२०१९

सब्जी-भाजी के अथाह माया-मोह में उलझकर, अदरक लहसुन की खरीदारी भरी  ठण्ड में भूल जाना, अक्षम्य अपराध है। उल्टे पांव जाकर ले आना, यही इस अपराध का एकमात्र दण्ड है।
२९ दिसम्बर 

सुबह से मन हो रहा है  किसी से कहूँ कि आज ठंड एकदम  ग्वालियर जैसी लग रही है, लेकिन आसपास ऐसा कोई नहीं है, जिसे ग्वालियर की ठिठुरन का अनुभव हो।

मायके की याद

अपने आने के लिये

ढूँढ ही लेती है

कोई न कोई बहाना ।

पीहर नहीं छूटता

बुढ़ापे में भी।
२७ दिसम्बर 

मेरे पास करीब १०/१२ साल पुराना एक चाकू है, जिस पर Decent लिखा है. चाकू और  Decent ? 😀😀  इस  चाकू का दिन में कम से कम ५/६ बार काम पड़ता है, लेकिन आज तक कभी इस ओर ध्यान नहीं गया.    Decent पढ़कर मजा आ गया. वैसे Decent के कई  अर्थ भी चाकू के सन्दर्भ में देखें तो मजेदार ही हैं-- लज्जावान, विनीत, शालीन, शिष्ट, श्लील, सन्तोषजनक, सभ्य,  सलज्ज, सहनीय, सुघड़, सम्माननीय, काफीअच्छा, अच्छा, आदरणीय, उचित, उदार, उपयुक्त, प्रतिष्ठित, भला, मर्यादित
२६ दिसम्बर 

हमारी जिंदगी नियमों का पालन करने में ही गुज़र जाती है। घर के बाहर सरकार के नियम और घर में कामवाली के। इन नियमों के लिए न तो सरकार से जवाबतलब किया जा सकता है और न ही कामवाली से।
२३ दिसम्बर 

जो भी अवैध निर्माण   होता है, उसे प्रशासन द्वारा नष्ट क्यों किया जाता है?  राजसात कर उस सम्पत्ति का उपयोग किसी अन्य कार्य के लिये क्यों नहीं होता ? उसमें लगी सामग्री एक तरह से राष्ट्रीय सम्पत्ति ही होती है और ढहाने के लिये भी राजकोष का उपयोग किया जाता है। हाल ही में इंदौर के 'पत्रकार'(?) जीतू सोनी का सिर्फ  एक आवास गिराने के लिए १० लाख रूपये खर्च हुए। इसके अलावा भी सोनी के कई निर्माण कार्य गिराये गये। ध्वस्त निर्माण से वह जगह भी असुंदर दिखती है।
 दिसम्बर 

कभी-कभी बैठे - बैठे भी थकान होने लगती है। ऐसे समय क्या करना चाहिए? एक आसान नुस्खा बताती हूँ, ध्यान से पढ़ना। पहले एक चादर लो , ठण्डा मौसम हो तो कम्बल भी ले सकते हैं। फिर आवश्यकतानुसार एक या दो, मोटे पतले तकिये लो। बस, और कुछ नहीं,  लेट जाओ ! शर्तिया अच्छा लगेगा।
२१ दिसम्बर 

बादाम न खाने से भी याददाश्त मजबूत होती है, ये स्वानुभव है। पहले मुझे नाश्ते के समय याद आता था कि रात को बादाम तो भिगोये ही नहीं,अब नींद खुलते ही याद आ जाता है। 😀😀😀
१५ दिसम्बर 

देश कोई भी हो, जाति कोई भी हो,धर्म कोई भी हो जिस पर अत्याचार होता है, जिसे दबाया जाता है, कुचला जाता है वह और कोई नहीं, एक कमजोर और गरीब इंसान होता है। यही इंसान  राजनीति के लिये वोट बैंक, अर्थनीति के लिये खोटा सिक्का और समाजनीति के लिये बदनुमा दाग होता है, लेकिन दुनिया के तमाम काम इसी की बदौलत और इसी के भरोसे चलते हैं, बावजूद इसके कि दुनिया में उसका कोई स्थान निश्चित नहीं होता।
१२ दिसम्बर 

नागरिकता संशोधन बिल समझ में नहीं आ रहा है। कुछ लोगों को नागरिकता मिलेगी और कुछ को नहीं । असम को अलग क्यों रखा गया है? देश में  मुस्लिम बड़ी तादाद में हैं और आम जनता के आपसी संबंध भी सौहार्द्रपूर्ण है, फिर उन्हें नागरिकता क्यों नहीं? अभी एक समाचार वाहिनी पर देखा कि एक व्यक्ति देश की ओर से कारगिल युद्ध में सम्मिलित हुआ था, लेकिन अब वह देश का नागरिक नहीं रहेगा। यह तो सर्वाधिक दुखद है। पूर्वोत्तर बाकी देश से अलग क्यों है? वहाँ नियम अलग क्यों है? फिर धारा ३७० और इस बिल में क्या फर्क है?

टीप: मैं किसी राजनीतिक दल से सम्बद्ध नहीं हूँ। यह पोस्ट  न तो भाजपा के विरोध में है और न ही विपक्ष के समर्थन में। मैं एक अल्पज्ञानी सामान्य नागरिक के तौर पर कुछ जानना चाहती हूँ,जो जवाब दे सकते हैं, वे दें अन्यथा चुप रहें।
१० दिसम्बर

कम्पनी वालों मुझे पिछड़ा ही रहने दो । मुझे कोई ब्रॉडबैंड कनेक्शन नहीं चाहिए,  मुझे कोई क्रेडिट कार्ड नहीं चाहिए, मुझे गृह ऋण की भी आवश्यकता नहीं है ।
 
और सबसे महत्वपूर्ण मैं  इंश्योरेंस के दायरे से बाहर निकल चुकी हूँ ।
 
हे कम्पनी कर्मियों! मुझे क्षमा करो।
 
९ दिसम्बर 

थोड़ी देर पहले एक तकनीकी समस्या आ गई तो बेटे को फोन लगाया । उधर से जवाब आया --अभी मीटिंग में हूँ, बाद में बात करता हूँ । फिर बेटों जैसे वैभव पुरोहित और प्रशांत कोठारी को फोन किया। वे भी व्यस्त थे। कुछ नहीं सूझा तो बहू से बात की। उसने तुरन्त हल बता दिया। तब खयाल आया कि बहू या बेटी को तो मैं पहले भी पूछ सकती थी। उनके बारे में बाद में क्यों सोचा?

पितृसत्तात्मक सोच कहीं भी असर डाल सकती है, और कुछ नहीं।
५ दिसम्बर 

 बहुत-से लोगों को शिकायत रहती है कि उन्हें कोई गम्भीरता से नहीं लेता। मेरे साथ कई बार  उल्टा होता है, मेरे हल्के-फुल्के हास्य-विनोद के लिए लिखे को कुछ लोग गम्भीर चर्चा की ओर मोड़ देते हैं। 😥😥
५ दिसम्बर 

ज्यादातर  इलेक्ट्रिशियन, प्लम्बर आदि घर में प्रवेश करते ही साधिकार चीजों का उपयोग शुरू कर देते हैं । कुर्सी या स्टूल खींच लेंगे, सामने टंगा कोई भी कपड़ा , चाहे वह रसोई का साफ सुथरा नैपकिन ही क्यों न हो, कुछ भी पौंछने के लिए निकाल लेंगे और हम बेबस देखते रह जाते हैं। इतना ही नहीं यदि लगातार दो दिन काम करें तो तीसरे दिन लगता है कि हम उनके घर आ गये हैं। 😀😀
४दिसम्बर 

खूप दिवसांपासून डाॅ. जगन्नाथ  दीक्षितांचे नाव ऐकून होते. आज म्हटलं काय म्हणतात ते ऐकूनच घ्यावे. ते म्हणाले दिवसातून फक्त दोनदा जेवायचे, बाकी अजिबात काही खायचं नाही.  ठीक आहे. नाही खाणार, पण मग दिवसभर काय करायचे? ते पण सांगायला हवे न. 😀😀😀
३ दिसम्बर 
 
प्रौढ़ावस्था तक जो शब्द सुना तक नहीं था, वह इतना आम हो गया है कि अब कुछ सूझ ही नहीं रहा है । हर दिन वीभत्स खबरें सुनकर/पढ़कर मन सुन्न हो रहा है । जो सबकुछ कर सकते हैं, वे मौन साधकर बैठे हैं और अपनी असहायता पर क्रोध आ रहा है । क्यों जीवित हैं हम ? अभी और कितना रसातल देखना है?
२ दिसम्बर

बोलते  समय अहिंदीभाषी अक्सर  लिंग प्रयोग में गलती करते हैं । स्त्री की  क्रियाओं को वे पुल्लिंग बना देते हैं, जैसे- आप आया क्या? सोया था क्या? आप पहुँचा क्या? वगैरे वगैरे ।

लेकिन यदि कोई हिन्दी भाषी पूछे कि आप आ गये क्या? आप सोये थे क्या? आप पहुँच गये क्या? तो देश के किसी भी हिस्से में हो,पक्का जानिए कि वह (स्त्री-पुरूष दोनों) इंदौरी है। 😁😁😁
१दिसम्बर 

पुलिस को अपराधियों का संरक्षक माना जाता है । सभी पुलिसकर्मी निश्चित ही ऐसे नहीं होंगे, किन्तु  उन्हें  इस छबि से बाहर आना होगा, तभी अपराधों में कमी आ सकती है।
३० नवम्बर 

इन दिनों जिस तरह अधिकांश स्कूलों में लड़कियों को अच्छा स्पर्श/बुरा स्पर्श समझाया जा रहा है, लड़कों को भी अच्छी नज़र/बुरी नज़र की समझाईश दी जाना चाहिए ।
३० नवम्बर 
    
समाज इतना भयावह क्यों होता जा रहा है ? 
 
क्या सारे राजनीतिज्ञों को अपने मतभेद भुलाकर इस विभत्स सामाजिक समस्या के बारे में नहीं सोचना चाहिए ? 
अधिकांश  गैर सरकारी संघटन  (NGO) पीड़ितों के लिए काम करते हैं, पीड़ा हो ही नहीं क्या इस बारे में उन्हें नहीं सोचना चाहिए ? फांसी जैसी घोषणायें जोशखरोश के साथ की जाती हैं ,फिर उनके क्रियान्वयन के बारे में क्या विधि वेत्ताओं को नहीं सोचना चाहिए? पुलिस बल बढ़ाकर सुनसान इलाकों में रात के समय उनकी नियुक्ति नहीं की जानी चाहिए ? जो आरोपी हैं / अपराधी हैं क्या उनके माता-पिता को भी अपना व्यवहार नहीं बदलना चाहिए ?  
जो लोग अंतर्जातीय विवाहों पर सक्रिय होकर परिवार को जात बाहर कर देते हैं, क्या उन तथाकथित सामाजिक कर्णधारों को ऐसे समय सक्रिय नहीं होना चाहिए ? इस समस्या का कोई मनोवैज्ञानिक पहलू भी है , क्या इस बारे में मनोचिकित्सकों को नहीं सोचना चाहिए ? पिछले बीस वर्षों में खान-पान के तरीकों में जो अद्भुत परिवर्तन  आया है , उस वजह से कहीं हार्मोनल बदलाव तो नहीं आ रहा है ? क्या इस बारे में चिकित्सा शास्त्रियों ने नहीं सोचना चाहिए ? और हम लिखने-पढ़नेवाले लोग,जो संवेदनशीलता का दम्भ रखते हैं , क्या  उन्होंने इन सबको जागरूक करने का बीड़ा नहीं उठाना चाहिए ? या फिर  लड़कियों ने फिर से घर में बंद हो जाना चाहिए ? और जब वे बंद रहेंगी, तब भी  सुरक्षा की कोई आश्वस्ति उन्हें नहीं रखना चाहिए, क्योंकि  पिता तक उन्हें नहीं छोड़ रहे हैं.
२९ नवम्बर 

भविष्य में  महाराष्ट्र जैसी स्थिति किसी अन्य राज्य में निर्मित न हो, इसलिए प्रस्ताव पारित कर सिर्फ तीन दलों को  मान्यता देना चाहिये -- १. हिंदुत्ववादी, २. धर्मनिरपेक्ष और ३. ढुलमुल.
२७ नवम्बर 
 
अखबारों में, पत्र-पत्रिकाओं में सिने तारिकाओं की फिटनेस के नुस्खे छपते रहते हैं। इनसे परे किसी अखबार ने अंजना ओम कश्यप की फिटनेस के भी  नुस्खे  छापने चाहिए,  खासकर उनकी आवाज का क्या रहस्य है, जो पूरा-पूरा दिन उतनी ही जोरदार रहती है ।
२३ नवम्बर 

सरकारी कार्यालयों के बारे में मेरा अनुभव और मत बहुत अच्छा नहीं है। ज्यादातर साढ़े दस - ग्यारह बजे तक खुलते हैं। यदि हम समय से पहुँच गये, तो इक्का दुक्का कोई काम करते दिखता है। उससे  अपने काम की जानकारी लेने पर अक्सर जवाब मिलता है -- क,ख,ग जी आनेवाले हैं, वे बतायेंगे।

 लेकिन आज मेरी राय बदल गई , करना चाहे तो सरकारी कर्मचारी सुबह साढ़े पांच बजे भी काम कर सकते हैं। वे चाहें तो ठण्ड के दिनों में सुबह-सुबह राष्ट्रपति शासन हटाकर, किसी को मंत्री पद की शपथ दिलवा सकते हैं। बस ! करवाने वाला चाहिए । 

अब मेरे जैसे साधारण नागरिक में इच्छा  और शक्ति का अभाव है, इसी वजह से दोपहर तक किसी अधिकारी/कर्मचारी के हम दर्शन तक नहीं कर पाते हैं । किसी को क्या दोष देना ? 
अथ राजनीति षष्ठम अध्याय
२३ नवम्बर 

राजनीतिक नाटक का पटाक्षेप। यही करना था, तो पहले ही कर लेते! कुल मिलाकर परम्परागत रूप से यह पारिवारिक लड़ाई साबित हुई। अब कृष्ण कौन थे और युधिष्ठिर कौन, कौन अर्जुन और कौन दुर्योधन इतना जानना भर बाकी है। अथ राजनीति पंचम अध्याय
२३ नवम्बर 

महाराष्ट्र में सरकार बनने के बाद, विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत देशभर के उन सभी नागरिकों को मुआवजा दिया जाना चाहिए, जिन्होंने अपने घर-परिवार को भूलकर, दिवाली के मुहाने पर और ऐन दिवाली में चुनाव प्रक्रिया में सहभागिता की थी। यदि एक महीने बाद भी सरकार का बनना अनिश्चितता के दायरे में है, तो चुनाव भी आगे बढ़ाये जा सकते थे । अथ राजनीति तृतीय अध्याय २१ नवम्बर

मेरी स्मृति के अनुसार शरद पवार ने राकांपा का गठन सोनिया गांधी के विदेशी मूल के विरोध में किया था । मेरी स्मृति यह भी बताती है कि बालासाहेब ठाकरे ने कहा था कि वे या उनकी शिवसेना कभी भी सत्ता की लड़ाई में शामिल नही होगी।
अथ राजनीति प्रथमो अध्याय १९ नवम्बर

कभी-कभी यह देखने में आता है कि दो व्यक्ति, दोनों ही अच्छे,  लेकिन दोनों की आपस में निभती नहीं है । कल कुछ ऐसा ही हुआ । सुबह ज्वार का आटा गूंधा , साथ में बैंगन की सब्जी बनाने वाली थी, फिर याद आया पनीर रखा है। शिमला मिर्च भी थी। सोचा पनीर को खत्म करना चाहिए। ज्वार की रोटी तो अच्छी लगती ही है और पनीर शिमला मिर्च का तो कोई जवाब ही नहीं है ।
मेरा अंदाज गलत निकला । दोनों की जोड़ी जमी नहीं । या तो सब्जी बैंगन की होना चाहिए थी या फिर गेहूँ की  रोटी/ परांठा होना चाहिए था।
छोटी-छोटी गलतियाँ भी महँगी पड़ जाती हैं ।
८ अक्टूबर 

अप्सरा आली ..... इस नितांत श्रृंगारिक मराठी गीत पर गरबा करते देखा, तो इस बात का प्रमाण मिल गया कि भक्त /भक्तिन बहुत बहुत यानि बहुत ही भोले होते हैं। 
३० सितम्बर

एक दिन हल्की बारिश के दौरान मैं गुनगुना रही थी-- ऐसे ही किसी रोज न जाने के लिए आ... और उसने मेरा कहा मान लिया.😁😁
२५ सितम्बर

मेरी माँ को हमेशा लगता था कि हम दोनों बहनें मायके एक साथ जायें, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता था । बारिश और बिजली के लिए मेरी यही भावना है कि दोनों एक साथ रहें, किन्तु होता उल्टा है । बारिश का आना बिजली को बिल्कुल भी सुहाता नहीं है। कभी लपक-झपक करेगी,कभी अंदर-बाहर करेगी और बारिश ज्यादा देर रह गई तो पक्का मानिए फिर  बिजली ने बिल्कुल नहीं रूकना है। बारिश बड़ी बहन की तरह समझदारी दिखाती है । उसे जब आना है , आती है । जितनी देर रूकना हो,रूकती है । उसे बिजली के होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
२३ सितम्बर

कपड़े हल्के रंग के खरीदो तो कई बार धुल धुलकर और फीके हो जाते हैं, गहरे रंग भूरे। दोनों का सम्मिश्रण हो तो गहरे या तो हल्के को ढँक देते हैं या उन पर अपना रंग चढ़ाकर हावी हो जाते हैं ।
ज़िन्दगी की तरह रंग भी अपना रंग दिखाने से चूकते नहीं हैं।
१५ सितम्बर

सासू माँ कहती थीं-- पल्लू ठीक से रखो ! अभी एक नई कुर्ती खरीदी तो बहू बोली -- माँ! इस पर चुन्नी मत लेना । समय-समय की बात 😀😀😀
१३ सितम्बर

सन 1861 में लाउडस्पीकर का आविष्कार हुआ था, तब से अब तक उसमें काफी परिवर्तन हो चुके हैं और ये सब पश्चिमी देशों में हुए हैं, लेकिन इसके सबसे बड़े पीड़ित हमारे देश के तमाम भगवान हैं ।
हे भगवान! आप अपनी शक्ति बनाये रखना । हमें तो आप बुला लेंगे, किन्तु आपको इस भू-लोक के अंत तक शोर को बर्दाश्त करना है, जो पृथ्वी की आयु के साथ बढ़ता ही जा रहा है। आपके भक्त आपको जिस हाल में रखेंगे, रहना है। आप कानों में रूई भी नहीं डाल सकते। मेरी पूरी सहानुभूति आपके साथ है।
१२ सितम्बर

पहले आवश्यकता और रूचि के मुताबिक  ज्ञान का कोई कतरा भी मिले, तो उसे सहेजने का चलन था। अब सामाजिक माध्यमों बर बाँटने का चलन हो गया है , पाने वाले की जरूरत या रूचि से कोई लेना-देना नहीं है । इस हाथ ले,उस हाथ दे का इससे अच्छा कोई उदाहरण नहीं हो सकता है।
१२ सितम्बर
प्रधानमंत्री हैं तो क्या हुआ? इसरो जाने की क्या जरूरत थी? और जाना ही था, तो प्रगतिशील बुद्धिवादियों से पूछ लिया होता । दूसरी बात यह कि रात को जो जैकेट पहनी थी, उसे ही सुबह पहन लेना था । रात को सोते समय अच्छे-से तह करके गद्दे के नीचे दबा देते, सारी सिलवटें निकल जाती। 
एक ये और एक वे  । इतने बड़े वैज्ञानिक की आँखों में आंसू आ ही कैसे सकते हैं? उन्हें तो अभी तक रोबोट हो जाना चाहिए था। प्रधानमंत्री के गले लगने का बहाना चाहिए था और क्या? प्रधानमंत्री ने भी मौके का फायदा उठाकर अपने वोट पक्के कर लिये ।

सारी बातों का ध्यान यदि बुद्धिवादी ही रखेंगे तो बेचारे  लिखना-पढ़ना कब करेंगे?
७ सितम्बर

क्या सामाजिक माध्यम हमें प्रतिक्रिया वादी बना रहे हैं ?
७ सितम्बर

झुक झुक झुक झुक 'इसरो'गाडी
धुरांच्या रेषा हवेत काढी
पळते ढग पाहू या
मामाच्या गावाला जाऊ या
६सितम्बर
कल कौन बनेगा करोड़पति में जिस महिला ने दस हजार पैसेवाले सवाल के लिये मदद मांगी, उसका हर जगह मजाक उड़ाया जा रहा है, उसे लानत भेजी जा रही है , उसके शिक्षिका होने पर प्रश्न चिन्ह लगाया जा रहा है । मेरे विचार से उसका निर्णय सही था । दस हजार पैसे कोई रोजमर्रा उपयोग में आनेवाली राशि नहीं है और न ही ऐसे सवालों के उत्तर किसी किताब में छपे मिलते हैं । यह तार्किक सवाल था और उस पर अपना समय बर्बाद करने से बेहतर था कि मदद ले ली जाय । वहाँ बैठे लोग प्रश्न पहले सुन चुके थे और दुबारा उन तक जब वह प्रश्न पहुंचा वे मन में हिसाब लगा चुके होंगे , इस तरह उन्हें समय ज्यादा मिल गया , लेकिन उस महिला के पास इतना समय नहीं था । 

अव्वल तो वहाँ तक पहुँचना ही इतना आसान नहीं है, फिर अमिताभ बच्चन जैसी हस्ती के सामने बैठकर अपना आत्म विश्वास बनाये रखना भी मुश्किल ही होता होगा । बाहर खड़े रहकर किसी की मिट्टी पलीद करना फुर्सतियों का मनपसंद शगल होता है । 

मैं उस महिला के पक्ष में हूँ ।
३० अगस्त

यूं तो किसी के भी जाने के बाद "अपूरणीय क्षति" कहा जाता है , लेकिन सुषमा स्वराज और अब अरूण जेटली का जाना निश्चय ही अपूरणीय क्षति है । 

 विनम्र  श्रद्धांजलि ।
२४ अगस्त

रुक्माबाई के पास कितने ही सवाल रहते हैं. आज सुबह सुबह एक नया सवाल आया -- ''आई! (माँ) इन्जनेर (इंजीनियर) को इंदौर में नौकरी नहीं मिलती क्या?''
''मिलती है न. क्यों , क्या हुआ?'' मेरा जवाब.
''मैं इतने घरों में काम करती हूँ. किसी का बेटा बेंगुर(बेंगलूर), किसी की बेटी पुणे, कोई एमरिका. सब बाहर रहते हैं.''
''अच्छा ये बात है ! किसी को और आगे पढ़ना होता है. कोई अच्छे पगार की नौकरी के लिए जाता है.''
''और यहाँ माँ - बाप अकेले ? क्या फायदा पढाई का ? इससे तो हम अच्छे, कम पढ़े-लिखे, कम पैसा. लड़ते-झगड़ते हैं, पर साथ में रहते हैं.''

वह तो अपने काम में लग गई और मैं निरुत्तर. न मैं उन अभिभावकों का विरोध/समर्थन कर पाई, न ही रुक्माबाई का.
२४ अगस्त

कोर्ट ने कहा है कि रिमांड के दौरान चिदंबरम की गरिमा का ख्याल रखें. तब तो गिरफ्तारी भी नहीं होना थी, हालाँकि उन्हें गरिमा वगैरह की चिंता दिखाई नहीं देती.हर बार  कैसे मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवा  रहे हैं. आम आदमी के घर पासपोर्ट सत्यापन के लिए भी पुलिस आती है तो आठ-दस चौकन्नी निगाहों से ही उसे उसकी गरिमा खंडित होती लगती  है.
२३ अगस्त

पुरातत्ववेत्ताओं ने उस आदि मानव का पता लगाना चाहिए, जिसने यह खोज की कि हाथों से खाने के अलावा काम भी किया जा सकता है । जितना काम मनुष्य करता है, उतना काम करते हुए कोई प्राणी नहीं दिखता । पक्षी दाना चुगते हैं और मजे से डाली पर बारह महीने सावन के  झूले का आनंद उठाते हैं । जानवर जंगलों में शिकार करते हैं, नदी का पानी पीते है। खेतों में चरनेवाले आराम से खेत चरते हैं । कुछ सामाजिक जानवर चौराहे पर जुगाली करते दिखते हैं । घरों में घूमने वाले कीटक तो खाते-पीते , बतियाते भी हैं । सबसे मूर्ख तो मनुष्य दिखता है , जीवन यापन के नाम पर चौबीस घंटे जुता हुआ ।
२२ अगस्त 
गिरफ्तार तो हुए , लेकिन सामान्य आर्थिक अपराधी की तरह रखा जायेगा या पूर्व वित्तमंत्री को हैसियत के अनुसार पंच तारांकित सुविधाएँ मिलेंगी ?
२१ अगस्त

"मम्मी, आज प्रीति को फोन आ गया था, वह जल्दी चली गई । आपके लिए नाश्ता ऑर्डर कर देता हूँ । " 
"और तू ?"
"मैं ऑफिस के कैन्टीन में खा लूंगा। आपके लिए दोपहर का खाना भी बाद में ऑर्डर कर दूंगा।"
"रहने दे , मैं खिचड़ी बना लूंगी । नाश्ता और खाना दोनों हो जायेगा । ऑर्डर शाम के लिए कर देना । प्रीति बिचारी थकी-मांदी आयेगी , फिर कब बनायेगी ?"

यह संवाद  सुना और लगा कि कहीं तो सुसंवाद की बयार बह रही है और यह बहुत सुखद है ।
१८ अगस्त

माँ के बुढ़ापे को बहुत नज़दीक से देखा था, समझ में अब आ रहा है. 
१७ अगस्त 

१५ अगस्त और २६  जनवरी के झंडे फहराने में दोनों का अलग अलग महत्व और अंतर है। 

पहला अंतर

१५ अगस्त स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर झंडे को नीचे से रस्सी द्वारा खींच कर ऊपर ले जाया जाता है, फिर खोल कर फहराया जाता है,  जिसे ध्वजारोहण कहा जाता है क्योंकि यह १५ अगस्त १९४७ की ऐतिहासिक घटना  को सम्मान देने हेतु किया जाता है जब प्रधानमंत्री  ने ऐसा किया था। संविधान में इसे अंग्रेजी में Flag Hoisting (ध्वजारोहण) कहा जाता है।
जबकि 
२६ जनवरी गणतंत्र दिवस के अवसर पर झंडा ऊपर ही बंधा रहता है, जिसे खोल कर फहराया जाता है, संविधान में इसे Flag Unfurling (झंडा फहराना) कहा जाता है।
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दूसरा अंतर
१५ अगस्त के दिन प्रधानमंत्री जो कि केंद्र सरकार के प्रमुख होते हैं वो ध्वजारोहण करते हैं, क्योंकि स्वतंत्रता के दिन भारत का संविधान लागू नहीं हुआ था और राष्ट्रपति जो कि राष्ट्र के संवैधानिक प्रमुख होते है, उन्होंने पदभार ग्रहण नहीं किया था। इस दिन शाम को राष्ट्रपति अपना सन्देश राष्ट्र के नाम देते हैं।
जबकि
२६  जनवरी जो कि देश में संविधान लागू होने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, इस दिन संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति झंडा फहराते हैं
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तीसरा अंतर
स्वतंत्रता दिवस के दिन लाल किले से ध्वजारोहण किया जाता है।
जबकि
गणतंत्र दिवस के दिन राजपथ पर झंडा फहराया जाता है।
१५ अगस्त 

अब एक जाँच आयोग या समिति बनाना चाहिए,जो यह पता लगाये कि जो काम घण्टों में हो गया वह वर्षों तक क्यों नहीं हुआ या क्यों नहीं किया गया ? संदर्भ -- धारा ३७०
५ अगस्त

कुछ वर्ष पहले मेरे यहाँ हर हफ्ते एक माली आता था । मेरी अनुपस्थिति में यदि वह आता तो दो-चार पौधों में गुड़ाई कर दी , कुछ पत्ते तोड़े कि उसका काम खत्म । कहने को हो जाता था कि मैं तो आया था । 

बारिश भी ऐसा ही कर रही है । सुबह-शाम खूब काले घने बादल आते हैं , थोड़ी बहुत फुहारें आती हैं कि हो गया काम खत्म । कोई  यह न कहे कि बारिश तो आ ही नहीं रही है ।

काश ! तमाम मक्कारों की तरह बारिश को भी नज़रबंद किया जा सकता ।
५ अगस्त

आज एक मराठी धारावाहिक में सलाह दी गई कि हफ्ते में कम से कम एक दिन पति ने रसोईघर सम्हालना चाहिए, ताकि पत्नी को कुछ फुर्सत मिले । सलाह तो नेक है , पर बाकी के छः दिन पत्नी को खाना बनाने के साथ-साथ रसोई व्यवस्थित करने के लिये  भी अलग से समय देना पड़ेगा , उसका क्या ? 
२ अगस्त

राजनीति में जाने का विचार है ।

-- कुछ रेवड़ियाँ बाँटना है 
-- बंदरबाँट करने का मन हो रहा है 
-- भाई - भतीजावाद  हिलोरे ले रहा है 
 
और सबसे महत्वपूर्ण 

-- अपराधियों के प्रति दया भाव उमड़ रहा है ।
१ अगस्त

वरिष्ठ साहित्यकार मंगलेश डबराल कहते हैं कि हिन्दी में लिखने से ग्लानि होती है । काश ! मैं इस भाषा में न जन्मा होता । 

कैसी अजीब सोच है । मेरी और मेरी तरह अनेक लोगों की मातृभाषा हिन्दी नहीं है , लेकिन हमें मातृभाषा इतना ही, बल्कि कुछ ज्यादा ही प्रेम हिन्दी से है । 

कई बार कुछ दफ्तरों से उनकी योजनाओं को लेकर फोन आते हैं और अंग्रेजी में ही आते हैं । मैं उनसे सिर्फ एक वाक्य अंग्रेजी में बोलती हूँ -- Are you Indian ? 
और वह जैसे ही "हां" बोलता है , मैं कहती हूँ हिन्दी में बात कीजिए । कई बार हिन्दी के लिए अड़ जाती हूँ ।

 और ये कैसे साहित्यकार हैं , जिन्हें नाम , दाम , यश , कीर्ती जिस भाषा की बदौलत मिली ,उसके प्रति ग्लानि होती है और वह भी तब जब यही उनकी मातृभाषा भी है । धिक्कार है !
२७ जुलाई

मैं जब स्कूल में पढ़ती थी, तब हमें संस्कृत,हिंदी और अंग्रेजी के शब्दार्थ याद करना पड़ते थे.  देवनागरी की वजह से संस्कृत और हिंदी की वर्तनी तो  नहीं , लेकिन अंग्रेजी शब्दों  के लिए उनकी स्पेलिंग अलग से याद करना पड़ती थी और गलत स्पेलिंग पर डाँट भी पड़ती थी.
जब कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति  यह कहता है कि मोबाईल घर पर रखा था (छूट गया था नहीं), तब मन होता है उसे बिठाकर मोबाईल का अर्थ उसके हिज्जों सहित रटने के लिए बोलूँ. 
२२ जुलाई 

मनुष्य को एक - दो छींकें भी आ जाय तो बाथरूम में टॉवेल ले जाने इतनी भी ताकत नहीं बचती है, लेकिन यदि स्त्री को बुखार भी हो तो वह कुछ अधिक काम इस डर से करती है कि कल कहीं बिस्तर से उठ ही नहीं पाई तो ? क्योंकि स्त्री मनुष्य की श्रेणी में नहीं आती है.
१२ जुलाई 

माँ भविष्य द्रष्टी थीं । कहती थी - सयानों ने मूर्खों के मुंह नहीं लगना चाहिए, जबकि तब तो सोशल मीडिया नहीं था । 😀😀😀
२९ मई 
आज सावरकर का विरोध करने वाले शायद यह नहीं जानते कि 1970 में इंदिरा जी ने उनपर डाक टिकट जारी करते हुए देश के लिए बलिदान देने वाले महान देशभक्त के रूप में सम्बोधित किया था। 

Uday Vasant Dholi की टिप्पणी । 

अब इसका क्या कोई जवाब है ? या यह भी झूठ है ? या इंदिरा गांधी भी गलत थीं ?
२८ मई

स्वतंत्रता यदि बिना खङग बिना ढाल मिली है, तो अब स्वतंत्र भारत में सावरकर या भगतसिंह का नाम आने पर डर किस बात का लगता है ?
२८ मई
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं कि देश विभाजन की संकल्पना सावरकर की थी, जबकि सब जानते हैं कि स्वातंत्र्य वीर सावरकर ने आजीवन "अखंड भारत" का सपना देखा । 

#अजब #नेता##गजब #ज्ञान#
२८ मई

अधिकांश समाचार वाहिनियों के अनुसार सुबह 6 बजे से वे चुनाव परिणाम बतायेंगी । उनके लिए मतगणना शायद रात में ही शुरू हो जायेगी । हम तो भैया नहा - धोकर , खा-पीकर ही टीवी खोलेंगे , परिणाम चाहे कितनी भी बजे आये । 
मतदान भी खाली पेट, परिणाम भी खाली पेट । ऐसा थोड़े ही होता है !!! 😀😀😀
२२ मई

जो लोग पानी खरीदने के लिए  सक्षम हैं , उनके लिए कोई समस्या नहीं है । उनके यहाँ दो/तीन कूलर चलते हैं, गाड़ियाँ धुलती हैं, कपड़े धुलते हैं, आरओ का खराब पानी बहता है, बगीचे तर रहते हैं, पूरा परिवार दोनों समय नहाता है , आदि आदि । इसका अर्थ यह हुआ कि पानी की वास्तव में कमी नहीं है , कमी व्यवस्था में है । पानी पर सबका अधिकार है, फिर वह सबको क्यों नहीं मिलता ? उसका अधिकतम वितरण कुछ निजी हाथों में क्यों है ? उन पर सरकारी नियंत्रण क्यों नहीं है ? जिन टैंकर से पानी बँटता है, वे भी एक तरह से अवैध ही होते हैं । ट्रैक्टर से सिर्फ खेती की जा सकती है, लेकिन उनसे खुलेआम पानी बाँटा जाता है ।
कुल मिलाकर यह कि युग कोई भी हो, सरकार किसी की भी हो -- समरथ को नहीं दोष गुसाईं । समर्थ, समर्थ रहेगा  और असमर्थ रोते - झींकते जिंदगी काटेगा ।
२२  मई 

जब भी सांप्रदायिक तनाव या दंगों की बात होती है , तब स्वाधीनता के समय हुए हिन्दू - मुस्लिम संहार, सन चौरासी के सिख संहार या इस शताब्दी में हुए गोधरा कांड की चर्चा होती है , लेकिन गांधी हत्या के बाद हुए   चितपावन ब्राह्मणों के संहार को अक्सर भुला दिया जाता है । क्यों ? जबकि उस समय तो गाँव के गाँव जला दिये गये थे और न सिर्फ चितपावन ब्राह्मण , बल्कि देशभर में बसा संपूर्ण महाराष्ट्रीय समाज दहशत में जी रहा था ।
२१ मई 

अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए कई इमोजी हैं । एक और होना चाहिए , जिससे यह व्यक्त हो सके -- "आप मूर्ख हैं ! "
२१ मई 

दो दिन पहले मैंने देशभक्ति पर लिखा था । दूसरे दिन कांग्रेस के एक कट्टर समर्थक से मुलाकात हो गई । उस युवा ने मुझसे कहा -- काकू !(आंटी) गोडसे तो ठीक , हम तो भगतसिंह को भी देशभक्त नहीं मानते । भगतसिंह ने देश के लिए ऐसा किया ही क्या था ?
मैं तो सुनकर दंग रह गई । ये कैसा विचार प्रवाह है ? मैंने उसे समझाने की कोशिश भी की कि महज २३ साल की उम्र में कोई हँसते-हँसते फांसी के फंदे पर चढ़ जाता है और तुम उसे देशभक्त नहीं मानते ?  वे जीवित रहते तो शायद और भी कुछ कर गुजरते , लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ ।
२०  मई 

चष्मे को पहले मराठी में "चाळीशी" कहा जाता था, यानि चालीस वर्ष की आयु में दृष्टि कमजोर होने से जिसकी जरूरत आ पड़ती है । चष्मा लगाने के बाद साफ दिखाई देने लगता है और समयानुसार उसका नंबर बदलता रहता है, लेकिन अब लोग एक ही चष्मा चढ़ा लेते हैं और उसे पहने रहते हैं । समय के अनुसार उसे बदले जाने की आवश्यकता को समझते ही नहीं है, इसी वजह से प्रत्येक बात को  अपने ही दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करते रहते हैं , चाहे उसका कोई औचित्य न हो ।
१७ मई 

एक तो आदतन अपराधी और परिस्थिति जन्य अपराधी में फर्क होता है दूसरे, कोई भी अपराधी, चाहे उसने कोई जघन्य अपराध किया हो, देशभक्त क्यों नहीं हो सकता ?
अपराध किसी की देशभक्ति का पैमाना नहीं हो सकता । वह अक्सर किसी अन्य के कृत्यों का परिणाम होता है , जबकि देशभक्ति एक अंदरूनी भावना होती है ।
१७ मई

दूरदर्शन की राष्ट्रीय वाहिनी पर रोज दोपहर 3 से 4 बजे तक एक अनुपम कार्यक्रम आता है -- महिला किसान सम्मान । इस कार्यक्रम में ऐसी महिलाओं को सम्मानित किया जाता है , जो अपने दम पर खेती-बाड़ी कर जीवन यापन कर रही हैं । प्रतिदिन अलग - अलग महिलाओं की विस्तृत जानकारी मिलती है । उनका जीवन वृत्त देखकर उनके द्वारा किए गए संघर्ष का पता चलता है । दूरदर्शन की जो टीम ऐसी महिलाओं को खोज खोज कर लाती है, वह बधाई की पात्र है । कोई सुदूर पूर्वोत्तर की तो कोई सुदूर दक्षिण की । सामान्यतया वे अनपढ़ होती हैं । उन्हें न हिन्दी आती है और न ही अंग्रेजी । इसलिये उनके लिये दुभाषिया की व्यवस्था होती है । वे अपनी कहानी सुनाती हैं , उन पर बना एक छोटा-सा वृत्त चित्र दिखाया जाता है और बाद में सामने बैठे कृषि विशेषज्ञ उनसे कुछ सवाल उनके उत्पादों के बारे में पूछते हैं । इस दौरान उन महिलाओं का आत्मविश्वास देखते ही बनता है ।

 मेरा तो रोज ही जी चाहता है कि उठकर उन्हें और दूरदर्शन के इस कार्यक्रम की निर्माता को  सलाम करूँ ।
१४  मई

चुनाव के माहौल में अक्सर यह जुमला चल पड़ता है कि यदि आप मतदान नहीं करते हैं , तो विरोध करने का अधिकार नहीं है । क्यों नहीं है ?
कैसी सब्जी बनाई है , कहनेवाले क्या खुद सब्जी बनाते हैं ?😀😀 
११  मई 

अब मुझे पंखे, कूलर और एसी पर दया आने लगी है । इन दिनों बेचारे दिन - रात हमारी सेवा में जुटे रहते हैं ।
९ मई

वे भ्रष्ट हैं, ये चोर हैं
और हम क्या हैं ?
हम नितांत मूर्ख, बेवकूफ और अक्ल से पैदल हैं ।
८ मई 

माँ कहती थी कि ''घटा घटा पाणी नको पिऊस. खाली बैस.'' यानि पानी एक सांस में मत गटको. नीचे बैठकर धीरे धीरे पियो. बचपन में माँ की बात मानना मज़बूरी थी. बड़े हुए तो लगा -- बेकार की बातें हैं और  इतना समय भी कहाँ हैं ? 

अब यही छोटी-छोटी काम की बातें यु ट्यूब पर सैंकड़ों की तादाद में मौजूद हैं. हम उन्हें देखते हैं, लाइक करते हैं और सब्स्क्राइब भी करते हैं अर्थात जो बातें बड़े - बुजुर्ग प्यार से, स्नेह से, चिंता से, चलते-फिरते यूँही सिखा देते थे, अब हम उनको खरीदकर निहाल होते हैं.
४ मई

पिछले लगभग 12/14 साल से मेरी बेटी ,अपने भाई के लिए कमीज, टी शर्ट, कुर्ते आदि लाती/भेजती रही है, साथ ही पुणे के खास पकवान भी लाती रही है, लेकिन कपड़ों का नाप कभी सही नहीं बैठा और पकवान बेटे को अक्सर पसंद नहीं आते । अब सोचती हूँ कि बेटी को कहूँ ,प. बंगाल चली जाय और दीदी से प्रशिक्षण ले लें।
२५ अप्रैल

आज पुराने घर का अखबारवाला मिल गया....पूछने लगा--कैसी हो भाभी ?....."भाभी"...बरसों बाद किसी बाहरी व्यक्ति का ऐसा भीगा-सा  संबोधन सुना...वर्ना मेडम,मेम और बहुत हुआ तो आंटी.....सुनते-सुनते रुक्षता आ गई थी…
१९ अप्रैल 

हमारा देश धर्म, जाति और लिंग की सोच से बाहर कब निकलेगा ? यह प्रश्न बिल्कुल बेमानी  है, क्योंकि हमारे राज्यकर्ता इसी आधार पर चुने जाते हैं, हम उन्हें चुनते हैं । हमारा समाज भी इन्हीं घटकों में बँटा हुआ है और आर्थिक लाभ का आधार भी अंततः यही होता है ।
१७ अप्रैल 

पिछले हफ्ते तापमान ४० डिग्री पर तप रहा  था और आज सुबह २६ डिग्री पर सुखद लग रहा था। जीवन  भी कितना सुखद हो जायेगा यदि  ४० वर्ष का  अनुभव हो और ऊर्जा  २६ की रहे।
१६ अप्रैल

किसी भी युद्ध में स्त्री को लक्ष्य बनाना आदिम परम्परा है और कुछ लोग उस परम्परा का निर्वाह पूरी निष्ठा से करते हैं ।
१५ अप्रैल

कल रात हवा बन्द, फिर बिजली बन्द, उस वजह से पानी बन्द, एसी बंद, कूलर बंद, मोबाईल की बैट्री बंद । इनवर्टर के भरोसे पंखा चालू था और खुद में दम बचा था, सो सुबह जीवित पाये गये ।
१५ अप्रैल

"आपके लिये और चाय बना दूँ ?" "नहीं" घर आये मेहमान का यह संक्षिप्त उत्तर गृहिणी के लिए असीम राहत भरा होता है , चाहे मेहमान मायके से ही क्यों न आया हो । क्योंकि चाय सिर्फ एक कप नहीं बनती और भी दावेदार ऐन समय पर तैयार हो जाते हैं और  चाय नामक एक काम जितनी देर में निपटता है , उतनी देर में तो दूसरे दो - तीन काम हो जाते हैं ।
३ अप्रैल

जो धर्म के नाम से डरते हैं वे धर्मभीरू कहलाते हैं और जो धर्म के नाम से डराते हैं, वे राजनेता ।
३ अप्रैल 

उन कमांडो पर दया आती है, जिन्हें मन के भाव छुपाकर निर्विकार चेहरे से, आगे खड़े नेताओं के कैसे-कैसे भाषण सुनना पड़ते हैं।
२ अप्रैल 

मैं तो एक आम नागरिक हूँ और किसी एक दिन की मोहताज नहीं हूँ । रोज ही मूर्ख बनती हूँ ।
१ अप्रैल 
तमाम वाहिनियों का चक्कर लगाने के बाद दूरदर्शन की शरण में जाना हमेशा सुखद होता है,चाहे डीडी नेशनल हो, डीडी भारती हो या डीडी सह्याद्री। जैसे आकाशवाणी का कोई सानी नहीं , वैसे ही दूरदर्शन लगभग हमेशा उच्च स्तर के कार्यक्रम प्रसारित करता है ।
३१  मार्च 
कामवाली बाई यह पिछली सदी में तेजी से अस्तित्व में आया शाश्वत सत्य है और उसका आना/नहीं आना अगली सदी तक चलने वाली चिरंतन समस्या है ।
३१ मार्च 
 जिस व्यक्ति का गुस्सा सामान्य तौर पर सातवें आसमान पर रहता हो , उसे और अधिक गुस्सा आने पर वह कहाँ जाता होगा ?
२९ मार्च 
बहुत बहुत पहले मुझे रा.स्व. संघ की विचारधारा पढ़ना और उनके बौद्धिक सुनना बेहद पसंद था। लाल बहादुर शास्त्री से लेकर नरसिंह राव तक कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी अच्छे लगते थे । इंदिरा गांधी  तो मुझे परम प्रिय थीं , आज भी कुछ मामलों में मैं उनकी प्रशंसक हूँ । अटल जी , लालकृष्ण आडवाणी के सम्मोहन में भी बंधी रही । इंदिरा गांधी की तरह अटल जी भी मुझे आज भी प्रिय हैं । मेरी ही समझ में नहीं आता कि मैं संघी हूँ, कांग्रेसी हूँ, भाजपाई हूँ, दक्षिण पंथी हूँ , आखिर क्या हूँ ?
किसी की भक्त नहीं हूँ, इतना पक्का जानती हूँ  (और यह भी कि अब एक रेला इस पोस्ट पर आनेवाला है )।
२८ मार्च 

कल एसी की सर्विसिंग करवाई तो जो बंदा आया था , वह बोला --
"आपका वारंटी पीरियड तो खत्म हो गया है , फिर आपने कम्पनी को क्यों फोन किया ? मेरा नंबर ले लीजिये , अगली बार मुझे ही फोन कर देना ।"
मेरी ओर से कोई सकारात्मक प्रत्युत्तर न मिलने पर थोड़ी देर बाद उसने नया पांसा फेंका -- "आपको सर्विसिंग के बिल की जरूरत तो नहीं होगी ?"
मैंने कहा - "क्यों नहीं ? मुझे बिल चाहिए ।"
"आंटी बिल में जीएसटी जुड़ेगा , तो पैसे ज्यादा लगेंगे ।"
"लगने दो , कोई भी टैक्स चुराना मैं ठीक नहीं समझती ।"
"आप बीजेपी की हैं क्या ? " अंतिम प्रश्न
कर चुकाने का बीजेपी से क्या सम्बन्ध है , सारी रात मंथन के बाद भी समझ नहीं पाई हूँ , जबकि बिल और कॅश मेमो मैं हर हाल में लेती हूँ और यह मेरी पुरानी आदत है ।
२७  मार्च 

किस किसको सुधारें ? 

लगभग चार दशक से हम जिन ''गुंदेचा बंधु''ओं से ध्रुपद सुन रहे थे, उन्हें दूरदर्शन भारती ने ''गुंडेचा'' कर दिया. 

अंग्रेजी मूल भाषा की तरह प्रयोग हो रही है और अनुवादक न तो भाषा जानते हैं, न किसी क्षेत्र का ज्ञान है और न ही शुद्धता के प्रति जागरूकता और प्रतिबद्धता है. 

मनोहर पर्रिकर की अंतिम यात्रा के समय ''पणजी'', कुछ वाहिनियों पर  ''पानजी'' और कुछ पर ''पांजी'' हो गया था. 

इसी तरह पुलवामा के दौरान  नौसेना के ''रविंद्र नाडकर्णी'' , आर. नादकर्णी कर दिये गये.

२५  मार्च

जैसे खेलने - खाने की उम्र होती है, वैसे ही सोने की भी उम्र होती है, इसलिये बेकार ही हम तो , हमारे समय में तो आदि राग अलापने की बजाय बच्चों को, युवाओं को यथासंभव सोने देना चाहिए ।
पता नहीं कब उनकी आँखों की नींद उड़ जाय । 
२४  मार्च 

हमारे मुद्रण माध्यमों का एक नटखट बच्चा है, जिसमें आज के मेरे राशिफल में छपा है --'' धन का आवागमन होगा यानि ''.धन आकर चला जायेगा'', अब  मेरी यह समझ में नहीं आ रहा है कि ख़ुशी मनाऊँ या दुःख ? लेकिन प्यारा  प्यारा बच्चा भी क्या करे ? उसे मालूम ही नहीं है कि  आगमन और आवागमन में  अंतर होता है.
अभी तक हम यही समझ रहे थे कि शैतान बालक  पिछले कई वर्षों से सिर्फ  हिन्दी के उद्धार में जुटा हुआ है, लेकिन ऐसा नहीं है, अब उसकी दृष्टी व्यापक हो गई है. आज के नगर पृष्ठ पर ( सिटी पेज लिखने की धृष्टता करने के लिए मैं कोई उसके जैसी अबोध  थोड़े ही हूँ) एक  शीर्षक है--ब्लाइंड्स के लिए बनाई IOT आधारित स्टिक. वैसे तो अंग्रेजी में मेरा हाथ तंग है, लेकिन इतना जानती हूँ कि ब्लाइंड का बहुवचन ब्लाइंड पर्सन  होता है. ब्लाइंड्स अलग होती हैं.
और अंत में एक शानदार पंक्ति. मन की आवाज में ब्रह्माकुमारी शिवानी लिखती हैं--हम रात को देर से सोते हैं तो सुबह ''लेट से'' उठेंगे.
टीप --- सन ५८ में पैदा हुए और सर्वाधिक प्रसार संख्या का मुकुट धारण करने के बाद भी , अपने अंदर के अबोध बच्चे को जीवित रखना बड़ी बात है ।
२३  मार्च 

कुछ लोगों की अक्ल तापमान की तरह होती है । कभी-कभी शून्य से भी नीचे चली जाती है ।
२२ मार्च 

कविता पाठ के लिए आमंत्रित किये जाने पर, जो अंतिम क्षण तक यह तय न कर पाएं कि उसे कौन-सी कविता पढ़नी है, वही सच्चा कवि है !
१६ मार्च 

हम यह सोचते हैं कि आचार संहिता राजनीतिक दलों के लिये लागू होती है , लेकिन हमेशा की तरह हम यानि जनता गलत होती है । आचार संहिता दरअसल जनता के लिये लागू होती है। इस अवधि में जनता के हितार्थ सारे काम बन्द होते हैं । किसी भी शासकीय कार्यालय में सामान्य कामकाज के लिये चले जाइये , एक ही जवाब मिलता है -- आचार संहिता लागू हो गई है , जबकि मेरी अल्प बुद्धि के अनुसार अधिकारी और आम आदमी इसके दायरे में नहीं होना चाहिये ।
१५  मार्च 

पृथ्वीलोक  से स्वर्गारोहण करनेवाले समस्त  भूलोकवासियों में से कुछ को सिर्फ यह जानने के लिये  पुनर्जन्म लेना पड़ेगा कि सामाजिक माध्यमों पर आनेवाले सभी समाचार, सूचनायें, जानकारियाँ,ज्ञान वाणी ,वक्तव्य,उपदेश, सात दिन में ३ किलो वजन कम करने,एक हफ्ते में बाल घने होने या २ मिनिट में घुटने का दर्द ठीक करनेवाले नुस्खे वगैरा सत्य नहीं होते. यहाँ तक कि ख़लील जिब्रान,प्रेमचंद,महादेवी वर्मा,हरिवंशराय बच्चन,अमृता प्रीतम,गुलज़ार आदि के नाम से प्रसारित होनेवाली रचनाएँ भी उनकी नहीं होती.  🙂🙂🙂
१३ मार्च 

आज भाजपा नेता कांग्रेस की शिकायत करने चुनाव आयोग गये थे , जिनमें निर्मला सीतारमण, रविशंकर प्रसाद आदि थे । रक्षामंत्री होने के नाते निर्मला सीतारमण का कद निश्चित ही बड़ा है , लेकिन महिला - पुरूष साथ-साथ हों तो जो दृश्य होता है , वैसा ही आम दृश्य था । रविशंकर प्रसाद आगे-आगे और ......

मंत्री होंगी अपने मंत्रालय में , हमें उससे क्या ?
१३ मार्च 

त्रुटियाँ निकालना स्वभावगत विशेषता है । छोटी थी तो लाड़ से कहा जाता था--इसे तो हर चीज निराली चाहिए । विवाह के बाद इस स्वभाव को "मीन मेख निकालने" की श्रेणी में डाल दिया गया । कुछ उम्र बढ़ने पर वही "आलोचना" बन गया और अब बालों की सफेदी, चेहरे की झुर्रियाँ देखकर "मार्गदर्शन" जैसा सम्मानित दर्जा मिल गया है । 
९मार्च 

कृपया महिला दिवस की बधाई न दें , उस दिन की शुरुआत क्यों हुई थी उसे जाने समझें और सबसे बड़ी बात स्त्री सिर्फ एक लिंग नहीं , व्यक्ति है , यह भी मानें ।
पूरे वर्ष  का मात्र  00.27 प्रतिशत औपचारिक कालखण्ड अस्वीकार्य है ।
७मार्च 

दिन भर टीवी के सामने गुजरा , जैसे तैसे खाना बनाया । बहुत स्वादिष्ट लगा । अभिनंदन शब्द ही ऐसा है ।

१ मार्च 


मैं वहाँ किसी काम से गई थी । अपनी बारी की प्रतीक्षा में बैठी थी । मुझसे थोड़ी दूरी पर दो युवतियाँ बैठी थीं । उनकी धीमी आवाज में चल रही बातचीत के कुछ शब्द सुनाई दे रहे थे , जिससे उनकी बातचीत के विषय कपड़े , फैशन, मेकअप , फिल्म आदि पता चल रहे थे । एक युवती बात करते हुए लगातार मोबाइल पर आँख गड़ाये थी ।
मुझे अंदर बुलाया गया, लौटकर आई तो मेरी जगह कोई और बैठा था । मुझे थोड़ी देर और रूकना था । उन युवतियों के पास जगह खाली थी , मैं वहीं जाकर बैठ गई । मेरे बैठते ही मोबाइल वाली युवती ने मुस्कुराकर मेरा अभिवादन किया  , तो मैंने सहज ही उससे पूछा -- आपके मोबाइल पर समाचार देख सकते हैं क्या ?
मेरा वाक्य पूरा होते न होते उसका जवाब तैयार था -- आंटी ! अभिनंदन के बारे में जानना है क्या ? आज छोड़ रहे हैं । मैं इतनी देर से वही देख रही हूँ ।
मैं अवाक , हतप्रभ , मुदित , हर्षित न जाने क्या-क्या ....
पूरा समय फैशन , कपड़े जैसे विषयों पर बात करने वाली उस सजग युवती से बात कर मुझे बहुत अच्छा लगा । वह न सिर्फ अभिनंदन के बारे में जानती थी , बल्कि नचिकेत और सौरभ कालिया के बारे में भी जानती थी। 
१ मार्च 

राष्ट्रीय समर स्मारक को टीवी पर देखा । बहुत अच्छा लगा । देश के लिए प्राण न्यौछावर करनेवाले हुतात्माओं को आदर पूर्वक स्मरण करने का बेहतरीन  स्थान देखकर मन भर आया , पर बलिदानियों के नाम  अंग्रेजी में लिखे हैं , मन यकायक खट्टा हो गया। 

हे ईश्वर ! सम्बन्धित अधिकारियों को माफ करना । ( मैं तो नहीं कर पाऊंगी )
२५ फरवरी 

वह काम का पूछने आई थी । मुझे जरूरत तो नहीं थी , फिर भी ऐसे ही उसकी जानकारी लेने लगी । उसने बताया - हम खरगोन के हैं । आदमी ज्यादा काम नहीं कर सकता ।
क्यों ? 
शादी के एक महीने बाद ही एक ट्रक ने पीछे से टक्कर मारी और उसका पैर कट गया । छोटे मोटे काम करता है , पर पुराता नहीं है ।

और मायका ? 

माँ है और दो भाभियाँ हैं ।

भाई ? 

नदी में पूर आया तो एक भाई बहा और उसको बचाने में दूसरा भी बह गया ।

मैं दहल गई । फिर पूछा -- कुछ पढ़ी-लिखी हो ? 

तीसरी तक पढ़ी हूँ , फिर पापा बीमार हुए तो स्कूल छोड़ना पड़ा ।

अरे ? अब कैसे हैं पापा ? 

दोनों भाई शांत हुए तो छः महीने बाद ही पापा भी चले गये । 

तुम्हारे बच्चे ? 

दो हैं , पर एक के दिल में छेद है ।

आगे कुछ और पूछने की हिम्मत ही नहीं हुई । हम अपने छोटे छोटे दुखों को भी कितना सहलाते रहते हैं और यहाँ तो सुख या खुशी दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रही थी ।

७ फरवरी

एक धारावाहिक - मेथी की एक गड्डी , दो धारावाहिक - पालक की एक गड्डी और दो/तीन गट्टे लहसून, तीन धारावाहिक एक किलो मटर । एक दिन टीवी देखो , अगले दो-तीन दिन आराम से कट जाते हैं । 
मुझे हमेशा यह सवाल सताता है कि जो महिलाएँ कहती हैं कि हम टीवी नहीं देखते या कुछ घरों में बच्चों की पढ़ाई के लिये केबल कटवा दिया जाता है , वहाँ ये सब काम कौन और कैसे करता होगा ? 😁😁
६ फरवरी 

लिखना - पढ़ना और बाई का आना / न आना , इन क्रियाओं का आपस में अटूट सम्बन्ध है ।

१फरवरी


ये शानदार हिन्दी देखिये !

 मुझे ग्वालियर की एक शिक्षिका ने मित्रता अनुरोध भेजा था , उसकी भित्ति पर यह देखा और अनुरोध अस्वीकार कर दिया । शिक्षिका यदि ऐसा लिखती हो तो भाषा का क्या होगा ?

शाला शा बालक उ मा वि ग्वालियर मे गणत्त्र दिवस की कुछ झलकियॉ।
२९ जनवरी 

एक स्त्री का अपना कोई अस्तित्व नहीं , यह सर्वोच्च न्यायालय भी कहता है । एक निर्णय के अनुसार वह यदि पति के धर्म को कुबूल नहीं करती है, तो पत्नी नहीं कहलायेगी । गजब की कुंठाएं भरी पड़ी हैं । 
 
ऐ औरत ! तू लौट जा अठारहवी सदी में ।
२३ जनवरी

महिला की गरिमा को ध्यान में रखकर सर्वोच्च न्यायालय का आदेश आया है कि बार में डांस के दौरान नर्तकी पर पैसे न उछाले जाय , वहाँ शराब न परोसी जाय आदि ।
लेकिन मूलभूत प्रश्न यह है कि डांस बार होना ही क्यों चाहिए ? वहाँ जिस तरह से अंग विक्षेप के साथ नृत्य होता है , क्या उससे किसी महिला की गरिमा को ठेस नहीं पहुँचती ?
१८ जनवरी 

अ.भा.मराठी साहित्य सम्मेलन में नयनतारा सहगल विवाद के बाद , स्थानीय स्वर्गीय किसान की पत्नी वैशाली येडे ने उदघाटन भाषण दिया । वे जो बोली बेहद संवेदनशील था , यद्यपि न तो वे साहित्यकार है और न ही अधिक पढ़ी-लिखी हैं ।
 
एक बात तो बहुत सकारात्मक और महिलाओं के पक्ष में कही कि हमें किसी की विधवा कहकर कमतर आंका जाता है , जबकि हमें अकेली महिला कहा जाना चाहिए ।
१२ जनवरी 


 



 



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