#विरोध #प्रदर्शन #में #भी #भेदभाव।
कोलकाता कांड से सम्बन्धित यह सूचना आज व्हाट्सएप पर प्राप्त हुई। इसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि संदेश केवल महिला सदस्यों के साथ साझा करें यानि बाकी कुछ नहीं, पर विरोध में भी साझेदारी नहीं करेंगे। (क्योंकि आज 'फीमेल ब्लैकआउट डे' है)
सखियो! अभी एक शतक तक स्वयं को भूल जाओ और जो भी कहा जायेगा उसका पालन करो। हम न सुधरे हैं, न सुधरेंगे।
ये है वह सूचना - - -
नमस्कार।
आज के लिए डी.पी. हम सभी इसका उपयोग कर सकते हैं। आज सुबह 8:00 बजे से रात 9:00 बजे तक फीमेल ब्लैकआउट डे है। कृपया सभी से अनुरोध है कि बंगाल बलात्कार मामले के विरोध में अपनी डीपी काली कर लें। संदेश को केवल सभी महिला सदस्यों को साझा करें।
Hi,
DP for today. We can all use this.Today is female blackout day from morning 8.00 am to 9.00 pm. Pls all are requested to black your DP to protest the West Bengal rape case. Share the message to all female member only.
२० अगस्त
माँ होती तो डाँट लगाती। आजीवन इस तरह चौकन्ना रहना ही माँ के प्रति सच्ची श्रद्धा है।
२० अगस्त
जैसे त्योहार का एक वातावरण होता है, वैसे ही दुर्दिन का भी होता है। इन दिनों वही हो रहा है। इलेक्ट्रॉनिक समाचारों में, समाचारपत्रों में बहुत जोर-शोर से अद्यतन जानकारी दी जा रही है। सामाजिक माध्यमों पर भी खूब लिखा जा रहा है। व्हीडिओ आ रहे हैं, और भी बहुत कुछ किया जा रहा है।
मानती हूँ कि सभी स्वाभाविक रूप से उद्वेलित हैं, लेकिन आगे क्या?
चार दिन चिल्लायेंगे, फिर चुप हो जायेंगे। वास्तव में समस्या के मूल में जाने की चेष्टा करना आवश्यक है।
सन २०१२ में निर्भया कांड के समय जो हलचल थी, उससे लग रहा था कि शायद अब स्थितियाँ बदलेंगी, लेकिन वे और अधिक बिगड़ गयीं हैं। कोलकाता की दारूण घटना तो अकल्पनीय है, परन्तु आये दिन हमारे आस-पास इस तरह की घटनायें हो रही हैं। बेहद गम्भीरता और सतत प्रयासों से इस बारे में सोचा जाना चाहिए।
कल रक्षाबंधन है। प्रत्येक भाई सिर्फ अपने स्तर पर भी सोच-विचार करे तो परिस्थितियाँ बदलना बहुत मुश्किल नहीं है। साथ ही लड़कियों ने भी इस पर विचार - विमर्श करना चाहिए। हमारे यहाँ आज भी पारिवारिक वातावरण है और यही सबसे सशक्त माध्यम बन सकता है।
यह किसी एक की समस्या नहीं है। इसे सामाजिक समस्या समझा जाना चाहिए। असहाय होकर मात्र देखते रहना, इस स्थिति से उबरना अब अत्यावश्यक हो गया है।
#कृपया #लड़कियों #के #छोटे #कपड़े #रात-#बेरात #घूमने #जैसी #बात #न #करें।
#सन्दर्भ : कोलकाता बलात्कार
१८ अगस्त
इससे ज्यादा मनहूस और शर्मनाक हरकत क्या हो सकती है कि जब सब कुछ ठीक - ठाक चल रहा हो तो सत्ता का सुख उठाओ और जब हालात बिगड़ रहे हों तो त्यागपत्र देकर देश से पलायन कर लो।
#सन्दर्भ : शेख हसीना / बांग्ला देश प्रधानमंत्री
५ अगस्त
सुबह के समय लगभग सभी कामकाज में व्यस्त रहते हैं। हमारे शहर का विद्युत मंडल भी बेहद सक्रिय रहता है। पूरे प्रदेश का यही अनुभव होगा, ऐसी आशा करती हूँ। मंडल की क्रियाशीलता अनुकरणीय एवं प्रशंसनीय है।
प्रत्येक पाँच मिनिट में बिजली बन्द - चालू करना कोई आसान काम नहीं है।
३१ जुलाई
दादी की पढाई -४
रविवार चूंकि आई बाबा (माता-पिता) के साथ बाहर जाना था, अतः कल रात को कक्षा हुई। पहले Five Six की वर्तनी पूछी गयी और बाद में हिन्दी में क्या कहते हैं, यह उप प्रश्न आया। मैंने पूछा अब सिक्स के आगे क्या होता है? उसका उत्तर मिला कि सेवन, लेकिन उसमें अक्षर ज्यादा है, इसलिए अगले हफ्ते बताऊँगी। अब इस हफ्ते 1-6 रोज दोहराने का गृह पाठ दिया गया है। उसे एकसाथ सुनाने के बाद ही आगे की पढ़ाई की जा सकेगी।
३१ जुलाई
तेज बारिश में भी पानी आड़ा-तिरछा नहीं, सीधा बरसता है, तो लगता है कि शैतान बच्चा शान्त बैठकर लगन से, विद्यालय से मिला गृहकार्य कर रहा है।
२८ जुलाई
भारतवंशी कहकर जिनके कसीदे काढ़े जा रहे हैं, वे कमला नाम का अर्थ भी नहीं जानती। वे अपनी पुस्तक में लिखती हैं - - कमला अर्थात कमल का फूल।
हा हन्त!
# सन्दर्भ : कमला हैरिस
२६ जुलाई
अँधेरे को अच्छा नहीं माना जाता है। अँधेरा अच्छा लगता भी नहीं है, लेकिन काले घने बादल जब अँधियारा फैलाते हैं, तो आशा की किरणें अलग ही उजास उत्पन्न करती हैं।
२१ जुलाई
दादी की पढाई -३
गुरू पौर्णिमा के पावन पर्व पर पाठ ३
Three - - तीन
Four - - चार
साथ में एक सीख भी दी गयी कि अब बार - बार सम विषम नहीं बताऊँगी। सम के बाद विषम आती है और विषम के बाद सम, यह याद रखना 😀😀
सम विषम अंग्रेजी में कहा गया। मैंने अपनी सुविधा के लिये उसका हिन्दी कर लिया।
२१ जुलाई
दादी की पढाई -२
Two टू यानि दो । दो दिन पहले यह नया पाठ दिया गया है, जिसे मुझे एक सप्ताह में याद करना है।
इसके साथ अतिरिक्त जानकारी भी दी गयी है। सिर्फ Two टू नहीं होता, Too और To भी टू होते हैं। अब इनमें क्या फर्क है अभी मेरी समझ में नहीं आयेगा, इसलिए बाद में बताया जायेगा।
"आज सिर्फ एक ही शब्द?" मैंने पूछा।
"अभी मुझे समय नहीं है। Monthly test हैं।" जवाब आया और तुरन्त good night भी।
१८ जुलाई
हाल ही में सम्पन्न अंतर्राष्ट्रीय विवाह समारोह में अतिथियों ने वर-वधू को आशिर्वाद स्वरूप क्या दिया होगा? लिफाफा तो बिल्कुल भी नहीं दे सकते थे। सम्पत्ति के अंबार में पता नहीं कहाँ पड़ा रह जाता। उपहार भी क्या दें? घर में सब होगा और बहुत सारा होगा। बेचारे सोच-सोचकर परेशान हो गये होंगे।
पहले के जमाने में सरदार, जागिरदार वगैरा पूरे गाँव को जिमाते थे। मुकेश भैया कभी पूरे देश को जिमाते तो हमारे सामने भी 'उपहार क्या दें' यह समस्या विकराल रूप में खड़ी हो जाती।
कभी-कभी निमंत्रण नहीं आने पर मन में अशान्ति होती है, लेकिन इस बार आत्मिक शान्ति अनुभव हो रही है।
# सन्दर्भ: अनंत अम्बानी पुत्र मुकेश अम्बानी वैवाहिक समारोह
१३ जुलाई
दादी की पढाई - १
कल रात सम्भाषण के बाद यह निष्कर्ष आया कि दादी को मराठी और हिन्दी तो आती है, पर अंग्रेजी नहीं आती। उस निष्कर्ष (आयु ६ वर्ष) का आधार यह था कि दादी कभी भी अंग्रेजी में बात नहीं करती। फिर गहन विचार-विमर्श के बाद तय हुआ कि दादी को अंग्रेजी सिखाना चाहिए। इस निर्णय के बाद गृहकार्य दिया गया।
उसके अंतर्गत कल की कक्षा में पढ़ाये गये पाठ को याद करना है --
१. हिन्दी के एक,दो,तीन और चार को अंग्रेजी में क्या कहते हैं ?
२. एक की अंग्रेजी वर्तनी
३. एक,दो,तीन और चार अंकों में सम और विषम अंक कौन-से हैं ?
कहते हैं ना कि सुबह जल्दी याद होता है , तो इस दादी ने आज आधा घण्टा पहले उठकर पाठ याद कर लिया है। एक बार शाम को भी सब पढ़ना है, ताकि प्रश्न पूछे जाने पर कोई त्रुटि न हो।
दादी को शुभकामनाओं की आवश्यकता है।
१० जुलाई
इंडिया को भारत करने मात्र से कुछ नहीं होगा, प्रत्येक को भारतीय भी करना होगा। अपनी सुविधा के लिए हिन्दू - मुस्लिम, ब्राह्मण - दलित ये भेद हटाना होगा। किसी भी शासकीय प्रारूप में इतने वर्षों बाद भी जाति का उल्लेख किया जाना आवश्यक क्यों है ? जाति के आधार पर जनगणना क्यों की जाती है ? प्रवेश, नियुक्ति, पदोन्नति, सुविधाएँ आदि का आधार जाति क्यों होता है ? 'योग्यता के आधार पर भारतीय' क्या इतना काफी नहीं है ?
कब तक हम लोग राजनीति के भरोसे जीते रहेंगे
५ जून
कल रसोईघर का ओटला रोज की अपेक्षा थोड़ा अधिक साफ करने के लिए मैंने मटके को गैस चूल्हे के पास रख दिया था। उसी दौरान घरेलू सहायिका का गृह प्रवेश हुआ। उसने इस दृश्य को देखा और तुरन्त टोका - - दादी! मटके को गैस के पास मत रखा करो । पानी गरम हो जायेगा।
मुझे लगा यदि यह मार्गदर्शन न करती तो मेरा क्या होता ?
टीप- गैस चूल्हा बन्द था 😀
२७ मई
सुप्रसिद्ध कथाकार आदरणीय मालती जोशी नहीं रहीं । नब्बे वर्ष की आयु में कल रात उनका निधन हो गया। वे कुछ समय से बीमार थीं।
कोविद के पहले एक कार्यक्रम में इंदौर आयीं थीं। मैं नहीं दिखी तो दूसरे दिन फोन लगाकर पूछा - सब ठीक तो है? तुम कल क्यों नहीं आयी? मैंनें उन्हें बताया कि इंदौर में नहीं हूँ, तो बोलीं - अब पता नहीं मिलूँगी कि नहीं। भोपाल में कम से कम मिलना हो जाता था।
इतनी सरलमना थीं। कोई श्रेष्ठत्व बोध नहीं था।
विनम्र श्रद्धांजलि 🙏
१६ मई
दिनभर से ऐसा लग रहा है कि यदि सामाजिक माध्यम पर स्याही लगी अंगुली नहीं दिखायी तो मत शायद अवैध घोषित हो जायेगा।
१४ मई
जनता का एक - एक मत कीमती है और स्वयं जनता...???
१२ मई
आचार संहिता लागू होने पर अनेक गतिविधियाँ प्रतिबन्धित हो जाती हैं। उनमें दलबदल को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए।
५ अप्रैल
एक समूह में अभी होलिका के चित्र सहित देखा - - Ready for Dahan. 😀😀😀
हा हन्त! यही हाल रहा तो देवी सरस्वती और श्री गणेश को जल्दी ही स्वर्ग में अंग्रेजी की कक्षाएँ शुरू करना पड़ेंगी...!!!
२४ मार्च
जवळ जवळ बारा वर्षांपूर्वी इंदौरच्या श्री सर्वोत्तम प्रकाशनाच्या मदतीने माझा मराठी काव्य संग्रह "एक वात थरथरणारी" प्रसिद्ध झाला होता. माझ्यासारख्या सामान्य, अचर्चित साहित्यिकांचे पुस्तक विकत घेऊन वाचण्याची तसदी सर्वसामान्यपणे कोणी घेत नाही. हे लक्षात ठेवून पुस्तकावर किंमत छापलीच नाही आणि दोनशेहून अधिक साहित्य रसिकांना हे पुस्तक भेट दिले. पण #सुषमा #वडाळकर अशी पहिली व्यक्ती आहे जिने स्वतःहून पुस्तकाबद्दल अतिशय आत्मीयतेने लिहून पाठवले. तिच्या या निस्सीम प्रेमाने मी भारावले आहे.
२० मार्च
मौसम को स्मृति भ्रम हो गया है। जब गर्म होना चाहिए, तब वह ओले बरसा रहा है।
हम महिलाओं के बारे में ही कुछ सोच लेता। गरम कपड़े, गोदड़ी, कम्बल, रजाई सब साफ़ करके अन्दर कर दिये हैं और रात से इतनी ठण्डी हवा ?
सुबह उठकर खिड़की - दरवाजे खोलना अच्छा लगने लगा था, आज तो हिम्मत ही नहीं हुई।
१७ मार्च
सन १९५८ में स्थापित बृहन्महाराष्ट्र मंडळ, एक ऐसी संस्था है जो महाराष्ट्र के बाहर रहनेवाले मराठी भाषियों के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक उत्थान का कार्य करती है। देश के लगभग हर प्रान्त में मंडळ की शाखाएँ हैं, जो अन्य स्थानीय संस्थाओं के सहयोग से पूरे वर्ष विविध कार्यक्रम करती हैं। इस वर्ष बृहन्महाराष्ट्र मंडळ द्वारा अ. भा. साहित्य सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है।
आगामी २४/२५ फरवरी को पणजी, गोवा में होने जा रहे इस भव्य समारोह में मैं भी कवि सम्मेलन में आमंत्रित कवयित्री हूँ। इसके अलावा एक अन्य कवि सम्मेलन की अध्यक्षता भी मुझे करनी है।
उद्घाटन के पश्चात् विभिन्न प्रदेशों के ७ साहित्यसेवियों को उनकी विशिष्ट उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया जायेगा। उनमें मालवा की प्रतिनिधि के रूप में मेरा चयन हुआ है ।
मैं बृहन्महाराष्ट्र मंडळ की प्राथमिक सदस्य भी नहीं हूँ, बावजूद इसके मुझे इतना सम्मान दिए जाने से गौरवान्वित अनुभव कर रही हूँ।
२२ फरवरी
पाँचों भाई मुझसे काफ़ी बड़े थे। सबसे बड़े अपनी पहली कमाई से रेडियो खरीदकर लाये थे। उस पर प्रति बुधवार रात आठ बजे बिनाका गीतमाला आती थी, जिसे सब भाई बहुत चाव से सुनते थे। आखिरी पायदान पर कौन-सा गीत पहुँचेगा इसकी शर्त लगती थी। माँ साढ़े सात बजे तक खाना परोस देती थी, नहीं तो नौ बजे तक कोई रेडियो के पास से हिलता नहीं था। उस समय रात के नौ बजने का अर्थ काफी रात बीत जाना होता था। मुझे तब तो कुछ समझ में नहीं आता था, लेकिन बाद में मैं भी सुनने लगी।
आज बुधवार को ही बिनाका गीतमाला का वह अद्भुत उद् घोषक आखिरी पायदान पर पहुँच गया 😢
अमीन सयानी! आप हमेशा याद रहेंगे। विनम्र श्रद्धांजलि 🙏
२१ फरवरी
परिवारवाद सिर्फ काँग्रेस में ही नहीं, अन्य दलों में भी है।
३१ जनवरी
३१ जनवरी
"राजनीति में सब चलता है",पहले यह एक उक्ति हुआ करती थी। अब कृति हो गयी है।
२९ जनवरी
कथा कवितेची ह्या उपक्रमात मला जोडल्याबद्दल सर्वात आधी #श्रीधर #जहागिरदार यांचे आभार. मराठी कवयित्री म्हणून मला काही जण ओळखतात पण कटू सत्य हे आहे की मला मराठी येत नाही कारण मी मराठी शिकले नाहीय. जी आणि जशी भाषा मला येते ती वडिलांमुळे, मोठ्या भाऊ बहिणींमुळे. बाकी माझं शिक्षण आणि परिसर नेहमीच हिन्दी आणि त्यामुळेच मला ह्या एका वेगळ्या दर्जाच्या उपक्रमाचे अतिशय दडपण आले होते पण श्रीधरजींच्या स्नेहापुढे मला नकार देता आला नाही.
माझ्या समवयस्कांपेक्षा माझे लहानपण वेगळे होते . ते असे की माझ्या बरोबरीच्या लोकांचे आई वडील ज्या वयाचे, त्या वयाची माझी सख्खी मोठी भावंडं होती. त्यामुळे एक पिढी मागचे वातावरण मी लहानपणी बघितले आहे. खूप मोठ्ठे कुटुंब. आते मामे, चुलत मावस आणि सख्खे अशे आम्ही ५८ भाऊ बहीण होतो. घरात खूप राबता असायचा . त्यातच आलवण व बोडख्यात असलेली नात्यातील दोन आजी वर्षातील ९/१० महिने सणवार, लग्नकार्य ह्या निमित्ताने आमच्याकडे असायच्या. माझे दोन्हीं कडील आजी आजोबा माझ्या जन्माच्या आधीच निवर्तले . पण सख्खी पणजी , आईची आजी, वय वर्षे ११० (जन्म १८५१) आमच्याकडे येऊन जाऊन असायची. ती आठवते. नात्यातील दोन बहिणींचा त्या काळात काडीमोड झाला. लांबच्या नात्यातील एक भाऊ वहिनीशी खूप मारझोड करायचा, शिवाय इतर नवरेही त्या काळाप्रमाणे आणि माहेरी ग्वाल्हेरला हिंदी संस्कृतीचा प्रभाव असल्याने , बायकोशी फारसे बरे वागत नसे. वडील लवकर गेले आणि प्रत्येक कार्यात पुढाकार घेणारी आई, अचानक मागे ढकलली गेली. तिचे पांढरे लुगडे व अपराधी भाव असलेला भकास चेहराच नंतर लक्षात राहिला. पुढे माझ्याही समोर असा प्रसंग आला. अगदी पांढरी साडी वगैरे नाही, पण बहुतेक वेळा वगळले जाणे भोगले. ह्या सर्व पार्श्वभूमीत स्त्री जीवन आणि तिचे दुःख जवळून दृष्टीस पडले.
ह्या सगळ्याचा परिणाम असा झाला की माझ्या बहुतेक कविता स्त्री जीवनाशी निगडित लिहिल्या गेल्या.
लग्न झाल्या झाल्या मंगळागौर आली. माहेरी होते. आई वहिनी वगैरे काही चर्चा करत होत्या आणि अचानक आईने विचारले -- का गं , तुझ्याकडे "हे" कसे करतात ?
तुझ्याकडे ? हा शब्द ऐकून मी हतबुद्ध झाले. नंतर सासरी देखील ह्या शब्दाचा वारंवार उल्लेख व्हायचा. त्यामागे सबळ कारणेही होती. देशस्थ (माहेर) कोकणस्थ (सासर), ग्वाल्हेर इंदौरचा एकमेकांबद्दल त्या वेळी असलेला आक्रस्ताळेपणा वगैरे. पण 'तुझ्याकडे' मला बोचायचा. त्यातूनच एक कविता बऱ्याच वर्षांनंतर आली .
जनक म्हणाले तू परक्याची
हे घर तुझं नव्हे
भर्ता म्हणाले मी आणली स्वगृही
हे घर तुझं नव्हे
ज्या करीता मी दिली आहूती
ते घर माझं नव्हतं
जेथे होम केला सर्वस्वाचा
ते घर माझं नव्हतं
ज्या घरात मी जन्म घेतला
ते घर माझं नव्हतं
ज्या घरात मी जन्म घालवला
ते घर माझं नव्हतं
लेक लहान होती तेव्हा माहेरी एक दुर्धर प्रसंग ओढवला. आईसाठी मी ५ महिने ग्वाल्हेरला राहिले होते पण हलाखी इतकी की मुलीसाठी १० पैशाचा फुगा घेणे शक्य नव्हते. निघताना नवऱ्याने दिलेले पैसे कधीच संपले होते आणि माहेरच्यासाठी परत मागवायची पद्धत नव्हती. मग ही कविता सुचली आणि अतिशय दुःखात लिहिलेल्या ह्या कवितेने मध्यप्रदेशातील मराठी साहित्य जगात स्थान मिळवून दिले .
#निखारे
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मी सकाळी स्वयंपाक करत होते
तेव्हा माझ्या मुलीने
माझ्याकडे खेळणे मागितले
मी तिला विस्तव दिला
दिले दोन जळजळीत निखारे
तिने खुशाल ते हातात धरले
आणि ती खेळत राहिली
त्या निखाऱ्यांशी
त्यांची राख फुंकून फुंकून
तिचे हात पोळले नाही
तिला चटका बसला नाही
की तिच्या हातावर
एव्हढासा फोड देखील उठला नाही
तिची नाळ
आगीशीच जोडलेली होती
तिथूनच शिकून आली होती
विस्तवाशी खेळणं
अग्निदिव्यातून जाणं .
*******************
बहुतेक कविता अशाच खरखरीत आहेत. आयुष्यभर घनदाट दुःखाच्या प्रसंगांनी पाठीराख्या भावासारखी सोबत केली. दुःखाच्या ह्या जिव्हाळ्याने मी ग्वाल्हेरची असूनही कवितेत गेयता आली नाही.
२५ जनवरी
आदरणीय #प्रभा #अत्रे (मेरे लिये प्रभा ताई) के निधन ने बेहद विचलित कर दिया। यह मेरी व्यक्तिगत क्षति है।
वे संभवत: शनि मंदिर संगीत समारोह के लिये इंदौर आयी थीं। कुछ समय पहले ही मेरे पति नहीं रहे थे और इसी कारण मैं उस कार्यक्रम में नहीं गयी। उन्हें जब यह पता चला , वे मुझसे मिलने मेरे घर आयीं। उस दिन का एक अनमोल छायाचित्र मेरे पास है , जो उन्होंने मेरे बच्चों को बहलाने के लिये खिंचवाया था।
दरअसल वरिष्ठ मराठी कवि स्व. श्रीकृष्ण बेडेकर के माध्यम से उनकी पुस्तक ''स्वरतरंगिणी'' के मेरे द्वारा हिन्दी अनुवाद की बात चल रही थी और उनके इंदौर प्रवास के दौरान भेट तय थी। दुर्भाग्यवश मुझ पर आयी आकस्मिक विपदा और जिम्मेदारियों के कारण मैं अनुवाद नहीं कर पायी। बाद के कुछ वर्षों तक दूरभाष पर बात होती रही, लेकिन दोबारा मुलाकात का अवसर नहीं मिल पाया।
विनम्र श्रद्धांजलि
🙏🙏🙏
१३ जनवरी
अनेक वर्षांनी 'हंस' चा दिवाळी अंक वाचायला मिळाला. मिळाला म्हणण्यापेक्षा 'मुक्त संवाद' इंदौरच्या ग्रंथ प्रदर्शनात मुद्दाम विकत घेऊन वाचला. त्यातील कथा, कविता विशेष आवडल्या नाहीत. ते समजू शकते कारण त्या सर्व साहित्यावर आधुनिक जीवन शैलीची छाप दिसत आहे. पण भाषा ? त्याचे काय ? साहित्यिक जर इंग्रजाळलेली मराठी वापरतील आणि नावाजलेली मासिके आपल्या दिवाळी अंकात ते लिखाण जसेच्या तसे छापणार असतील तर भाषेचे भवितव्य काय ?
कै. अनंत अंतरकर आणि कै. आनंद अंतरकर यांनाही भाषेचा हा दर्जा बघून नक्कीच त्रास होत असेल.
चारशे रुपये वाया गेले. त्यापेक्षा अमेजाॅन वरून पुस्तक विकत घ्या असे फेसबुकवर सतत कळवळून सांगत असलेल्या एखाद्या मित्र/मैत्रीणीचे पुस्तक घेतले असते तर बरे झाले असते.
६ जनवरी
हमारे इसरो का आदित्य अब सूरज को लगातार देख सकेगा। शायद इसी कारण महाराज नाराज हैं। कितने दिनों से आम आदमी को दर्शन ही नहीं दे रहे हैं।
६ जनवरी
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