जंगल का राजा कहलाने वाला शेर अपने भोजन की व्यवस्था खुद करता है । भोजन के बाद वह पानी पीने भी खुद ही जाता है । शेरनी से नहीं कहता कि जरा एक गिलास पानी पिलाना । 😊😊😊
३ दिसम्बर
कल मैंने इवांका के इस बयान "ऐसी टेक्नोलॉजी बने जिससे महिलाएँ रसोईघर से ही काम कर सकें" के सन्दर्भ में महिलाओं को रसोई तक सीमित करने के विरोध में एक पोस्ट लिखी थी। उस पर देखिए कैसी शानदार टिप्पणियाँ आईं हैं और दुखद पहलू यह है कि इनमें से कुछ टिप्पणियाँ महिलाओं की भी हैं।
----- महिला को प्राकर्तिक रूप से बनाया ही चीजों को मैनेज करने के लिए है.
----- महिलाएं भी कहाँ मानती हैं कि ये काम महिलाओं का नहीं
----- स्त्री अन्न पूर्णा है,ईश्वर की सर्वोत्तमरचना है।वह आर्थिक कार्य के साथ साथ भी रसोई कुशलता से समहाल सक्ती है.
-----Alaknanda tai, I admit that my wife and even my daughter in law r both great housewife as well as they are handling their jobs either at home or by going to office. I think now the female should not carry with them the sense of inferiority. They r great and will remain great for all the time to come.
----- ताई रसोईघर तो स्त्री का गहना है
----- रसोई को खाना बनाने तक सिमित नहीं माना जाना चाहिए .....वहाँ भी ज्ञान का अथाह भण्डार है / रसोई के बिना जीवन नहीं हो सकता /
----- महिलाओं को यदि इसका वेतन मिले तो इसमें बुरी बात क्या है ? बात होनी चाहिए हर श्रम का मूल्य होना चाहिए !
------ ताई खुद कल सुबह किचन में घुसी होगी ।
----- .रसोई का असली ज्ञान तो महिलाओं के पास है ........
----- स्त्री स्वयं ही रसोई से बाहर निकलना नहीं चाहती. रसोईघर ही उनका घर होता है और वही उनकी प्रयोगशाला.
------स्त्री ईश्वर की श्रेष्ठतम रचना है। वो वैसी ही अच्छी है।
मैंने कहीं सुना था कि मेरा देश बदल रहा है. ......क्या वाकई ?......
१ दिसम्बर
"ऐसी टेक्नोलॉजी बने जिससे महिलाएँ रसोईघर से ही काम कर सकें":इवांका
ये वक्तव्य भले ग्लोबल आंत्रप्रेन्योरशिप समिट जैसे आयोजन में एक शक्तिशाली अमेरिकन महिला द्वारा दिया गया हो , लेकिन इसमें वही आदिम विचार छुपा हुआ है कि महिला की प्राथमिकता रसोई है और रसोई ही होना चाहिए ।
लेकिन इस बयान से आज वे पुरूष जरूर खुश होंगे , जो अर्थार्जन के लिए बड़ी तादाद में घर से निकल रही महिलाओं को देखकर इस बात से आशंकित थे कि अगले दशक में कहीं उन्हें रसोई न संभालना पड़े । वे महिलाएँ भी संतोष अनुभव करेंगी जो यह समझती हैं कि बाहर निकलकर काम करने वाली महिलाएँ मौज मस्ती करती हैं ।
कुल मिलाकर हवा जैसी बह रही थी, वैसी ही बहती रहेगी ।
३० नवम्बर
साॅरी या थैंक्यू से ज्यादा असरदार शब्द है,सहमत । सीधे बोलती ही बंद कर देता है ।
३ नवम्बर
पुराने मकान में सब तरह के प्राणी आते थे । सांप, बिच्छू, गिरगिट, छिपकली, केंचुआ , मेंढक , बिल्ली, चूहा आदि । कभी कभी वे घर के अंदर भी आ जाते थे । मेरा ऐसा विश्वास है कि किसी प्राणी को जब तक हम छेड़ते नहीं हैं , वे हमें कुछ नहीं करते । ये मेरा विश्वास आज तक टूटा नहीं है । बच्चे डरते थे तो मैं कहती थी , पलंग या सोफे पर चढ़ जाओ । ये जैसे आए हैं , वैसे ही चले जाएंगे । वे सचमुच दीवार के सहारे सहारे बाहर चले जाते थे , लेकिन जाते समय वे कई बार नज़र उठाकर देखते तक नहीं थे तो बड़ा अपमानित अनुभव होता था ।
१ नवम्बर
अपने से कई वर्ष छोटे युवक को बेटा कहना/मानना बंद कर दूं ? मैं उम्र के किसी भी मोड़ पर सिर्फ स्त्री और मेरे सामने खड़ा पुरूष, सिर्फ पुरूष यह स्वीकारना बेहद मुश्किल है । इतना आदिम होना कैसे संभव है ? कोई भाई लगता है , किसी में बेटा दिखता है । कोई मित्रवत है तो कोई मात्र व्यक्ति । अपनी भावनाओं को संकुचित कर उसे सिर्फ आदमी मानूं और अपने बचे खुचे स्त्रीत्व को बचाने के लिए उससे बचती फिरूं ? कल से बहुत उद्विग्न हूँ । अपने-आप को कैसे तैयार करूं कि चाहे १०० बरस की हो जाऊं , रहूंगी मैं सिर्फ स्त्री ही ।
संदर्भ : कल शायद मेरठ में या और कहीं , मैं भूल रही हूं, एक १०० वर्षीय महिला से २५ वर्ष के लड़के ने बलात्कार किया और उस महिला की मृत्यु हो गई ।
३१ अक्टूबर
जिस स्थान से उन्हें नाम मिला, दाम मिला, मान मिला, सम्मान मिला,यश मिला, कीर्ति मिली उस स्थान को बचाने की मुहिम में शामिल होना उन्हें अपनी तौहीन लगी ।इस शहर में अहिल्या पुस्तकालय और प्रीतमलाल दुआ सभागृह से लाभान्वित होनेवाले साहित्यकार, संगीतकार, चित्रकार, छायाकार, रंगकर्मी, संस्कृति कर्मी हजार की संख्या में होंगे , लेकिन इन दोनों स्थानों को जमींदोज किए जाने की कार्रवाई का विरोध करने के लिए आहूत मौन प्रदर्शन में ५० लोग भी नहीं आये । वाह ! अपने हुनर के प्रति क्या शानदार संलग्नता है ! क्या समर्पण है और क्या सम्मान है ! तारीफ में शब्दकोश छोटा पड़ जायेगा ।
१३ अक्टूबर
भोपाल का दुष्यंत कुमार संग्रहालय टूटेगा, इंदौर का अहिल्या पुस्तकालय टूटेगा । समय के प्रवाह में कुछ नष्ट होता है तो वह समझ में आता है , लेकिन जान बूझकर विरासत को नष्ट करना कौन-सी समझदारी है? क्या अब उज्जैन , ग्वालियर जैसे सांस्कृतिक विरासतों से समृद्ध शहर निशाने पर होंगे ?
१२ अक्टूबर
अमिताभ बच्चन मुझे भी बहुत प्रिय हैं , पर बुरा लगा कि कल से किसी ने भी जयप्रकाश नारायण और जगजीतसिंह को याद नहीं किया ।
११ अक्टूबर
फिर छिड़ी रात बात फूलों की जैसी कई खूबसूरत गज़लों और तलत अज़ीज़ के साथ दूरदर्शन ने बेगम अख्तर का जन्मदिन मनाया।
दूरदर्शन न होता तो हम हनीप्रीत में ही उलझे रहते ।
७ अक्टूबर
संविधान ने अभिव्यक्ति का अधिकार दिया तो सोशल मीडिया ने उसकी क्षमता विकसित की है ।
४ अक्टूबर
आमचे वडील कै. र.वि.शिरढोणकर यांच्या स्मृतीत ३९ वर्षांपासून ग्वाल्हेरला होत असलेला कार्यक्रम काही अडचणींमुळे जेंव्हा भोपाळला करायचे ठरले, तेंव्हा पहिल्या वर्षी अनेक जणांशी भेट झाली, काहींची नावाने ओळख होती ती प्रत्यक्ष झाली.कार्यक्रमानंतर परत जाताना खूप आनंदाने, उत्साहाने लोक भेटायला येत होते, आवर्जून तारीफ करत होते, पण एक वयस्कर बाई शेवट पर्यंत आपल्या जागीच बसून राहिल्या. मला फार विचित्र वाटले. घरी गेल्यावर मी भावाला म्हटले --''इतक्या सगळ्यांनी कौतुक केले, पण त्या बाई कोण होत्या ? अजिबात हलल्या नाहीत.''
भाऊ जोराने खेकसला.शेवटी मोठा भाऊ (वय वर्ष ६६ आणि मी धाकटी बहीण वय वर्ष ५६) --''तुला माहित नाही त्या किती मोठ्या आहेत ?''
''मी ओळखत नाही रे'' माझा कधी नव्हे तो मिळमिळीत आवाज.
मग त्याने नाव सांगितले, तेंव्हा माझी चूक मला कळून आली.
पुढील वर्षी काही कौटुंबिक अडचणीमुळे मला जाता आले नाही. त्या पुढील वर्षीच्या कार्यक्रमात त्या बाई दिसताच मला मागची आठवण झाली. कार्यक्रम सुरु होण्यापूर्वीच वक्तशीरपणे त्या हॉलवर पोहचल्या होत्या. मी लगेच पुढे झाले आणि त्यांना स्वतःची ओळख करून दिली.तशा त्या चटकन म्हणाल्या -- ''अगं ! मी ओळखते तुला. त्या वर्षी तू संचालन केले होते न ?'' त्या माझ्यापेक्षा नक्कीच खूप मोठ्या होत्या, पण इतक्या चटकन एकेरी हाक दिल्याने आपुलकी जाणवली आणि
मीही नकळत खाली वाकून नमस्कार केला--काकू, नमस्कार करते. काकूंशी झालेली ती ओळख मग घट्ट नात्यात कधी बदलली कळलेच नाही.
काकूंसोबतच्या अनेक आठवणी काल पासून मनात रुंजी घालत आहेत. मी मार्चमध्ये भोपाळला गेले होते, तेंव्हा खूप आग्रहाने घरी बोलाविले आणि त्यासोबत एक प्रेमळ ताकीद होती--सुनेला पण घेऊन ये.आम्ही दोघी गेलो तर मला साडी दिली व माझ्या सुनेला अत्यंत नाजुक भरत कामाचे स्वतः केलेले रुमाल दिले.मी त्यांना म्हटले- काकू, तुमच्या नातसुनेला तुम्ही इतके छान रुमाल दिले , ते ठीक आहे, पण मला साडी कशाला ? त्या जे म्हणाल्या ते अगदी मनात कोरले गेलेय --अगं ! तुझा भाऊ गेला , पण भोपाळ अजूनही तुझे माहेर आहे. मग माहेरवाशिणीला साडी नको का ? मला काही बोलताच आले नाही. नंतर मी जून मध्ये ती साडी नेसले होते, त्याचे फोटो त्यांना पाठविले तर म्हणाल्या --आता कधी येणार ? एक सुंदर साडी तुझ्यासाठी घ्यायची आहे, ही तर मी घरातलीच दिली होती. नाही म्हणू नकोस.पण तो योग आलाच नाही.
काकूंनी दिलेली साडी आणि सोबत आता फक्त आठवण.
अजूनही विश्वास होत नाहीय की म. प्र. मराठी साहित्य संघाच्या अध्यक्ष, अनेक भाषांच्या ज्ञात्या, मध्यप्रांतांत मराठीच्या आधार स्तंभ आणि त्याही पलीकडे कोणाच्या ताई, काकू, मावशी ,आजी असलेल्या अनुराधा जामदार Anuradha Jamdar काल आम्हा सर्वांना पोरकं करून दूरस्थ प्रवासाला निघून गेल्या.
काल पासून लिहू लिहू म्हणत होते, पण पाणावल्या डोळ्यांनी आणि थरथरत्या हातांनी असहाय्य्य केलं. विनम्र श्रद्धांजली.
४ अक्टूबर
लोग अपने पालतू कुत्ते से अंग्रेजी में और एक ही शब्द दुहराकर क्यों बात करते हैं? नो नो, कम कम, सिट सिट आदि, वहीं सड़क के कुत्ते से ठेठ भाषा में एक ही बार - हट ।
२ अक्टूबर
मुझे उन पुरूषों की मानसिकता समझ में आती है ,जो खाना पसंद न आने पर थाली पटक देते हैं या बिना खाए उठकर चले देते हैं । दरअसल उनकी यह खीज असहायता को दर्शाती है , क्योंकि उन्हें खाना बनाना नहीं आता और जो परोसा जाता है वह खाना पड़ता है ।
जब कोई धारावाहिक देखती हूं तो मेरी स्थिति ठीक ऐसी ही होती है । कभी मैं रिमोट पटक देती हूँ , कभी उस धारावाहिक को बिना देखे टीवी बंद कर देती हूं । मैं भी असहाय अनुभव करती हूं । मुझे भी धारावाहिक बनाना नहीं आता और वे जो परोसते हैं , वह देखना पड़ता है ।
१ अक्टूबर
78 साल की आयु में कोई किसी राज्य का पालक बन सकता है तो हम 60 वर्ष की उम्र में किसी बैंक की किसी शाखा का एक काउंटर नहीं संभाल सकते ?
हमें सेवानिवृत्ति और उन्हें पुरस्कार ? ये कैसा समानाधिकार ?
३० सितम्बर
माते!अगले वर्ष पुकार सुनने नीचे आ जाना। नहीं आ सको तो प्रशासन के कान में ठुंसी रूई निकालकर जरा तेल डाल देना ।
#जागो#प्रशासन#इंदौर
३० सितम्बर
अभी मैंने सुबह 6 से 9 और शाम 6 से 11 धारा 144 लगा रखी है। न कोई आये, न फोन करे।कौन क्या बोल रहा है,सुनाई तो दे ।
#जागो#प्रशासन#इंदौर
२९ सितम्बर
देखो ! हम तो बहुत सीधे-सादे, भोले-भाले हैं । हमारा कभी कोई दोष नहीं होता और हमारी प्रजाति ने भला कभी कोई गलती की है ? अब मोह किसे नहीं होता ? ऋषि मुनी तक इस जाल से नहीं बच पाये हैं । तुम इत्ते छोटे छोटे कपड़े पहनोगी तो फिर हमारी क्या बिसात ? नज़र उठती भी है, फिसलती भी है और अनजाने में न जाने क्या-क्या हो जाता है । अच्छा , सच्ची सच्ची बताओ ! तुम यह सब जान बूझकर करती हो न ? कभी हमें सताने के लिए साड़ी में लिपट कर घूंघट वगैरा काढ़ लेती हो । फिर हमें भी एक सहज स्वाभाविक इच्छा होती है कि ऐसा क्या छुपा कर रखा है ? तुम बेकार शोर करती हो । इतना यदि यह गलत होता तो हजारों साल में करोड़ों फांसी पर नहीं चढ़ जाते?
एक असली बात और । हमारी दिदीया और छुटकी बिलकुल माँ जैसी है , तो हम तो बाबूजी जैसे होंगे कि नहीं ? बाबूजी अब करते नहीं है कुछ , पर मौसी , मामी और पडौस की चाची वगैरह को देखते तो हैं । हमने उनसे ही तो सीखा है , फिर हम गलत कैसे ?
जाते - जाते एक ताकीद भी दे रहे हैं कि कभी हमारे बारे में मत कहना कि कमीज के बटन खुले रहते हैं ,पेंट नीचे खिसक जाती है या निवृत्त होने के लिए कहीं भी खड़े हो जाते हैं । दोष तो हमेशा तुम्हारा ही रहेगा । हमारे पक्ष में बहुत लोग हैं जिनमें तुम्हारी प्रजाति भी शामिल है ।
आ गया समझ में ? नहीं आया हो तो अक्ल ठिकाने लगाना भी हमें आता है ।
२७ सितम्बर
इन दिनों अक्सर मैं लोक परिवहन का उपयोग करती हूं । मैं जब बाहर निकलती हूं उस समय ज्यादातर स्कूल काॅलेज के बच्चे रहते हैं । मैंने लड़के और लड़कियों के व्यवहार में एक विशेष अनुभव किया कि जब भी लड़के अपने स्थान से उठते हैं तो कई बार उनकी पेंट पीछे की ओर से नीचे खिसक जाती है और अंतर्वस्त्र अंदर से झांकते हैं। उन्हें न होश रहता है और न ही परवाह । यदि किसी लड़की की नज़र पड़ती है तो वह तुरंत नज़र हटा लेती है, किन्तु लड़कियों के साथ ऐसा नहीं होता । अमूमन तो लड़कियाँ बहुत ध्यान से और सजगता से अपने कपड़े संभालती हैं , पर कभी उनका दुपट्टा थोड़ा भी फिसल जाय या टाॅप जरा नीचे हो जाय तो वह तुरंत ठीक करती है , लेकिन उतनी- सी देर में भी कोई एक लड़का ऐसा नहीं होता जो लगातार उसकी ओर नहीं देख रहा हो।
२७ सितम्बर
जब हमारे परिवार बड़े होते थे तो छोटे-मोटे अवसरों पर भी ४०-५० लोगों का इकट्ठा होना आम बात थी । खूब हँसी ठिठोली, शोर शराबा होता था , लेकिन बीच-बीच में घर-परिवार के बड़े बुजुर्ग टोकते रहते थे - "धीरे ! आवाज बाहर न जाए ।" रात को छत पर अंताक्षरी के समय भी ये हिदायत रहती थी-- "देखो! आस-पडौस में लोग सो रहे हैं।"
अभी के बड़े कैसे हैं ? स्वयं शोर करते हैं और बच्चों को भी उसमें शामिल करते हैं ।
#जागो #प्रशासन #इंदौर
२६ सितम्बर
कोई बच्चा जरा जोर से बोले तो अक्सर माँएं डपट देती हैं - धीरे बोल, मैं बहरी नहीं हूँ। आदि माता के कान तो पूरी तरह से नाकाम हैं। सुबह ६ से रात के १२-१ बजे तक बच्चे चीखते-चिल्लाते रहते हैं , पर नौ-दस दिन बाद भी आवाज नहीं पहुँचती और बच्चे बिचारे मायूस होकर अगले ३५५ दिनों तक स्वर संधान में लगे रहते हैं ।
#जागो# #प्रशासन# #इंदौर#
२५ सितम्बर
बहुत सारे शब्दों को अब उनके मूल अर्थ से अलग अर्थ में प्रयोग किया जाता है जैसे गुरू,भाई,दादा,आदि। कुछ दिनों से मैं दो शब्द ऐसे ही अलग अर्थों में प्रयुक्त होते सुन रही हूं--मान सम्मान और आवभगत । मान सम्मान यानि कीमत में छूट और आवभगत यानि अग्रिम भुगतान । मैं तो कभी इन अर्थों के बारे में सोचती भी नहीं , यदि मेरा इनसे पाला नहीं पड़ता।
१२ सितम्बर
पत्रकारिता में बिलकुल नई नई थी । उ.मोईनुद्दीन खाँ साहब को कोई पुरस्कार मिला था । शास्त्रीय संगीत मेरा विषय होने के कारण मुझे उनका एक साक्षात्कार लेना था। उस समय लैंड लाइन फोन तक सामान्यतया नहीं थे । मुझे सिर्फ उनका मोहल्ला बताया गया और कहा गया वहाँ जाकर मकान ढूंढो । मैं जैसे ही उस गली में घुसी , सहम गई । बकरीद नजदीक थी और वहाँ के सारे घरों में उसे साफ महसूस किया जा सकता था । मैं एक ऐसे ब्राह्मण परिवार से थी , जहाँ प्याज लहसून खाना भी आम नहीं था । खैर मैं किसी तरह उस्ताद साहब के घर पहुँची। डरते सकुचाते कुंडी खटखटाई । साधारण कुर्ता पायजामा पहने एक व्यक्ति ने बाहर आकर सौम्य मुस्कुराहट के साथ पूछा - कहिए ! पता चला वे ही उस्ताद साहब हैं । उन्होंने मेरी घबराहट भांप ली । बोले - आ जाओ ! और पूछो क्या पूछना है । उनकी धीमी आवाज और सरल हँसी से मेरा डर ऐसा काफूर हुआ कि करीब डेढ़ घंटे तक मैं उनसे बात करती रही । बाद में उनके उस घर में और फिर आकाशवाणी परिसर के घर पर भी जाना हुआ । धर्म और जाति की पुरानी मान्यताओं को उम्र की परिपक्वता ने ध्वस्त किया तो उनके यहाँ चाय भी पी , लेकिन इन सबकी शुरुआत होने में उस्ताद मोइनुद्दीन खां साहब की उस सौम्य और आश्वस्त मुस्कुराहट का बहुत बड़ा योगदान था ।
ऐसे विनम्र व्यक्तित्व को सादर श्रद्धांजलि !!
१२ सितम्बर
यदि आप टीवी का स्वीच ऑन करके पंखे की ओर देखते हैं कि चालू हुआ कि नहीं ? तो निश्चित ही बुढ़ापे में प्रवेश की मुनादी है ।
११ सितम्बर
स्कूल कॉलेज में पढाई के दौरान रीति काल के कवि, भक्ति काल के कवि,छायावादी, आधुनिक , उत्तर आधुनिक कवि मालूम थे. अब उपहास की शैली में नया नामकरण भी हो रहा है. फेसबुकिये कवि, व्हाट्स ऐपिये कवि. फिर उनका मजाक भी उड़ाया जाता है. जबकि फेसबुक और व्हाट्स ऐप पर भी गंभीरता और पूरी संवेदनशीलता के साथ लिखने वाले मौजूद हैं. सोशल मीडिया के पहले के काल में जैसे उत्कृष्ट, अच्छे और सामान्य कवि होते थे, वैसे ही अब भी हैं. कागज पर लिखने वाले सारे श्रेष्ठ नहीं थे और नेट चलाने वाले सारे निकृष्ट नहीं हैं.
आजकल एक प्रसंग को लेकर नेट सेवी कवियों की खूब खिल्ली, तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा उड़ाई जा रही है. कुछ दिन पहले किसी नए कवि ने, किसी पुराने कवि से भूल वश मुक्तिबोध का व्हाट्स ऐप नंबर मांग लिया. इस बात से सहमति है कि उसे मुक्तिबोध की जानकारी होना चाहिए, पर यदि उसे नहीं है तो कोई अपराध नहीं है. वह यदि लिखता है तो वह लेखक/कवि है. मुक्तिबोध को नहीं जानता इसलिए उसके लिखे को ख़ारिज करना या उसे कवि नहीं मानना और उसकी खिल्ली उड़ाना इसमें कौन- सी बुद्धिमत्ता है ? फेसबुकिये कवि, व्हाट्स ऐपिये कवियों की तरह फेसबुकिये आलोचक और व्हाट्स ऐपिये आलोचकों की भी बाढ़ आई हुई है और विडम्बना यह है कि वे अपने आप को सर्वश्रेष्ठ मान रहे हैं, जबकि फेसबुकिये कवि, व्हाट्स ऐपिये कवियों में इस तरह की कोई ग्रंथि नहीं है.
९ सितम्बर
इन दिनों सोना कम खरीदा जा रहा है और उसकी वजह कमजोर फसल व धन की तंगी बताई जा रही है, मुझे लगता है कि दिनों दिन बढ़ रही सामाजिक असुरक्षा भी इसका एक कारण है.
९ सितम्बर
आकाशवाणी के ९० वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में सह्याद्रि वाहिनी पर एक कार्यक्रम आ रहा था, उसमें उन्होंने महाराष्ट्र के विभिन्न आकाशवाणी केंद्रों के स्टाफ से बातचीत को भी प्रसारित किया. एक केंद्र के सहायक निदेशक (केंद्र और निदेशक दोनों के नाम याद नहीं आ रहे) ने एक बढ़िया जानकारी दी कि ''आकाशवाणी से प्रसारित होनेवाले समाचार आज भी विश्वसनीय होते हैं. भले कुछ देर हो जाय लेकिन पूरी जाँच पड़ताल के बिना समाचार प्रसारित नहीं होता और यही वजह है कि इतने वर्षों में एक बार भी आकाशवाणी को किसी मामले में माफ़ी नहीं माँगना पड़ी है और न ही किसी समाचार का खंडन करने की नौबत आई है.''
यह सचमुच बेहद प्रशंसनीय है . व्यावसायिक लाभ जुटाने में लगे अख़बारों और टीवी चैनल ने इसका अनुसरण करना चाहिए.
९ सितम्बर
ये मैंने 4 सितंबर को लिखा था और मैं देख रही हूं कि 6 सितंबर से अमिताभ बच्चन अत्यंत स्वाभाविक तरीके से प्रणाम स्वीकार कर रहे हैं । यह कमाल शायद मेरी पोस्ट चुराने वालों की वजह से हुआ होगा ।
#4# #सितंबर #की #पोस्ट
अमिताभ बच्चन जब से कौन बनेगा करोड़पति का संचालन कर रहे हैं , कोई प्रतियोगी उनके पैर छूता है तो वे बोलते हैं - ये मत कीजिए । यूं तो आजकल गर्दन हिलाकर और बहुत हुआ तो आधे अधूरे पैर छूकर अभिवादन करना चलन में है । मुझे तो अच्छा लगता है जब कोई तरीके से चरण स्पर्श करता है । हमारी संस्कृति का पालन करने में आपत्ति क्यों होना चाहिए ?
८ सितंबर
आलस करने का भी जिसे आलस आये तो उसे क्या कहना चाहिए ?
८ सितंबर
बैंकों में जैसे स्थायी निर्देश होते हैं, वैसे ही समाज में कुछ लोग सदैव क्षमाप्रार्थी होते हैं । उनकी वह अति विनयशील मुद्रा जुगुप्सा उत्पन्न करती है ।
७ सितंबर
सोशल मीडिया पर की जाने वाली शाब्दिक हिंसा और बौद्धिक यातना की शिकायत के लिए लगता है शीघ्र ही अलग से थाना खोलना जरूरी हो जाएगा।
६ सितम्बर
किसी विचार का विरोध करने वाले को अक्सर वैयक्तिक विरोधी समझ लिया जाता है ।
६ सितम्बर
प्रेम क्या होता है ?
मैं कहूं कि मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है और तुम लाड़ से हँस दो
५ सितम्बर
पड़ौस का मुन्ना राजा (उम्र सिर्फ साढ़े तीन वर्ष) का आज सुबह बर्तन मांज रही कला से मौलिक प्रश्न --
कला दीदी , आपके घल बल्तन नहीं है ?
हैं न
तो फिल आप हमाले यहाँ बल्तन मांजने क्यों आती हो ?
५ सितम्बर
स्मार्ट सिटी का खिताब पाने के लिए भोपाल में दुष्यंत कुमार का घर ढहा दिया गया । इसके पहले शरद जोशी, शानी , त्रिलोचन के घर भी जमींदोज किए जा चुके हैं । कोई सड़क बनानी हो और रास्ते में धार्मिक स्थल आता हो तो बरसो बरस उसे बचाने/ हटाने की मशक्कत की जाती है । सरकार कोई भी हो वह सबसे पहले वोट बैंक का ध्यान रखती हैं , लेकिन सरकार के विरोध में पुरस्कार वापस करनेवाले बेतुके साहित्यकार इस मामले में चुप्पी साध गये हैं । सरकार चाहे कांग्रेस की हो या भाजपा की, बात-बात में उसे फासिस्ट वगैरा ठहराने वाले, हमेशा 'इस खतरनाक समय' का रोना रोने वाले तथाकथित देश प्रेमी और देश की चिंता में दुबले हुए जा रहे समस्त पंथी अब 'हाथ की घड़ी मुँह पर ऊंगली' की मुद्रा में हैं । आये दिन अखबारों और अब सोशल मीडिया को भी अपने फोटो से गुलजार करने वाले तमाम लेखक/लेखिका संघों के मुँह में ऐसे मौकों पर दही जम जाता है। ये ही लोग इन्ही सरकारों से धन ऐंठकर विदेश यात्रा कर आते हैं और लौटकर शेक्सपियर के संरक्षित आवास के गुण गाते हैं ।
व्यवहार का दोगला पन हर जगह हावी रहता है ।
५ सितम्बर
अमिताभ बच्चन जब से कौन बनेगा करोड़पति का संचालन कर रहे हैं , कोई प्रतियोगी उनके पैर छूता है तो वे बोलते हैं - ये मत कीजिए । यूं तो आजकल गर्दन हिलाकर और बहुत हुआ तो आधे अधूरे पैर छूकर अभिवादन करना चलन में है । मुझे तो अच्छा लगता है जब कोई तरीके से चरण स्पर्श करता है । हमारी संस्कृति का पालन करने में आपत्ति क्यों होना चाहिए ?
४ सितंबर
मन में कुछ नहीं रखना चाहिए, बोल देना चाहिए.
बहुत बोलती है. सब बात बोलना जरुरी है क्या ?
१ सितंबर
गणेश प्रतिमा के साथ जितना और जैसा खिलवाड़ आज तक हुआ है, उतना और वैसा किसी और देवता के साथ नहीं हुआ है. दो दिन पहले मेरे पास एक वीडियो आया, जिसमें गणेश की मूर्ती के साथ कोई बटन था और दर्शनार्थी द्वारा उसे दबाते ही गणेशजी उठकर उसे आशीर्वाद देते हैं. प्रचलित मान्यताओं के अनुसार स्थापना के बाद विसर्जन तक मूर्ती को हिलाते नहीं है. फिर गणेशजी का इस तरह खड़ा होना श्रद्धालुओं को कैसे रास आता है ? इसी तरह कभी स्लेट-बत्ती,कभी कंप्यूटर. कभी क्रिकेट कभी फुटबाल, कभी पगडी कभी साफा और नवीनतम मोदी जी के साथ कुर्सी पर, ऐसे विविध रूपों में गणेश जी उपलब्ध हैं.वे क्या कोई खिलौना है ? इससे आस्था पर चोट नहीं पहुंचती ? मुझे तो ऐसी मूर्ती के सामने हाथ जोड़ने की भी इच्छा नहीं होती. एक सिलसिला और चल निकला है, अपने घर की मूर्ती और सजावट को सोशल मीडिया पर प्रसारित करने का. व्हाट्स ऐप पर तो हम तुरंत उनको रद्दी समझकर डिलीट भी कर देते हैं. क्या यह देवता का अपमान नहीं है ? और अपने घर की , अत्यंत निजी क्रिया को इस तरह सार्वजनिक बनाने का क्या औचित्य होता है ? यह श्रद्धा है या मात्र दिखावा ?
सार्वजनिक गणेशोत्सवों की कथा तो और भी निराली है. पता नहीं अब कितने लोग जानते होंगे कि सार्वजनिक गणेशोत्सव मनाने की शुरुआत १२५ साल पहले लोकमान्य तिलक ने सोद्देश्य की थी. वह उद्देश्य तो खैर समाप्त हो गया पर गरिमा को तो बचाया जा सकता है. आरती हिंदी में अलग, मराठी में अलग, दोनों भाषाओं में जितनी तरह से गायी गई हो, उतनी सारी आरतियां प्रस्तुत होती है.प्रसाद में भी दिखावा. तुमने ५०० रु किलो की मिठाई बांटी , मेरी बारी आने पर ७०० रु की आएगी. फिर माइक और डीजे की अलग कहानी है.
समाज विकृति की परतों को गिनना मुश्किल है और उससे पार पाना असंभव.
३० अगस्त
एक सर्व सामान्य नौकरी पेशा व्यक्ति अपनी नौकरी के दिनों में मार्क्स का प्रशंसक होता है और अपने आप को सर्वहारा समझता है.सेवा निवृत्ति के बाद एक मुश्त इतना पैसा हाथ में आता है कि वह स्वयमेव पूंजीवादी हो जाता है. बाजार उस पर हावी होने लगता है. यकायक उसका हाथ खुल जाता है और अत्यंत दार्शनिक अंदाज में उठते बैठते जैसे खुद को ही समझाता है -क्या करना है अब पैसा बचाकर. लेकिन ये जुनून कुछ समय बाद खत्म होकर फिर वह धार्मिक हो जाता है और कभी कभी धर्म निरपेक्ष भी.
जीवन में इस तरह के बदलाव आते रहते हैं, बेहतर है कि हम किसी को वामपंथी,किसी को दक्षिणपंथी, किसी को अंधविश्वासी, किसी को कट्टरपंथी कहकर तानाकशी न करें.किसके विचार कब बदल जायेंगे , नहीं कहा जा सकता और हरेक कुछ न कुछ अंशों में यूँ भी वामपंथी, दक्षिणपंथी, कट्टरपंथी, अंधविश्वासी आदि सबका मिलाजुला रूप ही होता है.
२९ अगस्त
कुछ वर्ष पहले आहार विशेषज्ञ मुट्ठीभर बादाम खाने की सलाह देते थे.जैसे जैसे महंगाई बढ़ती गई, वे बादाम की मात्रा कम करते चले गए.अब कहा जाता है कि रोज चार बादाम भी काफी है. लेकिन जिन्हें रात को बादाम भिगोने और सुबह छीलकर खाने में आलस आता हो, उनके लिए तो ये भी भारी है.ये विचित्र चक्र है.बादाम खाएंगे तो फुर्ती आएगी, फुर्ती आएगी तो बादाम भिगोयेंगे,भिगोयेंगे तो खाएंगे और खाएंगे तो ही फुर्ती आएगी, लेकिन कुल जमा बात इतनी कि भिगोना जरुरी है.अब आलस उसी का तो आता है.फिर ???😀😀😀
२८ अगस्त
सारे माध्यम मालिकाना हक के और सारे कर्मी उनके चाकर । राजनीतिक,आर्थिक,सामाजिक, धार्मिक तमाम विकृतियों के लिए यह चौथा खंभा भी जिम्मेदार है । पलड़ा इधर या उधर झुका रहता है ।
२६ अगस्त
स्त्रियों के अपराधियों के लिए, चेलों चपाटों के साथ सरेआम फांसी का कानून बनना चाहिए ।
२५ अगस्त
चार वर्ष पुरानी पोस्ट है, लगता नहीं कि कहीं कुछ बदला है ।
बच्चियो ! हमने गलती की , तुम्हें पढाया - लिखाया , तुम्हें कहा शिक्षा तुम्हें सब कुछ देगी , तुम आर्थिक रूप से सक्षम बनो , अवसरों को चुनो . हमने तुम्हारे मन में कहीं यह बात गहरे से उतार दी बेटियो ! कि हमारा जमाना अलग था अब तुम्हें शाम ढले घर आने की जरुरत नहीं है , गर्दन झुकाकर चलने की जरुरत नहीं है , हमने तुम्हें पंख दिए , उड़ना सिखाया , बताया तुम्हें कि हमें तो जमीन पर चलने की भी इजाजत नहीं थी , पर तुम्हारे सामने अनंत आकाश है ,तुम हमारे लिए बेटे जैसी बेटी नहीं हो , तुम हमारी संतान हो , तुम एक इंसान हो , हमने तुम्हें गलत सपना दिखाया , हमने तुमसे कहा समाज बदल रहा है , मुक्ति की सांस लो , यह तो बता दिया कि नजरिया बदल रहा है , पर यह बताना भूल गए कि नज़र वही है बेटियो ! माफ़ करना बच्चियो हमने तुम्हें आगाह नहीं किया , पर डटी रहना , पीछे बिलकुल नहीं हटना , अब खुद ही सीखो वह सब जो हम सिखा नहीं पाए, बन्दूक उठाओ , खंजर उठाओ , तलवार घुमाओ , विश्वास सब पर रखो , पर चौकन्ने रहकर , सजग रहो , बलशाली बनो , उठो ! उठो ! बच्चियो , बेटियो उठो ! जागो ! हाथ से सब कुछ छूट जाये , उसके पहले संभलो , पर रुकना नहीं , झुकना नहीं, डरना नहीं , बिलकुल भी नहीं …
२३ अगस्त
अंजली कंपनी ने बरसों पहले "निर्लेप" तवा बनाया जिस पर कुछ चिपकता नहीं है यानि एक तरह से निर्लिप्त जिसे किसी बात से कोई लेना-देना नहीं होता और मिजाज इतना नाजुक कि जरा से में खरोंच आ जाय ।
अंजली से हजारों-लाखों वर्ष पूर्व भगवान ने भी एक ऐसा ही उत्पाद दुनिया में उतारा , जो बाद में पति कहलाया ।
२३ अगस्त
स्त्री/पत्नी वामांगी यानि एक तरह से वामपंथी, तो पति/पुरूष दक्षिणपंथी ?
२२ अगस्त
बारिश के मौसम में कीचड़ से बचते-बचाते चलना आसान है,पर कैलोरी गिनते हुए खाना बहुत मुश्किल है। बहुत ही मुश्किल ।
२१ अगस्त
मेरे घर में खिड़कियाँ बहुत हैं । तेज बारिश आती है, तो पुरानी फिल्मों की नायिकाओं की तरह मैं उन्हें बंद करने दौड़ पड़ती हूं । फिल्मों में क्या होता था , पता नहीं क्योंकि बाद में वह गाना वाना भी गाती थी । मेरे साथ तो अक्सर यह होता है कि गाना तो दूर, पूरी खिड़कियाँ बंद हो, इसके पहले ही बारिश रूक जाती है । 😁😁😁
२० अगस्त
जब यहाँ नई नई आई थी तो किसी की टिप्पणी देखती 6 ,8,10 hours ago, तो गिनने लग जाती-यानि कितने बजे ?बचपने का उम्र से क्या वास्ता ?
१८ अगस्त
एक पुरूष के माता-पिता ही सामान्यतया उसके अभिभावक होते हैं , लेकिन स्त्री के साथ ऐसा नहीं होता ।
इस मामले में पुरूष विपन्न है और स्त्री संपन्न ।
स्त्री के अभिभावकों में प्रमुख रूप से मनु के प्रसिद्ध श्लोक वाले वे तीन तो हैं ही इसके अलावा पारिवारिक अभिभावक , सामाजिक अभिभावक, समुदाय अभिभावक, जातीय अभिभावक, राजनीतिक अभिभावक, राष्ट्रीय अभिभावक आदि भी होते हैं और अब एक नई प्रजाति आई है -- सोशल मीडिया अभिभावक ।
१८ अगस्त
पहले माँ और बाद में सासू माँ कहती थीं -- रात को जूठे बर्तन नहीं रखना चाहिए । हाथोंहाथ साफ करो । तब लगता था कि क्या फर्क पड़ता है यदि सुबह धो लिए तो ?
अब जाकर समझ में आया कि वे भी क्या करतीं ? उस समय लाल हिट और काला हिट जो नही था ।
१६ अगस्त
कुछ लोग इतना बेतुका और इतना ज्यादा बोलते हैं कि लगता है जोर से चिल्लाकर कहूं -- चुप !
१६ अगस्त
झंडा वंदन करने गई तब यह नहीं पता था कि साहित्य आकाश में आज झंडा आधा झुकाने की नौबत आयेगी । व्हाटस ऐप का पटल बधाइयों से भरा पड़ा था और इसी बीच एक साहित्यिक समूह पर चंद्रकांत देवताले जी के निधन की सूचना । विश्वास ही नहीं हुआ । कुछ दिन पहले बात हुई थी तो बता रहे थे कि बहुत ज्यादा स्मृति भ्रंश होने लगा है । मैंने कहा - दादा , मुझे भी शुरू हो गया है । तो बोले - कितना मजा आयेगा जब कोई हमारा परिचय करवायेगा ।
आप यूं परिचय के क्षेत्र से बाहर चले गए । शब्द रूँध रहे हैं दादा !
१५ अगस्त
व्हाटस ऐप पर कुछ संदेश तो शायद इसलिए आते हैं कि उनके नीचे लिखा रहता है -ज्यादा से ज्यादा शेयर करो ।
वैभवलक्ष्मी या धनलक्ष्मी की मानसिकता अभी तक गई नहीं है ।
१४ अगस्त
हर मुस्लिम अपराधी नहीं है और न ही हर हिंदू के मन में नफ़रत है ।
जागो ! लोगो जागो !
१४ अगस्त
जब कभी शाम को दरवाजा कई बार खुलता/बंद होता है तो बगीचे के मच्छर घर में तफरीह करने चले आते हैं. आप कहीं बैठे हैं तो वे आपको घेर लेते हैं.बड़ी देर तक भिनभिनाते हुए जायजा लेते हैं.सीधे काटते नहीं हैं.जब ऐसा लगे कि अब काटनेवाले हैं तब वहां से उठ जाना चाहिए. दूर खड़े होकर मच्छरों के मजे लेना चाहिए. अचानक उठने से मच्छर अचकचा जाते हैं. वे घूम घूमकर आपको ढूंढने लगते हैं. फिर उनका एक दूसरे से वार्तालाप शुरू होता है.
उन्हें ताज्जुब होता है कि ३/४ लीटर खून अभी यहाँ था , कहाँ चला गया ?
१३ अगस्त
कुछ दिनों से अच्छा नहीं लग रहा था। चिकित्सकीय परीक्षण से पता चला कि खून में टमाटर की कमी हो गई है ।
१२ अगस्त
आँखों पर चश्मा और बालों में सफेदी देखकर कुछ लोग सोचते हैं कि शायद दिमाग और कान भी कमजोर है
तेज आवाज में समझा कर बात करते हैं ।
११ अगस्त
यह कर लूं , फिर वह करती हूं। यही सोचते सोचते उम्र निकल गई । पता चला कि यह हुआ ही नहीं , तो वह भी रह गया ।
५ अगस्त
उन्होंने पूछा - आप सुबह घूमने नहीं जाती ?
मैंने कहा - नहीं , मैं शाम को जाती हूं । सुबह उठकर मुझे पढ़ना अच्छा लगता है ।
उनकी प्रतिक्रिया -- इस उम्र में पढ़ाई ?
३ अगस्त
आज एनडीटीवी पर भाषा पर एक बढ़िया कार्यक्रम था।प्रसिद्ध भाषाविद गणेश एन देवी ने अनेक जानकारियाँ दी , उनमें दो बेहद रोचक थी ।
१. भोजपुरी सर्वाधिक विकसित भाषा है
२. अकेले मुंबई में ३०० भाषाएं बोली जाती हैं ।
३ अगस्त
२९ जुलाई को मैंने अपना प्रोफ़ाइल पिक्चर बदला तो अभी तक उस पर ५३५ लाइक्स और ११८ प्रतिक्रियाएं आ चुकी हैं.निश्चित ही मुझे अच्छा लगा.हरेक की प्रतिक्रिया से मुझे कुछ अलग अनुभूति हुई, लेकिन इसके साथ साथ दुःख की एक परत भी जुडी रही.
ठीक एक दिन पहले मशहूर पु.ना.गाडगीळ के ''मेरा मंगलसूत्र मेरा स्वाभिमान'' इस टैग लाइन वाले एक विज्ञापन का निषेध करते हुए मैंने Swaraangi Sane की लिखी एक पोस्ट शेयर की उस पर महज ५९ लाइक्स और १६ प्रतिक्रियाएं आईं.अर्थात प्रोफ़ाइल पिक्चर के मुकाबले लाइक्स का प्रतिशत लगभग ९ और टिप्पणियों का लगभग ७ रहा.मेरी मित्रता सूची में अधिकांश प्रबुद्ध हैं, लिखने पढ़नेवाले हैं,किन्तु सामाजिक सरोकार के प्रति यह गहन उदासीनता मुझे बींध गई. स्त्री के प्रति गहरी संवेदनशीलता दर्शानेवालों का खोखलापन सामने आ गया. दुखद पहलू यह रहा कि स्त्रियों ने भी इसे नजर अंदाज किया.जितने लाइक्स और टिप्पणियां मेरे चित्र को मिलीं, उनसे आधी भी इस पोस्ट पर मिलती तो मैं उनके भरोसे मेरे शहर की पु.ना.गाडगीळ की दुकान पर जाकर अपनी घोर आपत्ति दर्ज कर आती. उसका प्रभाव कुछ अलग ही होता.
स्त्रियों के साथ घर में,परिवार में, समाज में दुर्व्यवहार क्यों होता है , यह जानने के लिए ज्यादा दूर जाने की जरुरत नहीं है.विमर्श जैसे भारी भरकम नाम देने की तो बिलकुल ही नहीं है.
२ अगस्त
रोटी बेलते बेलते जब लकड़ी के चकले का पाया अचानक टूट जाता है , तब सड़ी गली व्यवस्था का वास्तविक अर्थ समझ में आता है ।
२ अगस्त
गठबंधन ने दलबदल को पीछे धकेल दिया ।
२७ जुलाई
अपाहिज विपक्ष वाले लोकतंत्र को ,क्या लोकतंत्र कहा जा सकता है ?
२७ जुलाई
चाहे गूगल हो या भगवान मुक्ति ऑफलाइन के बाद ही मिलती है ।
२७ जुलाई
बैंक से सेवानिवृत्त हुए भी काफी समय हो गया है , लेकिन अभी तक "ग्राहक" नहीं बन पाई हूं ।
मैं अब भी पेन लेकर बैंक जाती हूं ।
२६ जुलाई
आलसी होना वामपंथी होता है या दक्षिणपंथी ?
२४ जुलाई
सोशल साइट्स पर बने रहने का एक लाभ तो है कि आप बिना कुछ किए दिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के हो जाते हैं ।
२२ जुलाई
आजकल किसी विषय पर चल रही बहस , किसी एक को लक्ष्य बनाकर वैचारिक से यकायक वैयक्तिक में बदल जाती है ।
१७ जुलाई
चाय के साथ बिस्कुट खाते हुए आज भी बचपन याद आता है. बचपन में चाय नहीं मिलती थी. दसवीं के बाद पहली बार चाय पी.दोनों समय दो-दो बिस्कुट जरूर मिलते थे और वे परिवार के किसी बड़े की चाय में डुबोकर खाने की अनुमति होती थी.चाय का उतना भर स्वाद चखने को मिलता था. उसके बाद मन मसोसकर दूध पीना पड़ता था.विद्रोह करने की चंद कोशिशों को बल पूर्वक दबा दिया जाता था. बिस्कुट भी दो यानी दो ही.पैकेट अपने हाथ से कभी खोलना तो दूर छूने को भी नहीं मिलता था.आज भी एक बार में तीसरा बिस्कुट खाने की हिम्मत नहीं होती . माँ सिर्फ आँख दिखाकर मना करती थी. तीसरा बिस्कुट लेते समय लगता है , माँ जरूर कहीं से देख रही होगी.
उस समय घरों में गजब का अनुशासन होता था और उसका पालन भी तत्परता से किया जाता था.
१४ जुलाई
अभी तक कभी खाना बनाने के लिए बाई रखने का मन नहीं हुआ , वैसी नौबत भी नहीं आई , लेकिन कल ऐसे ही एक से पूछा खाली रोटी बनाने का क्या लेती हो ?
पहले तो एक पूरी प्रश्नावली आई । कितने लोग हैं ? एक समय या दोनों समय ? कितनी बनवाएंगी ? सारी गणना के बाद जवाब आया -- एक समय और बारह रोटी का आठ सौ रूपया ।
सुनकर चौंक गई । मन ही मन हिसाब लगाया तो पता चला इस दर से पिछले 40-45 साल में मैं तो साढ़े चार-पांच लाख रूपयों की रोटी बेल चुकी हूं ।
१२ जुलाई
पाकिस्तान के विरुद्ध महिला क्रिकेट टीम ने शानदार जीत दर्ज की , लेकिन कोई हल्की-सी लहर तक नहीं उठी । पुरूष टीम जीतती तो सैलाब आ जाता ।
खेलों में भी नाइंसाफी । भाई लोग कम से कम इस क्षेत्र में तो खेल भावना बरतते ।
२ जुलाई
आज एक मराठी धारावाहिक में बेटा सुबह जल्दी जाग जाता है तो चाय बनाने लगता है । माँ उठकर आती है और बड़ी खुश होती है । माँ को यह चिंता भी होती है कि बहू कहीं बीमार तो नहीं है ?
मेरा बेटा भी कभी-कभी सुबह उठकर चाय बनाता है तो मेरी सबसे पहली चिंता तो यह होती है कि कहीं दाल-सब्जी की भगोनी तो नहीं ले ली ? फिर सोचती हूं अदरक धो कर डाला होगा न ? घी के लिए मलाई इकट्ठा करती हूं तो दूध लेने से पहले मलाई अलग की या नहीं ? कप कौन-से निकाले ? वगैरा वगैरा ....
चाय का मजा और बेटे का प्रयास इन चिंताओं में बह जाते हैं । उधर वह एक माँ है , जो घर में घूम घूमकर बड़े उत्साह से सबको यह खबर सुनाती है ।
हे भगवान ! कर्कशा माँ से ऐसी सरल ह्रदया माँ मैं कब बनूंगी ?
३० जून
जामुन खाने के बाद आईने में जीभ देखने का मजा ही कुछ और है ।
३० जून
मन, भैया ! उदासी वगैरा छोड़ो । कविता लिखने का अभी कोई इरादा नहीं है ।
२९ जून
जयप्रकाश चौकसे के स्तम्भ ''परदे के पीछे'' में जिस दिन सलमान खान और राज कपूर परिवार का जिक्र नहीं होता , मुझे दिन भर एक अजीब-सा खालीपन महसूस होता है.
२८ जून
आने वाली Generation में माँ अपने बच्चों से बोलेगी :
तुझे पालने के लिए 10-10 घन्टे Offline रही हूँ, तब जाकर बडा़ हुआ है तू ।
इस तरह के चुटकुलों से मोबाइल का प्रत्येक पटल आबाद रहता है और उन्हें आगे बढ़ाने में पुरूष वर्ग मुस्तैदी से जुटा रहता है । ऐसे लोग कभी अपनी भी जिम्मेदारी स्वीकारें तो बेहतर होगा, महिलाओं का मजाक उड़ाना बहुत हुआ ।
२८ जून
दलित की परिभाषा क्या है ? यह संज्ञा है या विशेषण ?
२५ जून
पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक लेख में सभी दलों के नेताओं के बारे में चौंकानेवाली बातें उजागर की हैं----
--- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने और मीडिया के एक बड़े हिस्से के बीच दूरी बना ली है.
--- सोनिया गांधी का साक्षात्कार लेने गए राजदीप को पहले ही बता दिया गया कि कोई राजनीतिक प्रश्न नहीं.
--- ममता बैनर्जी शारदा चिट फंड का जिक्र होते ही साक्षात्कार के बीच से ही उठकर चली गईं.
--- मायावती ने पिछले एक दशक से कोई साक्षात्कार नहीं दिया है.
--- जयललिता ने अपने निवास के बाहर आकर प्रेस से मिलने से इंकार कर दिया था.
--- नवीन पटनायक भी इन्हीं नीतियों पर चलते हैं.
--- कई राज्यों के राज्य सचिवालयों में पत्रकारों को प्रवेश नहीं दिया जाता.इनमें राज्य से मान्यता प्राप्त पत्रकार भी शामिल हैं.
यह सब पढ़कर अजीब खटास अनुभव हुई कि यह कैसा लोकतंत्र है,जहाँ सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लोग अपनी जवाबदेही से बचने के लिए पत्रकारों से बचते हैं,ताकि उन्हें किसी अवांछित स्थिति का सामना न करना पड़े.वे असहमति से बचना चाहते हैं.किसी ज़माने में पत्रकारिता एक सम्माननीय पेशा माना जाता था,किन्तु वे अपना भरोसा खो चुके हैं,लिहाजा सारा खामियाजा हमें भुगतना पड़ता है.हम लोग कभी भी असलियत नहीं जान पाते,जबकि पहले दबंग पत्रकार बड़े से बड़े नेता से सच उगलवा लिया करते थे या अपने तईं खोजबीन करते थे.अब खोजी पत्रकारिता तो सिरे से नदारद है और पीली पत्रकारिता से भी आगे 'पेड मीडिया' का जमाना है.
२३ जून
उपनिषदों में वर्णित आश्रम व्यवस्था क्या स्त्रियों पर भी लागू होती है ????......
उस व्यवस्था के अनुसार अब मुझे वानप्रस्थ में होना चाहिए....अर्थात निवृत्त होना चाहिए...पर एक औरत क्या कभी निवृत्त हो पाती है ???....
और क्या सन्यस्त हो सकती है ???
१९ जून
आजकल काटने वाले जूते-चप्पल नहीं मिलते क्या ? पहले जूते-चप्पल काटते थे , घर में उसका भी एक माहौल रहता था । लंगड़ाते लंगड़ाते घर आना और एकदम जमीन पर बैठ जाना । घर के बीसियों लोगों में से दो-चार तो देख ही लेते थे, फिर उनके द्वारा पूछताछ से थोड़ी ठंडक पहुँचती थी । उसी बीच कुछ और लोगों को पता चलता तो क्या हुआ , क्या हुआ की ध्वनि गूंजने लगती थी । तभी कोई कहता - अरे ! मोजे तो उतार । अत्यंत कष्ट पूर्ण चेहरे से मोजे उतारने की क्रिया पूरी होती । एक कोई रौबदार आवाज उसी समय गूंजती - नारियल का तेल लगा , सुबह तक सब ठीक हो जाएगा । ज्यादा चीखने-चिल्लाने की जरूरत नहीं है । माँ अंदर रहती थी और जब तक माँ को इतने 'गंभीर' घाव का पता नहीं चलता था तब तक सब व्यर्थ होता था , इसलिए खाना खाते समय आलथी - पालथी न डालकर एक पैर लंबा फैलाकर बैठना जरूरी हो जाता था । तब माँ एक सार्वजनिक अपील करती थी - इसे कल कोई चिट्ठी लिखकर देना , ये स्कूल चप्पल पहनकर जाएगा/जाएगी । कई दिन 'चप्पल सप्ताह' चलता और एक दिन स्कूल से चेतावनी मिलती और फिर जूते पहनना शुरू हो जाता ।
१७ जून
इन दिनों स्टार प्रवाह (मराठी) पर , ७/८ वर्ष बाद "राजा शिव छत्रपति" का पुनः प्रसारण हो रहा है । यह धारावाहिक काफी शोध कार्य के बाद बनाया गया था ।
एक प्रसंग आज देखा । शिवाजी राजे पन्हाला के किले में हैं , किले को सिद्दी जौहर ने चारों ओर से घेर लिया है । चार महीने ऐसे ही बीत जाते हैं । किले की रसद धीरे-धीरे समाप्त होने की कगार पर है। उन्हें कोई बताता नहीं है, पर वे भांप लेते हैं और एक दिन अपने सेवक से कहते हैं कि आज से हम एक ही समय भोजन करेंगे ताकि कम से कम हमारा एक मावला तो दोनों समय पेट भर खा सकेगा, पर खबरदार ! यह बात किसी को पता नहीं चलना चाहिए ।
शिवाजी राजे के स्थान पर आधुनिक शासक होते तो पहले ही इस बात का ढिंढोरा पीटते कि वे अब अमुक दिन से एक समय उपवास करेंगे ।
१३ जून
गूगल पर सब कुछ खोज लेना आसान है , लेकिन क्या हम चीजों को स्मरण भी कर सकते हैं ? जैसे किसी को मुक्तिबोध या प्रेमचंद को पढ़ना है उसने उन्हें ऑनलाइन पढ़ लिया । फिर किसी और की जरूरत हुई तो उसे पढ़ लिया किंतु क्या पढ़ा यह छोड़ भी दें तो क्या वे सारे नाम स्मृति में रह सकते हैं ? मेरे पास और मेरे जैसे कई लोगों के पास पुस्तकें संग्रहित हैं तो उन्हें भले निकालकर बार बार न पढ़ें , फिर भी वे सारे नाम नज़र के सामने से गुजरते रहते हैं और इसी कारण विस्मृत नहीं होते । गूगल पर निर्भर रहने वालों पर क्या विस्मृति का संकट नहीं है ? और विभिन्न क्षेत्रों में किये जाने वाले तमाम कामों पर भी यह संकट नहीं है ? क्योंकि सामान्यतया खोजा वही जाता है जो चर्चित होता है और चर्चित वही होता है जो बार बार खोजा जाता है । अचर्चित तो इस तरह अचीन्हा रह जाएगा और गूगल पर भी सब कुछ तो नही ही है ।
१३ जून
अपनी बात रखने से पहले यह स्पष्ट कर दूँ कि मेरा किसी राजनीतिक दल या विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है.
मैं तो मूल रूप से इस आंदोलन की ही विरोधी हूँ. मैं यह मानती हूँ कि किसी को भी कर्ज माफ़ी क्यों दी जानी चाहिए ? नौकरीपेशा वर्ग को छोड़ दें,जिनकी एक बंधी-बंधाई आय होती है तो जो लोग बचते हैं,उन्हें 'व्यवसायी' इस एक शीर्षक के तले यदि समाहित किया जाय तो किसानों के अलावा जो मजदूर है, ठेला चलाता है, सायकल या ऑटो रिक्शा चलाता है, फोटोकॉपी की दुकान है, सब्जी बेचता है, सिलाई करता है,चप्पल सिलता है,सड़क बनाता है,सड़क पर झाड़ू लगाता है,वेल्डिंग करता है,पुताई करता है,ईंटें बनाता है,घड़े,मटके,गमले बेचता है,माली है,फूल बेचता है,फल बेचता है,पंक्चर जोड़ता है,अटाला खरीदता है,पेपर डालता है,इन सबका और इन जैसे सबका कर्ज माफ़ किया जाय. आजका किसान तो मुझे काफी संपन्न दिखाई देता है.उसके पास मोबाईल जरूर होगा,एक/दो बाइक भी होगी, लेकिन वह कर्ज नहीं चुकाएगा.यदि चुकाने की हैसियत नहीं रखता तो १५ लाख का कर्ज किसके भरोसे लेता है ? मैंने स्टेट बैंक में नौकरी की है, सिर्फ उसी प्रतिष्ठान की बात करूँ तो एक बैंक कर्मी (जिसके 'बहुत ज्यादा' वेतन को लेकर हमेशा बवाल मचा रहता है ) भी यकायक १५ लाख का कर्ज नहीं लेता.उसे तमाम सुविधाएं रहती है, तब भी वह कई कई बार सोचता है तो जिस किसान को फसल का कोई अंदाज नहीं है, वह इतनी बड़ी रकम क्यों उठाता है ? पहले बिना सोचे समझे कर्ज लेना और बाद में उसी मूर्खतापूर्ण मानसिकता के साथ जहर खाकर मर जाना. ऐसे किसान के साथ और ऐसे वज्रमूर्ख का समर्थन करनेवाले आंदोलनकारियों के साथ मेरी जरा सहानुभूति नहीं है.मैं मानती हूँ कि खेती-किसानी मानसून पर निर्भर है, लेकिन एक तो इधर के सालों में अच्छी वर्षा हुई है, दूसरे मैंने जो सूची दी है वे सारे और उनके जैसे अनेक, आय के लिए परिस्थिति पर ही निर्भर है.किस दिन कितनी कमाई होगी यह उनके लिए भी अनिश्चित होता है.क्या कर्ज माफ़ी का प्रावधान उनके लिए भी होगा ?
१० जून
एक नया और खतरनाक चलन शुरू हो गया है । लोग सेना के जवानों के साथ कैसा भी व्यवहार करे , पुलिस पर पथराव करे , पुलिस चौकी जला दे कोई बात नही लेकिन प्रत्युत्तर में उनके विरुद्ध यदि पुलिस या सेना कार्रवाई करती है तो दिन काले हो जाते हैं । सही को सही और गलत को गलत कहने का जज़्बा ही खत्म होता जा रहा है । सिर्फ विरोध के लिए विरोध करने की प्रवृत्ति पैर पसार रही है और इस प्रवृत्ति का कहीं कोई विरोध नहीं होता ।
७ जून
वे बोलीं --आजकल डाॅक्टर लोग बहू बेटी को तुरंत बेड रेस्ट के लिए बोल देते हैं । अपने समय ऐसा कहाँ था ? मैंने कहा -- सहमत हूं , पर हमारे समय बेड और बेडरूम भी तो नहीं थे । एक बड़ी सी सांस भरकर वे बोलीं ---हाँ रे !
३ जून
पहले घरों में सबका सूर्योदय एक साथ होता था । अब वैसा नहीं है । मेरी पीढ़ी का वही बचपन से चला आ रहा समय , सुबह पांच - साढ़े पांच बजे और बाकी सदस्यों का उनकी सुविधानुसार । चंद्रमा की कलाओं की तरह यह घटता बढ़ता है , सोमवार को जल्दी तो रविवार आते आते दो-तीन घंटे देर से भी ।
३१ मई
हम लोग सब्जी खरीद रहे थे , तभी वे आईं । मेरी उनसे एक दो बार औपचारिक बात ही हुई है, लिहाजा मैं उनके घर परिवार के बारे में ज्यादा नहीं जानती । बहरहाल असली बात पर लौटती हूं । सब्जी वाले के पास ककड़ी और टमाटर दोनों नहीं थे । वे बोलीं -- अरे ! अब तो मुश्किल हो जाएगी । मेरी समझ में नहीं आया कि एक दिन यदि ककड़ी टमाटर न हो तो ऐसा क्या हो जाएगा ? वे खुद ही बोलीं -- भाभीजी, ये अटैकी हैं न तो उनको रोज सलाद देना जरूरी है । मैंने पूछा -- अटैकी ? हाँ भाभी उनको दो बार हार्ट अटैक आ चुका है ।
भाषा के इस अटैक से अटैकी होने की अब मेरी बारी थी ।
२२ मई
स्त्री विमर्श यह शब्द पढ़ते हुए एक लंबा समय बीत गया है मुझे लगता है कि अब इस तरह के साहित्य को समाज विमर्श कहा जाना चाहिए । स्त्री को जब तक व्यष्टि के रूप में ग्राह्य नहीं किया जाएगा तब तक उसका दर्द, उसकी तकलीफ सिर्फ उसकी रहेगी और सब कुछ सहने के लिए वह इसी तरह अभिशप्त रहेगी ।
२१ मई
एक मराठी धारावाहिक में नायक का संयुक्त परिवार है , लिहाजा सदस्य काफी है । नायिका उसके परिजनों से मिलने जाती रहती है और उस घर से निकलते समय एक एक से बिदा लेती है -- चलती हूं विजय काका , अलका काकी , निकलूं गीता काकी , प्रणाम नानू मामा जा रही हूं , आदि आदि ।
मुझे लगता है कि कहीं किसी दिन वह मेरी ओर मुखातिब होकर यह न कह बैठे कि अच्छा अलकनंदा ताई , आती हूं कल फिर ....
१९ मई
सुबह रूक्मा बोली - दो दिन की छुट्टी चाहिए , देवर की शादी है । मैंने कहा - घर की शादी में सिर्फ दो दिन की छुट्टी ? वह बोली हाँ , दूसरी शादी है । किसी अनहोनी की आशंका में मैंने पूछा - दूसरी ? पहली को क्या हुआ ? जवाब आया - वह किसी काम की नहीं थी (मैंने फिर कुछ और सोचा) , दिमाग कम था । 'ओह' , उसकी बात जारी थी -- मेरी सास देवर से बोली तू दूसरी ले आ । देवर बोला और इसे ? इसे छोड़ आ बाप के घर । खाना बनाना भी तो नहीं आता, नहीं तो इसे भी रख लेते ।
सुबह से वही बात दिमाग में घूम रही है - इसे खाना बनाना भी तो नहीं आता ।
१८ मई
'चला हवा येऊ द्या' च्या इंदौर अंकात सुरूवातीचे काही दृश्य सोडता, बाकी शोधूनही इंदौर सापडलं नाही. परेश मोकाशी यांच्या येऊ घातलेल्या एका चित्रपटाची चर्चा "इंदौर" ह्या वेष्टना खाली तब्बल दोन दिवस दाखविली गेली . इंदौरात अनेक प्रतिभावंत आणि नामवंत नाट्य कलाकार, चित्रकार, मूर्तीकार, संगीतज्ञ , नृत्यांगना, साहित्यिक , पत्रकार, उद्योजक , शिक्षण तज्ञ वगैरे निर निराळ्या क्षेत्रात वावरणारी मंडळी आहेत, शिवाय हिरीरीने काम करणा-या विविध संस्था आहेत. त्यांच्या पैकी कोणीच व्यासपीठावर बोलावणाच्या लायकीचे वाटले नाही, ह्याचे आश्चर्य वाटते. स्वानंद किरकिरे म्हणजे इंदौर नाही आणि जर स्वानंदने त्या चित्रपटाची गीतं लिहिली नसती तर स्वानंदला सुद्धा कदाचित बोलावले गेले नसते . दिल्ली च्या अंकात तीन दिल्लीकर मंचासीन होते . त्याचे कारणही स्पष्ट आहे , एक तर ते सर्व केन्द्रीय मंत्री आणि दुसरे म्हणजे मूळ महाराष्ट्रचे. आठ लाखाच्या वर मराठी भाषिकांची लोकसंख्या असलेल्या शहराचा उपयोग अत्यंत मुत्सद्दीने व व्यापारिक बुद्धीने करून घेतला गेला आणि चित्रपटाच्या कलाकारांनी अनावश्यक व जोरकस टाळ्या वाजवून तो साजरा केला .
एकदा परत आम्ही मातृभाषेच्या नावाखाली आमच्या बांधवांकडून ठकविले गेलो , मूर्ख ठरविले गेलो. "मूर्ख बृहन महाराष्ट्रीय" हे धारावाहिक असेच चालू राहणार कारण त्याचे कर्ता करविता नेहमी आमच्याच परिसरातले असतात. ही खरी शोकांतिका आहे .
९ मई
दो रोटी खाना हो तब भी तामझाम कितना करना पड़ता है । थाली, कटोरी , चम्मच , गिलास , पानी , रोटी का कटोरदान , दाल सब्जी के डोंगे , और साथ में अनिवार्य रूप से दो / तीन जितने भी हो वे सब मोबाइल , एसी और टीवी के रिमोट .... बाप रे ! एक लंबी चौड़ी सूची
९ मई
कल महाराष्ट्र दिवस था..बहुत से लोगों ने एक दूसरे को बधाई दी...पर मैं ऐसा नहीं मानती....आम बोलचाल की भाषा में हमें यानी मराठीभाषियों को महाराष्ट्रिय कहा जाता है...पर वास्तव में वैसा है नहीं...महाराष्ट्र से बाहर बसे मराठी-भाषियों को महाराष्ट्र के लोग अपना नहीं मानते...उन्होंने एक शब्द बना लिया है.."बृहन-महाराष्ट्रिय" और इस शब्द के जरिये हमें जात-बाहर कर दिया गया है...मुझे नहीं लगता कि ऐसा किसी और प्रान्त में होता है...किसी बंगाली को बृहन बंगाली, बिहारी को बृहन बिहारी,पंजाबी को बृहन पंजाबी या किसी तमिल, मलयाली,कन्नड़ के आगे "बृहन " लगते मैंने ना देखा ना सुना...पर "आपला माणूस" " आमची भाषा" आदि का जय-जयकार करनेवाले तमाम नारेबाज भी ऐसे वर्गीकरण से असहमत नजर नहीं आते...बल्कि ये सारे लोग बड़े गर्व और अभिमान से "बृहन महाराष्ट्र मंडल" जैसी संस्थाओं को पोषित करते हैं...उनके कार्यक्रमों में सम्मिलित होते हैं...और सबसे दुखद यह है कि ज्यादातर "बृहन-महाराष्ट्रिय" भी उनके साथ किये जा रहे दोयम दर्जे के व्यवहार को ना केवल खुशी-खुशी स्वीकारते हैं...बल्कि साहित्य, संगीत, कला,समाज-सेवा,अर्थशास्त्र जैसे तमाम विषयों से सम्बन्धित ऐसे व्यक्ति को भगवान जैसा मानते हैं ,जिसकी एकमात्र योग्यता उसका महाराष्ट्र निवासी होना होता है..चाहे वह परभणी,नांदेड जैसी छोटी जगह से हो या मुंबई,पुणे जैसे शहरों का......उसकी हैसीयत दो कौड़ी की हो तब भी वह अत्यंत सुयोग्य "बृहन-महाराष्ट्रिय" से कमतर ही समझा जाता है...महाराष्ट्र के लोग तो हमें कमतर आंकते ही हैं...इसीलिये मैं अपने-आप को "महाराष्ट्रीय" नहीं "मराठी-भाषी" कहती हूँ.....
२ मई
बारह वर्ष की आयु में पत्नी बनी, चौदह में माँ। पन्द्रहवें में पति चल बसा । माता-पिता ने दूसरे विवाह के बारे में सोचा तो ससुराल पक्ष ने उसकी दुधमुँही बच्ची को बंधक बना लिया और वह एकाकी जीवन के लिए अभिशप्त हो गई ।
यह बहुत पुरानी बात नहीं है । अभी उसकी उम्र सिर्फ अट्ठाइस बरस है।
१ मई
लड़की के मन में हमेशा डर रहता है, कभी घर से निकलने का , तो कभी घर से निकाले जाने का ।
२१ अप्रैल
माँ की बीमारी में भी माँ के हाथ का बना , माँ के साथ और माँ के ही हाथ से खाने की जिद करने वाला बेटा देखते ही देखते बड़ा हो जाता है और एक दिन बहू की बीमारी में बोलता है -- माँ ! सुबह परेशान मत होना । मैं ऑफिस के कैंटीन में खा लूंगा या लंच पैक मंगवा लूंगा ।
माँ की मानसिक आयु पीछे ही ठहरी - सी । पता नहीं क्या खाएगा ? भूखा तो नहीं रहेगा ? उसे ये पसंद नहीं , वह हजम नहीं। सोचते-सोचते ठठाकर हँस पड़ती है माँ ,कहती है खुद से ही कि बेटे के साथ उसे भी तो बड़ा होना था ।
१५ अप्रैल
सुबह एक दफ्तर से फोन आया -
"मैडम आपका काम हो गया है ,लेकिन फोटो और पहचान पत्र नहीं मिल रहा है , दुबारा भिजवा दीजिए ।"
मैंने कहा -"अभी मैं शहर से बाहर हूं ।"
"व्हाटस ऐप कर दीजिए" - तुरंत निदान आ गया।
तकनीक सुविधा देती है
तकनीक तकलीफ भी देती है ।
१३ अप्रैल
जब भी भगवान से मुलाकात होगी, एक प्रश्न जरूर पूछूंगी कि ध्वनि प्रसारक यंत्र के अस्तित्व में आने से पहले , हजारों साल जिन्होंने चुपचाप आराधना की , वे सारे लोग स्वर्ग के अधिकारी थे या नहीं ?
११ अप्रैल
यदि कोई युवा बात समझने को राजी नहीं तो एक रामबाण उपाय है यह कहना कि देखो,तुम नहीं मानते तो इसमें मेरा कुछ नहीं जाएगा,पर तुम्हारी अभी पूरी जिंदगी पड़ी है.
जैसे ही उसकी नजर आपकी ओर उठेगी वह अकबका जाएगा. सोचेगा जिंदगी पड़ी है यानी सफ़ेद बाल और टूटे दांत ????
४ अप्रैल
जीवन में कुछ तो करना ही पड़ता है, उसके बिना गुजारा नहीं. चाहे आलस ही क्यों न हो
२ अप्रैल
लगभग चालीस वर्षों से मंच से जुड़ी हूं , लेकिन आज भी माइक के सामने जाने का समय पास आने लगता है तो घबराहट और बेचैनी का वही पुराना आलम होता है ।
३० मार्च
कभी किसी ज्यादा "मैं मैं" करनेवाले की चंगुल में फंस जाय तो निकलने का आसान रास्ता है, अपनी "मैं मैं" शुरू करना । पांच मिनट के भीतर छुटकारा मिल जाएगा ।
यकायक वह बोल पड़ेगा -- चलता हूं , एक काम याद आ गया , आपका बहुत समय ले लिया , आता हूं किसी दिन आदि आदि ।
महिला हो तो उसे पति , बच्चे याद आ जाएंगे -- ये सोच रहे होंगे पता नहीं कहाँ चली गई , आज हमें एक जगह जाना था, बच्चे आ गए होंगे , आदि आदि ।
२५ मार्च
फेसबुक पर एक भ्रम टूटा कि आधी आबादी महिलाओं की है । दरअसल आधी आबादी कवियों की है ।
२४ मार्च
बहुत पुरानी बात नहीं है. ५०/६० साल पहले तक महाराष्ट्रीय परिवारों में ''रूपया नारळ -साखरपुडा'' (सगाई) बहुत ही सादगी से होता था. जैसा कि रस्म के नाम से ही स्पष्ट है. वधु पक्ष के चुनींदा लोग वर के घर जाते थे और उसे कलदार सिक्का -नारियल (रूपया नारळ) देकर विवाह तय हो जाने की मुहर लगाते थे. दूसरी ओर वर पक्ष की प्रमुख महिलाएं वधु के लिए सवा रुपए की मिश्री (साखरपुडा) और एक ब्लाउज पीस (खण यानि किनारपट्टीवाला सूती या रेशमी ब्लाउज पीस) लेकर जाती थीं .
लगभग ४०/४५ साल पहले इन रस्मों में पंडितजी का प्रवेश हुआ.कुछ मंत्रोच्चार के साथ ये रस्म, वर-वधु पक्ष के लोग एक ही स्थान पर पूरी करने लगे. लेकिन तब भी ज्यादा लोगों को नहीं बुलाया जाता था और चाय नाश्ते के साथ कार्यक्रम समाप्त हो जाता था.
फिर २०/२५ साल पहले पंडितजी के साथ होटल भी जुड़ा और दोनों पक्ष एक दूसरे के रिश्तेदारों के साथ लेन-देन करने लगे. कलदार सिक्के की जगह वर को चांदी के सिक्के, महंगे कपडे ,वधु को मिश्री और एक ब्लाउज पीस की जगह महँगी रेशमी साडी, कोई जेवर, गोद भराई में मिठाई,फल और जितना ज्यादा दिखावा कर सकते थे , वह सब होने लगा.इसी बीच अंगूठी पहनाने का रिवाज भी आया, जिससे पंडितजी का कोई सम्बन्ध नहीं होता था और मात्र फोटो खिंचवाने तक यह सीमित था. जबकि पहले अंगूठी ''सुनमुख'' (एक तरह से मुंह दिखाई, यद्यपि महाराष्ट्रीय परिवारों में घूंघट प्रथा कभी नहीं रही) के समय, अन्य दूसरे जेवरों के साथ पहनाई जाती थी.
इधर के कुछ वर्षों में उपरोक्त दिखावे में बेतहाशा वृद्धि हुई है और साथ में पंडितजी के मंत्रोच्चार में ''रिंग सेरेमनी'' भी शामिल हो गई है.
कालाय तस्मै नम:
२३ मार्च
योगी , साध्वी पहले राजनीति में आते हैं फिर सत्तासीन होते हैं ।
इसे संन्यास कैसे कहा जा सकता है ?
१९ मार्च
साहित्य हो, संगीत हो, राजनीति हो या फिर घर-परिवार.क्षेत्र चाहे कोई-सा भी हो.चमत्कार हो न हो, चमत्कार की भाषा आना अनिवार्य है.
६ मार्च
प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या अन्य मंत्री अपने अपने दल के काम से जो दौरा करते हैं , क्या वह उनके काम का हिस्सा होता है ? दल तो वैयक्तिक होता है और सरकार देश की अर्थात दल का काम तो वैयक्तिक ही हुआ. जब किसी नौकरी पेशा व्यक्ति का वैयक्तिक काम उस प्रतिष्ठान का काम नहीं माना जाता तो मंत्री गण सरकारी तामझाम के साथ चुनावी दौरे के अधिकारी किस तरह होते हैं ?
४ मार्च
नौकरी के दौरान अधिकारियों ने भी इतना टाइप नहीं करवाया जितना अब फेसबुक और व्हाटस ऐप के साथी करवा लेते हैं ।
४ मार्च
आजकल प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन , दूध वाला, सब्जी वाला, अखबार वाला, ऑटो रिक्शा या कॅब चालक वगैरह की नई पीढ़ी काफी पढ़ी-लिखी और तकनीक की जानकार होती है । काफी जागरूक भी । उनसे बात करना अच्छा लगता है ।
२८ फरवरी
झंडे का फहरना...गुलाब की पंखुडियां....और तोपों की सलामी...आज भी रोमांचित कर जाती है.....१९४७ में क्या हुआ होगा लोगों के दिल का हाल !.......
२६ जनवरी
आधी जिंदगी लोगों को समझने में और आधी समझाने में गुजर जाती है ।
१९ जनवरी
व्हाटस एप के पहले, बिना शुभकामना संदेशों के भी, त्यौहार ठीक ठाक मन ही जाते थे ।
१४ जनवरी
मोजे पहनने के बाद भी यदि हाथ पैर ठंडे रहते हैं तो समझ लीजिए कि समस्या मौसम की नहीं , उम्र की है ।
१३ जनवरी
मशहूर स्त्री वादी कार्यकर्ता कमला भसीन ने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत अच्छी बात कही कि इज्जत लड़कियों की नहीं , लड़कों की खराब हो रही है, क्योंकि कुछ ही लड़के वाहियात हैं सब नहीं । उन्होंने यह भी कहा कि लड़कियों की इस लड़ाई में लड़कों ने न सिर्फ साथ देना चाहिए, बल्कि पहल भी करना चाहिए तभी मानसिकता और माहौल बदलने की शुरुआत होगी ।
९ जनवरी
हाल ही में बैंगलुरू में हुई घटना और इसके पहले हुई तमाम घटनाओं के बाद कुछ लोग लड़कियों के परिधान, उनके आने जाने के समय आदि को लेकर टिप्पणियां करते हैं , कुछ इन टिप्पणियों के विरोध में जुट जाते हैं और कुछ लड़कों या पुरूषों के संस्कारों में कमी की ओर इंगित करते हैं । कुल मिलाकर सारी चर्चा सामाजिक बिंदुओं पर आकर रूक जाती है ।
लगातार और तेजी से इस तरह की घटनाएं न सिर्फ हो रही हैं , बल्कि उनमें इजाफा भी हो रहा है । कहीं इसका कारण कुछ और तो नहीं ? जिस तरह से आधुनिक जीवनशैली के कारण तमाम शारीरिक बीमारियां यथा ह्रदयाघात, मधुमेह, किडनी फेल आदि हर दूसरे /तीसरे व्यक्ति में आम हो गया है, इसी तरह कहीं ऐसा तो नहीं कि लड़कों /पुरूषों के हार्मोंस में कोई बदलाव आया हो और इसको लेकर सब अनजान हों।
इस समस्या के बारे में सामाजिक पहलू के इतर भी सोचा जाना चाहिए ।
६ जनवरी
मीडिया के लिए खबरें सिर्फ मुलायम -अखिलेश तक सिमट गईं हैं ।
परसों पुणे में प्रख्यात नाटककार राम गणेश गडकरी की मूर्ति तोड़ दी गई ।
कल सितार वादक उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र खां साहेब नहीं रहे । वे पद्मभूषण से सम्मानित थे ।
इन खबरों का कोई महत्व उनके लिए नहीं है ।
५ जनवरी
कल मराठी फिल्म ''वेंटिलेटर'' देखते हुए एक बात फिर से मन में कौंधी जो पिछले कई समय से कचोटती रही है. पहले किसी व्यक्ति का अंत समय आने पर वह धीरे धीरे मृत्यु की ओर बढ़ता था और परिजन उस स्थिति के लिए मानसिक रूप से तैयार होने लगते थे. यह बात कोई बहुत पुरानी नहीं है.इधर के सालों में जबसे जीवन रक्षक प्रणाली का उदय हुआ है, व्यक्ति की मृत्यु को कुछ दिनों तक के लिए जबरदस्ती टाला जाता है. अधिकांश मामलों में इससे कुछ भी हासिल नहीं होता. उस व्यक्ति के निकटस्थ भी इसे समझते हैं,पर भावनाएं कहीं न कहीं मात खा जाती हैं और वे एक आशा में बंध जाते हैं. इस सारी कश्मकश में एक पल ऐसा आता है जब उनसे कहा जाता है कि वेंटिलेटर का अब कोई उपयोग नहीं है और उसे हटाने की अनुमति दी जाय.
मुझे यह बेहद अमानवीय लगता है.अपने किसी प्रियजन की सहज मृत्यु तो कोई बर्दाश्त कर लेता है लेकिन मृत्यु के लिए अनुमति देना त्रासद होता है.
३ जनवरी
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