फरवरी में वामा साहित्य समागम के समय सौंदर्य सेवायें ली थीं। मार्च से कुछ छोटे-मोटे अंकुर चेहरे पर दिखाई देने लगे थे, जो अब पौधों में परिवर्तित होकर घने हो गये थे।
कल बहू ने एक परिचित सौंदर्यदात्री को घर बुलाकर सारा जंगल साफ करवा दिया। पहली उत्स्फूर्त टिप्पणी तीन साल की नन्ही पोती की थी -- आजी, कित्ती छान दिसतेय ! (दादी, कितनी अच्छी दिख रही हो !) ऐसी प्रतिक्रिया पर जनम जनम वारी जाऊँ.......
१० नवम्बर
मार्च अप्रैल से अनेक जानकारियाँ आ रही थीं ।
समाचारपत्रों की ओर से कहा गया कि अखबार के कागज़ से कोरोना नहीं फैलता।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया कि कोरोना वायरस हवा में नहीं होता ,किसी सतह पर नहीं टिकता आदि।
कुछ दिन पहले चिकित्सकों के एक समूह ने निष्कर्ष निकाला कि यह वायरस सब्जियों में नहीं होता।
और अब वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद के माध्यम से जानकारी आई है कि गंदगी में रह रहे भारतीयों को कोरोना वायरस से खतरा कम है अर्थात गंदगी भी कोरोना के लिये जिम्मेदार नहीं है।
अब मात्र नेता बचे हैं जिनके बारे में कोई कुछ नहीं कह रहा है.....
😀😀😀
२ नवम्बर
उन्नीसवीं शताब्दी के चिंतक, दार्शनिक हेनरी डेविड थोरो के अनुसार आज छः दिन काम और एक दिन रविवार की छुट्टी होती है, यह क्रम बदलना चाहिए। छः दिन छुट्टी और एक दिन काम होना चाहिए। खुद को पहचानने के लिये समय मिलना चाहिये।
थोरो कितने अच्छे थे।
३० अक्टूबर
लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार,अत्याचार, यातना आदि के समाचार लगातार आ रहे हैं। एक तरह की विषण्णता मन में घर कर रही है। हर घटना के बाद उसपर उहापोह शुरू हो जाती है। लड़कियों के लिये सीख होती है, सहानुभूति होती है, उन्हें मानसिक,शारीरिक,आर्थिक दृष्टि से सामर्थ्यवान बनाने/बनने की बात होती है।
सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह से लड़कियाँ और उनके माता-पिता, अन्य निकटस्थ परिजन आदि केन्द्र में होते हैं।
यह बिलकुल स्वाभाविक है, किन्तु ऐसा तो नहीं कि घर-बाहर लड़कियों पर अच्छा/बुरा कैसे भी अधिक ध्यान दिया जा रहा है और लड़के उपेक्षित हो रहे हैं ? लगातार हो रही घटनायें कहीं कोई मनोरोग तो नहीं है ? अपराध करने के बाद न्यायिक निर्णय भले ही देर से आते हों, लेकिन गिरफ्तार होकर हवालात में रहना, पुलिसिया कार्रवाई का सामना करना, समाज में लांछित होना इन सबका किसी भी आरोपी/अपराधी को सामना करना ही होता है। अपराध करनेवाले लड़कों में कुछ ढीठ हो सकते हैं , लेकिन कम उम्र के या नाबालिग सारे आरोपी/अपराधी मक्कार, बेशर्म वगैरा नहीं हो सकते। माध्यमों की रेलमपेल में सारी बातें सामने आती ही हैं। कोई आरोपी/अपराधी भविष्य के इन खतरों से अज्ञानी होता होगा,लेकिन सब नहीं हो सकते। यदि शिक्षा का प्रतिशत बढ़ा है तो अपराध उसी अनुपात में कम होना चाहिये, उसमें कम से कम बढ़ोतरी तो नहीं ही होना चाहिए।
दुर्दम्य और खुलेआम अपराध क्यों हो रहे हैं ? इनकी संख्या बढ़ती क्यों जा रही है ? आत्महत्या की संख्या में इतनी वृद्धि कैसे हो रही है ? इन सब बिंदुओं पर समाजशास्त्री,मनोवैज्ञानिक,चिकित्सक आदि ने एकजुट होकर शोध करना अत्यावश्यक है। सरकारों ने भी इस दिशा में प्रयास करना चाहिए। इसमें पत्रकारों ने भी अपनी भूमिका तय करना चाहिए। साहित्यकारों ने अपनी गतिविधियाँ अपने-अपने समूहों तक,संगठनों तक सीमित न कर इस दिशा में कार्य करना चाहिए। परिवार में भी ये सिखाया जाना चाहिए कि कोई घटना होने पर मूक दर्शक नहीं बनना है।
शोध के साथ-साथ कई स्तरों पर मुखर विरोध भी आवश्यक है। इस विषय पर सभी ने सोचना चाहिए। समाज सबसे मिलकर बनता है तो अन्तत :समाज में फैल रही गन्दगी के जिम्मेदार भी सभी हैं। यह स्वीकार करना ही होगा।
२९ अक्टूबर
छी ! भारतीय कितने गन्दे हैं। फरवरी में भारत कितना अच्छा था, नवम्बर आते-आते गन्दा कर दिया।
#ट्रंप #उवाच #भारत #में #बहुत #गन्दगी #है।
२४ अक्टूबर
देश और समाज के प्रति मेरी पीढ़ी का योगदान शून्य है ...सारी जिन्दगी इसीमें निकल गई कि अगला इन्क्रीमेंट कब है , महंगाई भत्ता कितना बढ़ा, नया वेतनमान कितना फायदा देगा , आयकर कितना लगेगा और कितना उसके लिए बचाना है ....अपने में खोये हुए , आत्म केन्द्रित हम ...अब गाहेबगाहे फेसबुक पर ज्ञान बघारने आ जाते हैं, क्योंकि समय नहीं कट रहा....
२३ अक्टूबर
एक वरिष्ठ राजनीतिक नेता द्वारा एक स्त्री के प्रति उच्चारित अपमानास्पद सम्बोधन को लेकर बवाल मचा हुआ है। इतना कि मुख्यमंत्री उक्त राजनीतिक नेता जिस दल से सम्बद्ध हैं उस दल की प्रमुख को पत्र लिखकर कार्यवाही की माँग करते हैं, स्वयं सांकेतिक उपोषण करते हैं वगैरा वगैरा। स्त्री पर किसी न किसी रूप में अत्याचार के समाचार हमारी दैनन्दिनी का दुखद अविभाज्य अंग बन गये हैं, फिर अभी इतनी उथल-पुथल क्यों ? परिवेश के प्रति जो थोड़ा-सा भी जागरूक है, वह इसकी पृष्ठभूमि को आसानी से समझ सकता है कि इसे चुनाव का प्रभावी मुद्दा बनाया जाने के लिये व्यक्त की जानेवाली यह तथाकथित संवेदनशीलता है। इस संवेदनशीलता में एक विशेषण भी जुड़ा हुआ है--दलित। इस शब्द के उपयोग में भी लाभ छिपा हुआ होता है।
दलित को दलित ही रहने दो, स्त्री को स्त्री ही रहने दो। जैसा मन हो वैसे प्रयोग करो। चाहो तो अलग-अलग,चाहो तो मिलाकर। ध्यान सिर्फ इतना रखना है कि दोनों को व्यक्ति नहीं बनने देना है, इंसान नहीं बनने देना है।
अपशब्द किसी को भी नहीं कहे जाने चाहिये।चाहे वह स्त्री हो, पुरूष हो। दलित हो,सवर्ण हो। यह मात्र राजनयिक या एक दल का आख्यान नहीं है,हर स्तर पर, प्रत्येक वर्ग में, जाति में, विभिन्न धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पारिवारिक और सामाजिक मानसिकता का वक्तव्य है।
वास्तव में आवश्यकता इस बात की है कि इस मानसिकता को बदले जाने के उपाय किये जाय। जब तक मनुष्य को खाँचे में रखकर तौला जाता रहेगा, ऐसी और इससे भी वीभत्स घटित घटनाओं को रोका नहीं जा सकता है। इसका समाधान हमें ही ढूँढना होगा,अन्यथा राजनीति इसे हमेशा समस्या बनाकर रखेगी।
२२ अक्टूबर
चाणक्य नीति के अनुसार ''प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्र वदाचरेत्" अर्थात पुत्र के युवा होने पर उसके साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिये। निश्चित ही मित्रवत व्यवहार बराबरी वालों से होता है यानि इसका अर्थ यह हुआ कि पुत्र बड़ा हो गया। इसी तरह की एक और कहावत है कि यदि पिता-पुत्र के जूते का नाप एक हो गया हो तो समझ जाना चाहिये कि पुत्र बड़ा हो गया है।
समय की माँग यह है कि बच्चा यदि तकनीक की जानकारी देने लगा हो तो मान लेना चाहिये कि वह बड़ा हो गया है। मेरी नातिन मात्र १३ साल की है और यदा-कदा मेरे सामने आनेवाली तकनीकी समस्याओं को सुलझाती रहती है।
६ अक्टूबर
#गजब #का #विरोधाभास #है!
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, इंदौर का एक समाचार है। समाचार निश्चित ही अच्छा है, जिसके अनुसार वहाँ भविष्य में हमारी पुरातन भाषाओं के ग्रंथों में वर्णित विज्ञान और तकनीक के बारे में विशेषज्ञों द्वारा जानकारी दी जायेगी। अब इस परियोजना का शीर्षक देखिये ---एनिशिएंट इंडियन लेंग्वेज सेंटर। परियोजना का शीर्षक किसी पुरातन भाषा में तो दूर, हिन्दी तक में नहीं मिला, जबकि बहुत आसान था "प्राचीन भारतीय भाषा केन्द्र"।
दूषित मानसिकता का क्या उपाय है ?
३ अक्टूबर
मुझे याद आया, हम बचपन में प्रतिदिन शाम को तकली चलाकर सूत कातते थे । पिताजी घर लौटने के बाद देखते थे कि सूत काता या नहीं ? सूत काते बिना शाम का खाना नहीं मिलता था।
२ अक्टूबर
छोटी - सी बच्ची थी। उसके साथ बलात्कारियों ने तो जो वहशीपन किया, उसे तो शब्दों में व्यक्त करना संभव ही नहीं है, हतप्रभ हूँ। वैसे तो कोई भी अपराध सिर्फ और सिर्फ अपराध होता है। फिर ऐसे निर्मम अपराध को भी जातिगत आधार बनाना निकृष्टता की सीमा से भी अधिक है। संपूर्ण समाज को मनोवैज्ञानिक उपचार की आवश्यकता है।
२९ सितम्बर
#इससे #ज्यादा #दुखद #समाचार #और #क्या #होगा
सन २०१८ में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित सांगली, महाराष्ट्र के लेखक नवनाथ गोरे मजदूरी कर जीवन यापन करने को बाध्य है। एम.ए. और बी.एड. की डिग्री और रहने के लिये गन्ने की डंडियों से बनी झोपड़ी।
२४ सितम्बर
"वे ऐसे पहले केन्द्रीय मंत्री हैं, जिनकी कोरोना से जान गई।" ये क्या कोई उपलब्धि है, जिसे समाचार के साथ जोड़ा जाय ?
रेल राज्यमंत्री सुरेश अंगड़ी के निधन की खबर में यह वाक्य पढ़कर बहुत झुँझलाहट हुई। भाषा के प्रति लापरवाही का यह क्रूरतम पक्ष है।
२४ सितम्बर
फेसबुक पर या व्हाट्सएप पर ब्लॉक करने में वह मजा नहीं है, जो आमने सामने की लड़ाई में होता था।
दो पड़ौसियों में जब लड़ाई होती थी तो अक्सर वह सड़क पर होती थी और उनकी लड़ाई में बीच-बचाव करने के लिए कुछ लोग आ जाते थे। कभी-कभी समझौता हो जाता था, लेकिन यदि लड़ाई लंबी खिंच जाती तो वहाँ खड़े होकर तमाशा देख रहे किसी छोटे बच्चे से कहा जाता - जा, बाबूजी को बुला कर ला या दादा को बुला कर ला। लड़ने वाले भी ईमानदारी से दादा के या बाबूजी के आने तक लड़ते रहते। फिर "बाबूजी" आते दोनों में समझौता होता और दोनों अपने - अपने घर चले जाते।कभी कभी शीत युद्ध चलता रहता, पर कभी यह भी होता कि दूसरे दिन दोनों गप्पे लगा रहे हैं या साथ में कहीं जा रहे हैं।
लड़ाई जब रिश्तेदारों में होती खासतौर से दो सगे भाइयों में या चचेरे भाइयों में, तो रिश्तेदारी में जो सबसे बुजुर्ग होते बाकायदा उन्हें पंच नियुक्त किया जाता था। उनसे समय लेकर और दिन तय करके उनके घर पर दोनों तरफ के २-२/४-४ लोग इकट्ठा होते थे। वहाँ पर चाय भी बनती थी और फिर वह बुजुर्ग जैसा कहते, उस पर सहमति बनती थी। किसी अवसर पर मेल-मिलाप होने पर वे बुजुर्ग दोनों पक्षों से पूछते -- सब ठीक चल रहा है न ? साथ में हिदायत भी होती - अब शिकायत नहीं आना चाहिए। जो लड़े थे वे झेंपते - झेंपते गर्दन हिलाते और फिर पैर छूने नीचे झुक जाते। इन लड़ाइयों में औरतें शामिल नहीं होती थीं। "आदमी लोग जाने" यह भावना और चेहरे पर निर्विकार भाव स्थायी रहता था।
घर की महिलाएं भी लड़ती थीं, लेकिन महिलाओं की लड़ाई भी लिंगभेद की शिकार थी। उनकी लड़ाई को "औरतों वाली लड़ाई" कहा जाता था और उसमें बीच में कोई नहीं पड़ता था। यह भी कहा जाता था कि औरतों की किचकिच तो चलती ही रहती है। थोड़ी देर बाद वे अपने आप चुप हो जाती थीं क्योंकि उनके पास कोई चारा नहीं होता था और घर के कामकाज में लग जाती थी। आपस में बोलने भी लग जाती थी। कभी-कभी ज्यादा चखचख होती थी तो घर की सबसे बुजुर्ग महिला दोनों को कहती चलो ! बहुत हो गया अपना-अपना काम करो और आगे से ऐसा नहीं होना चाहिए। यह महिलाएँ देवरानी-जेठानी, ननद-भौजाई होती थी और एक दूसरे के लिए परायी होती थी। उनका अपना कोई उनके समर्थन में नहीं आता था। जब समाज कुछ प्रगतिशील हुआ और पढ़ाई - लिखाई का दौर आया तो पत्नी पति से कहने लगी कि तुम कभी भी मेरा साथ नहीं देते हो तो ऐसे में यदि कोई पुरुष रसोई घर में चला जाता या महिलाओं में बीच-बचाव करने लग जाता तो मराठी में उसे व्यंग्य से "बाईला" कहते थे। हिन्दी का शब्द मुझे नहीं मालूम। बाईला कोई एक ही होता था।
एक बात थी कि ये लड़ाइयाँ जीवन का एक अहम हिस्सा होती थीं और इसमें कोई आजीवन दुश्मनी नहीं होती थी। किसी एकाध प्रसंग में ही ऐसा होता था, वरना आपसी बोलचाल, खाना - पीना, उठना - बैठना सब कुछ सामान्य तरीके से चलता था। लड़ाई में एक बात और भी होती थी खास तौर से बच्चों के मामले में कि उसका प्रभाव बच्चों पर नहीं आने दिया जाता था और उन्हें उससे दूर ही रखा जाता था।
अब अपरिचित तो ठीक, नजदीकी परिचित, रिश्तेदार आदि के भी नंबर ब्लॉक कर दिए जाते हैं और आमना-सामना हुआ तो औपचारिक बातचीत हो जाती है, पर मन में एक कसैलापन बना रहता है। वहीं पुराने लोग जोर - जोर से झगड़ते थे, किन्तु मन से साफ रहते थे। वह साफगोई अब खत्म हो गई है।
२१ सितम्बर
यदि V यानि वोडाफोन और I यानि आइडिया तो V+ I = VI जिसका अंग्रेजी उच्चारण WE भी हो सकता है।
अर्थात WE = Worst & Erroneously.
लगभग एक महीने से भुगत रहे एक अज्ञात शोधार्थी की प्रयोगशाला से प्राप्त निष्कर्ष।
२० सितम्बर
हजारों में खरीदा और सैकड़ों प्रतिमाह दे रहे हैं, इसलिये टीवी दिन में कम से कम एक बार खोल कर देखना दायित्व बनता है, बाकी न तो समाचार, न धारावाहिक और न ही अन्य कोई कार्यक्रम इस योग्य है जो देखा जा सके या देखा ही जाना चाहिए।
शुरू से सुनते आये हैं कि सुख के साधन खरीदे जा सकते हैं, पर हम वे लोग हैं जिन्होंने दुख का साधन खरीदा है और हँसते - हँसते उसे बर्दाश्त करते हैं।
कालाय तस्मै नमः ।
१९ सितम्बर
किसी भी कविता में कवि / कवयित्री की अनुभूति तो होती है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वह उसका व्यक्तिगत अनुभव हो। अनेक बार ऐसा अनुभव आता है कि कुछ लोग कविता को निजी ज़िंदगी से जोड़ लेते हैं। इनबॉक्स खड़खड़ाने लगता है। किसी से व्यक्तिगत प्रश्न पूछने से पहले यह भी नहीं सोचते कि परिचय कितने समय से है,सम्बन्ध कैसे हैं ? यह भी नहीं सोचते कि मंच सार्वजनिक हो सकता है,कोई व्यक्ति सार्वजनिक नहीं होता। कल मैंने एक कविता ''एकांत'' पोस्ट की थी। अनाहूत सुझाव, प्रस्ताव, सीख सब शुरू हो गया।
एक श्रीमान कहते हैं -- मैं आपके शहर से मुश्किल से २० किलोमीटर दूर रहता हूँ। कभी भी, आधी रात को भी जरूरत हो तो बताईये। इन महोदय को मेरी मित्रता सूची में आये एक महीना भी नहीं हुआ है और ना ही कोई पूर्व परिचय है। जरूरत हुई तो और वह भी आधी रात को, पुराने परिचितों को छोड़कर मैं इन्हें क्यों बताऊंगी ?
बीच-बीच में मेसेंजर हटा देती हूँ, लेकिन कभी-कभी इसमें सच्चे मित्रों को कठिनाई हो जाती है, इसलिये फिर वही ....
कुल मिलाकर सामाजिक चेतना का अभाव कष्टप्रद होता है।
१७ सितम्बर
राजा की पूजा करने की परंपरा तो हमारे यहाँ पुरानी है और परंपरा में ही पुराना होना छुपा हुआ है। जिस ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की ऐसा हमारे धर्म में माना जाता है उस ब्रह्मा का मेरी जानकारी में एकमात्र मंदिर पुष्कर में है, लेकिन जो विष्णु के अवतार हैं और राजा रहे, जिन्होंने राज किया ऐसे श्रीराम और श्रीकृष्ण इनके मंदिर गली-गली में मिल जायेंगे। तीसरे भगवान शिव को, उनके तृतीय नेत्र और तांडव नृत्य के बारे में गलत विश्वास की वजह से पूजा जाता है। विष्णु के दशावतार माने जाते हैं लेकिन स्वयं विष्णु को कितने लोग पूजते हैं यह एक शोध का विषय हो सकता है। वैष्णव संप्रदाय इसमें शामिल न किया जाय क्योंकि संप्रदाय में तो अनुयायी होते हैं।
हिंदू धर्म से इतर जैसा कि हम जानते हैं भगवान बुद्ध भी राजवंश से संबंधित थे और बुद्ध के भी बहुत मंदिर हैं।
१७ सितम्बर
समाचार वाहिनियों ने भी हिंदुस्तान युनिलीवर से संपर्क कर एक फेयर एंड लवली स्वरूप अपना बनाना चाहिए। चौबीस घंटा समाचार सुनना वह भी चिल्ला चिल्ला कर एक ही बात, बार-बार वही चेहरे, वही तेवर बर्दाश्त के बाहर होता जा रहा है। दूरदर्शन की जो वाहिनियाँ हैं उनका स्वरूप बेहतर है। उनका समाचारों का समय निश्चित रहता है और बाकी वे दूसरे कार्यक्रम भी दिखाते रहते हैं। अच्छे स्तरीय कार्यक्रम होते हैं। इसी तरह का स्वरूप अब निजी वाहिनियों ने भी अपनाना चाहिये।
१२ सितम्बर
वह बिहार का बेटा, ये हिमाचल की बेटी । ये तमिलनाडु की बेटी, वह पंजाब का बेटा । ये यहाँ की, वह वहाँ का। ऐसे तो कोई न कोई कहीं न कहीं का है ही। इसका अर्थ यह हुआ कि इस देश का कोई नहीं । भारतवंशी सिर्फ विदेश में उपलब्धि हासिल करने पर ,बाकी अंदर तो रियासतें और उनका आपसी विद्वेष ज्यों का त्यों, बल्कि और अधिक तीव्र। रियासतों में राजा को अपने राज्य की चिन्ता तो रहती थी। अब तो मात्र और मात्र सिंहासन सुखाय..
११ सितम्बर
मुद्दा या पक्ष कितना भी सही हो, मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिये अशालीन भाषा का उपयोग सही नहीं कहा जा सकता है।
१० सितम्बर
एक सामान्य नागरिक को यदि सुरक्षा की आवश्यकता हो तो न्यूनतम कितना बड़बोलापन वांछित है ? (संदर्भ : फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत)
८ सितम्बर
मैं जब शादी के बाद इंदौर आई तो मेरी छोटी ननद को रोज घूमने जाने का शौक था। दरअसल हमारे शादी के समय पुराना मकान छोड़कर नए मकान में हम लोग रहने आ गए थे। पुराने मकान में लगभग 40 वर्ष साने परिवार रहा था। इस वजह से वहाँ के रहवासियों के साथ आत्मीय संबंध थे। मेरी ननद और उनकी हम उम्र लड़कियां छोटी से बड़ी वहीं हुईं थीं और मेरी ननद का मन इस नए मकान में नहीं लगता था। वह रोज उनसे मिलने जाती थी और इस बहाने घूमना भी हो जाता था, कुछ सौदा सुलुफ लेना हो तो वह भी हो जाता था।
मुझे बाहर जाने का बिल्कुल भी शौक नहीं था। वैसे भी मैं ग्वालियर जैसे छोटे शहर से इंदौर आई थी। आज भी इंदौर और ग्वालियर के बीच में बहुत फर्क है। मैं रोज उनके साथ जाने में टालमटोल करती थी और मेरी सासू माँ मुझे जबरदस्ती ननद के साथ भेजती थीं। कहती थीं कि दिन भर घर पर रहती है, जा थोड़ी घूम कर आ इंदौर भी देख ले वगैरा-वगैरा।
दो-तीन महीने मैं उनके साथ कभी गयी, कभी नहीं गयी और उसके बाद एक दिन वह बोली आपको बाहर घूमना पसन्द नहीं है। मैंने कहा हाँ, मेरा बस चले तो मैं 6 महीने भी घर से बाहर ना निकलूँ।
इस बात को लगभग 50 वर्ष होने को आ गए और इतने वर्षों बाद अब नियति ने मेरे इस वाक्य को गंभीरता से लिया। माँ कहती थी कि कुछ भी नहीं कहना चाहिए। हमेशा सोच समझकर बोलना चाहिए। वास्तु तथास्तु कहती है।
वह वास्तु तो काफी पीछे छूट गयी, लेकिन वास्तु पुरुष शायद मेरे साथ-साथ आ गया और अब मैं 6 महीने से करीब-करीब घर पर ही हूँ। माँ फिर से याद आ गयी कि हमेशा सोच-समझकर बोलना चाहिए।
३ सितंबर
"इधर" का सब खराब और "उधर" का सब अच्छा, उस ज्ञानवर्द्धक सूचनाओं की मालिका में , इधर का झाड़ू - पौछा, बर्तन, कपड़े और उधर का झाड़ू - पौछा, बर्तन, कपड़े का कोई तुलनात्मक अध्ययन अभी तक सामने नहीं आया है । 😀😀😀
१ सितंबर
एक बुद्धिमान, प्रगल्भ, विचारक, गरिमामय व्यक्तिमत्त्व। वे वित्तमंत्री थे, रक्षामंत्री थे। उन्होंने राष्ट्रपति पद को गौरवान्वित किया। प्रधानमंत्री बनने की भी तमाम योग्यताएँ थीं, लेकिन एक बड़ी अयोग्यता की वजह से प्रधानमंत्री बनने से वंचित रहे।
वे जिस दल के प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीत कर आते थे, उस दल के राज परिवार का सदस्य न होना उनकी सबसे बड़ी अयोग्यता थी।
विनम्र श्रद्धांजलि 🙏 प्रणब मुखर्जी
३१ अगस्त
सन १९९२ में कादम्बिनी में मेरी बेटी #स्वरांगी #साने की कविताएँ छपी थीं। उसमें एक स्तम्भ आता था, जिसमें नवोदित लेखकों को प्रोत्साहित किया जाता था। उसी के अंतर्गत उसकी कविताएँ छपी थीं। अब तो उसे काफी लोग पहचानते हैं, लेकिन तब उसकी कविता कादम्बिनी जैसी पत्रिका में छपना बेहद गौरवशाली अनुभव था। उस कविता के प्रत्युत्तर में तीन सौ पचास से ज्यादा पोस्टकार्ड स्वरांगी के नाम आए थे। उन पोस्टकार्ड को मैंने सहेज कर रखा था और उसके विवाह के समय उनका एक एल्बम बना कर, करीब - करीब उतनी ही किताबों के साथ दहेज के रूप में दिया था।
हम महाराष्ट्रीय परिवारों में विवाह के समय लड़की को जो भी उपहार दिए जाते हैं वे "रुखवत" इस नाम से अलग से सजा कर रखे जाते हैं। रुखवत में सिर्फ उपहार नहीं बल्कि ससुराल पक्ष को दी जाने वाली पारंपरिक मिठाइयाँ और कन्या के द्वारा यदि सिलाई, बुनाई, कढ़ाई जैसा कोई कार्य किया हो तो उसके नमूने आदि रखा जाता है। रुखवत काफी वैविध्य पूर्ण होता है। मैंने स्वरांगी की सारी उपलब्धियों को अर्थात उसको आए पोस्टकार्ड, किताबें और ट्रॉफियों को अलग से सजाकर रखवाया था और वह सहेज सके इसलिए एक अलमारी भी अलग से बना कर दी थी। उस विभाग को #ज्ञानदान यह नाम दिया था।
यह दोनों घटनाएं आज याद आ गयीं। संदर्भ -- कादम्बिनी का प्रकाशन बन्द होना।
३० अगस्त
कादम्बिनी और नंदन का बन्द होना, हिन्दी को धीमा ज़हर देने की प्रक्रिया का एक हिस्सा है।
३० अगस्त
प्राइम वीडियो पर मराठी फिल्म "जाणीवा" (अनुभूति) देखी। यह फिल्म एक बिल्कुल ही अलग विषय पर है। रेणुका शहाणे इस फिल्म में एक वकील है और वह आरोपी के बचाव में कहती है कि हमारे देश में न्याय कम होता है, निर्णय अधिक होते हैं। यह एक बहुत बड़ी वास्तविकता इस फिल्म में रेखांकित हुई है।
एक युवक जो हत्या का आरोपी है, हत्या करने के बाद स्वयं ही थाने में रिपोर्ट लिखवाने पहुँच जाता है। वह अपराधिक प्रवृत्ति का नहीं है। एक अच्छे पढ़े - लिखे परिवार से आता है। जो हत्या वह करता है,सोच समझकर करता है। सारी कहानी इसी अनुभूति पर टिकी है। अनोखा विषय और बहुत अच्छा उसका फिल्मांकन इस फिल्म का सबसे अच्छा पहलू है। जिन्हें मराठी समझ में आती है, उन्होंने इस फिल्म को जरूर देखना चाहिए।
रेणुका शहाणे के अलावा किशोर कदम, उषा नाडकर्णी, किरण करमरकर, अतुल पटवर्धन आदि इस फिल्म की प्रमुख भूमिकाओं में हैं। आरोपी युवक की भूमिका से सत्या मांजरेकर ने फिल्मों में पदार्पण किया है। निर्देशन भी चेतन ताम्हणे नामक बिल्कुल नये निर्देशक का है।
३० अगस्त
जी 5 पर फिल्म #मी #रक्सम Mee Raqsam देखी । बहुत बढ़िया हिंदी फिल्म है। बिना किसी भाषणबाजी के उसमें एक संदेश है कि कला को किसी दायरे में नहीं बाँधा जा सकता है। कला मुक्त होती है। भरतनाट्यम सीखने की इच्छा रखनेवाली एक बेटी और हर कदम पर उसके साथ खड़े आर्थिक रूप से कमजोर पिता की अनुपम कहानी है। बाबा आज़मी का शानदार निर्देशन है। समस्त कलाप्रेमियों को अवश्य देखना चाहिए और उन्हें भी जिन्हें कुछ करना होता है, लेकिन आत्मविश्वास, साहस, समस्याओं से जूझने की ताकत नहीं होती।
सब बढ़िया है, बस एक ही बात का मलाल है कि "मी रक्सम' इस शब्द का अर्थ समझ में नहीं आया। ये कौनसी भाषा का शब्द है, यह भी पता नहीं चला।
इस पोस्ट पर अनुपमा गर्ग और अलका सिंह की टिप्पणी से पता चला कि मी रक्सम का अर्थ होता है - मैं नृत्य करती हूँ/ मुझे नृत्य पसंद है। रक्स से ही रक्कासा यानी नृत्यांगना शब्द का उद्गम हुआ है।
२७ अगस्त
अब युवराज्ञी के बच्चों को क्यों नहीं कार्यकारिणी में सम्मिलित कर लेते ? आगे चलकर राजपाट उन्हीं को संभालना है, उसकी दीक्षा अभी से देना शुरू करना चाहिए। पहले भी तो राजकुमारों को छोटी आयु से ही धनुर्विद्या सिखायी जाती थी। समय बदल गया है, राजकुमारी को भी पारंगत होना चाहिये।
यदि किसी को भ्रम है कि राजतंत्र नहीं, लोकतंत्र है तब भी कोई हर्ज़ नहीं। वैसे भी अभी स्कूल - कॉलेज सब बन्द हैं। हमारे बच्चों ने भी इस समय का सदुपयोग कर घरेलू कामकाज सीख लिया है।
और कुछ नहीं,कम से कम बड़े होने पर गूंगी गुड़िया या पप्पू जैसे सम्बोधन तो नहीं मिलेंगे।
२५ अगस्त
इस बार तो गणेश जी मुदित, हर्षित होंगे और अचंभित भी । ऊपर से झाँक-झाँककर देख रहे होंगे कि क्या ये वही भक्तगण हैं ? इनको जरूर स्मृति दोष हुआ है। मुझ तक इनकी स्वर लहरियाँ इतनी मधुर आवाज में कैसे आ रही हैं ? मुझे तो ध्वनि प्रसारक यंत्र के बिना सुनने की आदत ही नहीं रही।
गणेश जी के साथ ही लोकमान्य तिलक भी हतप्रभ होंगे। उन्हें भी लग रहा होगा कि सौ - सवा सौ वर्ष पुराना भारत लौट आया है।
और मेरे जैसा सामान्य नागरिक सोच रहा है कि काश ! कोरोना मुक्त भारत भी लाउडस्पीकर मुक्त रहे।
२२ अगस्त
किसी भी समूह का संचालन करते समय खट्टे - मीठे अनुभव हमेशा आते हैं। किसी अच्छी बात की तारीफ सामान्यतया कोई करता नहीं है और थोड़ा-सा कुछ खराब होने पर उसकी आलोचना जरूर होती है। मराठी भाषी साहित्यकारों के वास्तविक समूह "आम्ही रचनाकार" या आभासी समूह "मायमावशी" के संचालन में यह अनुभव हमेशा आता रहा है। बहुत से सदस्य जिन्हें लिखने का अनुभव नहीं था, जिन्हें कोई जानता नहीं था ऐसे सदस्यों को जब थोड़ी-बहुत पहचान मिली तो वह समूह को बिसरा कर चले गये। यह एक बहुत ही खराब अनुभव लगातार रहा है, इसके विपरीत हिन्दी की उदीयमान युवा कवयित्री #विशाखा #मुलमुले ने एक बिल्कुल ही अलग अनुभूति दी।
हिन्दी के वरिष्ठ कवि डॉ. सुधीर सक्सेना की कविताओं का विशाखा ने मराठी में अनुवाद किया है। विशाखा महाराष्ट्र से बाहर जन्मी, पली-बढ़ी। इस वजह से उसके लिये मराठी का एक जो लहज़ा होता है वह अपरिचित था, हालाँकि मराठी उसे आती थी। उसे मैंने तीन वर्ष पूर्व मायमावशी में जोड़ा। वह बहुत सकुचाते हुए आई थी, लेकिन समूह में बनी रही और थोड़ा बहुत मराठी सीख गई। सुधीर सक्सेना जी ने उससे उनकी छोटी कविताओं का मराठी में अनुवाद करने के लिए कहा और उसने बहुत संकोच के साथ यह अनुवाद किया। हाल ही में इस पुस्तक का प्रकाशन हुआ और कोरोना काल की वजह से यह पुस्तक मेरे पास अभी कुछ दिन पहले पहुँची।
इसमें विशेष बात यह है कि मेरा या मेरे समूह का कोई बहुत बड़ा योगदान नहीं होने के बावजूद विशाखा ने पुस्तक की भूमिका में मेरे नामोल्लेख के साथ में समूह के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया है।
वह लिखती है कि वरिष्ठ कवयित्री अलकनंदा साने की तहे दिल से शुक्रगुजार रहूंगी, क्योंकि उनकी वजह से ही मराठी भाषा के लेखन वाचन को मैंने दिल से अपनाया। अलकनंदा जी के व्हाट्सएप समूह #मायमावशी से मैं जुड़ी हूँ। इसी समूह की वजह से मोबाइल में मराठी टाइपिंग कीबोर्ड को डाउनलोड किया। #अनुवाद #प्रक्रिया #को #भी #इसी #समूह #की #गतिविधियों #से #समझा, #सीखा। इतना ही नहीं पुस्तक प्रकाशन के पूर्व उसने मुझे अनुवाद की पीडीएफ भेजी ताकि जरूरत हो तो मैं उस में कुछ सुधार कर सकूं और मुझसे दो शब्द लिखने का अनुरोध भी किया, जबकि मराठी की वरिष्ठ कवयित्री सुलभा कोरे का मार्गदर्शन उसे पूरी सक्रियता से मिला था।
यह सब लिखने का उद्देश्य यह है कि जहाँ हमारी जड़ें जुड़ीं हैं या जहाँ से हमें थोड़ा-बहुत भी कुछ प्राप्त होता है, तो सफलता प्राप्त होने के बाद उसे स्मरण रखना यह एक बहुत बड़ी सीख विशाखा की ओर से सबको मिलती है। विशाखा मुलमुले को बहुत-बहुत स्नेह और शुभकामना।
२० अगस्त
ग्वालियर में प्रतिवर्ष तानसेन संगीत समारोह सुनने जाना किसी त्योहार से कम नहीं होता था। दिसंबर की भरी ठंड में यह समारोह होता था और उसकी तैयारी हम लोग लगभग एक हफ्ता पहले से करने लगते थे। उसके कुछ कारण थे। उस समय आर्थिक संपन्नता तो इतनी नहीं ही थी, साथ ही जीवन शैली भी दो जोड़ी कपड़ों की थी। ग्वालियर की ठंड में रात के अंतिम प्रहर तक बल्कि यह कहना चाहिए कि सुबह के प्रथम प्रहर तक चलने वाली तीन दिवसीय संगीत सभा के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता था कपड़ों का चयन। उसके बाद खानेपीने की व्यवस्था। तब बाहर खाना और खासतौर पर लड़कियों ने बाहर खाना अच्छा नहीं समझा जाता था। रात को ३ बजे घर लौटना और सुबह ८ बजे फिर से निकल जाना। यह कहने को मात्र ३ दिन के लिए होता था, लेकिन लगभग १५ - २० घंटे संगीत के लिए घर से बाहर रहना आसान नहीं होता था।
समारोह समिति की ओर से या फिर प्रशासन की ओर से, मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा है बस की व्यवस्था होती थी। हमारे घर से नजदीक जनकगंज अस्पताल के पास बस उतार देती थी और फिर वहां से थोड़ी दूर पैदल चलना पड़ता था। ज्यादातर हम सहेलियाँ होती थीं और रात को ३ बजे भी हमें डर नहीं लगता था। उसकी एक वजह यह थी कि हमारे आगे पीछे एक बड़ा हुजूम तानसेन समारोह से लौटने वालों का होता था और छोटी जगह होने की वजह से, पुराना मोहल्ला होने की वजह से ज्यादातर लोग एक दूसरे को जानते थे, इसलिए हम अपने आप को सुरक्षित महसूस करते थे और वह समय भी ऐसा नहीं था कि असुरक्षित अनुभव हो।
तानसेन समारोह आज इसलिए याद आया कि पंडित जसराज नहीं रहे। तानसेन संगीत समारोह में पं. भीमसेन जोशी, पं. जसराज, उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ, पं. बुधादित्य मुखर्जी,उस्ताद अब्दुल हलीम जाफर खाँ, विदुषी मालिनी राजुरकर, वीणा सहस्रबुद्धे, परवीन सुलताना, उस्ताद अमजद अली खाँ, श्रुति साडोलीकर, अश्विनी भिड़े आदि कुछ ऐसे नाम थे, जो प्रतिवर्ष समारोह में अपनी हाजिरी देते थे और इन सब को सुनना हमारे लिए अत्यावश्यक होता था। इतने सारे लोगों को प्रत्यक्ष बैठकर सुनने का सौभाग्य हमें मिला है।
वहीं पर पंडित जसराज को पहली बार सुना। पं. जसराज या पं. भीमसेन जोशी या मालिनी राजुरकर या ऊपर लिखित सभी आदरणीय संगीतज्ञों को सुनने के लिए भीड़ उमड़ने से पहले हम आगे जाकर बैठ जाना चाहते थे, ताकि तसल्ली से सुन सकें। इसी तसल्ली के साथ वहीं पर जसराज जी से अजब तेरी दुनिया मालिक राग दरबारी कानड़ा में सुना, अड़ाना में माता कालिका, खमाज में लट उलझी सुलझा जा बालमवा, चलो सखी सौतन के घर जईयो जैसी अद्भुत बंदिशें सुनी, जो इतने वर्षों बाद, लगभग ५० वर्ष बाद भी ज्यों की त्यों याद हैं। ये सारे सम्माननीय संगीतज्ञ हृदय में बसे हुए हैं। उनके प्रति किसी ने कहा नहीं कि सम्मान प्रदर्शित करो, लेकिन सम्मान बना रहा और बढ़ता चला गया।
पंडित भीमसेन जोशी के बाद आज पंडित जसराज जी के जाने से अंतर्मन में पीड़ा अनुभव हो रही है और उस पीड़ा के लिए कोई शब्द नहीं है। सादर नमन
१८ अगस्त
पिछले दिनों एक परिचित युवा कोरोना ग्रसित हो गया। शुरू में बात की थी उसके बाद कल उससे बात हुई तो वह काफी उत्साहित लगा। आवाज में एक अलग ही भाव अनुभव हुआ। उसकी तबीयत ठीक हो रही थी, एक यह कारण तो था ही साथ ही उसे जो भी अनुभव इस बीमारी के दौरान आए वह साझा करते हुए बेहद प्रसन्नता अनुभव कर रहा था।
उसने सिलसिलेवार बताया कि वह उस दिन सुबह काम पर निकल गया था लेकिन दोपहर के बाद उसे हल्की-सी हरारत महसूस हुई। उसने तुरंत जागरूकता दिखाते हुए पास के ही स्वास्थ्य केंद्र जाकर अपनी जांच करवा ली और घर आ गया। घर आने के बाद पत्नी से बोला कि मुझे बुखार है, घर में माता-पिता हैं छोटी लगभग 3 साल की बच्ची है तो जब तक रिपोर्ट नहीं आती तब तक कम से कम मैं अलग ही रहूँगा। दुर्भाग्य से रिपोर्ट पॉजिटिव आई और तब तो उसे अलग कमरे में रहना ही था। यह तो वह हिस्सा है जहां उस परिवार की पढ़ाई लिखाई और वर्तमान समय के प्रति जागरूकता दिखाई दी।
मुख्य बात अब यहां से आगे शुरू होती है लगभग 3 घंटे के भीतर ही उसे रिपोर्ट मिल गई थी और दूसरे दिन चिकित्सकों की एक टीम ने आकर दोबारा उसका परीक्षण किया और बताया कि बहुत ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है घर पर ही अलग रहो यही बहुत है। इसके बाद लगभग रात को 8:00 बजे उसके पास स्वास्थ्य केंद्र से फोन आया कि कल सुबह स्वास्थ्य कर्मियों की एक टीम आएगी और ना सिर्फ उसके परिवार के सभी सदस्यों की जाँच होगी बल्कि सोसाइटी के भी सदस्यों की जाँच की जाएगी। सुबह 9:00 बजे ही फोन आ गया कि हम पहुंच रहे हैं। स्वास्थ्य कर्मियों की टीम पहुँच गई और बहुत व्यवस्थित तरीके से हर व्यक्ति की शंका का समाधान करते हुए जाँच की गई। उस युवा के परिवार के सदस्यों की अलग से जाँच हुई घर को सैनिटाइज किया गया और उन्हें किस तरह अपनी सुरक्षा करनी है इस बारे में जानकारी दी गई। पीड़ित युवा को दवाइयाँ दी गईं और परिवारजनों को भी निर्देश दिए गए।
इस बीच एक हफ्ता गुजरा। मैंने हफ्ते भर बाद उससे कल बात की। वह कह रहा था कि हर दिन तीन बार वहाँ से फोन आते हैं। उसमें से एक वीडियो कॉल होता है और उस वीडियो कॉल पर ऑक्सीमीटर की जांच के परिणाम दिखाना होते हैं, बाकी दो कॉल में उससे पूछताछ की जाती है, बीमारी की जानकारी ली जाती है और आवश्यक हुआ तो कुछ निर्देश दिए जाते हैं। इससे भी एक बहुत बढ़िया बात उस युवा ने बताई कि उसकी दवाइयाँ खत्म होने वाली थी। शाम तक का डोस था लेकिन दूसरे दिन के लिए शायद दवाइयाँ नहीं रहती। एहतियात के तौर पर उसने बताया कि मेरी दवाइयाँ खत्म हो गईं हैं और 1 घंटे के अंदर उसके पास दवाइयाँ पहुँच गईं।
उसका एक वाक्य इस सारी व्यवस्था के प्रति बेहद सकारात्मक है। उसने कहा - आंटी मुझे तकलीफ तो ज्यादा नहीं थी और उम्र भी मेरी कम है। दवाइयों की वजह से और उनके सारे निर्देशों का पालन करने से तो मेरी बीमारी ठीक हुई ही है लेकिन जिस तरह का व्यवहार मिला है, जिस तरह तरीके से वे सारे लोग बात करते हैं, आधी बीमारी तो उसी से खत्म हो जाती है।
एक बात का विशेष उल्लेख करना चाहूँगी कि यह सब विवरण किसी निजी जांच एजेंसी का नहीं है। हम अक्सर सरकारी विभागों को कोसते रहते हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग इन दिनों जिस तरह से काम कर रहा है, वह बेहद जोखिम का है। उनकी प्रशंसा के लिए शब्द नहीं है। इस तरह के अनुभव और भी लोगों को आये हैं क्योंकि कल से मैंने बहुतों को यह बात बताई और दूसरे लोगों ने भी अपने अनुभव साझा किये।
स्वतंत्रता दिवस पर इन सेनानियों को सलाम जो देश के अंदर पैर पसार रहे दुश्मन को खदेड़ने का प्रयास पूरी शक्ति से कर रहे हैं। जय हिंद।
१५ अगस्त
उच्च पदस्थों को फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते तो हमेशा सुना है, लेकिन कल विश्व स्वास्थ्य संगठन की मुख्य वैज्ञानिक सौम्या स्वामिनाथन को फर्राटेदार हिन्दी बोलते सुना।
१४ अगस्त
जो विदेश में बस गये हैं, उनके मन में देश के प्रति कोई भावना हो न हो हमारे समाचारपत्र और टीवी वाहिनियों का उनके लिये प्रेम जरूर हिलोरे लेने लगता है। उनको "भारतवंशी" कहते नहीं अघाते और ऐसा कह - कहकर स्वयं ही गर्वित होते रहते हैं।
अब अमेरिका के चुनाव होने तक कमला हैरिस का गुणगान होगा। उनकी सात पुश्तों की उपलब्धियाँ ढूँढ - ढूँढकर हमें कंठस्थ करवाईं जायेंगी।
अखबार और टीवी चैनल अब न उगलते बनते हैं, न निगलते।
१४ अगस्त
कोई भी व्यक्ति कभी भी पूरा समय नपा तुला, संयमित नहीं रह सकता । कभी ना कभी उसकी जुबान फिसलती है, उसके व्यवहार में कहीं खोट नजर आती है। यदि व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में हो तो उसकी हर छोटी मोटी बात भी सार्वजनिक हो जाती है और एक अर्से तक इन सारी बातों को याद रखा जाता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होता कि यदि कभी किसी की जुबान फिसली है कभी व्यवहार गड़बड़ हुआ है तो उसे ना सिर्फ पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया जाए बल्कि संकट की घड़ी में या उसके अंतिम समय में उस व्यक्ति के लिए ऊल जलूल बातें की जाय। हम जिस संस्कृति का गुणगान करते हैं उस संस्कृति में यह सारी बातें वर्जित हैं और ना सिर्फ हमारी संस्कृति में बल्कि दुनिया में कहीं भी मृत व्यक्ति के प्रति खराब शब्दों का इस्तेमाल करना अच्छा नहीं माना जाता। हमारे मन में यदि उस व्यक्ति के प्रति दुर्भावना है तब भी सामाजिक जिम्मेदारी मानकर हम अपनी भावनाओं को खराब शब्दों में प्रदर्शित ना करें। यह तो हम कर ही सकते हैं, बल्कि किया ही जाना चाहिये।
उच्च शिक्षित, उच्च पदस्थ लोग भी जब निम्न स्तर की भाषा का उपयोग कर वीभत्स भावनायें प्रकट करते हैं तो वे स्वयं अपने समक्ष प्रश्नचिह्न खड़ा कर लेते हैं।
(संदर्भ - राहत इंदौरी निधन)
१२ अगस्त
आज के "उत्सव" की संकलित रिपोर्ट रविश कुमार ने जैसी परिष्कृत हिन्दी में प्रस्तुत की, वह अनुपम है। रविश कुमार ऐसी ही विशिष्टता के कारण एक अलग स्थान रखते हैं।
यह सब देखते हुए एक विचार मन में आया कि मंदिर के शिलान्यास के साथ ही प्रस्तावित मस्जिद का भी शिलान्यास प्रधानमंत्री करते तो यह एक राष्ट्रीय प्रसंग हो जाता और उनका आज जो कद है, उससे वे कई गुना ऊँचे हो जाते।
हमारे राजनेता और उनके सलाहकार दलगत राजनीति से ऊपर उठने का प्रयास ही नहीं करते। यह एक ऐसा अवसर था जिसे वास्तव में ऐतिहासिक बनाया जा सकता था।
५ अगस्त
हमें बचपन में राखी बांधने पर नेग के बतौर एक रुपया मिलता था क्या इस बात पर कोई आज विश्वास कर सकता है ?
पूरे कुनबे में हम 57 भाई बहन थे और भाइयों की संख्या ज्यादा थी। इन भाइयों में सगे, चचेरे, ममेरे, फुफेरे, मौसेरे भाइयों के अलावा मां के ममेरे भाई के बेटे और पिताजी के फुफेरी और मौसेरी बहन के बेटे भी होते थे। कोई भेदभाव नहीं होता था और काफी बड़े होने तक तो रिश्ता थोड़ा दूर का है, यह भी हमें कभी बताया नहीं जाता था। कोई 1 का सिक्का देता था, कोई दो का नोट और कुल मिलाकर पच्चीसेक रूपयों की कमाई तो हो ही जाती थी।
बचपन में राखी का इंतजार बहुत सुहाना होता था।
३अगस्त
जैसे गणित विषय सामान्य बच्चे के लिए नहीं होता, वैसे ही #शकुंतलादेवी सामान्य दर्शक के लिए नहीं है। आधे से ज्यादा समय अंग्रेजी संवाद चलते हैं और वह भी भारतीय अंग्रेजी में नहीं, वर्ना विदेशी अंग्रेजी में। उप शीर्षक भी नहीं दिये हैं। बाकी विद्या बालन का अभिनय बाँधकर रखता है, इसमें कोई शक नहीं। निर्देशन में कसावट है। देखी जानी चाहिए।
२ अगस्त
कोई मुद्दा किसी राजनीतिक दल के लिए चुनावी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। चुनाव जीतने के बाद उस मुद्दे को वादे की तरह निभाना भी एक अच्छी पहल मानी जा सकती है, लेकिन उस मुद्दे को या वादे को पूरा करने के लिए पूरा सरकारी तंत्र झोंक दिया जाए या जनता द्वारा विपरीत परिस्थितियों के साथ अथक श्रम से अर्जित धन को उसमें मुक्त हस्त से खर्च किया जाए, क्या यह #जन #हिताय कहा जा सकता है ?
क्या इसके लिए उस मीडिया को भी दोषी नहीं माना जाना चाहिए जो हर समय सिर्फ एक ही मुद्दा लेकर गुणगान करती रहती है और उसके पास जो धन है उसका उपयोग वह किसी सामान्य जन के हित में खर्च नहीं करती बल्कि धनाभाव के चलते अपने कर्मचारियों को बाहर निकालने का दुस्साहस करती है ?
क्या इसके लिए वे व्यापारी दोषी नहीं है जो आर्थिक मंदी का जोर-शोर से हवाला देकर महंगाई बढ़ा रहे हैं ?
क्या इसके लिए वे लोग दोषी नहीं है जो इस तरह के चुनावी वादों को अनावश्यक भव्यता प्रदान कर रहे हैं ?
और क्या इसके लिए मेरे जैसे फेसबुकिये दोषी नहीं है, जो किसी भी मुद्दे पर सिर्फ अपने विचार व्यक्त कर, लाइक्स पाकर निहाल हो जाते हैं ?
आखिर हम लोग कब चेतेंगे ?
#असहमतियों #का #स्वागत #है #किन्तु #अशालीन #भाषा #का #नहीं
२ अगस्त
भारतीय शास्त्रीय संगीत सीखने पर मिलने वाली स्नातक उपाधि विद और स्नातकोत्तर उपाधि कोविद कहलाती है। कल मुझे इन उपाधियों की विस्तृत जानकारी चाहिये थी । मैंंने गूगल पर ढूँढने के लिये कोविद टाईप किया तो उधर से प्रतिप्रश्न आया – Do you mean Covid 19 ? जबकि मैंंने हिन्दी में टाईप किया था। Next next करते मैं थक गई लेकिन जो वांछित था वह नहीं मिला।
कोविद के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत जोड़कर देख लिया। फिर गंधर्व महाविद्यालय जोड़ा। भातखंडे जोड़ा । सारे संबंधित शब्द जोड़कर देख लिये, लेकिन गूगल बाबा Covid 19 पर ही अटके हुए थे।
कुल मिलाकर निष्कर्ष यह निकला कि आतंकवादी का आतंक कहीं भी हो सकता है।
२८ जुलाई
हम वरिष्ठ नागरिक क्या अब आजीवन नज़रबंद की तरह रहेंगे ? इसका भी कोई उपाय ढूँढा जाना चाहिए। मुझे तो ऐसा लगने लगा है कि मैं अब सड़क पर बिना किसी के सहारे चल भी पाऊँगी कि नहीं ?
२८ जुलाई
मेरे एक रिश्तेदार हैं। युवावस्था में कुछ लिखते थे। फिर रोजीरोटी के चक्कर में छूट गया। सेवानिवृत्ति के दिन उन्होंने ऐतिहासिक घोषणा की--अब प्रतिवर्ष मेरी एक किताब आयेगी। मेरे भाई ने पूछा --क्या कारखाना शुरू कर रहे हो ? बोले- यही समझ लो और वाकई १२ साल में ११ किताबें आ गईं। ये उपलब्धि उनके जीवन परिचय में जुड़ गई और अब वे अपनी उम्र और ११ किताबों के बूते वरिष्ठ साहित्यकार कहलाते हैं।
लेखन का स्तर क्या है , यह मत पूछिये, लेकिन प्रतिभा को त्रिवार वंदन करने का मन होता है, क्योंकि उन किताबों में कविताएँ हैं, कहानियाँ हैं, लघुकथा हैं, ललित लेख हैं, उपन्यास है, आत्मचरित्र है यानि साहित्य की हर विधा उपलब्ध है। मराठी हिन्दी दोनों भाषाओं में विचरण करने की गति समान है। अभी तो इतना ही ज्ञात है।
गहरे पानी पैठूँ तो शायद और ज्ञान वृद्धि हो सकती है।
२२ जुलाई
मराठी में बड़ी बहन को ताई कहते हैं। इसके अलावा भी यदि किसी महिला के प्रति सम्मान प्रकट करना हो तब भी उसके नाम के आगे ताई लगा दिया जाता है। ऐसा अनुभव मुझे बहुत आता है और अब तो उम्र बढ़ गई है तो ज्यादातर लोग अलकनंदा ताई कहते हैं, लेकिन मैं मराठी में भाऊ या दादा अकस्मात नहीं कह पाती हूँ। हमेशा सोचती हूँ कि अगली बार दादा कहूँगी, लेकिन नहीं हो पाता है।
पुरूष के प्रति एक अविश्वास का भाव हमारे खून में रचा बसा होता है, हमें घुट्टी में पिला दिया जाता है। हम उनके प्रति सहज - सरल नहीं रह पाते हैं।
२१ जुलाई
वाकई समय बड़ा बलवान होता है! इन दिनों Be Negative कहना सबसे बड़ी Positivity है।(सन्दर्भ: कोविड १९ )
१८ जुलाई
परिस्थिति बदलना सम्भव न हो तो मन:स्थिति बदल लेना चाहिए।
१६ जुलाई
हमारे समय तो सत्तर बहत्तर प्रतिशत वाले भी मुश्किल से एक दो होते थे। उनसठ साठ को भी बुद्धिमान कहा जाता था। माता को तो बिलकुल ही नहीं, पर पिता को भी प्रतिशत से कुछ लेना-देना नहीं होता था। घर में बड़ी संख्या में परिजन होते थे। स्कूल से घर लौटने पर कोई भी पूछ लेता था -- पास हो गई ? "हाँ" संक्षिप्त जवाब। "जा, हाथ-पैर धोकर ठाकुरघर में अगरबत्ती जला दे और सबके पाँव पड़ ले" उसके बाद सिर्फ गर्दन हिलाना ही अपेक्षित होता था। कोई समवयस्क हो तो वह भी अकेले में पूछता - कितने नंबर आये ? जितने भी आये हो, उसने "अरे वाह" ही कहना था। जब सबका परिणाम आ जाता तो एक दिन भगवान को भोग लगाकर पेड़े बाँट दिये जाते। बहुत हुआ तो शाम को आइसक्रीम।
न कोई मुँह लटकाये घूमता था , न ही कोई तारीफ से सिर पर चढ़ाया जाता था।आत्महत्या भी कभी सुनी नहीं।
अब नब्बे प्रतिशत से ऊपर आम हो गया है और साठ बासठ पानेवाले और साथ में अधिकांश के माता-पिता मुँह लटकाये घूमते हैं, जबकि दोनों ही प्रथम श्रेणी के कहलाते हैं।
अब बच्चे ज्यादा बुद्धिमान हो गये हैं या शिक्षक उदार हो गये हैं ?
१४ जुलाई
सबको पता है कि झूठ है, लेकिन न्याय नहीं होगा, क्योंकि सबूत किसी के पास नहीं है।
भगवान नहीं दिखता लेकिन मान लेते हैं, हवा नहीं दिखती, भावना नहीं दिखती,पाप पुण्य नहीं दिखते, यहाँ तक कि वायरस भी नहीं दिखता लेकिन सब मान लिया जाता है, मात्र सत्य के लिए प्रमाण चाहिए । अद्भुत....(सन्दर्भ : विकास दुबे मुठभेड़)
१० जुलाई
देश में आत्मनिर्भरता की ओर कोई कदम उठाये जा रहे हों या नहीं, लेकिन साहित्यकार जरूर आत्मनिर्भर हो रहे हैं। पहले, पहले यानि बहुत समय पहले नहीं, कोरोना से पहले 😀😀 जब मंच प्रस्तुति होती थी, तो केमेरा ठीक करना, माइक टेस्टिंग, रेकॉर्डिंग आदि काम कोई और करता था, किन्तु अब लेखकों ने यह सब सीखकर आत्मनिर्भरता का उदाहरण समाज के सामने प्रस्तुत किया है।
साहित्यकार समाज में यूँ ही थोड़े ही सम्मान पाते हैं 😁😁😁
९ जुलाई
चाची कैसी हैं ? मामाजी का बुखार कम हुआ कि नहीं ?
इसी अंदाज़ में आजकल कोरोना के बारे में पूछा जाता है--आपके उधर क्या हाल है ? 😀😀😀
९ जुलाई
हम जब लड़की हुआ करते थे तो हमारे जोर से हँसने पर पाबन्दी थी। हड़काकर पूछा जाता था कि क्या हो गया ?
अब जोर से खाँसने पर यही प्रश्न कुछ चिन्ता के साथ पूछा जाता है।
हम पर संदेह तब भी होता था, अब भी हम संदेह के घेरे में होते हैं। 😁😁😁
६ जुलाई
अभी दो-तीन दिन पहले मालिनी गौतम ने लिखा था कि मित्रता अनुरोध करनवाले की भित्ति पर ताला जड़ा हो तो वह अनुरोध स्वीकार करने से बचती है। उस पर Kumar Sushant ने लिखा कि वे व्यक्ति की जानकारी ले लेते हैं और बाद में ठीक नहीं लगा तो उसे हटा देते हैं।
यह नुस्खा आजकल मैं दूरदर्शन की वाहिनियों पर आजमा रही हूँ। नये कार्यक्रमों की जानकारी हो या दिनभर में कोई अच्छी फिल्म आनेवाली हो तो उस वाहिनी पर रूकना , नहीं तो उसे हटाकर दूसरी।
वाहिनियों का ताला खोलने का यही एक तरीका है।
मेरे सेटेलाइट प्रदाता का स्टाफ दिनभर हिसाब लगाता होगा कि मुझसे वास्तव में कितनी राशि लेना है 😁😁😁
५ जुलाई
राजनीतिज्ञों की तरह हम महिलाएँ अपनी रोटी खुद ही सेंकती हैं।
उससे फौरी तौर पर कोई फायदा भी नहीं होता, बल्कि अपनी रोटी सेंकने से पहले दूसरों की रोटी सेंकना भी हमारी ही जिम्मेदारी मानी जाती है।
३ जुलाई
कोरोना काल में सबसे हतभागी बिल्कुल छोटे अबोध बच्चे, शिशु हैं, जिन्होंने दुनिया देखी ही नहीं और उनके लिए एक लम्बे समय तक दुनिया के दरवाजे बन्द हो गये।
पड़ौस के दो घरों में डेढ़ साल और छ: महीने के बच्चे हैं, जिन्हें कभी कोई गोद में लेकर दरवाजे के पास खड़ा हो जाता है तो घर के अंदर से तुरंत आवाज आ जाती है--अरे ! अंदर ... अंदर और कभी कभी तो हम पड़ौसी भी टोक देते हैं।
मेरी ढाई साल की पोती के भी यही हाल है। इस साल उसे प्ले स्कूल भेजना था। पढ़ना-लिखना तो ठीक है, लेकिन वहाँ वह अपने हम उम्र बच्चों के साथ खेलती, शैतानी करती, सबके साथ रहना, खाना आदि सीखती। इन सबसे वंचित हो गई।
३ जुलाई
बिना पानी डाले कम तेल में सब्जी पकाना हो तो ढँकनी पर थोड़ा पानी डाल दें।
कुछ नहीं, आज सुबह पुरानी डायरी में पुराना दोहा मिल गया
सरसुती के भंडार की बड़ी अपूरब बात ।
ज्यों ज्यों खर्चे, त्यों त्यों बढ़े बिन खर्चे घट जात।।
ये दोहा उस जमाने का है, जब ज्ञानी लोग ज्ञान देने से कतराते थे। तब उनकी पूछ-परख भी होती थी। अब कोई पूछता नहीं है तो क्या हुआ बाँटने का सिद्धांत, कोई मनुष्य थोड़े ही है, जो बदल जायेगा ?
इसलिये सोचा कि यदि मेरे पास सरस्वती का अमूल्य भंडार है , तो मुझे बाँटना चाहिए। रखे- रखे कभी कम हो गया तो ? 😁😁😁
२ जुलाई
हमें तो दो ही प्रकार मालूम थे -- अच्छे लक्षण वाला सुलक्षणी और बुरे लक्षण वाला कुलक्षणी। अब ये नया आया है - बिना लक्षण वाला । इसे क्या कहेंगे ?
२५ जून
हमने स्वतंत्र भारत में जन्म लिया और कोरोना हमें पारतंत्र्य का अनुभव करा रहा है। ये मत करो, वो मत करो। इसको मत देखो,उसको मत छुओ। बाहर मत निकलो, लोगों से मत मिलो। हे भगवान ! कितने प्रतिबंध.....
१९जून
कल मैंने गुलाबो सिताबो फिल्म पर लिखा तो इनबॉक्स में पूछताछ हुई- आप फिल्में भी देखती हैं ? क्यों भाई (पूछने वाला भाई ही था, बहनें ऐसे प्रश्न नहीं पूछती) फिल्में क्यों नहीं देखें ?
६५ साल से ऊपर वालों को घर से बाहर नहीं निकलने की सलाह दी गई है, फिल्में देखने की मनाही थोड़े ही है।
१७ जून
गुलाबो सिताबो देखी। अच्छी लगी। अलग कहानी और वैसा ही उसका निर्वाह। अमिताभ बच्चन का अभिनय शानदार। उनको हमेशा सीधे खड़ा देखा है और चाल भी सतर होती है, लेकिन इस फिल्म में झुकी कमर के साथ थोड़ा लंगड़ाकर चलना, कुछ लड़खड़ाकर सीढ़ी या रिक्शा पर चढ़ना आदि बेहद विश्वसनीय लगा। उनका मेकअप और कपड़े भी पात्र के अनुरूप है। यदि हमें यह पता न हो कि वे अमिताभ हैं तो पहचान पाना मुश्किल है।
यद्यपि इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है कि देखना ही चाहिए, लेकिन देखने पर पछतावा भी नहीं होगा। यह एक ऐसी फिल्म है, जिसमें न नफ़ा न नुकसान। बहुत दिनों के बाद ऐसी फिल्म देखी, जिसको देखने पर न तो दिल पर और न ही दिमाग पर कोई बोझ अनुभव हुआ और न ही कोई पछतावा हुआ।
१६ जून
रोटी जीवन के अनेक हिस्सों पर प्रभाव डालती है। उसी तरह से वह व्याकरण को भी प्रभावित करती है। विश्वास न हो तो एक रोटी ज्यादा खाकर देख लीजिए।
भरा पेट, भारी पेट हो जायेगा।
१३ जून
राजनीति इतनी मन मस्तिष्क पर छाई रहती है कि राजनेताओं की बीमारी में भी लोगों को राजनीति दिखाई देती है। माना कि यह सही हो सकता है, किन्तु उनका तो काम ही राजनीति खेलना है, हम तो अपनी दृष्टि साफ रखें।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मन की मलीनता हमारे अपने जीवन पर प्रभाव डालती है।
१० जून
कोरोना काल में बहुत कुछ बन्द था और अब बहुत कुछ खुल गया है। इसमें धार्मिक स्थल भी सम्मिलित हैं। खुलने के बाद धार्मिक स्थलों को लेकर कई तरह की चर्चा चल रही है। एक तर्क यह भी आया है कि धर्म स्थल इतनी जल्दी खोलने की क्या जरूरत थी ?
मैं इसके परे जाकर यह जानना चाहती हूँ कि इन स्थलों की आवश्यकता ही क्या है ? ईश्वर को लेकर सभी धर्मों की मूल भावना एक ही है और सभी धर्मों का मूल विचार भी समान है। जब सभी यह मानते हैं कि ईश्वर सर्वव्यापी है तो उसकी आराधना घर में बैठकर क्यों नहीं हो सकती ?
किसी समय इन धार्मिक स्थलों ने समाज कल्याण के लिए महति भूमिका निभाई होगी, लेकिन अब वहाँ एक विशुद्ध व्यावसायिक स्वरूप के साथ ठेकेदारी प्रथा चल रही है, जो ईश्वर या धर्म की मूल अवधारणा के एकदम विपरीत है। अन्य धार्मिक स्थलों की तो मुझे जानकारी नहीं है, लेकिन लगभग सारे प्रसिद्ध मंदिर धर्म स्थल कम, पर्यटन स्थल अधिक हो गये लगते हैं।
ना तो मैं नास्तिक हूँ और ना ही किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना मेरा उद्देश्य है, लेकिन इस दुख की घड़ी में ईश्वर का स्मरण घर बैठे किया जा सकता है और इस विषय पर सोचा भी जा सकता है।
९ जून
दस - पन्द्रह दिन बेटे के यहाँ रहना था, तो कपड़े भी उसी हिसाब से लेकर आई थी। उसी बीच अचानक देशबन्दी हो गई, किन्तु कम कपड़ों में भी ढाई महीने आराम से गुज़र गये।
अब सोचती हूँ, इसे आदत बना लूँ। अलमारी भरी हो, तब भी एक जोड़ी कपड़े से ही दिन कटता है, फिर ये और, और ,और.... का लालच किसलिए ?
जैसे वहाँ भरी हुई अलमारी छोड़कर यहाँ आई हूँ, वैसे ही तो अंत में जाना है।
#कोरोना #से #मिला #सबक
६ जून
अनिश्चित तो जिया जा सकता है, लेकिन अनिश्चिंत मुश्किल होता है।
अभी हम सब इसी कठिनाई से गुज़र रहे हैं।
३ जून
हम यानि मैं और मेरी घनिष्ठ सहेली बहुत छोटे तो नहीं थे, लेकिन अठारह बरस के नहीं थे। इस कारण ए प्रमाणपत्र वाली फिल्में देखना संभव नहीं था। उन दिनों लगातार चरित्र, दस्तक, चरित्रहीन जैसी ए प्रमाणपत्र वाली फिल्में आईं।मेरे पाँचों भाई मुझसे काफी बड़े थे और घर में उस समय के मान से काफी खुला वातावरण था। वे सोचते थे कि हमें इन फिल्मों को देखना चाहिए, लेकिन स्कर्ट - ब्लाऊज वाली हम लड़कियों को टॉकीज में प्रवेश मिलना मुश्किल था (उस समय सिर्फ अविवाहित लड़कियाँ ही स्कर्ट-ब्लाऊज पहनती थीं)। तय यह हुआ कि भाभियों और बहनों के साड़ी-ब्लाऊज का उपयोग किया जाय। हम दोनों साड़ी-ब्लाऊज, बड़ी बिन्दी, जया भादुड़ी जैसा जूड़ा बनाकर, डरते-डरते ही सही, सभी फिल्में देख आये।
आज यह सब इसलिये याद आया कि मुझे इंदौर लौटना है और ६५ वर्ष से कम दिखने का कोई उपाय नहीं है। बाल काले कर, स्कर्ट-ब्लाऊज पहन लूँ तब भी ६५ से ऊपर ही दिखूँगी।
#तात्पर्य: नकली तौर पर बड़े हो सकते हैं, लेकिन छोटा होना आसान नहीं होता।
२८ मई
Health is wealth ....Wealth concerns to health ...
पहले मुर्गी या पहले अंडा ??...😀😀
२७ मई
देशबन्दी में भी अब बहुत सारे दैनंदिन कार्यों के लिये छूट दी गई है। बाकी सब तो ठीक है, हमारे प्रिय धारावाहिक कब शुरू होंगे ?
इतने प्रिय कि यदि हम बाहर हों तो दौड़ते-भागते समय पर घर पहुँचने की कोशिश करते हैं। थोड़ी-सी भी देर हुई तो पहले टीवी शुरू करते हैं, बत्ती बाद में जलाते हैं। समय पर नहीं पहुँच पाये तो जब वह धारावाहिक दोबारा आता है, तब देखते हैं। इनवर्टर से कुछ और चले न चले टीवी जरूर चलना चाहिए।
इतने प्रिय कि नायक-नायिका की सारी गतिविधियाँ हमारी अपनी हो जाती हैं, उनके घर का कोना-कोना हमें पता होता है, उनकी खुशियाँ, उनके ग़म, उनकी समस्याएँ, उनके निदान क्या-क्या नहीं होता! जीवन कितना जीवंत हो जाता है। उस दौरान कितने भी घनिष्ठ व्यक्ति का फोन आता है तो कैसी झल्लाहट होती है, यह एक भुक्तभोगी ही जानता है।
इतने प्रिय कि सारे पात्रों के संवाद हम खुद ही बोल लेते हैं,उस दौरान भले ही परिवारजनों से संवाद हीनता हो। न भूख, न प्यास। न थकान, न नींद। सब कुछ उस छोटे परदे पर सिमट जाता है।
तो इतने प्रिय, इतने इतने प्रिय धारावाहिक कब शुरू होंगे ? हम अभी तो एनडीटीवी, आजतक, जी न्यूज आदि देख देखकर दिन गुजार रहे हैं। आखिर कब तक ऐसा चलेगा ?
२२ मई
कल मैंने गिलास के लिए हिन्दी शब्द पूछा था, तो कुल मिलाकर यह निकलकर आया कि अंग्रेजों से पहले संभवत: हमारे यहाँ गिलास का प्रयोग होता ही नहीं था और विभिन्न जगहों पर जल पात्र, लोटा, कलस्या, गडुआ, रामझारा, गंगासागर,सकोरा, चरू, चंबू आदि उपयोग में लाये जाते थे, जो सामान्यत: लोटे के ही विभिन्न रूप होते थे। आर्थिक परिस्थिति के अनुसार मिटटी से लेकर चांदी-सोने तक ये बनाये जाते थे। लगभग सभी ने ये पात्र देखे हुए हैं। मुझे एक बात विशेष रूप से अनुभव हुई कि ये सारे पात्र कम से कम ५०० मिलीलीटर के होते हैं और हमारे देश की जलवायु के अनुसार एक बार में इतना पानी वे लोग पी लेते होंगे। हमने अभिजात दिखने के प्रयास में १००-१५० मिलीलीटर के गिलास से पानी पीना शुरू किया और कम से कम ८/१० गिलास पानी पीना चाहिये,अब यह सलाह सुनने को अभिशप्त हुए।
हर बार हाथ धोना चाहिये, हाथ मिलाकर नहीं नमस्ते से अभिवादन करना चाहिये, जैसी सीख के बाद क्या अब गिलास से नहीं, लोटे से पानी पीना चाहिये यह सुझाव आयातित होकर हमारी जीवन शैली में आयेगा ?
२२ मई
कोरोना काल में और उसके बाद आनेवाली अनेक समस्याओं पर सामाजिक माध्यमों(सोशल मीडिया), अखबारों, समाचार वाहिनियों (न्यूज चैनल्स) आदि पर लगातार चर्चा जारी है, लेकिन देह व्यापार करनेवाली स्त्रियों के बारे में कोई नहीं बोल रहा। वे तो वैसे ही सदैव शोषित होती हैं और इस समय उनकी भी आमदनी शून्य होगी। मदद का मय फोटो प्रचार - प्रसार करनेवालों का भी उधर ध्यान गया है, ऐसा नहीं लगता।
२२ मई
मेरे समकालीन और उससे कुछ अगलों को याद होगा कि पहले स्नानघर घर के पिछवाड़े होता था और मकान के बाजू में इतना खुला हिस्सा रहता था कि कभी किसी मौके पर, खासतौर से किसी के अंतिम संस्कार के बाद या संवेदना बैठक के बाद, घर लौटने पर सीधे पिछवाड़े जाकर हाथ - पैर धोने या नहाने आदि के लिए स्नानघर में जाया जा सकता था।
पिछले तीस वर्षों में जीवन इतना अधिक उतार-चढ़ाव युक्त रहा कि मैंने चार मकान बेचे और पाँच खरीदे .... हर बार बिल्डर से स्नानागार की व्यवस्था उपरोक्त तरीके से करने के लिए कहा। लेकिन किसी एक ने भी मेरी सलाह/माँग को महत्त्व नहीं दिया।
अब कोरोना काल में शायद मकानों की रचना के लिये इस तरह के नक्शे बनाने पर विचार हो, क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हमें कोरोना के साथ ही जीने की आदत डालनी है।
२१ मई
लोकतंत्र में एक कमजोर विपक्ष लाखों ऊलजलूल विरोधियों का जन्मदाता होता है।
१६मई
एक मध्यमवर्गीय सेवा निवृत्त व्यक्ति की सामान्य अभिलाषा क्या होती है ? सब लोग एक साथ उठे-बैठे,खाये-पिये हँसे-बोले, न कहीं जाने की आपाधापी , न कहीं से लौटने की चिन्ता, मजे-मजे से टीवी देखें, फोन पर लम्बी बात करें, नाती-पोतों का साथ हो
वही सब तो हो रहा है।
बिलकुल मन माफिक।
मन ने कहा -- हाँ,सचमुच ! यही तो चाहा था।
तो ? मेरे भाई खुश क्यों नहीं हो ?
क्या बताऊँ ? बिना बुलाये वह पाहुना आ बैठा है ना ?
यह बोलकर मन फिर अपने खोल में बंद हो गया।
१५ मई
बहुत सारे लोग मित्रता सूची में हैं, यह या तो फेसबुक स्टोरी से या इनबॉक्स से या फिर उनके जीवंत होने (लाइव) की घोषणा से पता चलता है, अन्यथा वे कभी भित्ति (वॉल) पर आये हों ऐसा नहीं होता। बहुत तटस्थ, निरपेक्ष होते हैं। ना तो कभी अपशब्द लिखेंगे और ना ही कभी बधाई, शुभकामना, अभिनंदन आदि की औपचारिकता के पचड़े में पड़ेंगे, जबकि बाकायदा मित्रता अनुरोध भेजकर मित्र बनते हैं।
मुझे हमेशा लगता है कि जिन्हें किसी से कुछ लेना देना नहीं होता वे वास्तविक जीवन में भी इतने ही निस्पृह होते हैं क्या ? और यदि हाँ तो कितने खुश और सुखी रहते होंगे !
ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर।
१५ मई
माल्या के साथ नौ हजार करोड़ भी आयेंगे क्या ? सामान्य नागरिक हूँ, खाली 'हाँ' से भी खुश हो जाऊँगी। एकाध रोटी ज्यादा खा लूँगी 😀😀
१५ मई
फेसबुक पर करीब 10 साल हो गये। यहाँ आने के बाद बहुत सारी जानकारियाँ , विशेष रूप से अपने बारे में मिलीं।
शुरुआत ताजातरीन विषय के साथ। कुछ सूक्तियाँ बदल गईं। जैसे शुरू से सुना था कि समरथ को नहीं दोष गुसाईं। यह सूक्ति विशेषकर कोरोना काल में बदलकर 'मजदूर/ गरीब को नहीं दोष गुसाईं' हो गई है।
आप उनके बारे में कुछ नहीं लिख सकते चाहे वे खाना फेंक दें, चाहे वे हिंसा पर उतारू हो जाए, चाहे वे लॉकडाऊन का उल्लंघन करें, उनके बारे में कुछ नहीं कहना है क्योंकि मजदूर/ गरीब को नहीं दोष गुसाईं।
आप यदि इन करतूतों के विरोध में लिखते हैं तो आपका लिखा अश्लील है। यद्यपि हमारे समय में अश्लील की परिभाषा कुछ और हुआ करती थी लेकिन अब विरोध करना भी अश्लीलता की श्रेणी में आता है। अतः आप अश्लील लिखते हैं, आप सामंतवादी सोच के हैं, आप अज्ञानी हैं, आप सुविधा संपन्न घरों में रहते हैं इस वजह से आप में संवेदनशीलता की कमी है आदि इस तरह के कई छिपे हुए गुणों का पता चलता है।
आपने अभी मजदूर दिवस पर मजदूरों की खराब स्थिति पर लिखी किसी कविता का अनुवाद किया है तो उस पर टिप्पणी तो दूर उसे लाइक भी नहीं किया जाता और पूरी तरह से उसकी उपेक्षा की जाती है क्योंकि आप में संवेदनशीलता की कमी है। जो संवेदनशील लोग हैं, जो बुद्धिमान है, वे इस तरह की पोस्ट को पढ़ना, उसको लाइक करना, उस पर टिप्पणी देना मूर्खता समझते हैं। उनके पास इतना समय भी नहीं होता कि वे आपकी वॉल पर आकर दूसरा कुछ भी लिखा जा रहा है उस पर ध्यान दें। स्वाभाविक भी है। आप अकेले ही थोड़े हैं। आपके जैसे अनेक हैं, जिनके जाले साफ करना है।
कुछ समय पहले फेसबुक की एक परिभाषा पढ़ी थी या यह कहना चाहिए कि इसे हिंदी में अनुवादित किया गया था चेहरों की किताब। यहां किताब क्या चेहरों के ग्रंथ दिखाई देते हैं। जो लोग प्रत्यक्ष में अत्यंत विनम्रता से बात करते हैं ,अत्यंत सुलझे हुए दिखाई देते हैं वे अपनी वॉल पर आपके नाम का उल्लेख किए बिना, आपको इस तरह से भला बुरा कहते हैं कि कौन सा चेहरा सही है इस पशोपेश में आपकी जिंदगी निकल जाय।
फेसबुक पर आने के बाद में एक जानकारी और मिली। भले ही आपने कार्ल मार्क्स को बहुत शिद्दत से पढ़ा हो, बहुत विस्तार से पढ़ा हो, आप उस विचारधारा के प्रशंसक हो,लेकिन आप मार्क्स के अनुयायी हैं, यदि यह नहीं दिखा सकते तो सब व्यर्थ है। आप प्रगतिशील भी नहीं है, आप जनवादी भी नहीं है, आप गरीबों के मसीहा तो बिल्कुल नहीं है, आप सामंतवादी हैं, आप असंवेदनशील हैं और अंदर की बात यह है कि आप में अक्ल की कमी भी है।
आप यह चाहते हैं कि लोग आपको हाथों हाथ लें तो आप तथ्य नहीं रख सकते, आप संतुलित विचार नहीं रख सकते। आप यदि सरकार की बुराई करते हैं हमेशा सरकार की बुराई करें, उनके अच्छे कामों की प्रशंसा बिल्कुल न करें। प्रशंसा करते हैं, तो बुराई बिल्कुल भी नहीं। भूल जाइए कि आप एक लोकतांत्रिक देश में रहने वाले नागरिक हैं। आपको किसी एक समूह से, किसी एक संप्रदाय से, किसी एक जाति से, किसी एक दल से जुड़े रहना बहुत जरूरी है।
फेसबुक पर आकर एक यह भी जाना कि लोग आपको स्व की ओर जाने की प्रेरणा देते हैं। इतनी बड़ी जिंदगी बिना अपने को जाने ही बिता दी और यहां जो लोग मित्रता सूची में हैं, बहुतेरे वास्तव में आपके मित्र हैं, जो आपको आपके बारे में जानकारी देते हैं कि आप कैसे हैं ? यह एक अलौकिक अनुभव है। जब एक लम्बा जीवन बीत गया है, बचा हुआ रीत रहा है तब यह जानना वास्तव में बहुत जरूरी है कि आप क्या हैं ? इसके लिए फेसबुक को बहुत-बहुत धन्यवाद।
यदि कोई यह समझता हो कि मैं फेसबुक को अलविदा कह रही हूँ, तो वे इस गलतफहमी में ना रहें क्योंकि ज्ञान प्राप्ति की कोई सीमा नहीं होती और मैं अपने ज्ञान में अधिकाधिक वृद्धि करना चाहती हूँ। मैं यहीं पर हूँ और डटी रहूंगी। कहते हैं न सांस है तो आस है, मैं कहना चाहूँगी कि फेसबुक है तो ज्ञान है। शुभ रात्रि।
९ मई
आज एक मराठी फिल्म देखी -- एबी आणि सीडी (अमिताभ बच्चन और चन्द्रकान्त देशपांडे) । एकदम अलग और मार्मिक कहानी। वृद्ध दादाजी की घर में हो रही उपेक्षा देखकर , पोता उनका सम्मान और आत्म सम्मान लौटाने के लिए अपने मित्रों और छोटी बहन के साथ मिलकर एक योजना बनाता है और अनेक कठिनाइयों के बाद उसमें सफल हो जाता है। विक्रम गोखले (दादाजी चन्द्रकान्त देशपांडे) तो उत्कृष्ट अभिनेता हैं ही, अन्य कलाकारों का अभिनय और पारिवारिक परिस्थितियाँ भी स्वाभाविक हैं। अन्त में कुछ मिनटों के लिए अमिताभ बच्चन भी आते हैं और बुजुर्गों के लिए बहुत मानीखेज सुझाव छोड़ जाते हैं।
कुल मिलाकर एक ऐसी फिल्म जिसे पूरे परिवार ने देखना चाहिए। प्राइम वीडियो पर अंग्रेजी सब टायटल के साथ उपलब्ध है।
४ मई
बड़े परिवार हुआ करते थे। उनमें कोई एकाध किशोर/युवा कुछ उद्दंड होता था। उसे चेतावनी दी जाती थी - खबरदार! घर से बाहर कदम रखा तो देखना।
वे किशोर,वे युवा अब पैंसठ वर्ष की आयु पार चुके हैं। अब भी उन्हें यही कहा जा रहा है कि घर से बाहर न निकलें।
बेचारे........😀😀😀
३ मई
आज अनायास वे दिन याद आ गये, जब गर्मी की छुट्टियों में परिवार इकट्ठा होता था और बच्चे लूडो या उसके जैसा कोई खेल खेलते थे, तो उनमें थोड़ी-सी ठिठोली करके लाल गोटियाँ लेने की होड़ लगती थी और एक दूसरे को चिढ़ाने के लिए #हरे #हरावे #लाल #जितावे कहा जाता था। आगे की पीढ़ियाँ शायद उल्टा बोलेंगी हरे जितावे लाल हरावे।
समयानुसार भाई, गुरू जैसे कितने ही शब्दों के अर्थ बदल गये हैं, उनमें ये भी सम्मिलित हो जायेंगे।
#कोरोना #जोन
३ मई
कोरोना काल में शराब, तंबाकू आदि की वजह से कोई बीमार होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ तो उसे मरणोपरांत किसी उपाधि से सम्मानित किया जाना चाहिए, क्योंकि देश के लिए राजस्व जुटाने जैसे पवित्र कार्य में उसका भी महान योगदान रहेगा। राजस्व की स्थिति बेहतर रही तो उसके परिवार के लिए आर्थिक सुरक्षा का प्रावधान भी किया जाना चाहिए, ताकि अधिकतम लोग इस पुण्य कार्य में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकने के लिए प्रोत्साहित हों।
२ मई
बचपन में दिन के हिसाब से वार सीखे थे -- रविवार, सोमवार... आदि। फिर सात दिन का एक सप्ताह, तीस दिन का एक महीना, तीन सौ पैंसठ दिन का साल वगैरा वगैरा, लेकिन एक- एक दिन कभी नहीं गिना था , जैसे अभी गिन रहे हैं।
२८ अप्रैल
पहले जिसे 'पीढ़ी का अंतर' कहकर हेठी से देखा जाता था, अब उसे 'अलग-अलग जीवनशैली' यह नाम देकर सम्मानित दर्जा दिया जाता है।
२६ अप्रैल
इन दिनों बहुत सारे प्रतिष्ठानों में घर से काम करवाया जा रहा है इनमें स्त्री पुरूष दोनों ही हैं। जैसा कि हम जानते हैं अभी सभी महिलाएं घर के सारे काम खुद ही कर रही हैं। ऐसे समय में जिन महिलाओं को अपने दफ्तर का काम भी करना है, वे उसे किस तरह से समायोजित कर पा रही होंगी ? क्योंकि अधिकांश घरों में सब लोग अभी घर पर हैं और सभी महिलाएं दिन में तीन चार बार का खाना नाश्ता, फिर उतनी ही बार बर्तन, झाड़ू पौछा कपड़े सब कुछ कर रही हैं। निश्चित तौर पर बहुत सारे घरों में उन्हें मदद मिल रही है, लेकिन जहां पति पत्नी दोनों को कार्यालयीन काम करना है वहां पर काम का बोझ और भी ज्यादा होगा और निश्चित तौर पर वहां की गृहिणी कुछ ज्यादा तकलीफ उठा रही होगी क्योंकि पुरुष तो सारा काम कर ही नहीं पाते हैं और कुल मिलाकर जिम्मेदारी महिला की होती है। यह एक वास्तविकता है, आरोप नहीं है। इसे सामान्य रूप में लें और जो उसे नहीं ले सकते हैं मौन रहें।
मुझे लगता है कि यह भी एक समस्या है जिसकी ओर शायद किसी का भी ध्यान नहीं गया है। परिवार के सारे सदस्य घर पर हैं, बच्चे भी घर पर हैं तो काम निश्चित रूप से वैसा नहीं हो पाता होगा जैसा आम दिनों में महिला पूरा करके अपने कार्यालय चली जाती है।
२५ अप्रैल
इन दिनों पुरानी जीवनशैली याद आती है। अभी अभी तक यानि पन्द्रह-बीस साल पहले तक हम सीमित संसाधनों और आवश्यकताओं के साथ, बिना किसी चोंचले के आनंदपूर्वक जीते थे। आर्थिक वर्ग कोई भी हो, जीवनशैली थोड़े में संतुष्टि वाली ही थी। घर में हरा धनिया न हो तो कोई तूफान नहीं आता था। जमीन पर दो गद्दे बिछाकर तीन जने बिना किसी ना-नुकुर के गाढ़ी नींद सोते थे। घर में कितने भी प्राणी हो, स्नानघर एक ही होता था और एक ही साबुन से सब नहाते थे। साबुन व्यक्तिगत पसंदगी का विषय नहीं होता था। नये कपड़े और मिठाई का त्योहार से ही नाता होता था। ऐसी तमाम बातें हमारी दिनचर्या को सरल और किफायती बनाती थीं।
२१ अप्रैल
आज अखबार में पढ़ा कि विदेशों में लॉकडाऊन के चलते महिलाओं ने शैंपू करना बंद कर दिया है और बाल धोने के लिए पारंपरिक तरीके ढूंढ रही हैं। अब मैं उस दिन का इंतजार कर रही हूं जब अमेरिका या यूरोप के किसी देश से यह जानकारी निकलकर आएगी कि रीठा, शिकाकाई, आंवला बाल धोने के लिए अच्छे होते हैं। हमने हमारी पारंपरिक चीजें छोड़ दी हैं। अभी जब उधर से आएँगी तो हम बड़ी श्रद्धा पूर्वक उन्हें ग्रहण करेंगे।
अखबार पढ़ते समय मुझे भी याद आया कि मेरी मां रीठा, शिकाकाई, आंवला, कपूर कचरी, नागर मोथा,जटामांसी, मेथी दाना इत्यादि चीजें मिलाकर इमामदस्ते में कूटकर रखती थीं। रविवार या छुट्टी के दिन सुबह-सुबह उस मसाले से एक या दो चम्मच लेकर लोटा भर पानी में उसे चूल्हे के पास की छोटी सिगडी जिसे हम अवेलु कहते थे उस पर उबलने के लिए रख देती थी। वह पानी कम आंच पर उबलता भी रहता था और गर्म भी बना रहता था। सुबह सुबह से ही पूरे घर में एक बेहतरीन खुशबू भर जाती थी।
अब मुझे बाल धोने के उस पारंपरिक तरीके की याद तो आ गई है लेकिन जब तक विदेशी नहीं कहेंगे तब तक मैं अपना नहीं सकती यह मेरी मजबूरी है, क्योंकि मैं एक सच्ची भारतीय हूँ।
२० अप्रैल
जब से तालाबंदी शुरू हुई है तब से फेसबुक पर
सभी की सक्रियता काफी बढ़ गई है। कुछ महिला-पुरुष अलग-अलग व्यंजन बना कर देख रहे हैं और उनके फोटो सहित बनाने की विधि भी दे रहे हैं। कुछ महिलाओं ने साड़ी में फोटो डालने की गतिविधि शुरू की। कुछ लोग पुराने फोटो यहां लगा रहे हैं। इन सारी गतिविधियों की आलोचना भी हो रही है कि यह समय उत्सव का नहीं है।
यद्यपि मैं इस तरह की किसी भी गतिविधि में सम्मिलित नहीं हुई हूँ, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि यह सब सिर्फ तनाव की वजह से हो रहा है और इसकी आलोचना नहीं की जानी चाहिए।
जब किसी का वजन बढ़ने लगता है या अधिक भूख लगती है तब अक्सर चिकित्सक उससे पूछते हैं कि वह किसी तनाव में तो नहीं है ? मुझे लगता है कि इन असाधारण क्रियाकलापों का कारण शायद कोरोना को लेकर उपजा तनाव होगा।
यदि यह तनाव मुक्त होने की प्रक्रिया है तो उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, क्योंकि मैं हमेशा मानती हूं कि सारे लोग मूर्ख नहीं होते और असंवेदनशील तो बिल्कुल नहीं होते।
१९ अप्रैल
किसी भी घटना के परिप्रेक्ष्य में यदि आप अपने कोई विचार रखते हैं, तो फेसबुक पर आरोप - प्रत्यारोपों की झड़ी लग जाती है। हर बात को राजनीतिक मोड़ देने की न सिर्फ कोशिश की जाती है, बल्कि उसे थोपने के महत् प्रयास किये जाते हैं। 😪😪
राजनीतिक दलों की तरह यहाँ भी निर्दलीय का तमगा लगाने की सुविधा होना चाहिये।
१६ अप्रैल
कपड़े सिलने वाले, बाल काटने वाले, सायकिल पर प्लास्टिक का सामान बेचनेवाले, बर्तन-कपड़े, किराना आदि के छोटे दुकानदार, चाय, पान की गुमटीवाले, रिक्शा चालक, कबाड़ खरीदनेवाले, पंक्चर ठीक करनेवाले, फूल बेचनेवाले आदि ऐसे बहुत से हैं जो न तो कुछ कमा पा रहे होंगे और न ही वे मांग पा रहे होंगे। ये सूची काफी लम्बी हो सकती है। उनके बारे में भी सोचा जाना चाहिए।
१६ अप्रैल
तालाबन्दी की इस अवधि में घर से बाहर निकलने पर पाबन्दी है, लेकिन लोग एक कदम आगे बढ़ गये। वे सामाजिक माध्यमों से भी बाहर नहीं निकल रहे हैं । 😁😁😁
१६ अप्रैल
मैं स्वभावतः घरघुस्सी हूँ। नौकरी के दौरान अक्सर कहती थी कि मेरा बस चले तो छ: महीने घर से न निकलूँ। अभी तालाबन्दी के दौरान यह अनुभव हुआ कि लगातार घर में बने रहना कितना कठिन है। अब ३ मई तक कम से कम और रहना है। कुल मिलाकर सिर्फ एक महीना और कुछ दिन अर्थात मैं जो छ: महीने की डिंग हाँकती थी, उसका लगभग चौथाई हिस्सा।
पच्चीस मिनट मंथन करने के बाद यह समझ आया कि मेरे जैसा सामान्य इंसान स्वच्छंद, मुक्त रहना चाहता है, उम्र, लिंग, जात, व्यवसाय कुछ भी हो।
१४ अप्रैल
सुबह नाश्ता करने के बाद मैं थोड़ा- सा लेट गयी। अब गर्मी शुरू हो गई है तो वैसे भी सुस्ती आती है। पंखा चल ही रहा था, आँख लग गई। मैं वैसे काफी चौकन्नी सोती हूँ। जरा- सी देर में लगा कि मेरे पास कोई खड़ा है। आँख खोल कर देखा, नन्हीं पोती (सवा 2 साल) उसकी माँ ने दी हुई कटोरी हाथ में लिए खड़ी थी जिसमें अंतिम दो अंगूर बचे थे। मेरी आँख खुलते ही मुझसे बड़े प्यार से पूछा-- आजी! तुला देऊ ? (दादी आपको दूँ)
यूं तो कोई नींद से जगा दे तो गुस्सा आता है लेकिन इस मासूम प्यार पर नींद तो क्या जिंदगी भी कुर्बान है।
१४ अप्रैल
मराठी में एक कहावत है
भुकेला कोंडा
झोपेला धोंडा
अर्थात जब भूख लगती है तो चोकर भी चलता है और नींद आती है तो पत्थर पर भी आ जाती है।
लेकिन गुजरात और केरल में फंसे प्रवासी मजदूर यह शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें खाना मनपसंद नहीं मिल रहा और उनके रहने की भी व्यवस्था अच्छी नहीं है। इस संकट की घड़ी में दरअसल मजदूरों ने, सरकार एवं उन सभी के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए जो यह सारी व्यवस्थाएं उनकी सहायता के लिए कर रहे हैं। व्यवस्थाओं में कमी हो सकती है, सबको संतुष्ट करना आसान नहीं होता, लेकिन इसे लेकर सड़क पर उतरना, हिंसा करना, सब्जियों की गाड़ियाँ जला देना कदापि उचित नहीं है। (सन्दर्भ : कोरोना लॉकडाउन में मजदूरों का पलायन )
१३ अप्रैल
जो भाजपा के या नरेन्द्र मोदी के समर्थक हैं, वे भक्त तो जो अन्य दलों के और उनके नेताओं के समर्थक हैं, उनको क्या कहते हैं ?
मेरा भाषा ज्ञान जरा कमजोर है और इन दिनों फुर्सत भी है तो सोचा कुछ ज्ञान वर्द्धन कर लूँ।
फेसबुक पर बने रहने के लिए ज्ञानी होना अनिवार्य है न ?
६ अप्रैल
आप सहमत हैं या असहमत, यह आपका वैयक्तिक मामला है, लेकिन एक उच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की हर बात पर सार्वजनिक रूप से खिल्ली उड़ाने से उस व्यक्ति की समझ पर नहीं, बल्कि आपकी समझ पर प्रश्नचिन्ह लगता है।
३ अप्रैल
मराठी भाषी साहित्यकारों के इंदौर स्थित "आम्ही रचनाकार" समूह की शाखा भोपाल में भी है । होली के पहले मैं भोपाल आ गई थी और उस समय मध्यप्रदेश में कोरोना नहीं था। 12 मार्च को रंगकर्मी और साहित्यकार Vivek Savarikar Mridul की पुत्री का विवाह था, वहां पर आम्ही रचनाकार के कुछ सदस्यों से मुलाकात हुई। मैं चूंकी 25 मार्च के बाद इंदौर लौटने वाली थी इसलिए Sushma Thakur ने तय किया कि शनिवार दिनांक 21 मार्च को उनके घर पर आम्ही रचनाकार की बैठक की जाय। 18- 19 मार्च तक हम सब उस बैठक को लेकर उत्साहित थे, लेकिन देशभर से जिस तरह की खबरें आ रही थी और सावधानी के तौर पर सामाजिक कार्यक्रमों को स्थगित किया जा रहा था, 20 तारीख को हमने भी यह निर्णय लिया कि बैठक को स्थगित किया जाय। यद्यपि हम मुश्किल से 10 या 12 सदस्य ही उसमें शामिल होने वाले थे और वह भी सुषमा ठाकुर के घर पर और एक तरह से यह एक पारिवारिक आयोजन था, लेकिन हमें कोई भी खतरा उठाना ठीक नहीं लगा, साथ ही प्रशासनिक सलाह मानना भी नैतिक जिम्मेदारी अनुभव हुई। सबसे बड़ी बात यह भी थी कि इस विचार से हम सभी सहमत थे।
समझ में नहीं आता कि देश की राजधानी में हजारों की संख्या में क्या कुछ लोग भी समझदार नहीं थे जो इस जमावड़े को रोक सकते या किसी तरह की सूचना प्रशासन को दे सकते थे? पिछले तीन-चार दिनों से यही प्रश्न मन में को बार-बार मथ रहा है।
१ अप्रैल
जब नया-नया व्हाट्सएप अपनाया था तब से लेकर अभी अभी तक वहाँ सुबह-सुबह से आने वाले तमाम संदेश मुझे कभी भी अच्छे नहीं लगे। कुछ संदेश तो तीन-तीन चार-चार बार आते रहते हैं, तो बहुत कोफ्त होती है।
लेकिन इन दिनों किसी का संदेश आता है तो अच्छा लगता है। उस संदेश में एक संदेश और छुपा रहता है कि संदेश भेजने वाला एवं उसका परिवार सभी सकुशल है।
२६ मार्च
अगले कुछ दिनों में देश के नागरिकों को एक उपलब्धि मिलने वाली है। भारतीय जनमानस अनंत काल से एक प्रश्न का उत्तर पाने के लिए व्याकुल है। उन्हें १४ अप्रैल तक बोधिवृक्ष के नीचे बैठने का सौभाग्य मिला है और वे १५ अप्रैल की सुबह 'युरेका युरेका' कहते हुए ही सोकर उठेंगे।
और
वह चिर प्रतिक्षित प्रश्न है --- दिनभर क्या करती रहती हो ?
२६ मार्च
कोई खाने की, व्यंजनों की पोस्ट डाल रहा है तो आलोचना। कोई हँसी ठट्ठा कर रहा है तो आलोचना। कोई अपने बगीचे के फोटो डाल रहा है तो आलोचना।
मुँह लटकाकर बैठने से क्या होगा ? जितना सकारात्मक रहेंगे और प्राप्त परिस्थिति का खुलकर सामना करेंगे , उतना सब कुछ आसान हो जायेगा।
बाप रे ! अभी एक ही दिन बीता है कहें या अरे वाह ! एक दिन बीत भी गया कहें, यह तय करना ही सिर्फ हमारे हाथ में है। बाकी ईश्वरेच्छा बलियसी ......
२५ मार्च
आज दिन भर घर पर रहना है तो कुछ मदद की जाए, यह सोचकर घोषणा हुई कि आज खाना मैं बनाऊंगा। अब पत्नी के पास कुछ काम तो था नहीं तो उसने चावल धोकर रख दिये। पुलाव बनाने के लिए खड़े मसाले डालकर पानी उबाल दिया। प्याज काट के रखा। कुछ टमाटर काटे, कुछ की प्यूरी बनाई। इसके बाद भी उसके पास समय बच गया तो उसने अदरक लहसुन का पेस्ट बनाया, सब्जी के लिए मसाला भी हाथों-हाथ पीस मिक्सर धोकर रख दिया। फिर भी समय बच गया। तो फिर फ्रिज खोल कर देखा। थोड़ा सा पालक रखा था, जिससे सब्जी नहीं बन सकती थी उसने धोकर काटा और पराठे का आटा गूंथ दिया।
उन्होंने घोषणा की थी वे आए। उन्होंने कहा कलछी कहां रखी है? देखो तेल इतना ठीक रहेगा? नमक तो तुम ही डाल दो। ढक्कन कौन-सा रखना है ? थोड़ा सा पराठे बनाने में मदद कर दो मैं तवे पर सेंक लूंगा। इस तरह से खाना बन गया अब उसका फोटो फेसबुक पर इस घोषणा के साथ डालना जरूरी था कि आज हमने किचन में हाथ आजमाया।
इतना सारा खाना बनाने के बाद थकान तो होना ही थी और पत्नी ने तो वैसे भी कुछ काम सुबह से किया नहीं था तो किचन की सफाई का जिम्मा उसे निभाना ही था। बर्तन भी साफ करना ही थे क्योंकि बाई नहीं आने वाली थी। सब काम निपटाया तब तक चाय का समय हो गया अब जब सुबह से काम कुछ नहीं किया तो चाय कौन बनायेगा ? वह फिर उसे ही बनाना थी और आज उसे नींद भी नहीं आई क्योंकि सुबह से कुछ काम ही नहीं किया था।
#यह #मात्र #विनोद #है। #इसे #वैसा #ही #ग्रहण #करें।
२४ मार्च
इंदौर और अन्य शहरों में जब लोग झुण्ड बनाकर घूम रहे थे, तब उस समय प्रशासन और पुलिस कहाँ थे ? धारा १४४ भी लगी हुई है। यदि तुरंत सख्ती बरती जाती तो उत्साह का स्वरूप ऐसा नहीं होता। अति भावुकता हमेशा ही दिमाग का साथ छोड़कर भाग जाती है। एक प्रतिक्रिया आई कि इंदौर की नाक कटवा दी। ये भी एक तरह की भावुकता है। यहाँ सवाल नाक का नहीं, बल्कि कई ज़िन्दगियों का है। दिनभर का विलगीकरण चौपट हो गया। दो दिन पहले भोपाल में भी काँग्रेस सरकार गिरने के बाद भाजपाई झुण्ड बनाकर शिवराज सिंह चौहान को मुबारकबाद दे रहे थे। उस समय भी न तो स्वयं शिवराज सिंह ने, न उनके सुरक्षा कर्मियों ने और न ही वहाँ उपस्थित वरिष्ठ नेताओं ने इस बात पर आपत्ति जताई।
२३ मार्च
मराठी में एक बालकथा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। एक कौए का घोसला बारिश में बह जाता है। वह पडौसन चिड़िया के घोसले में शरण चाहता है। वह बार-बार उसका दरवाजा खटखटाकर कहता है -- चिड़िया दीदी , दरवाजा खोलो ! चिड़िया उसे हर बार बहलाती है । रूक जाओ ! मैं बच्चे को नहला रही हूँ, दूध पिला रही हूँ, सुला रही हूँ वगैरा वगैरा।
कल मैं अपनी पोती (मात्र सवा दो साल) को यह कहानी सुना रही थी। उसने अपनी कल्पनाशीलता से कुछ बातें उस कहानी में जोड़ दी। रूक जाओ ! मैं बच्चे को क्रीम लगा रही हूँ, डायपर पहना रही हूँ। आज तो प्रगति का एक सोपान और --- रूक जाओ! बच्चे को स्कूल ले जा रही हूँ, टिफिन बना रही हूँ।
कल शायद चिड़िया के बच्चे को मोबाइल या कंप्यूटर चलाना सिखा देगी।
२२ मार्च
कर्फ्यू और ताली इन शब्दों की मीमांसा करने का यह समय नहीं है। तमाम विरोध के बावजूद उनमें निहित भावना को समझा जाना चाहिए।
१९ मार्च
क्वारंटाइन को हमारी भाषा में सूतक नहीं कहा जा सकता है क्या ? कीटाणुओं से बचने के लिए हमारे यहाँ जन्म से मृत्यु तक यह प्रचलित था। हम हमारी भाषा, हमारे रीति- रिवाज़, परम्पराओं आदि से इतनी दूरी क्यों रखते हैं ?
१९ मार्च
पाकिस्तान में हमारे देश से ज्यादा लोग कोरोना पीड़ित हैं और संसाधन हमसे कम हैं । ऐसी परिस्थिति में भी पूँछ में गोलीबारी से वह बाज़ नहीं आ रहा है। इतना बुद्धिहीन पडौसी ईश्वर किसी को न दें।
१९ मार्च
--सार्वजनिक सूचना--
हम शेष ३६४ दिन भी थे, हैं और रहेंगे, अतः एक दिन की बधाई अस्वीकार्य है।
७ मार्च
किसी के कक्ष में उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। वे आये तब मैं दीवारों पर लगे, सुवाच्य अक्षरों में लिखे सुभाषित पढ़ रही थी, जो अब लगभग दुर्लभ है। उन्हें हँसी आ गई। बोले - मोबाइल तो हाथ में दिख रहा है। सोशल मीडिया पर नहीं हैं क्या ? मैंने कहा -- हूँ और अच्छी खासी सक्रिय हूँ। उन्हें और जोर से हँसी आ गई। कहा -- तब भी हाथ का लिखा पढ़ रही हैं?आपको सर्फिंग, स्क्रोलिंग कुछ तो करना था। इस तरह से पढ़नेवाले पिछड़े माने जाते हैं।
क्या कहती ? यह एक सीधे- सादे इंसान की पीड़ा थी।
५ मार्च
रोटी बनाते बनाते लगभग 60 वर्ष होने को आ गए, लेकिन रोटी फूलने पर आज भी उतनी ही खुशी होती है जितनी पहली बार हुई थी। क्या मैं इतनी मासूम हूं अब भी ?
३ मार्च
ईश्वर से कुछ माँगो तो वह बड़ी मुश्किल से देता है। जगतस्वामी को कम्पनियों से सीखना चाहिये।तमाम कम्पनियाँ फोन कर करके कुछ न कुछ देने पर तुली रहती हैं।
२ मार्च
चर्चित फिल्म "थप्पड़" की आज समीक्षा छपी है। उसके अंत में लिखा है कि हर बहन को अपने भाई और पत्नी को पति के साथ देखना चाहिए। इससे तो परिवार में भूचाल आ जायेगा। एक पुरुष को दो बार फिल्म देखना पड़ेगी ,एक बार बहन के साथ और एक बार पत्नी के साथ। बहन कभी दूसरे शहर में होगी तो खर्चा और बढ़ जायेगा। बस , रेल्वे या हवाई जहाज का टिकिट सुरक्षित करना पड़ेगा। अपनी कार हो तब भी व्यय तो होगा ही। बीवी - बच्चे भी साथ चलने की जिद कर सकते हैं। बहन के घर जाना फिर भी ठीक होगा, लेकिन कभी बहन ने खुद आने की इच्छा जताई तो ? लेन - देन तो दोनों परिस्थिति में करना पड़ेगा , किन्तु बहन कभी ज्यादा रुक गई तो ? उसी समय पत्नी का भाई भी सपरिवार आ गया तो ? जिनके यहाँ अकेले पिता हैं या अकेली माँ है वे फिल्म देखने भले न जाय, साथ में तो ले जाना ही पड़ेगा।
ऐसा कहा जाता है कि पढ़ा - लिखा होने से कुछ नहीं होता, व्यावहारिक ज्ञान होना चाहिए। 😁😁😁
२८ फरवरी
किसी के विचारों से असहमति का ये अर्थ नही होता कि उसका उपहास किया जाय या उसके विरूद्ध अशालीन भाषा का प्रयोग किया जाय। विशेष तौर पर सामाजिक माध्यम, एक तरह से सार्वजनिक मंच होते हैं और यहाँ जो भी इस मंच का प्रयोग अभिव्यक्ति के लिये करता है वह उसका मौलिक अधिकार होता है। उस अधिकार का हनन नही किया जा सकता है/ नही किया जाना चाहिए । जो असहमत हो उन्हें इन मंचों पर मित्रता सूची से बाहर होने/करने का विकल्प भी है।
२१ फरवरी
हम पिछले (और शायद पिछड़े भी) हिन्दू और हिन्दुत्व की जिस अवधारणा के साथ पले-बढ़े, वह सर्वधर्म समावेशक, सर्वे संतु निरामया , वसुधैव कुटुंबकम जैसे सिद्धांतों के साथ चलता था। हिन्दू और हिन्दुत्व का सतत जयघोष करनेवाले आधुनिक हिन्दू, अपने माता-पिता तक को, मातृभाषा में सम्बोधित नहीं करते और संस्कृति रक्षा का तमगा लगाकर झण्डाबरदार बने घूमते हैं। ये तथाकथित धार्मिक पुरोधा सूक्ष्मदर्शी लेकर छोटे-छोटे छेद ढूंढने में ही अपने हिन्दू होने और हिन्दुत्व रक्षा की सार्थकता को प्रमाणित करने में लगे रहते हैं। हिन्दुत्व एक बहुत व्यापक संकल्पना है और छुटभैये उसे सूक्ष्म से सूक्ष्म बनाने में जुटे हुए हैं। वे सोचते हैं कि उनके बताये रास्ते पर चलनेवाला ही सच्चा हिन्दू है।
हिन्दू धर्म की यही सबसे बड़ी और त्रासद विडंबना है।
२० फरवरी
नव गठित मंदिर न्यास ने इच्छा व्यक्त की है कि मंदिर का क्षेत्र वेटिकन सिटी और मक्का से ज्यादा होना चाहिए। वेटिकन सिटी 109 और मक्का 80 एकड़ में है। न्यास 111 एकड़ चाहता है। दो एकड़ ज्यादा होने से क्या भगवान गाॅड से बड़े और 31 एकड़ ज्यादा होने से अल्लाह से बहुत बड़े हो जायेंगें?
२० फरवरी
इन दिनों गांधीवादी होने का प्रयास कर रही हूँ।
कान में एक द्रव होता है, जो सूख गया है। मुझे सलाह दी गई है कि शोर से बचूँ, मोबाइल पर बात न करूँ आदि आदि। अतः मौनव्रत चल रहा है।
मौनव्रत है, इसलिये किसी से झगड़ा- वगड़ा कतई नहीं है। अतः अहिंसा का पालन हो रहा है।
रोग से बचाव के लिए प्रतिदिन कुछ न कुछ नया कोई न कोई सुझाता ही रहता है। इन सबका पालन , सत्य के साथ प्रयोग की तरह किया जा रहा है।
कहीं पढ़ा था कि युवावस्था में मार्क्सवाद प्रभावित करता है। मैं इसमें जोड़ना चाहूँगी कि वृद्धावस्था में गांधीवाद अपनाना अनिवार्य होता है।
१७ फरवरी
आज दूरदर्शन पर कव्वाली पर बहुत अच्छा जानकारीपरक कार्यक्रम आ रहा था। उसमें "इश्क़ ए मज़ाज और इश्क़ ए हक़ीक" ये दो शब्द सूफी साहित्य के संदर्भ में आये थे। इनका क्या अर्थ होता है?
१५ फरवरी
मराठी में एक स्तरीय धारावाहिक आता है, जो काफी हद तक विश्वसनीय भी लगता है । इस धारावाहिक में बड़ा बेटा मकरंद कवि है। एक दिन मकरंद को पता चलता है कि उसकी कविताएँ किसी और ने चुराकर अपने नाम से किताब छपवा ली है । वह प्रकाशक से और वकील से बात करता है। दोनों मकरंद को बताते हैं कि कविताएँ उसी कवि के नाम से रजिस्टर्ड हैं अतः मकरंद कुछ साबित नही कर सकता है।मकरंद की पत्नी काॅपीराइट एक्ट की बात भी करती है ।
कविताएँ या साहित्य रजिस्टर्ड होने का क्या अर्थ है? मैंने यह बात पहली बार सुनी है। क्या काॅपीराइट एक्ट के अंतर्गत यह आता है?
१४ फरवरी
मूर्खतापूर्ण धारावाहिक और वितृष्णा उत्पन्न करनेवाली राजनीतिक चर्चाओं के बीच, दूरदर्शन के अलावा अन्य किसी वाहिनी पर जब कोई अत्यंत महत्वपूर्ण और स्तरीय कार्यक्रम देखने को मिल जाता है तो टीवी घर में रखना सार्थक लगने लगता है।
आज कलर्स मराठी ने बाळासाहेब ठाकरे पर ऐसा ही एक सुन्दर कार्यक्रम प्रस्तुत किया। एक उत्तुंग व्यक्तित्व और वह भी राजनीतिक व्यक्तित्व पर तीन घण्टे का अराजनीतिक कार्यक्रम बनाना आसान नहीं था।कार्यक्रम में सक्रिय सहभागिता भी समाज के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की रही और इसी कारण कार्यक्रम उस ऊंचाई तक पहुँच सका। शरद पवार, देवेन्द्र फडणवीस,संजय राऊत, सुनील गावसकर, सुरेश वाडकर, संजय दत्त, नवाजुद्दीन, सुबोध भावे, अवधूत गुप्ते जैसे शिखर पुरुष और साथ में उद्धव ठाकरे ,आदित्य ठाकरे ये परिजन , बहुत ही आत्मीयता और सहजता से व्यक्त हुए ।
#एक #था #टाइगर
१९ जनवरी
हमारे देश की जब बात चलती है तो बड़े गर्व से कहा जाता है कि भारत ने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया। सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन विश्व गुरू, महाशक्ति जैसे विशेषणों से युक्त हमारे देश द्वारा कुछ देशों को अधिकार में ले लिया जाता या अखण्ड भारत का पुराना नक्शा बना रहता तो हमारे साथ-साथ अन्य देश भी चैत्र प्रतिपदा को नववर्ष का स्वागत करते, हमारे मिष्ठान्न उनके यहाँ बनते, वे उनके धार्मिक स्थलों पर जाते, इसके साथ ही कुमकुम अक्षत से बच्चों का टीका कर मंगलकामना करते। संस्कृत भाषा जीवित रहती। संयुक्त परिवार बचे रहते। हमारी संस्कृति के तमाम अच्छे पहलुओं का वैश्विक अनुसरण होता और नये वर्ष के नाम पर फूहड़ता से बचे रहते।
१जनवरी
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