक #सम्मान हेतु चुना गया। कल ४ मई को आकाशवाणी, इंदौर केन्द्र ने एक आयोजन कर बतौर निर्माता संतोष जी को एवं बतौर लेखिका मुझे,कार्यक्रम प्रमुख और सहायक निदेशक श्री किशोर कुमार वर्मा के हस्ते ससम्मान प्रमाणपत्र प्रदान किये। विभागीय अव्यवस्था तथा बाद में कोरोना महामारी के चलते जरा विलम्ब हुआ, लेकिन सम्मान तो सम्मान ही होता है। ५ मई जब अपने बच्चों को कोई पुरस्कार या सम्मान मिलता है, तो उसकी खुशी अलग ही होती है।स्वयं को मिले सम्मान से ज्यादा गर्व अनुभव होता है। बेटे #विभास #साने को अखिल भारतीय स्तर पर #प्रतिभाशाली #पत्रकार के रूप में मिले सम्मान के बाद प्रखरता से यही अनुभूति हुई। एक्सचेंज4मीडिया और समाचार 4मीडिया ने मिलकर इस वर्ष एक पहल की और ४० ऐसे पत्रकारों को सम्मानित करने का निर्णय लिया जो ४० वर्ष से कम उम्र के हैं पर बेहद प्रतिभाशाली हैं। प्रिंट, डिजिटल और टीवी, तीनों ही माध्यमों में कार्यरत ये पत्रकार भविष्य की पत्रकारिता को दिशा देने के लिए तैयार हो रहे हैं, इस सोच के साथ प्रविष्टियां आमंत्रित की गईं और एक सशक्त निर्णायक मंडल ने सम्मान योग्य ४० युवा पत्रकारों का चयन किया। निर्णायक मंडल में शशि शेखर,सुमित अवस्थी, अनुराधा प्रसाद, नाविका कुमार, संजय पुगलिया और अनुराग बत्रा जैसे पत्रकार सम्मिलित थे। मेरे पिता #रघुनाथ #विष्णुपंत #शिरढोणकर ने लगभग ९० वर्ष पूर्व उत्तर-मध्य भारत में मराठी भाषा में पत्रकारिता की शुरूआत की। उस मशाल को आगे ले जाने का काम मैं कुछ अंशों में कर पायी। उसके बाद इस विरासत को मेरी बेटी स्वरांगी साने ने पूरे दमखम के साथ सम्हाला और अब बेटे विभास साने ने अपने सशक्त हाथों में इसे थाम लिया है। ३० अप्रैल मामाजी, सुनिये! प्रदेश की अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक अनुराधा शंकर बता रहीं हैं कि वल्लभ भवन में महिलाओं के लिए सुविधाघर नहीं है। २९ अप्रैल विश्व पुस्तक दिवस पर भारतीय स्टेट बैंक, भोपाल वृत्त ने इसी बैंक से सेवानिवृत्त साहित्यकारों का, एक भव्य समारोह आयोजित कर सम्मान किया।यह एक अभूतपूर्व आयोजन था। मुझे गर्वानुभूति है कि उन सेवानिवृत्त बैंककर्मियों में मुझे भी सम्मिलित किया गया था। इसी बैंक से सेवानिवृत्त, वरिष्ठ कवि #राजेश #जोशी कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे एवं अध्यक्षता सुप्रसिद्ध शायर #मंजर #भोपाली ने की । सम्मान समारोह के बाद हुए कवि सम्मेलन में कविता पाठ का अवसर भी मिला। २६ अप्रैल

एक मराठी धारावाहिक लगभग सालभर से देख रही हूँ। शुरुआत में एक लड़की का संघर्ष था, जो पढ़ना चाहती है। पढ़ने के लिए अपने गाँव से पुणे आकर एक प्रसिद्ध महाविद्यालय में प्रवेश लेती है। फिर बहुत सारी उठापटक दिखायी गयी। इस सबके बीच महाविद्यालय के एक युवा प्राध्यापक और इस लड़की के बीच कुछ भावनायें पनपती हैं, लेकिन दोनों एक - दूसरे को जता नहीं पाते हैं। 
अच्छा भला धारावाहिक चल रहा था, तभी एक युवती का अनपेक्षित आगमन होता है, जो बाद में उसी महाविद्यालय में बतौर प्राध्यापिका नियुक्त होती है। प्राध्यापक के परिजन उसका विवाह इस युवती से तय कर देते हैं।  अँगूठी की रस्म के ठीक पहले प्राध्यापक कहता है कि वह उस छात्रा/लड़की से प्रेम करता है। लड़की मना कर देती है। लड़की छात्र प्रतिनिधि भी है।
अब फिल्मों की तरह प्राध्यापक लड़की को मनाने के लिये रातभर उसके छात्रावास के नीचे, जो उसी महाविद्यालय के अंतर्गत आता है, जहाँ वह पढ़ाता है, खड़ा रहता है, गाना भी गाता है 😀 उधर वह युवती भी शादी टूटने से उद्विग्न है। 
अब मुझे उस महाविद्यालय के तमाम छात्र - छात्राओं की चिन्ता हो रही है। उनको पढ़ाने वाले दो शिक्षक अपने - अपने घर में बैठे रूदन कर रहे हैं। अब उन्हें पढ़ायेगा कौन ? शिकायत करना हो छात्र प्रतिनिधि भी विकल अवस्था में है। परीक्षायें भी सर पर हैं।
हे ईश्वर ! धारावाहिक निर्देशक को सद्बुद्धि दे !
१९ मार्च 

कुछ मित्रों ने पूछा है कि आजकल फेसबुकपर आप कम दिखती हैं ? सही है, सोच-समझकर निर्णय लिया है । फेसबुक पर जब लिखना शुरू किया था, तब ऐसा लगा था कि यहाँ हम अपने "मन की बात" ( वह सुप्रसिद्ध मन की बात नही, सच्ची वाली 😀) कर सकते हैं, लेकिन कुछ भी लिखा, किसी भी विषय पर लिखा तो हर बार दसेक मित्र, अमित्र हो गये। नपी - तुली, लिपापोती वाली बात कहना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। इससे बेहतर तो यह है कि मौन साध लें।
यह निर्णय लेना आसान नहीं था, लेकिन मेरी सहायिका ने इसे आसान बना दिया। उससे मैं कुछ भी कहूँ, दो तीन वाक्य तय है --
बिल्कुल सही कहा दादी आपने।
दादी ! आपकी यही बात मुझे बहुत अच्छी लगती है।
दादी ! आप कह रही हैं तो ठीक ही होगा। 

कोई विरोध नहीं, कोई विवाद नहीं। जीने के लिये और क्या चाहिए ? 
१५ मार्च 

प्रतिवर्ष ८ मार्च को महिला दिवस के उपलक्ष्य में बहुत सारे पुरूष बधाई सन्देश भेजते हैं, लेकिन मैं किसी को स्वीकार नहीं करती। यदि स्वीकार कर लूँ तो  प्रत्युत्तर में अगले ३६४ दिन उन्हें बधाई सन्देश भेजना पड़ेगा ।
८ मार्च

यूट्यूब पर लघु फिल्म "दी पिज्जा" देखी। यह   अकेले रहने वाले तथा कोरोना काल में और अधिक अकेले हो गये वृद्ध की कहानी है। 
भूख लगने पर यह वृद्ध व्यक्ति पिज्जा मँगवाता है और पिज्जा लेकर आनेवाले युवक ज़ाहिद को साग्रह अन्दर बुला लेता है। ज़ाहिद नियमों का हवाला देते हुए बार-बार मना करता है, पर वृद्ध व्यक्ति उसे हाथ पकड़कर ले आता है, सोफे पर बिठाता है, पानी देता है और आख़िर में अपने साथ पिज्जा भी खिलाता है। साथ में बतियाता है और अपनी पूरी कहानी सुना देता है। अन्त में ज़ाहिद को दोबारा आने का आमंत्रण भी देता है। फिल्मांकन बेहतर है, लेकिन मुझे उसका कथानक सही नहीं लगा। 
फिल्म बनाने का उद्देश्य अच्छा है , किन्तु यदि कोई वृद्ध इसका अनुसरण करें तो यह उसके लिए खतरनाक भी हो सकता है। जरूरी नहीं कि सब लोग ज़ाहिद की तरह अच्छे हो। कितना भी अकेलापन हो, किसी अजनबी को घर के अन्दर बुलाना वर्त्तमान समय में बुद्धिमानी का काम नहीं है।
५ मार्च 

हर गली, हर सड़क पर घूमनेवाले कुत्तों को देखकर लगता है कि बहुत जल्दी इनकी तादाद  इंदौर की जनसँख्या के बराबर हो जायेगी। सुबह टहलते समय तो कम से कम यही दृष्य दिखता  है। जितने टहलनेवाले, उतने ही कुत्ते।
४ मार्च 
स्टार प्रवाह वर सादर होणाऱ्या "मी होणार सुपरस्टार छोटे उस्ताद"च्या कालच्या आणि आजच्या भागात, कार्यक्रमाचा सूत्रधार म्हणून मराठी पद्धतीने नटूनथटून आलेल्या सिद्धार्थ चांदेकरने मराठीचे, कवीवर्य कुसुमाग्रजांचे गोडवे इंग्रजाळलेल्या मराठीत गायले. तसेच ह्या स्पर्धेचे तिन्ही परीक्षक सचिन पिळगावकर, वैशाली सामंत आणि आनंद शिंदे यांनी देखील नेहमी प्रमाणे इंग्रजी शब्दांचा विपुल प्रमाणात वापर केला.
आणि ह्या पद्धतीने लहानग्या स्पर्धकांसमोर एक आदर्श मराठी दिनाची औपचारिकता पूर्ण झाली. २७ फेब्रुवारी


२१ फरवरी १९५२ को ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने मातृभाषा बांग्ला की रक्षा के लिए एक प्रदर्शन किया।  पाकिस्तानी सरकार ने विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए गोलीबारी का आदेश दिया।  सोलह छात्रों की मौत हो गई थी।  उन छात्रों के सम्मान में, वर्ष १९९९ में, यूनेस्को ने २१ फरवरी को "मातृभाषा दिवस" ​​के रूप में घोषित किया।
इसी तारतम्य में एक महत्त्वपूर्ण जानकारी को साझा कर रही हूँ।
मराठी भाषा के विद्वान इतिहासकार, लेखक, वक्ता एवं पुणे विश्वविद्यालय के उपकुलपति (१९६१-१९६४) पद्मविभूषण महामहोपाध्याय दत्तो वामन पोद्दार (५ अगस्त १८९०- ६ अक्टूबर १९७९) ने "स्वभाषा नियमाष्टक" बनाया और आजीवन उसका पालन किया।  
आईये ! इस अवसर पर इसे पढ़ते हैं। जहाँ जहाँ मराठी लिखा है, वहाँ वहाँ अपनी मातृभाषा को रखकर पढ़ा जाय तो ये नियम आज भी विचारोत्तेजक अनुभव होते हैं।  अगर इनका पालन किया जाए तो मातृभाषा को आसानी से मजबूत किया जा सकता है।

 १.  मैं समय-समय पर कुछ उत्कृष्ट मराठी पाठ पढ़ूंगा।
 २.  मैं कम से कम एक अच्छी मराठी पुस्तक प्रति माह खरीदना चाहूँगा।
 ३.  मैं कम से कम एक प्रतिष्ठित मराठी मासिक की सदस्यता लूँगा।
 ४.  मैं अपने सभी लिखित और मौखिक लेनदेन मराठी में करूंगा।
 ५.  मैं अपने बच्चों में, परिजनों में मराठी के उचित गौरव को जगाने का प्रयास करूंगा।
 ६.  मैं कम से कम एक मराठी अखबार खरीदूंगा।
 ७.  हो सके तो मैं अपने अशिक्षित भाइयों के लिए मराठी में किताबें लिखूंगा।
 ८.  मैं मराठी की बेहतरी के लिए काम कर रहे संगठनों की मदद करने की पूरी कोशिश करूंगा।
२१ फरवरी

पीछे की बस्ती में विवाह है। ढोलक बज रहा है। इतनी बढ़िया लग्गी बहुत समय बाद सुनी।
२१ जनवरी  

चेतावनी तो ग्लोबल वार्मिंग की थी और झेल रहे हैं -- ग्लोबल कूलिंग।
इतने वर्षों में इंदौर में इतना कोहरा, इतनी ठण्ड नहीं देखी।
मुझे याद है, विवाह के बाद जब ग्वालियर से इंदौर आयी तो रिश्ते की एक कम उम्र ननद ने पूछा था -- भाभी, कोहरा क्या होता है ? वह जानती थी कि ग्वालियर में बहुत ठण्ड पड़ती है।
२१ जनवरी 

Busy without busyness का अर्थ बुढ़ापे में समझ में आता है। 
प्राणायाम करना है, घूमने जाना है, हल्के-फुल्के व्यायाम करना है, आँख में दवाई डालना है, कान में तेल डालना है, घुटनों की मालिश करना है, मोजे पहनना है, स्कार्फ बाँधना है, दूध पीना है, कुछ पौष्टिक बनाना है, उसे खाना है। बस, दिनभर अपनी ही तीमारदारी में लगे रहना है। और हाँ,  उसके बाद fitness के गुण भी  गाना है।
१४ जनवरी 

मेरी पोती सहित शिशु वर्ग के तमाम बच्चे इस वर्ष भी वास्तविक रूप से शायद ही विद्यालय जा पायेंगे। 
पढ़ना, सीखना, ज्ञान अर्जित करना तो आजीवन चलता रहता है, लेकिन दुख इस बात का है कि वे संगी-साथियों के साथ उठना-बैठना, लड़ना-झगड़ना, खाना-पीना जैसे निर्मल आनन्द से हमेशा के लिए वंचित हो जायेंगे, जो उन्हें विद्यालय जाकर ही मिल सकता था। 
इन क्रियाओं के माध्यम से सामाजिक समझ भी विकसित होती है जो आधुनिक एकल परिवारों में प्रायः असम्भव ही है।
८ जनवरी 

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