सिमोन दी बुआ !...हम अब भी वहीँ हैं जहाँ आप हमें छोड़ गईं थी ........
३१ दिसम्बर
उन्होंने दलित स्त्री पर अत्याचार किया
मैंने प्रतिकार नहीं किया
क्योंकि मै दलित नहीं थी।
उन्होंने दहेज़ के लिए उसे मार डाला
मैंने कोई आवाज़ नहीं उठाई,
क्योंकि मेरे माता -पिता समृद्ध थे।
उस पर बलात्कार हुआ
मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ा,
मै अपने घर में सुरक्षित थी।
उसने अपनी बेटी को गर्भ में ही मारने का फैसला किया
मै उसे समझाने नहीं गई ,
क्योंकि मै पुत्रवती थी।
मै अपने तक सीमित रही ,
बस! ऐसे ही जीती रही।
---------------------अज्ञात मराठी कवयित्री
२८ दिसंबर
अभी जो वीभत्स घटना दिल्ली में हुई,उसके बाद कानून बनाने की बात चल रही है, लेकिन इसके पहले कुछ और कानून बनाने की जरुरत है .......
१ . लड़कियों के लिए ड्रेस कोड, इसके लिए तालिबान संहिता की मदद ली जा सकती है।
२ . महिलाओं के Dented / Painted यानि सरल भाषा में कहें तो सजने-सँवरने पर पाबंदी लगे।
३ . महिलायें लड़कियाँ देर रात यानि महज ९.३०-१०.०० बजे से पहले घर आ जायें।
४ .यदि बावजूद इसके कहीं फँस जाये तो आत्म समर्पण कर दें, सनद रहे सबकी आँतों का इलाज
करवाना सरकार के लिए संभव नहीं है।
५ .यदि जींस की दुकानों के आसपास भी उन्हें देखा गया तो क़ानूनी कार्यवाही की जा सकती है।
२७ दिसम्बर
मुझे नहीं मालूम आज स्कूलों में क्या पढाया जाता है, पर पहले एक विषय के रूप में नैतिक शास्त्र पढाया जाता था, तब वह भले समझ में नहीं आता था, लेकिन अंतस में कही उसका प्रभाव जरुर रहता था। मेरे बचपन में, यहाँ तक कि मेरे बच्चों के बचपन में भी सुबह उठते ही और शाम को दिया-बत्ती के बाद ईश्वर से प्रार्थना , संस्कृत के श्लोक, कुछ सुभाषित,सूक्तियाँ आदि बच्चे बोलते थे, बाद में बड़ों के पांव छूते थे , इन सारी बातों का कहीं न कहीं प्रभाव तो पड़ता ही था। जो लोग सामाजिक क्षेत्र में काम करते थे, उनकी एक स्वच्छ और सम्मानित छबि होती थी और उनका जीवन आदर्श के रूप में सामने रहता था, उसका असर अधिकांश लोगों पर रहता था। मेरी पीढ़ी के अभिभावकों ने अपनी संतानों को धनाभिमुख शिक्षा यथा- डॉक्टर, इंजिनीयर की ओर प्रोत्साहित किया और तमाम गलत रास्ते इसके लिए खोल दिए। हमारी पीढ़ी ने जो गलती की, मात्र उस पर भी नई पौध ने यदि ध्यान दिया तो काफी फर्क पड़ सकता है, सारी बातों के लिए ना तो सरकार जिम्मेदार है और ना ही हमें उसका मुँह ताकना चाहिए।
२४ दिसम्बर
आज ज्योति जैन की पुस्तक "बिजुका'' का लोकार्पण था ...डी.आय.जी. अनुराधा शंकर बोलीं- हम पुलिसवाले भी बिजुका होते हैं .....दर्द वहाँ भी हैं ...
२३ दिसम्बर
इंडिया गेट पर जमा हुजुम को देखकर अच्छा लगा , यद्यपि वे जिस वजह से इकट्ठा हुए वह बेहद दुखद है। .....अक्सर नई पीढ़ी के बारे में कहा जाता है कि वह आत्मकेंद्रित है, असंवेदनशील है, पर जो संयमित एकजुटता उन्होंने दिखाई है , उसके लिए सलाम ! और दूसरी एक और ख़ास बात कि लड़के भी इसमें बड़ी तादाद में थे और बेहद आक्रोशित भी ...उन्हें किसी ने नहीं कहा- - उत्तिष्ठ ! जाग्रत ! पर वे ठण्ड के बावजूद वहाँ थे,..... आँसू गैस, लाठीचार्ज और पानी की बौछारों के बावजूद वहाँ थे .....मैं अपने अन्दर बहुत आशान्वित अनुभव कर रही हूँ ....
२२ दिसम्बर
अब लगता है कि महिलाओं को आत्म-परीक्षण की जरुरत है।
अपने-आप से , आईने से और पुरुष की निगाह से वह दिन में कई-कई बार यह सवाल क्यों पूछती है --मै कैसी दिख रही हूँ ? साफ-सुथरी रहें, परिष्कृत रहें, गरिमामय परिधान पहनें, लेकिन सुन्दर, गोरी,आकर्षक दिखने की चाहत क्यों ?
हाथ मिलाकर अभिवादन करना आम हो चला है, पर कस्बाई नगरों में यदि कोई लड़का-लड़की से हाथ मिलाता है , कनखियों से उधर देखने का मोह क्यों नहीं छूटता ?....
कोई सहकर्मी कुर्सी खींचकर बैठता है, तो हम २ इंच ही सही पीछे क्यों हो जाते है ? सहकर्मी, सहकर्मी है , उसे 'पुरुष सहकर्मी'' मानना और स्वयं को ''स्त्री'' मानना क्या सदैव उचित है ?
तमाम जगहों पर जहाँ भी कोई कतार लगती है , हमें अलग से कतार की जरुरत क्यों महसूस होती है ? सारे पुरुषों की हर समय एक ही भावना तो नहीं होती और सामान्यतया सार्वजनिक स्थानों पर जो लोग आते हैं , उन्हें सिर्फ अपनी बारी का इंतज़ार रहता है, लेकिन अलग रहकर हम उन्हें याद दिलाते हैं, तुम पुरुष हो, हम स्त्री।
एक ओर हम अधिकारों की बातें करते हैं, दूसरी ओर सुविधाएँ चाहते हैं। लगातार हम यह अनुभव कराते रहते हैं कि ''तुम अलग हो, हम अलग हैं ''व्यवहार में एक सहजता का अभाव दिखाई देता है।
स्त्रीत्व का अभिमान करें, स्त्रीत्व की रक्षा करें, मान करें,सम्मान करें , लेकिन उसे लगातार जताने की क्या आवश्यकता है ? महिला स्वयं ही खुद को व्यक्ति मानने के लिए जब तक राजी नहीं होगी, तब तक पुरुषों को दोषी ठहराने का उसे क्या हक़ है ?
१९ दिसम्बर
कुछ भी कहना बेकार है। सारी बातों का केंद्र बिंदु हमारे घर हैं।औरतों को घरों में हेय स्थान आज भी है। मुझे क्षमा करें , लेकिन जितने भी पुरुष इस विषय पर अपने मत/ टिप्पणी दे रहे हैं , उनमें से कोई एक भी दिल पर हाथ रखकर ईमानदारी से यह कुबूल कर लें कि उसके मन में एक बार भी ऐसा नहीं आया है कि ''मूर्ख है वह'', या किसी समस्या को उसने ''औरतोंवाली बाते '' नहीं कहा हो।
कितने भी कानून बन जाये या कितनी भी बार हम सामाजिक व्यवस्था को कोस लें , कीड़े तो दिमाग में हैं , उन्हें कोई खत्म नहीं करना चाहता।
जो भावनायें पुरुष के मन में होती है, वे ही औरतों के मन में भी होती है, लेकिन आज जब यह कहा जाता है कि लड़कियां बहुत सुविधाएँ पा रही हैं, बहुत आगे बढ़ गई हैं, तब भी ...तब भी एक भी मामला ऐसा नहीं आया है कि लड़कियों के किसी समूह ने ऐसा कोई कृत्य किया है।
औरत को जब तक एक ''औरत ''समझा जायेगा , जब तक सिर्फ एक ''देह'' समझा जाएगा , तब तक यह सब रुकनेवाला नहीं , चाहे कितनी भी लफ्फाजी कर ली जाय ....
मेरी उम्र की महिला भी तब तक सुरक्षित नहीं है, जब तक उसे एक ''व्यक्ति''नहीं माना जायेगा और इसे ''व्यष्टि' से ''समष्टि'' तक सबको भुगतना होगा।
१८ दिसम्बर
गुजरा हुआ जमाना याद आ गया ....वे ठण्डी रातें और रात के २/३ बजे घर लौटकर फिर सुबह ८/९ बजे निकल जाना ....उ . बिस्मिल्लाह खां साहेब, पं जसराज,कुमार गन्धर्व, पं भीमसेन जोशी , बेगम परवीन सुल्ताना , विदुषी मालिनी राजुरकर , पं हरिप्रसाद चौरसिया , पं .शिवकुमार शर्मा , उ .अमज़द अली खान , और तब के नवोदित राजन-साजन मिश्र , शाहिद परवेज़, बुद्धादित्य मुखर्जी,राशिद खां ,आरती अंकलीकर , श्रुति साडोलिकर,अश्विनी भिडे ये कुछ कलाकार थे, जो तानसेन के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने प्रति वर्ष शिरकत करते थे ....आज डी . डी . भारती पर तानसेन समारोह का सीधा प्रसारण देखकर करीब 40 वर्ष पुराना समय याद आ गया ....
स्मृतियाँ भी कैसी घनेरी होती है ......
१४ दिसम्बर
ज्यादातर लोग समझते हैं कि संगीत में ७ स्वर होते हैं, पर जानकार जानते हैं कि ७ शुद्ध और ५ कोमल , इस प्रकार शास्त्रीय संगीत में कुल १२ स्वर होते हैं .....एक ऐसा ही ज्ञाता आज १२-१२-१२ को अपने १२ सुरों को साथ ले चला गया .....कहीं और महफ़िल सजाने ....श्रद्धांजलि ....पं रवि शंकर
१२ दिसम्बर
एक छोटी बच्ची से पूछा किसीने-- तुम्हारा घर कहाँ है ?
बच्ची ने जवाब दिया --- जहाँ मेरी माँ है।
१२ दिसम्बर
सिर के ऊपर के बाल उड़ते जा रहे हैं, कोई बात नहीं ....अन्दर दिमाग बना रहे , यही उस परमपिता से प्रार्थना ...
१० दिसम्बर
कल लोकसभा टीवी पर बहुत अच्छी फिल्म देखी ''कुर्मावतार''.....शायद तमिल फिल्म थी ....एक साधारण व्यक्ति जो गांधीजी के बारे में ज्यादा नहीं जानता ,उसे एक धारावाहिक में अभिनय करने के लिए जबरदस्ती महज इसलिए लाया जाता है कि वह गांधीजी जैसा दिखता है।वह बिलकुल अनिच्छुक होता है और बार-बार कहता है कि उसे न तो अभिनय आता है और न ही उसमें रूचि है, पर उसकी कोई नहीं सुनता ।निर्देशक उसके बेटे को पैसों का लालच देता है और कहता है , उन्हें राजी करो। बेटा गांधीजी से सम्बंधित ढेर सारी किताबें ला देता है और कहता है -- बहुत आसान है ,यदि वे काम करेंगे तो बहुत सारा पैसा आएगा और वे अपने पोते यानी उसके बेटे को बड़ा आदमी बना सकेंगे। वह व्यक्ति किताबें पढ़-पढ़ कर गांधीजी के सिद्धांतों का प्रशंसक हो जाता है और सत्य,अहिंसा,सत्याग्रह को अपने जीवन में उतरने की कोशिश करने लगता है ....यहीं से उसका अंतर्द्वद्व शुरू होता है ....कहानी,अभिनय, निर्देशन सब कुछ बेहद उम्दा ...
और आज शाम डी डी सह्याद्री पर डॉ बाबासाहेब आंबेडकर पर एक बहुत बढ़िया कार्यक्रम देखा .....मै अभी तक यही जानती थी कि शिवाजी पर बहुत सारे 'पोवाडे' लिखे गए हैं ,पर आज पता चला कि बाबासाहेब पर भी सैकंडो पोवाडे हैं , नंदेश और उदेश उमप भाइयों ने बेहद सुन्दर प्रस्तुती दी ...और साथ-साथ चल रहा था कोल्हापुर के मराठी के एक प्रोफेसर (मै नाम भूल गई) का खूबसूरत और ज्ञानवर्धक सूत्र संचालन ....
शनिवार-रविवार सार्थक हो गया।
९ दिसम्बर
वे एक लम्बे समय बाद मिलीं। बड़ी देर तक अपने बारे में, पति के बारे में ,बच्चों के बारे में बतियाती रही। एक बार भी उन्होंने ना तो मेरे बारे में पूछा, न ही बोलने का मौका दिया।विदा लेते समय कहने लगी ---आज तुमसे बात करके अच्छा लगा, मिला करो कभी-कभी ......एक दूसरे के बारे में (?) पता तो चलता है .....
२ दिसम्बर
घर पर जब चीला, डोसा या थालीपीठ बनाते हैं , तो पहली बार तवे के तापमान का अंदाज नहीं आता और अक्सर पहला चीला, डोसा या थालीपीठ या तो टूटता है या जल जाता है। मुझे अभी अपनी दूसरी किताब के प्रकाशन के बाद यही अनुभव हो रहा है कि पहली किताब के समय तवे के तापमान का अंदाज सही नहीं था और वे कवितायेँ कुछ कच्ची हैं, कुछ अधिक लाऊड है, कुछ बहुत लम्बी है। कुल मिलाकर यह कि दूसरी किताब का आना जरुरी था।
२ दिसम्बर
कल किसी समारोह के लिए ग्वालियर .......मायका अब भी खींचता है अपनी ओर .........
३० नवंबर
कल सुबह 8.30 बजे आकाशवाणी इंदौर पर मेरे साक्षात्कार का प्रसारण ......(मित्रों ! पुस्तक विमोचन का नशा अभी उतरा नहीं है ....
२९ नवंबर
अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव से सम्बन्धित एक मजेदार घटना याद आ गई, हालाँकि स्थितियां मजेदार नहीं थी!!!! हमारे दिलो-दिमाग पर अमेरिका कैसे राज करता है,इसका यह एक उदाहरण है ......
बीस वर्ष पूर्व ३ नवम्बर १९९२ को मेरे पति अचानक कोमा में चले गये थे ....डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था ....दूसरे दिन ४ नवम्बर को अमेरिका में चुनाव थे ...पति तो कोमा में थे ,पर हम मैं,मेरी ननदें,भाई जो सारे लोग चेतन थे, वे भी अपनी सुध-बुध खो बैठे थे .....उन पर उपचार जारी थे .....रात को मैं अस्पताल से घर चली जाती थी और कोई पुरुष रिश्तेदार वहाँ रुकता था .....१३ नवम्बर को सुबह ६.३० बजे मैं जैसे ही अस्पताल पहुँची , मेरे भांजे ने कहा- मामी, कल रात को मामा ने थोड़े पैर हिलाए थे .....और थोड़ी -बहुत बात करके वह चला गया .....फिर करीब १० बजे डॉक्टर आये , उन्होंने जाँच की , बोले --Its miracle ! you are too lucky....फिर मुझे उनसे मिलने की इजाजत मिल गई .....जैसे ही मैंने उनके कमरे में प्रवेश किया, वे धीरे- से मुस्कुराये और मुझसे पूछा- अमेरिका के चुनावों की क्या खबर है ? ....वे बिलकुल सहज, स्वाभाविक थे और उन्हें पता ही नहीं था कि बीच में १० दिन गुजर गए हैं ......
और मैं पगली ये सोच रही थी कि वो मुझसे मेरे बारे में , बच्चों के बारे में पूछेंगे .....
८ नवंबर
हाजी अली में महिलाओं के प्रवेश को प्रतिबंधित किये जाने को लेकर...आज मेरी सखी आभा निवसरकर बहुत उद्वेलित है... मेरी बेटी स्वरांगी ने आभा की लिंक पर बहुत तल्ख़ टिप्पणी की है...इन दोनों की ही तरह, मुझे पता है मेरी अन्य युवा सखियाँ नूर, शालिनी,मानसी, मोना आदि भी उद्वेलित होंगी..पर हम मध्यम आयु की महिलाओं को यह सब अधिक आंदोलित नहीं करता क्योंकि हमारे सामने एक पूरी पीढ़ी, पढ़ी-लिखी पीढ़ी, जिनमें हम भी शामिल हैं, शिक्षित होने के ढोंग से गुजर चुकी हैं और आज भी हम बहुत ज्यादा बदलाव महसूस नहीं करते....मेरी ये कविता सभी आभा ,सभी स्वरांगी, सभी नूर, सभी शालिनी,सभी मानसी, सभी मोना के लिए....कि बेटा ! ये समाज अब भी ऐसा ही है...
मुझ पर कोई बंदिश न थी
मेरे चेहरे पर कोई घूँघट नहीं था
मुझसे कहा गया जीने के लिए साँस जरुरी है,
मैंने साँस ली
मुझसे कहा गया दिन पूरे हो जाते हैं
सभी के एक दिन,
मैंने साँस छोड़ दी
मुझसे कहा गया, खाना चाहिए
मैंने खा लिया
मुझसे कहा गया, नहीं खाना चाहिए
मैंने नहीं खाया
कुछ चीजें मेरी सेहत के लिए अच्छी नहीं थी
खुलकर हँसना, मुक्त भाव से मिलना-जुलना
मैंने वह सब नहीं किया.
मुझसे कहा गया शिक्षित औरत को
सलीकेदार होना चाहिए
ज्ञान के दरवाजे से भले गुजर जाये
पर अन्दर झाँकना नहीं चाहिए
मैं आहिस्ता-आहिस्ता गुजर गई
अपने दिमाग का उपयोग सिर्फ
सर झुकाने के लिए किया
राय शुमारी के लिए नहीं किया
मैंने अपना सलीका नहीं छोड़ा
जब भी मुझसे कहा गया
मैंने कान बंद कर लिए
आँखें बंद कर ली
जुबान को सिल दिया
मन पर सौ ताले जड़ दिए
बुद्धि को ताक पर रख दिया
मैं वह सब करती हूँ
जो मुझसे कहा जाता है
एक पढी-लिखी औरत हूँ
समझदारी से काम लेती हूँ
अब मेरे चेहरे से घूँघट हटा दिया गया है
मुझे बंधनों से मुक्त कर दिया गया है
पर तब भी
जब मुझसे कहा जाता है
मैं साँस लेती हूँ
जब कहा जाता है
साँस छोड़ देती हूँ
६ नवंबर
दीपावली नजदीक आने पर बच्चे ठुनकने लगते थे ----पटाखे लाने के लिए, जिस बच्चे के घर सबसे पहले पटाखे आ जाते थे वह हीरो बन जाता था।पिता,चाचा या बड़े भाई की उंगली पकड़ कर बाज़ार जाना दीपावली के त्यौहार से भी बड़ा उत्सव होता था। घर के बड़े अपना बजट देखते और बच्चे की आँखों में होते दोस्त के पास देखे नवीनतम पटाखे। आज टीवी पर पटाखों का विज्ञापन देखा तो यह सब याद आ गया। ऑन लाइन खरीदारी की सुविधा भी उक्त विज्ञापन में थी। यह सुविधा , सुविधा रहे, वहाँ तक ठीक है पर यदि ये शैली बन गई तो बच्चे एक सहज-स्वाभाविक आनन्द से वंचित नहीं हो जायेंगे ?
५ नवंबर
इन दिनों शिक्षित ज्यादा दिखाई देने लगे हैं और वह भी निचले तबके में...पिछले दिनों मेरे यहाँ एक खाना बनानेवाली आती थी, वह स्नातक थी...इन दिनों जो कामवाली आ रही है, उसका बेटा बी.बी.ए. कर रहा है और बेटी बी.एस.सी बायोटेक में....मेरे रिक्शावाले ने बैंक से लोन लेकर बेटे का इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला करवाया है और उसकी बेटी किसी कंपनी में एच.आर.मेनेजर है.....बहुत अच्छा लगता है....इन बच्चों की खासियत यह है कि ये बड़ी तहजीब से बात करते हैं...न तो इन्हें अपने उच्च शिक्षित होने का गरूर है और न ही मां-बाप के मजदूरी करने पर कोई हीन भावना...
लगता है कि अब भी कुछ शेष है...जिस पर भरोसा किया जा सकता है....
३ नवंबर
बच्चों को किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित करना बुढ़ापे में भारी पड़ सकता है...पढ़ते-पढ़ते ज़रा झपकी लग जाये और आँख खुले तो पता चले .......चष्मा तो माथे पर है और हाथ की किताब गायब है...
१ नवंबर
ओस की बूंदों , हवा के झोंको से सुनी तेरी पदचाप.....
सखी तू कहकर तो आती !...
२९ अक्टूबर
शरद पूर्णिमा पर छत पर फ़ैली चांदनी और जायफल डला दूध ...एक अनौपचारिक संगीत सभा भी होती थी , जिसे जो आता हो और जो सुनाना हो वह मुक्त भाव, मुक्त कंठ सुनाया करता था...महिलाएं परिवार के बड़े बच्चे का टीका करती , आरती उतारती और उसे नेग देती...छोटे बच्चों का टीका तो होता ,पर नेग नहीं मिलता और उनका सारा ध्यान दूध की ओर रहता...
वे अमृत मय दिन बीत गए, रीत गए...
२८ अक्टूबर
आज साहित्य पर आधारित एक सांगीतिक कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला.....शहर के प्रसिद्द घरानेदार तबला वादक मनीष खरगोणकर उक्त कार्यक्रम में संगत कर रहे थे...यों तो उदघोषिका ठीक-ठाक थी पर वह मनीष को बार-बार मनीष खरगोणकर सर कह रही थी , इसी तरह प्रस्तुती दे रहे विसुभाई बापट के आगे भी एकाध बार सर उपाधि लगी ......पारम्परिक कार्यक्रम में ऐसी अंग्रेजियत ??....मुझे तो खटक गई…
२७ अक्टूबर
महिलाओं को मोबाईल से क्या काम ?????
महिलाओं के लिए अब एक और फतवा----बसपा सांसद राजपाल सैनी का कहना है कि महिलाओं को मोबाईल ना दें, जिनके पास है उनसे वापस लेलें....महिलाओं को मोबाईल से क्या काम ?
२२ अक्टूबर
आये दिन ये ख़बरें आती है कि अमुक मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित....कहीं किसी मंदिर में महिलाओं द्वारा प्रसाद बनाये जाने पर आपत्ती ली जाती है और घरों में तो छुआछुत चलती ही है...ये मेरी समझ में कभी नहीं आया कि जिस चीज से नव-निर्माण होता है , नव-सृजन होता है और जिसे ईश्वर ने इसका वाहक या माध्यम बनाया है .....वही भगवान के लिए अपवित्र कैसे हो जाती है ?
विजय-दशमी पर राम-रावण की चर्चा प्रतिवर्ष होती है .... वैसे ही नवरात्री में आदि शक्ति की आराधना पर इस मुद्दे को भी उठाया जाना चाहिए…
२० अक्टूबर
एक बात बहुत खटकती है मुझे हमेशा.....किसी स्त्री को किसी दिन थकान हो सकती है, झल्लाहट हो सकती है, बोरियत हो सकती है...यह पति(यों) को महसूस क्यों नहीं होता...? लगभग हर भारतीय पति (बड़े गर्व से) यह कहता है कि मुझे बाहर का पसंद नहीं,,,पर जब तक पत्नी बिस्तर पर न पड़ जाये वह खुद होके दाल-चावल या खिचडी जैसा आसान खाना भी नहीं बनाता..यदि कभी शान से बनाये भी तो उसे पत्नी सहायक के बतौर चाहिए और उसके बाद रसोई की जो दुर्दशा होती है ...उससे तो पत्नी को कहना पड़ता है---तुम तो रहने दो ! यह पीढी-दर-पीढी ऐसा ही चला आ रहा है...पिछला जमाना बीत गया ....अब पत्नी भी उतनी ही काबिल, हुनरमंद, शिक्षित और १२-१४-१६ घंटे काम पर जाती है.... पता नहीं वह दिन कब आएगा कि जब वह रसोई में बाद में जाये और पति पहले जाकर पूछे -आज क्या बनाऊँ ? या पत्नी आटा गूंधे तो पति बिना बताये (अख़बार,टीवी,कंप्यूटर का मोह पाले बिना ) सब्जी काटने पहुँच जाये.....
१४ अक्टूबर
बढ़ता वजन,कोलेस्ट्रोल,,मधुमेह , वगैरा-वगैरा की चिंता छोड़कर किसी दिन एक कटोरी गर्मागर्म दाल में दो रोटी चूरकर , दो चम्मच देसी घी डालकर खाएं......शब्दातीत आनन्द मिलेगा....या बचपन में जैसे रोटी के साथ घी-शक्कर का रोल बनाकर खाते थे वैसा खाकर देखिये....बाद में अपने डॉक्टर भैय्या हैं ही...
१३ अक्टूबर
जब टीवी आया तो किताब सिर्फ कुछ मिनिटों की साथी रह गई....किताब के साथ रेडियो भी छूट गया...छाया गीत, भूले बिसरे गीत या शास्त्रीय संगीत का राष्ट्रीय कार्यक्रम सुनते हुए लेटकर किताब पढ़ना.....वो भी क्या दिन थे...और फेसबुक के बाद अब टीवी का रिमोट छूटता जा रहा है...
१२ अक्टूबर
चलते रस्ते बाघ आ जाये कोई बात नहीं...पर पकते खाने के बीच गैस खत्म नहीं होनी चाहिए....
११ अक्टूबर
इन दिनों अख़बार में रोज ही झगड़े और रंजिश में तलवार बाजी होने की ख़बरें रहती है...
अकस्मात मुझे याद आया कि मेरे मायके में भी एक तलवार थी....मेरे दादाजी सिंधिया दरबार में मुलाजिम थे और वह तलवार उन्हीं की थी..मेरा जन्म दादाजी की मृत्यु के बाद हुआ और तब देश भी स्वतंत्र हो चुका था, लिहाजा मैंने उस तलवार को दीवार पर टंगा हुआ ही देखा .... और वह भी तीसरी मंजिल पर...हम उसे दूर से ही देखते...विजय दशमी के दिन सब पढ़नेवालों की किताबों और कलम-दवात के साथ उस तलवार की भी पूजा होती थी...उसे सिर्फ मेरे बड़े भाई (जो उम्र में मुझसे बीस साल बड़े थे) दीवार से उतारते थे....फिर उसकी साफ-सफाई की जाती ...पूजा होती और शाम को फिर एहतियात से तलवार को म्यान में रखकर टांग दिया जाता.....हम बाकी भाई बहनों ने न कभी उस तलवार को हाथ लगाया और न ही कभी ये हिम्मत हुई कि इसके लिए किसी से पूछें......
आजकल घरों में तलवारें आती कहाँ से हैं और युवा उसे हाथ में कैसे थाम लेते हैं....???
१० अक्टूबर
मेरे देश की धरती ने कभी उगला होगा सोना.....अभी तो वह भोले-भाले नेता उगल रही है.....पी. चिंदम्बरम.....शांताकुमार...विजय गोयल....जयराम रमेश...लालू....शरद पवार...क्या तो उनके मासूम चेहरे और कैसी सरल अबोध वाणी....मैं वारी-वारी जाऊँ ......
८ अक्टूबर
मेरे घर के सामने मकान बन रहा है..अत:भारतीय परम्पराओं के अनुसार उनकी गिट्टी,रेती आदि से सड़क घिरी रहती है...कल मै कहीं से रिक्शा से लौट रही थी..रिक्शेवाले से कहा ---भैया , यहीं बाहर ही उतार दो, आगे तुम्हें रिक्शा पलटने में दिक्कत होगी...वह बोला--आंटी आप बुजुर्ग होकर भी मेरे लिए पैदल चल सकती है तो क्या मै थोड़ी-सी परेशानी उठाकर रिक्शा नहीं पलटा सकता ???....उसने किसी तरह आडा-तिरछा घुमाकर मुझे ठीक घर के सामने उतारा...मैं दंग रह गई उसकी सदाशयता देखकर......हम लोग कितने पूर्वाग्रह ग्रसित होते हैं ,,,,,
३ अक्टूबर
सार्वजनिक जीवन में हम जिस चीज की निंदा करते हैं, निजी जीवन में अक्सर उसकी अभिलाषा रहती है.....(उपनिषद गंगा )...
३० सितम्बर
एक उम्र के बाद आलोचना के स्वर धीमे पड़ जाते हैं......
३० सितम्बर
आभास हा छळतो मला...छळतो तुला...एक मराठी प्रेम गीत....(ये आभास तुम्हें सताता है..मुझे सताता है).....ये गीत छायावादी लगता है... शायद फेसबुक के लिए लिखा गया है....
२९ सितम्बर
कल गणेश विसर्जन पर धूम रहेगी....गणपति बाप्पा मोरया,पुढच्या वर्षी लवकर या (अगले बरस तू जल्दी आ ) ....
क्यों आना चाहिए गणपति बाप्पा ने अगले बरस जल्दी ???....
असुरक्षा के माहौल और रोटी-पानी की जद्दो-जेहद में जुटे लोगों को देखने ???...पानी के लिए तरसते और पानी की वजह से जान गँवाती जनता को देखने ???... यहाँ-वहाँ बिखरे पड़े घोटाले और उनकी जाँच का नाटक करनेवाली एजेंसियों को देखने ???...बेशर्म राजनेताओं और मक्कार नौकरशाहों को देखने ???.... लाल बत्ती की गाड़ियों में बैठकर हवाई जहाज में उड़नेवालों को देखने ???....बरसों-बरस घिसट रही योजनाओं को देखने ???....भटके हुए आन्दोलनों और उनमें अटके व्यक्तित्वों को देखने ???.... देश भर में खुदी पडी सडको को देखने ??....सड़कों पर फैले कचरे को देखने ??....औरतों के साथ होने वाले अपराधों को देखने ???....आखिर ऐसा क्या है हमारे पास जो हम बाप्पा को अगले बरस जल्दी से जल्दी दिखाना चाहते हैं ???...
२८ सितम्बर
एक हफ्ता छोटी-सी नातिन के साथ गुजारा......उसके साथ डोरेमन, नोबिता जैसे कार्टून चरित्र देखते हुए एक बात महसूस हुई कि उनमे से कोई भी चरित्र टीवी नहीं देखता, वे खेलते हैं ... , घूमने जाते हैं...प्राणियों से बात करते हैं...पर टीवी नहीं....लेकिन उन्हें देखने के लिए हमारे बच्चे टीवी से चिपके रहते हैं....
२७ सितम्बर
हमारे पुराने मकान के ठीक सामने राशन की एक दुकान थी,जहाँ से हम वक्त-जरुरत सामान ले लिया करते थे...मेरे पति उन दिनों अप-डाउन करते थे तो हफ्ते के हफ्ते ,हर रविवार उसके पैसे चुका देते थे..मेरा बेटा चारेक साल था,तब मेरी बहन आई हुई थी,वह उन्हें हाथ पकड़कर दुकान ले गया और दुकानदार से बोला-ये मेरी मौसी हैं,ये कुछ माँगे तो दे देना और तुरंत मौसी की ओर मुखातिब होकर बोला-मौसी आप पैसे मत देना बाबा दे देंगे...ऐसे ह्रदय स्पर्शी दृश्यों की हम अब कल्पना भी नहीं कर सकते....
१५ सितम्बर
अक्सर लोग उस चीज का गुणगान करते हैं,जो उनके पास होती है या जिसे वे पाना चाहते हैं...
पर मजे की बात यह है कि हिन्दी दिवस पर हिन्दी का गुणगान ऐसे लोगों द्वारा किया जाता है,जो आम तौर पर न तो हिन्दी बोलते हैं,......न लिखते हैं..... न पढ़ते है...
१४ सितम्बर
हिन्दी दिवस का तमाशा....राजभाषा-अधिनियम का पालन ???.....तमाम बैठकों में हिंगलिश में हिन्दी का गुणगान...प्रतियोगिताओं का नाटक, इनाम और फोटो, चाय-पानी, खाना-पीना, लिपस्टिक पुती साड़ियाँ, और ३० सितम्बर के बाद फिर अपने घर-वापसी ....और साल में कभी संसदीय कार्य समिति का दौरा और दौरे की खानापूर्ति....
११ सितम्बर
बढ़ती उम्र के साथ गांधीजी के तीन बंदरों पर विश्वास होने लगता है.....कुछ भी मत देखो (सब कुछ अनदेखा करो).....कुछ भी मत सुनो (बहरे बनो रहो)....और कोई पूछे तब ही बोलो (हालाँकि यह बचपन में कहा जाता है , समझ आने में एक जिन्दगी गुजर जाती है)....
८ सितम्बर
लगभग तीस साल पहले जब मैंने सुबह घूमने जाना शुरू किया था...तब चिड़ियों की चहचहाहट ,मंद समीर , आकाश में मनोरम दृश्य जैसे शब्दों का साक्षात् अनुभव होता था...अब चिड़ियों की चहचहाहट की जगह वाहनों की कर्कश आवाज सुनाई देती है.....युवा वर्ग अकारण बहुत तेज गति और हॉर्न के साथ पास से गुजरते हैं तो बिना किसी विकार के भी दिल की धडकनें बढ़ जाती हैं ....मंद समीर तो क्या कैसी भी हवा नहीं चलती....वातावरण कुंद-सा महसूस होता है....और आकाश के मनोरम दृश्य भी गायब हो गए हैं...इन सब से बचने के लिए सुबह और जल्दी निकलने के बारे में सोच भी नहीं सकती ...न मेरे शरीर पर सोना होता है..न हाथ में मोबाईल या पर्स.....खतरनाक उम्र भी काफी पीछे छूट गई है..तब भी एक अज्ञात भय सताता है...बेहद असुरक्षित महसूस होता है...
५ सितम्बर
सारे बहादुरीवाले शब्द स्त्री लिंग क्यों होते हैं...???
जैसे- सेना,फ़ौज,पुलिस,लड़ाई,लाठी,मूँछे,....
४ सितम्बर
किसी औरत को देखती हूँ....दुपहिया पर रेनकोट पहने...तो याद आ जाता है ''चल मेरी लूना'' वाला खुद का वो समय....कोई दिखती है एक हाथ से साड़ी सम्हालती, दूसरे हाथ से बच्चे की उंगली पकडे तो यकायक मै ३०-३५ साल पीछे चली जाती हूँ .... किसी के हाथ में या वाहन के हुक पर टंगी सब्जी/ किराना देखकर मुझे याद आता है कि अभी-अभी तक याने बहु के आने से पहले तक मैं भी शाम को घर पहुँचते ही खाना बनाने जुट जाती थी......सच ! समय बिलकुल नहीं बदला...महिला के हाथ से करछुल पता नहीं कब छूटेगी ??...
३ सितम्बर
जिन्दगी!!! ज़रा बताके तो जा...तू ऐसी न होती तो कैसी होती....???
२ सितम्बर
सन २०१२ ऐसे उदित हुआ कि मै लगभग हर हफ्ते किसी न किसी के घर शोक-संवेदना व्यक्त करने जा रही हूँ ....कुछ परिवारों में तो जैसे मृत्यु ने किसी जनम का बदला लिया ऐसा महसूस हुआ...अकाल और आकस्मिक मृत्यु... दिमाग झनझना गया और ह्रदय की हालत बयां नहीं हो सकती...और इस हफ्ते तो सारी हदें पार हो गईं...तीन जगह....नश्वरता का ये अनुभव अब बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा है..
२६ अगस्त
आज आयबीएन लोकमत पर Greatest Indian कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन , शबाना आजमी और राजदीप सरदेसाई एक सोफे पर इस तरह बैठे थे कि मुझे इंदौर के टेम्पो याद आ गए.....अमिताभ बच्चन आगे खिसक कर, शबाना आज़मी पीछे टिककर और फिर राजदीप सरदेसाई आगे की ओर...
इंदौर में किसी ज़माने में लोक वाहन के रूप में टेम्पो चलते थे, जिसमें तेरा लोग बैठ सकते थे और इतने का ही परमिट मिलता था ,पर ज्यादा पैसे कमाने लालच में टेम्पो चालक अक्सर अठारह सवारी तक बिठा लेते थे और फिर सवारियों से कहा जाता था-आगे पीछे खिसक के बैठो यानी एक ही सीट पर एक व्यक्ति आगे और एक पीछे। लगभग ६ इंच में वे एक सवारी बैठा लेते थे...
१५ अगस्त
तुम देवकी के थे, यशोदा के थे, सुदामा के थे, अर्जुन के थे, राधा के थे, मीरा के थे.....
मेरे क्यों न हुए ????...
१२ अगस्त
सुना है कि फेसबुक पर लोगों को बिछुड़े स्वजन मिल जाते हैं....लेकिन यदि कोई फेसबुक से ही लापता हो तो कहाँ मिलेगा ???
८ अगस्त
अगली पीढ़ी के लिए ढेरों शुभकामनायें.....उन्हें किसी लोकपाल बिल का सपना न आये...बिना घबराएँ गले-गले तक भ्रष्टाचार में वे जीते रहें ...
कोई अण्णा , कोई केजरीवाल, कोई बेदी उन्हें सोते से जगाकर खुद भटक न जाये... उन्हें मिले मनमोहक चुप्पी, चिद्दड बेशर्मी और सिब्ब्ली मक्कार हँसी ...
हे ईश्वर ! हमें सुला दें और न जगाए नए -नवेलों, मासूम और अबोधों को..
३ अगस्त
पुणे में मेरी बेटी के दफ्तर से कुछ ही दूरी पर बम फटा....उसका मोबाइल भी नहीं लग रहा था..."दिल दहलना"का अर्थ आज शब्दश: अनुभव किया...अभी करीब दस मिनिट पहले वह घर सुरक्षित पहुँच गई..शुक्र भगवान का..
१ अगस्त
ईश्वर को किसान से कुछ सीखना चाहिए...जमीन का टुकड़ा हो या बड़ा-सा खेत...चौकोर हो,तिरछा हो या आयताकार....किसान क्यारियाँ हमेशा एक समान और सीधी बनाता है..पर भगवान हमारे जीवन में बमुश्किल एकाध क्यारी सीधी बनाता है... इसलिए ईश्वर को किसान से कुछ सीखना चाहिए.....
२५ जुलाई
गुवाहाटी में उसके साथ अत्याचार होता रहा और पत्रकार महोदय फोटोग्राफी में लगे रहे....
वा.....क्या जज्बा है कवरेज का...क्या बुलंदी है ब्रेकिंग न्यूज की.....
रसातल, पाताल सारे शब्द इनके लिए कम है...कहाँ डूब मरेंगे ? कौन-से नरक में जगह मिलेगी ???...
१२ जुलाई
बिदा आम ...तुम मेरे लिए बहुत खास हो....इस मौसम का आख़िरी आम.....और कटोरी में रस की आख़िरी बूँद...बहुत दुःख हुआ...कल का रविवार लम्बे अरसे बाद सूना-सूना-सा !!!!
७ जुलाई
कितनी ही चीजें तकलीफ देती हैं
और उन्हीं चीजों के साथ कितने सारे लोग खुश भी हैं..
१ जुलाई
कोई बात जिन्दगी भर तभी याद रहती है, जब उसे हम एक बार बे-वजह भूल जाते हैं…
२३ जून
आज सुबह स्कार्फ और गॉगल्स घर भूल गई.....बाहर निकलते ही पंच-तत्वों में से दो से सीधा पाला पड़ा...तेज(सूर्यप्रकाश) और पवन(हवा)....बड़े दिनों के बाद इनसे साबका हुआ...
तब याद आया जमीन को भी कितने दिनों से छुआ नहीं है...स्लीपर उतारो तो चप्पल,सेंडिल या बेलीज और उनको उतारकर फिर स्लीपर...उसमें भी विविध प्रकार...रसोई की अलग,बाथरूम की अलग,बगीचे और पोर्च की अलग...
मुझसे किसीने कहा नहीं...पर "अपने-आप को मीनाकुमारी समझकर" मैंने खुद ही जमीन पर पैर रखना छोड़ दिया...और कभी-कभार जमीन पर पैर रखा भी तो वह धरा या पृथ्वी पर नहीं.....पत्थर लगे, टाइल्स लगे,मार्बल लगे फर्श पर....
पंच-तत्वों में से सिर्फ पानी ही है...जिसका स्पर्श रोज होता है...हा हंत !!!!
२२ जून
उपनिषदों में वर्णित आश्रम व्यवस्था क्या स्त्रियों पर भी लागू होती है ????......
उस व्यवस्था के अनुसार अब मुझे वानप्रस्थ में होना चाहिए....अर्थात निवृत्त होना चाहिए...पर एक औरत क्या कभी निवृत्त हो पाती है ???....
और क्या सन्यस्त हो सकती है ???
१९ जून
जीवन में चिंताएं क्या कम थी.. .. ..जो एक चिंता और पाल ली मैंने.......रोज सुबह उठकर एक यक्ष प्रश्न खड़ा रहता है सामने-----खाना क्या बनेगा ???....अब एक प्रश्न और आ जाता है उसके पीछे-पीछे-----आज फेसबुक पर क्या लिखूंगी ???....
१८ जून
बेटा-बेटी जब उनके शहर में होते हैं तो नियत समय पर कितनी सारी बात हो जाती है...पडौस के कुत्ते से लेकर राष्ट्रपति -चुनाव तक और संपत्ति कर से लेकर बराक ओबामा तक...पर वे दिखते नहीं है...केवल आवाज से संतुष्ट होना पड़ता है...
और वे शहर में होते हैं तो दिखते रहते हैं, पर उनसे ठीक से बात नहीं हो पाती....नहाना-धोना,खाना-पीना, मित्र/सहेलियाँ...उनका स्वयं का परिवार...रिश्तेदार...इन सबके बीच बहुत कम समय बचता है...तब केवल उनके दिखने से संतुष्ट होना पड़ता है...
कुल मिलाकर ऐसे या वैसे अतृप्ति बनी ही रहती है...
१६ जून
पहले शादी-ब्याह में वर-वधु को बाहर के लोग नेग के रूप में कुछ रूपये हाथ में पकड़ाते थे...वर-वधु के साथ जो भी होता,सहेली/मित्र,भाभी/बहन या कोई भी.. वे बड़े हिफाजत से उन रुपयों को सम्हाले रखते और बाद में जिम्मेदार व्यक्ति को सौंप देते...फिर कुछ औपचारिक समय आया , तो लिफाफे में नेग दिया जाने लगा....तब भी लिफाफे को बंद नहीं करते थे...उसके फ्लेप को अन्दर कर दिया जाता था बस, पर रूपये सुरक्षित रहते थे....फिर कुछ सालों बाद लिफाफा चिपकाने का चलन शुरू हुआ....तब मुझे याद है...पहली बार सासु-माँ और मेरे पति में एक लम्बी बहस हुई थी...सासुजी का कहना था--क्या वहाँ चोर-उच्चके आयेंगे कि चिपकाकर दे रहे हो....?? और अब चिपकाने के बाद सेलो टेप भी लगाया जाने लगा है....
अविश्वास की धारा कितनी गहरी हो गई है !!!
१२ जून
ऋतुजा दिवेकर (करीना कपूर की आहार विशेषज्ञ , जिनकी वजह से जीरो फिगर सम्भव हुआ ) कहती हैं कि आलथी - पालथी डालकर या सुखासन में अर्थात ठेठ भारतीय तरीके से भोजन करना चाहिए...उनकी बहु-चर्चित किताब Dont loose your mind, loose your weight में भोजन कैसे करें इस अध्याय में उन्होंने पहला नियम यह दिया है....फिर वे कहती हैं कि केलोरी की चिंता ना करें...जो इच्छा हो और जिस भोजन की आपको आदत हो वही खाएं......यही तो मेरी माँ भी कहती थी----पहनो जग भाया...खाओ मन भाया...
लो पूरी दुनिया तलाश ली...वजन कम करने के लिए और लौट आये अपनी ही रसोई में...
४ जून
लगभग पांच साल पहले मैंने टाटा-स्काय लगवाया तो सारी मराठी वाहिनियों का आस्वाद मिलने लगा ......लाइफ सचमुच झींगा-लाला लगने लगी...हिन्दी धारावाहिकों से नाता एक तरह से टूट गया...मराठी में अनेक विषयों पर बने धारावाहिकों में रंगमंच के मंजे हुए कलाकारों का अभिनय देखना बेहद सुकून देता था...पर अचानक उस महिला की दृष्टि इधर पडी, जो ना खुद सास है ना बहु...ना ननद है ना भाभी....और मेरे घर में भी जरी की साड़ियों में सजी -धजी महिलाएं, जो सोते समय भी लिपस्टिक लगाकर सोती हैं...दिखाई देने लगी,,,बड़े-बड़े मकान और आलिशान फर्नीचर...राजनीती,कूटनीती,झगडे....सत्यानाश कर डाला...एक समृद्ध भाषा की बेहतरीन वाहिनियों का...
३ जून
शास्त्रीय संगीत जिनको आ..आ..ऊ..ऊ..लगता है...नाटक के संवाद नकली लगते हैं......साहित्य की विधाएं सिर्फ गल्प या कपोल-कल्पित लगती है.....वे लोग शेअर बाजार के भाव या बैंक की ब्याज दरें मुझसे बड़े चाव से सुनते हैं...
२ जून
लगभग ३२ साल पहले जब पहली मोपेड खरीदी थी तब पेट्रोल का भाव ५.०० रू. लीटर था ....मोपेड खरीदने से पहले काफी लम्बा गुणा-भाग हुआ था ,यह तय करने के लिए कि हम ७५/१०० रू महीने का भार उठा पायेंगे कि नहीं ?.....लेकिन अब कोई विकल्प ही नहीं है.....आदतें इतनी बिगड़ गई हैं और दूरियाँ इतनी बढ़ गई हैं कि .... हमें यह भार उठाना ही है.....
२३ मई
फेसबुकपर पर भले ही सब कुछ आभासी है....पर शब्द सच्चे होते हैं...असली दुनिया के आभासी शब्दों से तो यही भला है…
१८ मई
टीवी देखने का आनन्द नए सिरे से मिल रहा है.....नए-नए पात्रों के साथ परिचय भी.....नन्ही नातिन के साथ कार्टून चेनल देखने का मजा ही कुछ और है.....चाहे नहाना हो या खाना-नाश्ता...हर बार मीठा-सा जवाब---बस! नानी 5 मिनिट.....और उसके इन शहद भरे बोलों पर सब कुछ वारी जाऊं .....
१८ मई
मै घर पर रहती हूँ तो माँ जैसी हो जाती हूँ...पर बाहर निकलने पर बेटी जैसी नहीं हो पाती...
१० मई
थोड़े-थोड़े अन्तराल में बच्चों का घर आना बहुत जरुरी है......मेरा आत्मविश्वास बना रहता है कि मै आज भी इतने (?) लोगों के लिए वैविध्यपूर्ण खाना पका सकती हूँ...
८ मई
सत्यमेव जयते का शीर्षक गीत चल रहा था..तभी मोबाईल बजा...कुछ अनमनी-सी हो मैंने उठाया...पहले सोचा -काट दूँ...फिर उस पर बहु का चेहरा दिखा...तब भी बेमन से ही कहा-हाँ बोल !..उसका हमेशा की तरह उत्साह से लबरेज स्वर- आई ! जल्दी से सुनिए ! सत्यमेव जयते शुरू होनेवाला है..सोचा आपको याद दिला दूँ...मैंने कहा- हाँ मैं देख रही हूँ..उतनी ही तेजी से वह बोली--ठीक है रखती हूँ...और फोन खट से बंद....
ये इक्कीसवी सदी की सास-बहु का संवाद था....मुझे महसूस हुआ...बदलाव की बयार मेरे बहुत करीब-से बह रही है...
६ मई
मेरे शहर की बिजली का मेन स्विच आसमान में है...और उसे बन्द-चालू इन्द्र देवता करते हैं....बारीश शुरू...बिजली गायब...बारीश बंद...बिजली चालू...
५ मई
आय बी एन लोकमत पर आज एक बहुत बढ़िया कार्यक्रम देखने को मिला...३ मई १९१३ को भारत की पहली फिल्म "राजा हरिश्चन्द्र" प्रदर्शित हुई थी, जिसे दादा साहेब फाल्के ने बनाया था..आज से भारतीय फिल्म इंडस्ट्री का शताब्दी वर्ष शुरू हुआ..इसी परिप्रेक्ष्य में उक्त वाहिनी ने दादा साहेब फाल्के का एक काल्पनिक साक्षात्कार प्रसारित किया और इस बहाने पूरी भारतीय फिल्म इंडस्ट्री का एक तरह से विहंगावलोकन हो गया ...साथ-साथ दादा साहेब फाल्के के बारे में भी जानने को मिला....कैसी विलक्षण प्रतिभा थी उनमें...उन्होंने चित्रकारी सीखी थी,फोटोग्राफी सीखी, जादू सीखा और नौकरी की पुरातत्व विभाग में...उस ज़माने में अपनी पत्नी को फिल्म निर्माण की बारीकियां समझाई...और शायद इसी वजह से हमने अपने युग में विजया मेहता, सई परांजपे,अपर्णा सेन जैसी फिल्म निर्देशिकाएं पाई.....एक व्यवस्थित फिल्म वितरण व्यवस्था भी दादा साहेब की ही देन है और आज भी उसी अनुरूप फ़िल्में वितरित होती हैं...
३ मई
आज महाराष्ट्र दिवस था..बहुत से लोगों ने एक दूसरे को बधाई दी...पर मैं ऐसा नहीं मानती....आम बोलचाल की भाषा में हमें यानी मराठीभाषियों को महाराष्ट्रिय कहा जाता है...पर वास्तव में वैसा है नहीं...महाराष्ट्र से बाहर बसे मराठी-भाषियों को महाराष्ट्र के लोग अपना नहीं मानते...उन्होंने एक शब्द बना लिया है.."बृहन-महाराष्ट्रिय" और इस शब्द के जरिये हमें जात-बाहर कर दिया गया है...मुझे नहीं लगता कि ऐसा किसी और प्रान्त में होता है...किसी बंगाली को बृहन बंगाली, बिहारी को बृहन बिहारी,पंजाबी को बृहन पंजाबी या किसी तमिल, मलयाली,कन्नड़ के आगे "बृहन " लगते मैंने ना देखा ना सुना...पर "आपला माणूस" " आमची भाषा" आदि का जय-जयकार करनेवाले तमाम नारेबाज भी ऐसे वर्गीकरण से असहमत नजर नहीं आते...बल्कि ये सारे लोग बड़े गर्व और अभिमान से "बृहन महाराष्ट्र मंडल" जैसी संस्थाओं को पोषित करते हैं...उनके कार्यक्रमों में सम्मिलित होते हैं...और सबसे दुखद यह है कि ज्यादातर "बृहन-महाराष्ट्रिय" भी उनके साथ किये जा रहे दोयम दर्जे के व्यवहार को ना केवल खुशी-खुशी स्वीकारते हैं...बल्कि साहित्य, संगीत, कला,समाज-सेवा,अर्थशास्त्र जैसे तमाम विषयों से सम्बन्धित ऐसे व्यक्ति को भगवान जैसा मानते हैं ,जिसकी एकमात्र योग्यता उसका महाराष्ट्र निवासी होना होता है..चाहे वह परभणी,नांदेड जैसी छोटी जगह से हो या मुंबई,पुणे जैसे शहरों का......उसकी हैसीयत दो कौड़ी की हो तब भी वह अत्यंत सुयोग्य "बृहन-महाराष्ट्रिय" से कमतर ही समझा जाता है...महाराष्ट्र के लोग तो हमें कमतर आंकते ही हैं...इसीलिये मैं अपने-आप को "महाराष्ट्रीय" नहीं "मराठी-भाषी" कहती हूँ.....
१ मई
अक्षय तृतीया यानी कैरी का पना...मीठे खरबूज...सत्तू और खटाई डली भींगी चने की दाल...जीवन-शैली से गायब होता जा रहा है यह हमारा "फास्ट-फ़ूड" और हमारे "कोल्ड-ड्रिंक्स"....
२४ अप्रैल
आज पुराने घर का अखबारवाला मिल गया....पूछने लगा--कैसी हो भाभी ?....."भाभी"...बरसों बाद किसी बाहरी व्यक्ति का ऐसा भीगा-सा संबोधन सुना...वर्ना मेडम,मेम और बहुत हुआ तो आंटी.....सुनते-सुनते रुक्षता आ गई थी...
१९ अप्रैल
अगर तू बादशाह है ,तो भी "उसका" (ईश्वर का ) गुलाम है....(उपनिषद-गंगा)...
१५ अप्रैल
जब हम छोटे थे तो बड़े होने की तमन्ना थी ...मगर बड़े होने पर पता चला कि अधूरे अहसास और टूटे सपनों से अच्छा तो अधूरा होमवर्क और टूटे खिलौने थे...
१३ अप्रैल
बिदा आम ...तुम मेरे लिए बहुत खास हो....इस मौसम का आख़िरी आम.....और कटोरी में रस की आख़िरी बूँद...बहुत दुःख हुआ...कल का रविवार लम्बे अरसे बाद सूना-सूना-सा !!!!
७ जुलाई
आओ !मेरी कलकत्तावालियों ,केरलवालियों,आंध्रवालियों ,गढ़वालवालियों ,कटकवालियों ,महेश्वरवालियों,चंदेरीवालियों ....आओ...बारीश की फुहारों और ठण्ड की चुभन ने तुम्हें मुझ से दूर कर दिया था...काश्मिरी,बनारसी,पोचमपल्ली,कांजीवरम पर गुजारा किया मैंने....पर सुकून और गरिमा तो तुम्हीं से मिलती है...आओ निकलो एक-एक कर बाहर...अब चार महीने सिर्फ तुम,तुम और तुम...और कुछ नहीं..
६ अप्रैल
डाक्टर लोग भी.....कभी सस्ताई की बात नहीं करते...नकली बीमारी का असली प्रमाण-पत्र चाहिए था...छुट्टी के लिए..तो सोचा लगे हाथ रक्तचाप भी देख लूँ...बस ! सामान्य था, पर उनको एक वजह मिल गई...कहने लगे-अब आपको ध्यान रखना चाहिए..ये "अब" सुनते-सुनते बीस साल होने आये हैं....फिर उनकी सलाह शुरू हो जाती है....आय में जितने शून्य जुड़ते हैं..उतनी नसीहते बढ़ जाती है...बिलकुल प्राथमिक स्तर पर कहेंगे-रोज दूध लेना चाहिए, फिर एक शून्य बढ़ा तो हरी सब्जी,सलाद खाइए..एक शून्य बढ़ा कि...फल खाइए...सूखे मेवे खाइए...और इससे भी मन नहीं भरता तो मल्टी विटामीन .....दूध में डालने के लिए प्रोटिनेक्स जैसा कोई पावडर....वगैरा और जुड़ जाते हैं...
६अप्रैल
प्रो.असगर वजाहत ने दूरदर्शन पर अपने साक्षात्कार में आकाशवाणी के समाचार वाचक देवकीनंदन पाण्डे को याद किया....एक पूरा का पूरा युग जीवित हो गया...देवकीनंदन पाण्डे, अमीन सयानी,इंदु वाही,रणजीत सतीश... उनकी आवाज के लिए दीवानगी रहती थी ....ऐसी दीवानगी आज प्रत्यक्ष और सजे-धजे दिखते ....एंकर और समाचार वाचकों के प्रति महसूस नहीं होती....कुछ वर्ष पहले तक सरला महेश्वरी,निधि कुलपती और कुछ हद तक विनोद दुआ इसके अपवाद थे...फिर भी वो जादू नहीं था..
४ अप्रैल
सास भी कभी बहु थी....
आजएक लम्बे अरसे के बाद दुबारा BABY'S DAY OUT देखी ....मजा आ गया...साथ-साथ एक पुराना किस्सा भी याद आ गया...मेरा बेटा तब घुटनों चलता था...पुराने बड़े घर में वह कहीं से चक्कर लगाता आया और सेंटर टेबल के अंदर घुसकर सो गया...उन दिनों टेबल को ढकनेवाला और हाथ से कढ़ा मेजपोश बिछाने का प्रचलन था... तो वह दिखाई भी नहीं दिया...बड़ी देर में हमें याद आया कि बेटा कहीं दिखाई नहीं दे रहा है...उन दिनों घर में लोग भी बहुत रहते थे..हम पति-पत्नी मोहल्ले के हर घर में ढूंढ़ आये...वह कहीं नहीं मिला...मैं तो रोने-रोने को थी ....थके-हारे घर लौटे तो पोता मजे-से दादी की गोद में खेल रहा था...सासु-माँ ने मीठी घुडकी दी-"एक बच्चा तुम लोगों से सम्भाला नहीं जाता"....तब बुरा लगा था ,पर अब सास बनने के बाद उन घुड़कियों का महत्व पता चलता है...
१ अप्रैल
पीड़ा...
दरअसल
प्रसव के बाद
शुरू होती है...
३१ मार्च
भारत की पहली महिला चिकित्सक डा.आनंदी बाई जोशी का आज जन्मदिन है....उनका जन्म 31 मार्च 1865 को कल्याण ,जिला ठाणे में हुआ था....उस ज़माने में जब स्त्री-शिक्षा ,परदेश गमन,समुद्र पार करना पाप समझा जाता था....उनके पति गोपालराव जोशी, जो उनसे २० साल बड़े थे....ने महसूस किया कि कुल मिलाकर समाज में डाक्टरों की कमी तो थी ही , महिलाओं के लिए तो और भी समस्या थी....उन्होंने आनंदी बाई जोशी की बुद्धिमत्ता को देखते हुए उन्हें पढ़ाने का निर्णय लिया और प्रोत्साहित किया...7 अप्रैल 1850 को वे जहाज से अमेरिका के लिए प्रस्थित हुई और 16 नवम्बर 1886 को भारत की यह पहली डाक्टर स्वदेश लौटी...
३१ मार्च
एक नौकरी के लिए ....
साड़ियाँ खरीदना
फिर उन्हें तैयार करना
उनका रख-रखाव
एक मोबाईल,दो मोबाइल
एक लेंड लाइन
पेट्रोल,
सौन्दर्य प्रसाधन,
ब्यूटी पार्लर,
एक सुन्दर-सी ब्रांडेड वाटर बोतल
वैसा ही टिफिन
शानदार बड़ा-सा बेग
और उसमें भरे हुए नोट
दो/तीन बैंकों के क्रेडिट कार्ड /ए.टी.एम.कार्ड
घर में सुख के लिए जुटाई गई सुविधाएँ
किचन गजेट्स
और ढेर सारा कुछ-कुछ
और फिर इन सबके लिए नौकरी...
और वो बेचारा "पापी -पेट"....जिसका हवाला हमेशा दिया जाता है...वो तो क्या रुखी-सूखी दो रोटी और गिलास भर पानी में भी खुश रहता है...
३० मार्च
आओ कॉक्रोचों,चूहों,साँपों,बिल्लियों,शेरों,सेंधमारों,....और जो भी आ सकते हो ...आ जाओ..हमारे दरवाजे खुले हैं,...हमारी जो भी कमजोरियां हैं ...वो बतानेवाले विशेषज्ञ भी हमारे यहाँ हैं...हमारे यहाँ पैसा देकर कुछ भी खरीदा जा सकता है...ढेरों सुविधाएँ हैं यहाँ....आओ.. अखिल विश्व के समस्त प्राणियों आओ
२८ मार्च
प्लास्टिक मुद्रा के इस युग में भी कभी-कभी ......रसोई के डिब्बों में छुपाकर,बचाकर रकम रखने का तरीका,.... कारगर लगता है ...
२५ मार्च
आज "उपनिषद गंगा" में अँधा-युग के प्रसंग को देखते हुए अनायास २० साल पुराना समय याद आ गया,जब मेरी बेटी स्वरांगी ने इसी प्रसंग को एन.एस.डी. के शिविर में अभिनीत किया था...और वे सारे लोग फिर से याद आ गए ,जिनके स्नेह और सुरक्षा के साये में मैंने उसे इस शिविर में भेजा था....वह सबसे छोटी और शिविर की आयु मर्यादा के अनुसार भी कम आयु की थी..पर आदिल कुरेशी और स्व.शाहीद मिर्जा ने अपने प्रयासों से उसे शिविर में सम्मिलित करवाया....उसके साथ के उन सारे लोगों का स्नेह,प्रेम आज भी उसके साथ है..तनवीर फारुकी,दीपा बनसोड(तनवीर),सन्देश व्यास,रवि वर्मा,परिधि महाजन,राहुल बोस,और स्वानंद किरकिरे भी...स्वानंद तो शायद इसी शिविर के बाद एन.एस.डी. गए और अपनी प्रतिभा और सादगी के साथ खूब नाम कमाया.....
१८ मार्च
दुःख ईश्वर का प्रसाद नहीं
कि बाँटा और खत्म किया
१० मार्च
भ्रूण हत्या होती है तो वह स्त्री है....फलक है तो वह स्त्री है...आयुषी तलवार को मार दिया जाता है क्योंकि वह स्त्री थी.......भंवरी देवी को मार दिया जाता है क्योंकि वह स्त्री थी ....
और फिर एक अंतर्राष्ट्रीय महिला-दिवस...सखियों...बहनों...बधाई आप सभी को.....
कि आप अभी तक बची हुई हैं ....बधाई आपको कि आप अभी तक साबित नहीं हुई कि आप फलक हैं....या आयुषी...या भंवरी देवी....शुक्र मनाइए कि आप तभी तक हैं बची हुई....
मजे से सुनिए तब तक आपको दी हुई उपाधियों के बारे में कि आप शक्ति स्वरूपा हैं...आप देवी स्वरूपा हैं .....माँ समान हैं...
सुनिए कुछ सूक्तियां कि यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता:.....और फिर साल भर कुछ मत बोलिए...कुछ नहीं....बिलकुल कुछ भी नहीं...
७ मार्च
आजकल सफर में भी शांति नहीं रहती...बस हो चाहे ट्रेन....बैठते ही मोबाईल बजने लगते हैं...यदि कोई सहयात्री व्यवसायी हो तो समझिये कि ना तो आप कुछ पढ़ सकते हैं और ना ही संगीत का आनंद ले सकते हैं...उसके व्यवसाय की सारी बारीकियां सुनना ही पड़ेगी...मनन-चिंतन तो शायद धीरे-धीरे कालबाह्य हो जायेंगे......एसी हो तो बाहर की दृश्यावली से भी वंचित...ना वो चटपटे चने...ना वो कुल्हड़वाली चाय...सफर में बनने वाले रिश्ते भी खत्म हो गए...ना कोई भैय्या...ना कोई अम्मा...सब मेडम और सर....सॉरी और थैंक्यू .....ना चढना ...ना उतरना...ना रेलमपेल..ना धक्का-मुक्की.....रोमांच ही खत्म हो गया.
३ मार्च
इस वर्ष के अ.भा.मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष एवं प्रसिद्ध मराठी कवि श्री वसंत आबाजी डहाके ने आज इंदौर के मराठी अकादमी के कार्यक्रम में एक बहुत अच्छी बात कही ...उन्होंने कहा कि कोई-सा भी पाठ्यक्रम हो ,इंजीनियरिंग,मेडिकल,वाणिज्य हो या एम.बी.ए.,साहित्य अनिवार्य रूप से पढाया जाना चाहिए.....साहित्य से व्यक्ति संवेदनशील और एक अच्छा इन्सान बनता है .........
२७ फरवरी
वे बुजुर्ग हैं ( मेरे से भी ज्यादा :) ) मोबाईल नहीं रखती ....सुबह उनका फोन उनकी युवा पोती ने उठाया ,बोली --- दादी स्नान ले रही है ( सरल हिंदी अनुवाद )......
२३ फरवरी
भारत के सबसे बड़े समाचार पत्र समूह का दावा करनेवाले एक स्थानीय अख़बार की हिन्दी कैसी है, यह सर्व विदित है.पर आज के अख़बार की बानगी देखिये....समर ड्रेसेस में नजर आयेंगे नये इनोवेशन.....ऑफ शोल्डर की डिमांड बढ़ी...बीड्स और बुल्स से डेकोरेशन....सेलिब्रिटी मांग रही लेडी ....और आज तो मेरी अंगरेजी सुधर गई....वुमेन का बहुवचन वुमंस ....???
२२ फरवरी
हमारे यहाँ दादी-नानी द्वारा कहानी सुनाने की परम्परा रही है...कथावाचक भी होते हैं...कथक होता है...पहले कोई फिल्म देखकर आता था तो तीन-तीन दिन तक दृश्य दर दृश्य कहानी सुनाता था.. मराठी में कीर्तन और कथा-कथन की परम्परा है....कुल मिलकर कहानी का महत्व हमें पता है...अब उस पर "स्वयम्भू विश्व-सम्राट" की मुहर लग गई है... एनेलिसिस ऑफ़ चाइल्ड वेलफेअर सोसायटी अमेरिका ने एक विश्लेषण से जाना कि जिन बच्चों को, इनमें शिशु भी शामिल है, कहानी सुनाई गई ,उनका स्वास्थ्य अच्छा पाया गया और व्यवहार बहुत शांत व अनुशासित रहा....
चलिए अब '"दादा" ने बोल दिया है तो मेरे जैसे स्त्री-पुरुषों का भविष्य उज्जवल है....सेवा निवृत्ति के बाद काम मिलने की सम्भावना है...क्योंकि "उधर" जो होता है वह सब आत्मसात करने वालों की एक बड़ी जमात हमारे यहाँ है...
१० फरवरी
अमर उठ..लकड़ी -कंडे ला...अलाव जला...ब्लोवर लगा...गरमा-गर्म सूप पी...हलुआ खा...ओजोन परत पर छेद देख...ग्लोबल वार्मिंग वालों को तलाश...(पहले अमर से कहा जाता था-अमर... उठ घर चल...चटई बिछा...पाठ पढ़...)
९ फरवरी
दिनभर आप काम के बोझ से दबे रहे .....तकनीक से जूझते रहे ...कार्य-प्रणाली से परेशान रहे....शाम को जब काम ठीक-ठाक तरीके से समाप्त होने की कगार पर है और आप थोडा तनावमुक्त अनुभव कर रहे हैं.....उस समय आपका हाल-चाल पूछने के लिए जो शख्स नमूदार होता है...उसे बॉस कहते हैं....
९ फरवरी
आज घर में एक सांप का बच्चा निकला...उसे ठिकाने लगाया...अब पता कर रही हूँ ..कहाँ से आया ?...भोपाल से या दिल्ली से ?...
६ फरवरी
चाहे कितने ही राजनारायण आये ,जे.पी.आये..... सुब्रमण्यम स्वामी आये...या अन्ना हजारे ......हम गंदगी में पैदा हुए, पले-बढे और ऐसे ही मर जायेंगे..
४ फरवरी
बेचारे रवीश कुमार पर दया आती है...नेताओं से बहस की बजाय तो वो किसी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक होते.....?
२ फरवरी
जब मन समुद्र में भूला-भटका होता है
तब कोई नया शब्द तैरने का आधार ले आता है....
.....गेटे
१ फरवरी
मन में बहुत सारे अर्जुन हैं......पर यहाँ कोई कृष्ण समझाने नहीं आता ....
३१ जनवरी
सुख क्या है ?....रविवार की सुबह जी -भर नहाना ...दोपहर थाली भर खाना....फिर दो घड़ी बिना व्यवधान के सोना....और शाम को कोई काव्य-गोष्ठी, नाटक या शास्त्रीय संगीत की कोई महफ़िल...इससे ज्यादा सुख और क्या है ?..
२९ जनवरी
फैलाना आसान है...समेटना कठिन ...
२८ जनवरी
हे ईश्वर !...पेट की क्या जरूरत थी ??.....केवल मस्तिष्क और हृदय बना देते.....हम जी लेते साहित्य और संगीत के सहारे ......
२६ जनवरी
नार्वे के न्यायाधीशों से कहना चाहिए कि वे पानी-पूरी,गोलगप्पे या पुचके,हाथ से खाकर दिखाएँ ...
इमरती और जलेबी हाथ से कैसे खाई जा सकती है...?????
दाल-चावल खाने का मज़ा हाथ से ही आता है और वह भी जमीन पर आलथी-पालथी डालकर...
और बच्चे के ठुनकने पर माँ का यह कहना---आ तुझे मेरे हाथों से खिलाती हूँ....बड़े-बड़े ४०/५० की उम्र पार कर चुके "बच्चे" भी हमारे यहाँ माँ के हाथों को याद करते हैं...
और सबसे महत्वपूर्ण.... यह सर्वथा निजी मामला है-बच्चे की परवरिश कैसे की जाये…
२३ जनवरी
तू कल क्या कर रिया था ?..
कल मैं लोकपाल पर लड़ रिया था...
तू आज क्या कर रिया है ?....
आज मैं बटला-हॉउस पर लड़ रिया हूँ...
तू कल क्या करेगा ?....
तू मेरी चिंता छोड़...अपनी कर...मैं कल भी रहा तो तू क्या करेगा ?....
१३ जनवरी
मराठी की प्रसिद्ध लेखिका स्व.दुर्गा भागवत वृद्धावस्था के बारे में कहती हैं-"मुझे बुढ़ापा अच्छा लगता हैं.शरीर थकता है,कान दांत,आँखें कमजोर हो जाते हैं पर इन सबकी वजह से फायदा ही होता है.मनुष्य अंतर्मुख होता है.कुछ अधिक विचारशील हो जाता है.उसका लोगों से संपर्क कम हो जाता है और इस कारण फालतू की बातचीत,व्यर्थ समय नष्ट होना आदि समाप्त हो जाता है.रोज कुछ नया सीखने की इच्छा हो तो सीखा जा सकता है,कुछ नया करना हो तो उसके लिए भी समय मिल जाता है.प्रकृति का सौन्दर्य निहार सकते हैं,जीने का सच्चा आनन्द इसी अवस्था में मिलता है और आप सुख का अनुभव करते हैं...."
(आदरणीय दुर्गा भागवत ने उक्त बातें अपनी आयु के ८७ वें साल में एक साक्षात्कार में कही थी.वे देश की ऐसी पहली साहित्यकार थी ,जिन्होंने आपातकाल का सर्वप्रथम विरोध किया था )
११ जनवरी
शून्य की खोज इसलिए थोड़े ही हुई थी कि तापमान उससे नीचे चला जाये...
१० जनवरी
टीवी खोलने पर कोई समाचार वाहिनी चल रही हो तो मूर्खतापूर्ण राजनीती पर ,राजनीतिज्ञों के मूर्खतापूर्ण बयान चलते रहते हैं..किसी मनोरंजन वाहिनी पर कोई-सा अविश्वसनीय धारावाहिक चल रहा होता है और खेल वाहिनियाँ तो क्रिकेट के अलावा किसी और खेल के बारे में जानती ही नहीं हैं.सचिन के शतक की चिंता या कोई रिकॉर्ड बनाने की चिंता ,इन्हें स्वयम सचिन से ज्यादा रहती है...और इस सबके बीच सबसे ज्यादा बे-अक्ल मैं स्वयम को पाती हूँ कि करीब २५ साल पहले मैंने टीवी खरीदा और २० साल से वाहिनियाँ खरीद-खरीद कर देख रही हूँ...मराठी में एक बहुत अच्छी कहावत है-----"विकतचे दुखणे"....यानि खरीदा हुआ दर्द.....
५ जनवरी
एक वह वर्ग है जिसे कुछ न कुछ मुफ्त में देने के लिए सरकारें आतुर होती हैं.इस वर्ग को कभी मुफ्त खाना,कभी मकान तो कभी बिजली मुफ्त में देने की पेशकश होती है.दूसरा वर्ग स्वयं सरकार में बैठे लोगों का है,जो सब कुछ मुफ्त में हासिल करना अपना हक समझता है.फिर बचता है हम जैसों का मध्य वर्ग जो न आम है और ना ही खास..कभी कार्ल मार्क्स ने कहा था--मध्य वर्ग ही किसी देश की दशा और दिशा तय करता है.लेकिन हमारे यहाँ मध्य वर्ग स्वयम दिग्भ्रमित है.परेशान है.वह समझ नहीं पाता है कि घर-परिवार को कैसे चलायें ? इसी जद्दो-जेहद में उसकी जिन्दगी कट जाती है.वह सोचता रहता है---इस हफ्ते सब्जी में कटौती की जाये या फल खरीदना मुल्तवी किया जाये ? दूध बच्चों के लिए हो या घर के बड़े-बुजुर्गों के लिए ? सूखे मेवे मौसम में एक बार ही लाकर काम चलाया जाये तो कैसा रहे ? पेट्रोल और मोबाईल के खर्चे को कैसे सीमित किया जाये ? इस त्यौहार पर बच्चों के लिए कपड़े खरीदे ,माँ के लिए शॉल या फिर पत्नी के लिए साड़ी ? इसी बीच कुछ नए खयाल भी आते हैं...जो महंगे है,लम्बी अवधि के हैं,पर जरूरी भी हैं.जैसे मकान बनवाना,कार खरीदना वगैरा ...पति-पत्नी दोनों कमाते हों तो रोज की खिच-खिच थोड़ी कम हो जाती है..पर सपने पैर फैलाते हैं...बच्चों की उच्च शिक्षा या खुद कुछ नहीं तो सिंगापूर या दुबई जैसी कम खर्चे की विदेश यात्रा..कुल मिलाकर मध्य-वर्ग बीच में ही फंसा रहता है..वह कोई भी सुविधा न तो मुफ्त में पा सकता है और न ही मुफ्त में बटोर सकता है.. न तो वह निचले तबके जैसा रह सकता है ..न ही ऊँचे तबके में जा सकता है..और विडम्बना यह है कि जिन्हें सब आसानी से मिलता है, वह इसी वर्ग ने चुकाए करों की वजह से सुलभ होता है...प्राप्य होता है...
३ जनवरी
स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए कई नेता जेल गए और तत्कालीन सरकार के अनुसार वे अपराधी थे...पर इन "अपराधियों" ने अपने समय का सदुपयोग किया...लोकमान्य तिलक ने गीता रहस्य,जवाहरलाल नेहरु ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया,वीर सावरकर ने कमला काव्य,हरेकृष्ण महताब ने हिस्ट्री ऑफ ओरिसा, जैसे ग्रंथों की रचना जेल में रहकर की...लेकिन आधुनिक अपराधी नेता जेल में आनन्द से और निट्ठल्ले रहते हैं और हमारी....हाँ हमारी सरकार उन्हें नव-वर्ष के उपलक्ष्य में पकवान परोसती है...
२ जनवरी
No comments:
Post a Comment