जब यह कहा जाता है कि "बस ! आपका मार्गदर्शन चाहिए " , तो समझ जाना चाहिए कि आप चुकने लगे हैं !!!
२८ दिसम्बर
अच्छी तरह हाथ - मुंह धोने और थोडा कमतर नहाने में दो/चार मग्गों का ही फर्क होता है ...पर ये दो/चार मग्गे कभी सुकून देते हैं तो कभी तकलीफ ......
२८ दिसंबर
घर से चले थे हम तो ख़ुशी की तलाश में
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थोड़ा ढूँढा तो मिल गई और क्या .......
२५ दिसम्बर
हमारी शादी के समय अल्बम बनवाना एक विलासिता मानी जाती थी और हर आने-जानेवाले को वह दिखाना परम कर्तव्य, जो घर का कोई न कोई सदस्य पूरा कर देता था, बावजूद इसके मेरे पास इसका कोई रिकार्ड नहीं है कि कितने लोगों ने वह अल्बम देखा और पसंद किया, पर यहाँ फेसबुक पर हर गतिविधि का हिसाब मौजूद है।
दोस्ती और दुश्मनी निभाने में ये आंकड़े वाकई मददगार होते हैं ..
२२ दिसम्बर
एक स्टेटस और उस पर आई प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप ..................
वेतन कितना मिलता है , यह सवाल ही बेमानी है . अधिकांश लोगों को शायद यह मालूम नहीं है कि बैंक महासंघ के साथ हुए एक समझौते के अनुसार प्रत्येक पांच वर्ष में बैंक कर्मियों का वेतनमान पुनरीक्षित होना चाहिए , तदनुसार नवंबर 2012 में पुनरीक्षण होना चाहिए था , लेकिन साल भर बाद भी उस बारे में कोई चर्चा तक नहीं है .
रहा सवाल व्यवहार का तो सिर्फ भारतीय स्टेट बैंक ही क्यों , सभी राष्ट्रीयकृत बैंकों के बारे में यही शिकायत है , पर शिकायत करनेवाले यह कभी नहीं सोचते कि खिड़की के उस पार उनके जैसा ही इंसान बैठता है . कोई यदि अपनी नैसर्गिक आवश्यकता के लिए या लंच के लिए उठता है , तो भी माथे पर बल पड़ते हैं , उन्हें खरी - खोटी सुनाई जाती है . भीड़ सारी इन्हीं बैंकों में होती है , यस सर , नो सर वाली जगहों में कितने लोग जाते हैं ? और जो जाते हैं उनका वहाँ व्यवहार कैसा होता है ? सरकार की सारी योजनाओं का पालन इन्हींको करना है . अभी आकर देखिये आधार कार्ड जुड़वाने के लिए कैसी लम्बी - लम्बी लाइनें लगती है , जिनके खाते नहीं है , वे इसकेलिए खाते खुलवा रहे हैं ..दूसरे विभाग पांच- पांच दिनों तक बंद रहे तो कुछ नहीं होता , बैंक दो दिन बंद हो जाये तो कोहराम मचता है , अख़बारों की सुर्खियां बनता है ...दीवाली जैसे त्यौहार पर भी सिर्फ एक दिन की छुट्टी होती है , इसे आसानी से भुला दिया जाता है ..
ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती .....
१९ दिसम्बर
दिनभर खूब फेसबुकी की , चेटिंग की , कुछ मेल किये , पढ़ने के लिए कुछ किताबें फिर से निकाली , थोड़ी नींद ली , गैस का सिलेंडर भी आ गया , सो ताजा तरीन अनुभव कर रही थी। युवा अनुभव कर रही थी। उस अनुभव को बरक़रार रखने के लिए साडी को परे हटाया , सलवार किसी और रंग की, कुर्ती कोई और ऐसा बेमेल सलवार सूट पहना , शेम्पू किये बालों को खुला ही छोड़ दिया , पिन नहीं लगाई , कपड़े की झोलेनुमा पर्स कंधे पर टांगी और हड़ताल का जश्न मनाने फल-सब्जी की तलाश में शाम को घर से निकल पड़ी.....चौराहे पर पहुंची तो एकदम सन्नाटा ,एक भी ठेला नहीं , न फल न सब्जी,आलू तक नहीं । अगले चौराहे तक चली गई, आखिर निराश हो लौट रही थी, तो मजदूर वर्ग के कुछ लोग जुलुस की शक्ल में दिखे , हाथों में मोमबत्ती लिए ...मैं एक दुकान के पास ठिठक गई , अच्छी बड़ी दुकान थी , पर मैं पहली बार ही गई थी , दुकानदार से पूछा -- क्या हुआ ? वह तो जैसे भरा बैठा था . बोला मेडम ( आंटी नहीं ) परसों रात को यहाँ एक नशेड़ी ने एक फलवाले को और एक सब्जीवाले को मार दिया । मैंने कहा - हाँ , मैंने पढ़ा था । बोला - पुलिस कुछ नहीं कर रही , इसलिए आज उन्होंने काम बंद रखा है, गरीबों की कोई सुनवाई नहीं जैसे कुछ वाक्य उसने मुझे सुनाये । इसी बीच मेरी नज़र ब्रेड पर पड़ गई , एकदम ताजी मुलायम दिख रही थी ...सोचा वही ले लूँ ...दुकानदार का बोलना जारी था , अकस्मात वह बोला -- आपको मैंने यह सब जानबूझकर बताया ...आप जैसे लोग ही कुछ कर सकते हैं ....मैंने कहा मेरे जैसे मतलब ? उसने मुझे नीचे से ऊपर तक देखा फिर बोला -- मतलब एक्टिविस्ट लोग ही कुछ कर सकते हैं , मैंने कहा मैं कोई एक्टिविस्ट नहीं हूँ ( मन में सोचा तुम्हारे जैसी ही भाषणबाजी करती हूँ , और कुछ नहीं ) वह एकदम निराश हो गया - अरे सॉरी , मैं समझा आप किसी संस्था या दल से जुडी हैं ....बाहर निकलने का सारा उत्साह खत्म हो गया ... 25 रुपये की ब्रेड के साथ मुफ्त का भाषण दिमाग में लिए घर आ गई ...एक पर एक फ्री ....
१८ दिसम्बर
वह बेचारा जब छोटा-सा , मूलभूत मात्र था , तब भी मै उसे कान के नीचे रखकर काम नहीं कर पाती थी,..... अभी वाला तो पैदाइशी ''स्मार्ट '' है , हाथ में आ जाता है यही क्या कम है ?
१५ दिसम्बर
सफ़ेद बाल होने में जिंदगी निकल जाती है , काले तो क्या आधे घंटे में हो जाते हैं ...
५ दिसम्बर
नौकरी , नौकरी की तरह करना चाहिए ...
३ दिसम्बर
जैसे न्यायालयों में ईश्वर को हाजिर-नाज़िर मानकर शपथ ली जाती है , वैसा ही कुछ फेसबुक का हाल है , मित्रों को हाज़िर - नाज़िर मानकर स्टेटस अपडेट किये जाते हैं।
१ दिसम्बर
जब भी किसी के घर जाना होता है तो लोग चाय के लिए तो पूछते ही हैं .मै बिना किसी ना-नुकुर के हामी भरती हूँ , तो उन्हें थोडा ताज्जुब होता है , पर वे उसे दर्शाते नहीं है . फिर एक सवाल आता है - शकर तो चलेगी ना ? मेरी सहमति पर एक संशय उनकी नज़रों में तैरता दिखाई देता है .वे चाय के साथ कुछ नाश्ता , मिठाई- नमकीन भी रखते हैं , मेरा उसपर भी कोई ऐतराज नहीं होता . तब उनका अविश्वास बेसाख्ता शब्दों में फूट पड़ता है - काफी मेंटेन हैं आप ....दरअसल मेरे बढे हुए वजन और बीत चली उम्र के साथ मेरे व्यवहार का तालमेल नहीं बैठ पाता.....उनका भी कोई दोष नहीं ......उम्रदराजी के साथ जिस तरह एक गाम्भीर्य अपेक्षित होता है , वैसे ही कुछेक बीमारियां भी अपेक्षित होती हैं ..
३० नवम्बर
कहते हैं कि लक्ष्य बड़ा और कदम छोटे होना चाहिए .....इसका आसान अनुसरण यूँ किया जा सकता है ---- चार जनों का खाना बनाने के पहले एक कप चाय बना ली जाय .....
२७नवम्बर
दो दिन चुनाव में ड्यूटी थी . वहाँ मेरे जैसे तथाकथित बुद्धिजीवियों और फेसबुकी बहसबाजों से इतर तमाम सामान्य लोगों से बातचीत का अवसर मिला . कुल मिलाकर चुनाव के प्रति अनास्था और उदासीनता का माहौल था . लोग सिर्फ ड्यूटी बजाने आये थे . एक सरकारी आदेश जारी कर हजारों की संख्या में लोगों को बुला लिया गया था और आदेश पालन में जरा सी चूक होने पर नाम ले-लेकर सरे आम माइक से निलम्बन की धमकियाँ दी जा रही थी . सरकार की ओर से कोई व्यवस्था नहीं होने का अनुभव कई लोगों को था और वे ठण्ड के कपडे, ओढ़ने-बिछाने के लिए रजाई-कम्बल, करीब 36 से 40 घंटों के लिए खाने-पीने का सामान , पीने का पानी लेकर लदे-फदे, अपने मतदान केंद्र का स्थान और नाम ढूंढते यहाँ-वहाँ घूम रहे थे .
इसके पहले हुए प्रशिक्षण में हमें कुछ भव्य बातें सुनाई गईं थीं . ''आप लोग भाग्यशाली हैं , जो सबसे बड़े लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया के लिए चुने गए हैं . आप अपने-आप को गौरवान्वित अनुभव करें .'' अब गौरव वगैरा तो किसीके चेहरे पर नजर नहीं आया , बहरहाल आक्रोश और गुस्सा जरुर था . ये जो कठिन तपस्या करवाई जा रही थी , उसका फायदा इन आमजनों को कतई नहीं मिलना था , जिनके लिए ये कवायद की जा रही थी , वे फिर से नए घोटालों में जुट जायेंगे , ये सभीको अच्छी तरह पता था . चुनाव मद में हुए खर्चों का भार अंतत: जनता पर आना है और महंगाई और बढ़ना है , ये रहस्य भी किसी से छुपा नहीं था , पर एक बात पक्की थी --- अपना और अपने परिवार का अस्तित्व बचाने के लिए सारे के सारे तत्परता से इस ''पवित्र कार्य'' में जुटे थे ........वैसे कुछ लोग इस बात से जरुर खुश थे कि आभिजात्य कहे जानेवाले बैंक कर्मी भी इस वर्ष महायज्ञ में जोत दिए गए थे ....
२५ नवम्बर
हमारे समय में पाबंदियां बहुत थी , पर समय कुल मिलाकर ठीक था . किसीको भैय्या कहो तो वह भैय्या ही रहता था , पिता तुल्य पिता जैसा ही स्नेह बरसाता था .उम्र के कुछ हिस्से सुरक्षित रहते थे , बच्ची को बच्ची और बूढ़ी को बूढी समझा जाता था , जिस स्त्रीत्व पर गर्व अनुभव होता था , वही स्त्रीत्व अब ग्लानि उत्पन्न करता है , जिसकी वजह से सर ऊँचा रहता था , वही अब डरावना लगता है. अब घर में मै अकेली रहूँ , चाहे मेरी अबोध नातिन , दोनों के लिए भय का पैमाना एक ही है …
२१ नवम्बर
आज केबीसी में अमिताभ बच्चन ने एक जानकारी दी कि एक महिला दिनभर में औसतन बासठ बार मुस्कुराती है और पुरुष मात्र आठ बार ...( सामनेवाला यदि हरकते ही ऐसी करे , तो मुस्कराहट तो आएगी ना )
१७ नवम्बर
हम बैंकर्स के बारे में ज्यादातर लोगों को यह लगता है कि नए सिक्के हमारी मेज पर सौंफ - इलायची की तरह रखे रहते हैं ......नए नोटों की गड्डियां हमारी दराजों में ऐसे ही पड़ी रहती हैं और हम कुछ भी , कभी भी खरीद सकते हैं , क्योंकि कम ब्याज पर हमें ऋण उपलब्ध होता है ( ऋण वेतन से चुकाना भी रहता है , इसे आसानी से भुला दिया जाता है )....दीपावली जैसे- जैसे नजदीक आती है , ऐसे सोच-विचार के लोगों की भीड़ हमारे आस-पास मंडराने लगती है .....या देवी सर्व भूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्थित :
२९ अक्टूबर
हरियाणा के करनाल में साहित्यकार अवतार सिंह पाश की याद में बनी लाइब्रेरी मिटने जा रही है, क्योंकि सरकार ने वह जगह मेडिकल कॉलेज के नाम कर दी है...
२३ अक्टूबर
मेरी पीढ़ी ने न तो देश के लिए कुछ किया , न समाज के लिए ! बस एक पौध खड़ी कर उसे धकेल दिया अर्थहीन , अर्थप्राप्ति की ओर.... और अब तीन उँगलियाँ अपनी ही तरफ है ,इसका विचार किये बिना वानप्रस्थ में माला जप रहे हैं --- आज के युवा ऐसे , आज के युवा वैसे ....
२३ अक्टूबर
आज एक साहित्यिक कार्यक्रम में गई थी। वहां दो / तीन बुजुर्ग वक्ताओं ने ही एक सुर अलापा कि नई पीढ़ी और युवा वर्ग पाठ्यक्रम के इतर कुछ नहीं पढ़ रहा . उन्हें चिंता थी कि पुस्तक विमोचन , कवि गोष्ठी , परिसंवाद जैसे विशुद्ध साहित्यिक कार्यक्रम आदि का ये अंतिम समय चल रहा है वगैरा , वगैरा .....उस समय मुझे फेसबुक के मेरे युवा मित्र याद आ रहे थे।
करीब ढाई साल पहले जब मैं यहाँ सक्रीय हुई, मेरे परिचय क्षेत्र के बाहर से बने मेरे पहले मित्र संजय पाठक से लेकर अभी कुछ अर्सा पहले मेरी मित्रता सूची में शामिल हुए प्रियम तिवारी,अतुल कुमार राय, रणजीत पराडकर जैसे मित्रों के चेहरे मेरी आँखों के सामने से गुजर गए और इनके बीच में थे स्वप्निल कुमार, शिवानन्द मिश्र,दिलीप वशिष्ठ,पीयूष पाण्डे, फ़रहत अली खान युसुफ़जई , नीलेश शेगाँवकर, आभा निवसरकर,शालिनी चतुर्वेदी, कविता वर्मा,संज्ञा अग्रवाल, मेरी बेटी स्वरांगी साने कितने नाम गिनाऊँ ? इन सबके स्टेटस पढ़कर ही पता चलता है कि ये सबके सब अध्ययनशील और पठन- पाठन में रूचि रखनेवाले नाम है।
वैसे भी फेसबुक पर युवा वर्ग ही सबसे ज्यादा सक्रीय है और मेरी मित्रता सूची में मै उन्हीं लोगों को शामिल करती हूँ , जिनकी इन सबमें रूचि है , इस लिहाज से मेरे लगभग सभी मित्र इसी श्रेणी के हैं , अब मै यह कैसे मान लूँ कि साहित्यिक कार्यक्रमों का यह अंतिम समय है !!!!!
२३ अक्टूबर
कल एक सज्जन तमतमाते हुए आये और कहने लगे --- where is manager ? I just want to talk . Is this a nationalize bank ? you bankers **** and you people say your bank is a largest bank ...and so on पर मेरे एक ही वाक्य से चित हो गए . मैंने धीरे से कहा -- सर ! मुझे अंग्रेजी नहीं आती .....
अंग्रेजी में रोब झाड़नेवाले पता नहीं क्या साबित करना चाहते हैं ?
१६ अक्टूबर
चैनल्स पर कोई आशाराम को रो रहा है , कोई जगन मोहन को तो कोई चंद्राबाबू को और डीडी भारती पर उ.बिस्मिल्ला खां साहब की शहनाई के मंगल सुर ....वाकई डीडी का कोई जवाब नहीं …
७ अक्टूबर
फ्रिज में रखा नीबू यदि कड़ा हो गया हो तो उसे कुछ सेकण्ड्स के लिए माइक्रोवेव में रख दें , रसीला हो जायेगा ....इसे कहते हैं एक गजेट से दूसरे को मात देना ..
७ अक्टूबर
वो कल्कि (अवतार) को आने में कितनी देर है ????
६ अक्टूबर
हमारे अनेक तिथि या पर्व मनाने के पीछे का धार्मिक उद्देश्य तार्किक भी लगता है .कुछ हमारी कृषि संस्कृति से जुड़े हैं , कुछ पर्यावरण से .जैसे मकर संक्रांति पर नई फसल का नैवेद्य , तो सावन में हरियाली तीज या भादों में हरितालिका तीज पेड़- पौधों से परिचय का माध्यम है . नववर्ष ( चैत्र प्रतिपदा ) पर श्रीखंड या फिर अक्षय तृतीया पर मटके का दान , नई मटकी से शिव पर जलाभिषेक याद दिलाता है कि अब गर्मी आ गई . शरद पूर्णिमा का दूध भी यही स्मरण कराता है कि अब दही खाने के दिन जा रहे हैं , पर सर्व पितृ अमावस्या का तर्क अब तक समझ नहीं आया .....
Pitru-paksh AAcharya Chaanakya ke office management ka nayab namoona hai, jab bhi mahatwapurn faisle lene ke liye raj-sabha aayojit hoti , koi na koi sardaar shraddh ke karan anupshthit rahta, is bimaari se niptane ke liye Chaanyak ne 15 din shraaddh ke liye tay kar diye aur aakhari din yane Amawasya saare un pitaron ke naam kar di jinka 15 dino me 'number'nahi lag saka,Arthshaastra bhi prabandhan hi to hai.Ye 15 din wo hai jab krishi ke kaam jyada nahi hote hai. ( PRAMODINI MONE)
३ अक्टूबर
नींद से मित्रता कम ही थी
इस दुश्मनी ने फेसबुकिया बना दिया ....!!!
१ अक्टूबर
रैलियों , सभाओं का मौसम है . कार्यकर्ताओं का जी अघा जाय तो पूड़ी वगैरा फेंके नहीं . उन्हें कड़ी धूप में सुखा लें और फिर उसको चूरकर कढ़ाई में सेंककर हलुआ बना लें या पक्की चाशनी में डाल कर लड्डू .ये लड्डू १५ दिन तक ख़राब नहीं होते . आधुनिक लोग इस चूरे को ब्रेड क्रम्स की तराह भी इस्तेमाल कर सकते हैं . इस सारे उपक्रम में कुछ लोगों को रोजगार भी मिल सकता है .....मै पूरी गंभीरता और शिद्दत से यह कह रही हूँ ..
३० सितम्बर
आज सुबह '' प्रधानमंत्री '' में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की सभाएं देखकर अपने कॉलेज के दिन याद आ गए। वे ग्वालियर आनेवाले थे और उनकी सभा महारानी लक्ष्मीबाई महाविद्यालय में होना थी। घर से करीब ४/५ किलोमीटर दूर, उस समय के हिसाब से यह दूरी ज्यादा थी। मैंने अपनी कुछ सहेलियों को इस बात के लिए राजी किया कि सभा में जायेंगे। मेरा परिवार ग्वालियर के प्रतिष्ठित परिवारों में आता था, सो उनके घर से अनुमति मैंने खुद जाकर हासिल की, पर खुद अपने घर में काफी मशक्कत करना पड़ी। उन दिनों जब महिलाओं का अखबार पढ़ना समय की बर्बादी माना जाता था, हमारे घर पर अखबार आता था और माँ उसे पढ़ती थी, इसलिए लोकनायक कौन हैं ? यहाँ से शुरुआत तो नहीं करना पड़ी, पर वे एक युवा लड़की की माँ थीं । दस शंकाएं मन में थी। हम लोग कॉलेज में साड़ी पहनकर ही जाते थे। उस दिन के लिए अनुमति तो मिली पर इन हिदायतों के साथ ----
१ साडी का पल्लू दोनों कन्धों से नीचे नहीं होना चाहिए
२ बाल अच्छे से बांधकर जाना और चोटी पल्लू के अन्दर होनी चाहिए
३ काजल ज्यादा मत लगाना
४ जोर-जोर से हँसना मत
५ लड़कों से बात मत करना
६ सीधे घर आना
और ऐसी ही तमाम हिदायतें, पर हम पर जुनून ऐसा कि सब मान लिया और सुबह नौ बजे उनका भाषण था, तो घर से सात बजे ही तैयार होकर चल पड़े, पैदल-पैदल।
२९ सितंबर
केबीसी में बड़ी-बड़ी औरतें भी अमिताभ बच्चन के सामने कितना लड़ियाती हैं , इतराती हैं ....यह भी तो एक तरह का भ्रष्टाचार है
२३ सितंबर
जिजीविषा कैसी होती है और कैसे हर प्राणी में होती है, यह आज सुबह बड़े करीब से देखा। बहुत तेज बारिश हो रही थी। मैं छाता हाथ में लेकर बाहर निकली, पहले फाटक का ताला खोला, चाभी अन्दर रखी, फिर दूध की थैलियाँ उठाने बाहर गई, अन्दर आई, तभी अखबार आया, फिर से बाहर गई ....इस सारी कवायद में जाली का दरवाजा तीन / चार बार खोला, बंद किया, तो कुछ मच्छर अन्दर आ गए। चाय गैस पर चढ़ाकर आदतन फिर मैं जाली के दरवाजे से बाहर का नज़ारा देखने लगी ...तभी मुझे दरवाजे पर मच्छर भिनभिनाते दिखे ...वे दरवाजे की जाली से बाहर जाने की कोशिश कर रहे थे ...मैंने जैसे ही थोडा - सा दरवाजा खोला, वे फटाफट बाहर की ओर उड़ गए। इस दौरान किसी एक ने भी मुझे काटा नहीं ...बाहर जाकर शायद उन्होंने चैन की सांस ली होगी .....
२१ सितंबर
यदि मेरे परिवेश में कोई अर्चना पूरनसिंह या नवजोत सिंह सिद्धू जैसा हँसे तो लोग पकड़कर पागलखाने भिजवा देंगे
२० सितंबर
पितृपक्ष में अनेक लोग बहुत सारे काम नहीं करते , लेकिन लक्ष्मी को नहीं भूलते ...दफ्तरों में भी पन्द्रह दिन का अवकाश होना चाहिए ...आखिर लक्ष्मी की पवित्रता भी तो कोई मायने रखती है कि नहीं ?
१९ सितंबर
गरम-गरम खा लो ! यह कहना जितना सरल है, उसे अमल में लाना उतना ही कठिन। यह जब अब मुझसे कहा जाता है, तब समझ में आता है कि पिछले चालीस/ बयालीस वर्षों में मैंने ना जाने कितने लोगों पर , कितनी ही बार यह अत्याचार किया है।
१६ सितंबर
लम्बी तानकर सोने जैसा सुख नहीं , बशर्ते फोन की घंटी ना बजे , कुरियरवाला हस्ताक्षर लेने को बेताब ना हो , सब्जीवाले ने ये कसम ना खाई हो कि वह पूरी सब्जी बेचकर ही जायेगा , कोई कार चालक गाडी रिवर्स गियर में डालकर जल्दी से सीधा हो गया हो , पड़ोसी कहाँ गए हैं और कब तक लौटेंगे यह ज्ञान प्राप्त करने की अभिलाषा किसी के मन में जागृत ना हो , पंखा , एसी , इनवर्टर सब दुरुस्त हों , कोई चींटी मीठे की तलाश में इर्द-गिर्द ना हो , कोई कुत्ता भोंकने की साधना में लीन ना हो ,अचानक कोई कविता की पंक्ति सूझे और उसे लिखने की प्रबल इच्छा हिलोरें ना ले रही हो , पडौस का बच्चा भी आराम से सो रहा हो और पेट अच्छी तरह से भरा और जिव्हा तृप्त हो ...
लेकिन तब भी यह सुख नहीं मिलता , क्योंकि ऐसे सुन्दर समय में आँखों से नींद गायब ही रहती है ..
१४ सितंबर
फेसबुक पर यदि खाता खोला है , तो उसकी दीवार पर रोज चढ़ना एक सामाजिक दायित्व है ....!!
१० सितंबर
गुझिया के साथ मोदक जरुर बनाना !!!
तीज - त्योहारों पर जब भी गुझिया बनती, घर की बड़ी - बुजुर्ग औरतें ये ताकीद देती कि -- देखो मोदक जरुर बनाना ! लम्बे - चौड़े संयुक्त परिवार में कोई न कोई नौसिखिया रहती ही थी, जिसके हाथ से गुझिया टूटती और फिर उसका मोदक बनाना पड़ता, फिर भी चेतावनी तो दी ही जाती थी। एक बार मैंने नानी से पूछा - गुझिया के साथ मोदक बनाना क्यों जरुरी है ? वह बोली - बहनों के बीच भाई तो होना चाहिए। उसके बाद जब गणेश चतुर्थी आई तो मैंने नानी से पूछा - नानी एक गुझिया बनाना पड़ेगी न ? वह बोली -- अरे हट ! आज थोड़े ही गुझिया बनाते हैं। मैंने कहा - क्यों ? भाई के बीच बहन नहीं होना चाहिए ? नानी ने डपट दिया -- ज्यादा सवाल मत पूछा कर, तुझे ससुराल जाना है। बात आई - गई हो गई। मै छोटी से बड़ी और बड़ी से बूढी हो गई। कितनी ही बार स्त्री के पक्ष में लिखा, आवाज उठाई, झगडा मोल लिया, पर रूढिगत संस्कार अवचेतन में इतने गहरे तक उतरे हुए हैं कि मेरे मुंह से भी बरबस निकलता है -- गुझिया के साथ मोदक जरुर बनाना !!!
९ सितंबर
फेसबुक से एक फायदा तो हुआ ...हमारे जैसे ( पकाऊ , बुढउ ) काल बाह्य होने से बच गए।
७ सितंबर
लोग कहते हैं , जीने के लिए क्या चाहिए .... दो रोटी और थोडा - सा प्रेम ....मै लोगों से अलग हूँ , मुझे तीन रोटी और ढेर सारा प्रेम चाहिए ...
५ सितंबर
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृतां
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे
भगवन श्रीकृष्ण ने तब अर्जुन से यह कहा था , लेकिन अब कोई भगवान जन्म नहीं लेता , इसका अर्थ क्या यह हुआ कि हम एक अच्छे, बेहतरीन युग में जी रहे हैं ?
२८ अगस्त
जो व्यक्ति मां की सुनता है, पत्नी की नहीं उसे Mama's boy कहते हैं । जो पत्नी की सुनता है , मां की नहीं उसे जोरू का गुलाम कहते हैं, पर जो मां की भी नहीं सुनता , पत्नी की भी नहीं उसे क्या कहते हैं ?
२६ अगस्त
बच्चियों ! हमने गलती की, तुम्हें पढाया - लिखाया, तुम्हें कहा शिक्षा तुम्हें सब कुछ देगी, तुम आर्थिक रूप से सक्षम बनो, अवसरों को चुनो । हमने तुम्हारे मन में कहीं यह बात गहरे से उतार दी बेटियों ! कि हमारा जमाना अलग था अब तुम्हें शाम ढले घर आने की जरुरत नहीं है, गर्दन झुकाकर चलने की जरुरत नहीं है, हमने तुम्हें पंख दिए, उड़ना सिखाया, बताया तुम्हें कि हमें तो जमीन पर चलने की भी इजाजत नहीं थी, पर तुम्हारे सामने अनंत आकाश है,तुम हमारे लिए बेटे जैसी बेटी नहीं हो, तुम हमारी संतान हो, तुम एक इंसान हो, हमने तुम्हें गलत सपना दिखाया।
हमने तुमसे कहा समाज बदल रहा है, मुक्ति की सांस लो। यह तो बता दिया कि नजरिया बदल रहा है, पर यह बताना भूल गए कि नज़र वही है । बेटियों ! माफ़ करना । बच्चियों हमने तुम्हें आगाह नहीं किया, पर डटी रहना, पीछे बिलकुल नहीं हटना । अब खुद ही सीखो वह सब जो हम सिखा नहीं पाए, बन्दूक उठाओ , खंजर उठाओ , तलवार घुमाओ , विश्वास सब पर रखो , पर चौकन्ने रहकर , सजग रहो , बलशाली बनो । उठो ! उठो ! बच्चियों , बेटियों उठो ! जागो ! हाथ से सब कुछ छूट जाये , उसके पहले संभलो , पर रुकना नहीं , झुकना नहीं, डरना नहीं , बिलकुल भी नहीं ...
२३ अगस्त
गृहस्थी के लम्बे सफ़र में सबसे ज्यादा परेशान एक ही सवाल ने किया है --- शाम के खाने में क्या बनेगा ?...
२१ अगस्त
सोनी पर इन दिनों एक बेतुका विज्ञापन आ रहा है ....''एक औरत जो घर चलाती है , क्या वह देश चला सकती है '' ऐसा विज्ञापन दूसरे कार्यक्रम के लिए क्यों नहीं ? ....'' एक व्यक्ति जो अभिनय करता है , क्या वह किसी गेम शो का एंकर बन सकता है ''
२० अगस्त
आज अलसुबह गाय के रंभाने से नींद खुली। गाय का रम्भाना बहुत दिनों बाद सुना .लगा कि रम्भाना , चहचहाना , कूकना, फूलों पर मंडराना , काँव-काँव , बांग जैसे शब्द शायद हमारे शब्दकोश से बाहर हो जायेंगे ..
१९ अगस्त
डॉक्टर ने कहा आयरन की कमी है ... 70 रु किलो पालक लाने से तो लोहे के चने चबाना ज्यादा आसान है ...
१७ अगस्त
लेखकों के लिए यह एक आमदनी का जरिया हो सकता है .....एक बोर्ड टांगकर ----
१.यहाँ किफायती दरों में बयान बदले जाते हैं
२. सरल शब्दों का उपयोग आपकी क्षमता के अनुसार
३. हिंदी को रोमन में लिखे जाने की सुविधा
४. मेरे कहने का आशय यह नहीं था, मीडिया ने मेरे बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया है ,इसमें बाहरी ताकतों का हाथ है , जैसे बयान हमेशा उपलब्ध हैं
५. तैयार बयानों को मिनिटों में रुचिनुसार(कस्टमाइज),व्यक्तिगत (पर्सनालाइज) किये जाने की सुविधा
६. साल भर में १२ या उससे अधिक बार बयान बदलानेवालों को ५० % तक रियायत
७. आजीवन सदस्यता के फॉर्म भी उपलब्ध हैं , भुगतान किश्तों में बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के किया जा सकता है
८ अगस्त
अपने जीवन के उत्तरार्ध में माँ ने एक नियम बनाया था कि पूजा किये बिना वे कुछ खाती नहीं थी और नहाने और पूजा करने के बीच पानी भी नहीं पीती थीं .....मै फेसबुक पर एक चक्कर मारे बिना सोती नहीं हूँ और फेसबुक के दौरान अपना मेल-बॉक्स तक चेक नहीं करती ....समय-समय की बात है और क्या ?...
५ अगस्त
उल्हास नगर में लड़की पर गर्म घी फेंका ......मनोवृत्ति तो बदलने से रही ....अब क्या घी बेचने पर पाबन्दी लगायेंगे ?....
२८ जुलाई
मेहनत से पीठ और कमर भले झुक जाये ..... गर्दन तनी रहती है ...
१८ जुलाई
वह अपने दादाजी के साथ आई थी .....उन्होंने पोती से कहा - बेटा ! ये दादी हैं ... नमस्ते करो .... उसने बड़ी दृढ़ता के साथ ना में गर्दन हिलाई ....उन्होंने उसे अपनी गोद में ही दुलारते हुए फिर कहा -- ऐसे नहीं करते बेटा , नमस्ते करो ...उसने फिर नकार दिया , उन्हें शर्मिंदा होते देख मैंने कहा --- जाने दीजिये , आजकल के बच्चे तो हाथ मिलाते हैं .. क्यों है ना ? यह कहते हुए मैंने उसकी ओर हाथ बढ़ा दिया , उसने शेकहेंड किया , तो मैंने पूछा -- क्या नाम है आपका ... जवाब आया -- चेरी ...अरे वा स्वीट चेरी ? तपाक से जवाब मिला -- नहीं पिंक चेरी और जवाब के पूरा होते-होते मैंने उसका जैसे ही हाथ छोड़ा , वह तुरंत दादाजी की ओर मुड़कर बोली - दादा ! सेनितायजर... हम तो अभी भी अपने से बड़ों के पैरों में झुकते हैं और कई बार अक्षरश: जमीन छूकर चरण - धूलि लेते हैं ... कभी संक्रमण का खयाल तक नहीं आया और उस नन्हीं बच्ची को जरा-सा हाथ लगाया तो सेनीटायजर याद आ गया .... संस्कार भी कैसे-कैसे होते हैं ...
११ जुलाई
अक्सर हमें लगता है कि टीवी या फिल्मों में दिखाए जानेवाले अन्तरंग दृश्यों या हिंसा आदि को हम परिवार के साथ नहीं देख सकते , लेकिन हाल ही में मुझे एक साधारण दृश्य में भी यही अनुभव हुआ ...हम सास-बहु टीवी पर एक चर्चित मराठी सीरियल देख रहे थे .... घर का बेटा दुर्घटनाग्रस्त हो अस्पताल में पड़ा है, सास को लगता है कि बहु के साथ हुई चख-चख की वजह से बेटे का संतुलन बिगड़ा और वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया तब सास बहु से कहती है --- देख ! तेरा पति होने से पहले वह मेरा बेटा है , उसे कुछ नहीं होना चाहिए ... इसके पहले काफी लम्बे संवाद , बहु को सुनाते हुए .... वह सब कुछ नकली, ये मालूम होते हुए भी हम सास-बहु थोड़ी देर तक बेवजह एक दूसरे से नज़रें चुराते रहे ....
२ जुलाई
सुनो नानी की कहानी
सुबह आँख खुलते ही नानी ssss....के नाम की पुकार मचती और नानी की जगह मां को देखकर तुरत एक सवाल उछलता --- नानी गई क्या ? मासूमियत ऐसी कि दिनभर अपने आय . क्यू . का प्रमाण कई-कई बार देनेवाली के दिमाग में ये ख्याल नहीं आता कि नानी का सूटकेस यदि कमरे में है तो नानी जा कैसे सकती है ? फिर हर बात पर बस नानी ! पांच मिनिट। बेटा ब्रश कर ले , बस नानी ! पांच मिनिट, बेटा दूध पी ले , बस नानी ! पांच मिनिट, पांच मिनिट यानी समय चक्र का कौन-सा भाग , कालखंड का कितना हिस्सा यह भले न पता हो , पर इतना पक्का पता है कि नानी से पांच मिनिट की मोहलत याने माँ से पूरा अभयदान। फिर स्कूल के लिए दौड़-भाग। स्कूल जाने में कोई आना-कानी नहीं , कोई कोताही नहीं , पर नहाना है , नाश्ता करना है , तैयार होना है , हरेक के लिए बस, नानी ! पांच मिनिट ....नानी की दुनिया का एक अनमोल हिस्सा इन पांच मिनिटों पर न्योछावर ....
बाद में दिनभर डोरेमान , नोविता , शेनचिन जैसे कार्टून चरित्र , श्रेया , इरा , सखी , हंसिका , अक्षी जैसी तमाम सहेलियाँ ....नानी हलुआ ... नानी पिज़्ज़ा , नानी दाल - चावल , नानी पिंक ड्रेस , नानी ये, नानी वो ...नानी का पांच अंकों में खरीदा मोबाईल बेकार क्योंकि उसमें गेम्स डाऊनलोड नहीं किये हैं नानी ने .....ऐसे - ऐसे प्रश्न जिनका नानी के पास कोई जवाब नहीं ---- भगवान का घर यानी ? लोग भगवान के घर क्यों जाते हैं ? झोपडी में रहनेवाले बच्चे गरीब क्यों होते हैं ? आप मेरी माँ की माँ हैं तो पप्पा की क्यों नहीं है ? मै अकेली क्यों हूँ , मेरे भाई-बहन क्यों नहीं है ? आप जब स्कूल जाती थी तो आपको भी छुट्टी के बाद झूलाघर जाना पड़ता था क्या ? नानी आपकी आँख में पानी कहाँ से आता है ?
और नानी की आँख का पानी है कि रुकता ही नहीं है। गिरता है वहां से लौटकर भी , कस्टमर केअर पर , केवायसी पर , डेबिट - क्रेडिट के आंकड़ों पर , ट्रांजेक्शन की रकमों पर , माउस पर , चश्मे पर ...... नानी सोचती है कि टाइप करे -- TEARS..... और फिर उसे सिलेक्ट कर डिलीट कर दे , नानी का सारा क्रिया - कलाप हेंग हो जाता है ....नानी जानती है कि BALANCE करने के लिए TEARS की Entry Delete करना जरुरी है ....पर ....पर जड़ता टूटे तब ना ?.....
२९ जून
अपने बारे में तो ठीक, दूसरों के बारे में भी कुछ बोलने/कहने के लिए समय नहीं पा मिल रहा है ...😀
२६ जून
इन दिनों जैसे ही मै अपना नाम ''अलकनंदा '' बताती हूँ , लोग घबराकर पीछे हटने लगते हैं .....(उत्तराखंड त्रासदी के बाद )
२० जून
फेसबुक पर स्टेटस अपडेट भी एक तरह से एकांत साधना है .........
१७ जून
डॉक्टर लोगों के यहाँ ऐसे-ऐसे पोस्टर लगे रहते हैं कि लगता है सबसे ज्यादा बीमार हम ही हैं ....
१. चलते समय सांस तो नहीं फूलती ? आपके फेफड़ों में संक्रमण हो सकता है ( यहाँ तो हर समय ही साँस फूली रहती है , फिर ? )
२. आपको अवसाद तो नहीं होता , उदासी तो नहीं आती ? थायराइड की जाँच करवा लें ( अरे ! उदासी का क्या है, सुबह होती है, शाम तक चली जाती है, कभी रात को सोते समय घेर लेती है और उसके पीछे-पीछे कभी अवसाद भी आ जाता है और कभी तो थायराइड के बारे में सोचकर ही अवसाद हो जाता है )
३.आपका वजन तेजी से कम हो रहा है ? भूख ज्यादा लगती है ? आपको मधुमेह हो सकता है ( यहाँ तो सब उल्टा काम है, भूख भी लगती है और वजन भी बढ़ता है, मीठे से मोह तो छूटता ही नहीं है, कुछ न हो तो शकर और देसी घी के साथ रोटी भी चल जाती है )
४. और ढेरों डरावनी बातों के बाद " मै आपका इलाज करता हूँ, ईश्वर आपको स्वस्थ करते हैं"
७ जून
मुझे (हमें) नहीं पता पचास लोगों का खाना बनाना मुझे(हमें) कैसे आ गया , पर मेरे से(हमसे) काफी पहले इस दुनिया में आये मेरे(हमारे) पति कभी चाय का प्रबंध तक ठीक से नहीं कर पाए ...हे ईश्वर ! उन्हें माफ़ करना !!
२ जून
महोदया ६२ साल की और महोदय ७४ साल के। पिछले २० सालों से रिश्तेदारी में हैं। गाहे-बगाहे मुलाकात होती रही। महोदय हमेशा तारीफ के अंदाज़ में ही रहते थे। महोदया ने कभी ज्यादा ध्यान नहीं दिया, पर इतना वे समझती थी कि महोदय अनुरक्त हैं। इस बार एक पारिवारिक समारोह में एक हफ्ता साथ-साथ रहना पड़ा। महोदय उनके आगे-पीछे। उनकी साडी की तारीफ, उनकी चाय की तारीफ , उनकी ओर मौका लगते ही एकटक देखना आदि, आदि ...महोदया को एक हफ्ता बिताना एक साल जैसा लगा ...कहने लगी -- यही समझ नहीं आ रहा कि अब इस उम्र में रोऊँ या हँसू ? चीखूँ या चिल्लाऊँ ? खुश होऊं या गुस्सा करूँ ?????.... महोदया बोलते-बोलते आखिर में रो पड़ीं .
३० मई
शिक्षित लोगों का अभी सुशिक्षित होना बाकी है ...मोबाईल फोन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है....इसे कुछेक अवसरों पर कम्पन ध्वनि (Vibrate Mode) पर रखना चाहिए ....उसे अति विशिष्ट अवसरों को छोड़कर बंद नहीं रखना चाहिए... सार्वजनिक स्थानों पर अपनी आवाज को तेज नहीं होने देना चाहिए ...हो सके तो लोगों के बीच से कहीं और चले जाना चाहिए ....अत्यंत निजी बातचीत और स्थान के अलावा लम्बी बात नहीं करना चाहिए ..जैसी कितनी ही बातें हैं , जिनके लिए कोचिंग क्लास लगाई जा सकती है ...
कल एक महत्वपूर्ण बैठक थी और हमारे एक काफी वरिष्ठ अधिकारी संबोधित कर रहे थे .. मेरे नजदीक बैठी सहयोगी का मोबाईल बजने लगा ,(जिनका कार्यकाल करीब-करीब तीस वर्ष का हो चुका है ) वे बार-बार काट रही थी , हम आगे की पंक्ति में बैठे थे तो बोलना संभव नहीं था ..मैंने एक कागज पर उन्हें लिखकर कहा -- मेडम Vibrate Mode पर कर दीजिये , मैंने लिखकर उन्हें बताया लेकिन वे मेरे कान से लग गई --- मुझे नहीं आता . अधिकारी महोदय की नज़र हम पर पड़ना ही थी , सो पड़ी . मैंने उनका सेल उठा लिया ताकि मै उसका मोड बदल दूँ ... इतनी देर में वह ३/४ बार बज गया ... वे फिर मेरे कान से लग गई --- बेटी कर रही है , आज देर हो गई है न अपने को ? मैंने उन्हें हाथ के इशारे से रोकने की कोशिश की , पर वे बोलती रही कान में फुसफुसाकर ...आखिर में अधिकारी महोदय को कहना पड़ा ----What's the problem Madam ?....
२१ मई
आज कहीं पढ़ा ..अच्छा लगा ..
कोई फर्क नहीं पड़ता
कि मै स्त्री हूँ या पुरुष
मेरे पास एक पल था जो बीत गया
मेरे पांच शत्रु आज भी है
और मै भी हूँ .........
(पांच शत्रु --- काम, क्रोध , लोभ , मद, मोह )
१४ मई
न्यायालयों में उनके साथ नरमी बरती जाती है , जो आदतन अपराधी नहीं हो और राजनीती में उनके साथ , जो आदतन अपराधी हो।
६ मई
माँ यदि रसोई में बर्तन धो रही हो और उसी समय बेटा अपना कप या गिलास लेकर आये तो वह अपने हाथ का बर्तन माँ को पकड़ा देगा , पर यदि बेटी या बहु कुछ लेकर आयेगी तो तुरंत कहेगी -- माँ ! आप हटो , मै सब कर दूँगी .......(यहाँ दामाद को इसलिए छोड़ दिया गया है कि वह अव्वल तो कोई बर्तन लेकर रसोई तक जायेगा ही नहीं )
२ मई
सुनार की दुकान में हों तो लगता है कोई देख तो नहीं रहा ???
कार के शोरुम में हों तो लगता है कोई देख भी रहा है कि नहीं ??? 😁😁
१ मई
मां दिल से टूटती है और पिता शरीर से ......
२९ अप्रैल
पेरोल के कुछ घंटे बाकी !
कल फिर नौकरी की चाकी !!
२८ अप्रैल
इन दिनों जैसा कि अक्सर होता है, लोग अमूमन पूछ ही लेते हैं --सेवा निवृत्ति में अभी कितना समय बचा है ? उनके पिता आये थे, तो मैं उस परिवार से मिलने चली गई, वहां भी ये बात उठी। मैंने अवधि बताई तो पिताजी (करीब ८० वर्ष) कहते हैं --- आपने अब तक बहुत दौड़- भाग कर ली, बूढ़े सास-ससुर थे, बच्चे छोटे थे, सबका करते-करते उम्र निकल गई, आप व्यस्त भी बहुत रहीं। मेरी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, वे कहना क्या चाह रहे हैं ? मैं कभी सर हिलाकर, तो कभी हुंकार से, कभी जी, हाँ जी कहकर प्रतिसाद देती रही .. काफी देर बाद उन्होंने कहा - अभी से मंदिर जाने की आदत डाल लो, दो घंटे सुबह और दो घंटे शाम। नौकरी के बाद समय अच्छा कट जायेगा।
मै हतप्रभ -- मंदिर क्या समय बिताने के लिए जाते हैं ??
२७ अप्रैल
वैभव पुरोहित ने फिल्मों की बात छेड़कर कुछ बीते दिन याद दिला दिए। मै जब कॉलेज की छात्रा थी, तब मेटिनी शो हुआ करते थे यानी दोपहर में कोई पुरानी फिल्म और रात में नई। मैं और मेरी सहेली कई बार एक ही दिन में मेटिनी देखते थे और रात का शो भी। दो आँखे बारह हाथ, काला पानी, जागृति, बूट पॉलिश , प्यासा, कागज के फूल जैसी फ़िल्में मेटिनी की बदौलत ही देख पाए। सत्तर के दशक में एक प्रवाह था ''समानांतर सिनेमा", ये फ़िल्में रात को देखी। भाइयों के पीछे लगकर और उनकी सायकल के डंडे पर एक आगे और दूसरी पीछे करियर पर बैठकर जाते थे। आनंद, छोटी--सी बात, बावर्ची, मिली, आदि ''समानांतर सिनेमा" की फ़िल्में थीं। चेतना, दस्तक,चरित्र जैसी ए सर्टिफिकेट फिल्मों के लिए भाभियों की साड़ी पहनकर गए , ताकि बालिग़ लगे। उसी दौर की बात है , ग्वालियर में पहला इंडियन कॉफ़ी हॉउस खुला ( मै मूलत: ग्वालियर की हूँ) तो हम दोनों छुपते- छुपाते वहाँ गए थे और जीवन में पहली बार डोसा बहुत डरते-डरते खाया था ,एक डर तो यह कि यह कोई मांसाहारी व्यंजन तो नहीं और दूसरा कि कोई देख न लें। उस समय में होटल जाकर खाना अच्छे लक्षणों में नहीं आता था।
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पुरानी यादों को टटोलना अक्सर बुढ़ापे की निशानी होता है , तो क्या मै ?????
२७ अप्रैल
जब कोई आपसे मिलने के लिए आये और यह कहे कि वह पिछले २०/२२ साल से मिलने के लिए उत्सुक था, तो अपनी कलम के लिए यह वाक्य किसी ज्ञानपीठ या नोबल से कम नहीं लगता ....
२५ अप्रैल
आज एक चेनल पर त्रिशूल (१९७८) देख रही थी। उसमें पिता बने संजीव कुमार का अमेरिका से लौटे अपने पुत्र शशि कपूर से एक सवाल -- तू बार-बार कम्प्यूटर , कम्प्यूटर कह रहा है , यह होता क्या है ? शशि कपूर का उत्तर -- कम्प्यूटर एक ऐसी मशीन है , जिसके पास हर सवाल का जवाब होता है ...
२१ अप्रैल
हाथ की पुरानी तकलीफ उभरकर आई तो चिकित्सक ने कहा खेल सामग्री की दुकान से स्प्रिंग ले आइये और उससे हाथों की कसरत कीजीये , किसी और ने सुझाव दिया ताली बजाना भी एक अच्छा व्यायाम होता है ....
पहले बुढ़ापे में झांझ और चिपड़ी लेकर भजन किया जाता था, साथ में ताली भी बजाते थे ...कैसी अद्भुत जीवन शैली थी !
१७ अप्रैल
डी डी भारती पर तानसेन समारोह ग्वालियर की रिकार्डिंग दिखा रहे थे। पं.राजन-साजन मिश्र का गायन चल रहा था। पीछे तानपुरे पर बैठा युवक बेवजह मुस्कुरा रहा था। बरबस एक पुरानी याद आ गई। करीब चालीस साल पुरानी। तानसेन समारोह में विदुषी मालिनी राजुरकर का गायन था और मेरे गुरूजी ने मुझसे उनके साथ तानपुरा बजाने के लिए कहा। मेरी ख़ुशी छलक पड़ रही थी। कार्यक्रम समाप्ति के बाद वे मुझसे बोलीं -- छान वाजवलंस ( अच्छा बजाया ) एक प्रमाणपत्र मिल गया। उस समय न तो विडिओ रेकार्डिंग होती थी और न ही फोटो का प्रबंध करने की अक्ल थी ( और तब यह भी नहीं पता था कि भविष्य में फेसबुक नाम की कोई चीज अवतरित होगी ) बस ''छान वाजवलंस'' को ही लिए-लिए घूमती रही, कितने ही दिनों तक।
१५ अप्रैल
अपनी कमजोरियों को दूसरे के मुंह से सुनना , कभी - कभी सुखद भी होता है ..
१४ अप्रैल
अंकगणित का जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं होता .....जीवन तो रेखा गणित की तरह चलता है...कभी सीधी रेखा में ,कभी बिंदु की तरह ठहरा हुआ , कभी समकोण की तरह ,कभी अपनी ही परिधि में गोल-गोल घुमाते वृत्त की तरह . कभी आयताकार , कभी वर्गाकार , कभी त्रिभुज जैसा ,जिसकी एक भी भुजा समान नहीं होती ..
रेखागणित जैसा जीवन अपने-आप मिलता है ...अंकगणित साधना पड़ता है ..
१३ अप्रैल
अपने ही घर को परायी नज़र से देखना , सच्चे अर्थों में वानप्रस्थ है ....और वही हो नहीं पाता..
६ अप्रैल
कल सूर्यकान्त त्रिपाठी ''निराला'' के बारे में कुछ पढ़ रही थी...एक बड़ा ही रोचक प्रसंग पढ़ा ...निराला का जब विवाह हुआ, तब वे १४ वर्ष के और उनकी पत्नी मनोहरा १३ वर्ष की थी। तब वे प.बंगाल के एक छोटे गाँव महिषादल में रहते थे। महिषादल में प्लेग फैला तो मनोहरा को उनके पिताजी अपने गाँव डलमऊ ले गए। निराला को ये अच्छा नहीं लगा , वे भी डलमऊ पहुँच गए। निराला ने इतनी कम उम्र में कई ग्रन्थ पढ़ डाले थे तो पत्नी मनोहरा भी कम नहीं थी। एक दिन 'बांग्ला और हिन्दी' की श्रेष्ठता को लेकर दोनों में खूब बहस हुई। निराला ने बहस का अंत न देखकर गुस्से में कहा - हमें स्त्री जाति से घृणा है और उठकर चले गए।
थोड़ी देर बाद भोजन का समय हुआ। खाना खाने के दौरान मनोहरा ने उन्हें पानी नहीं दिया। मां ने पूछा, तो मनोहरा ने जवाब दिया -- इन्हें स्त्री जाति से घृणा है। मै स्त्री हूँ। बावड़ी स्त्री है। गंगा स्त्री है, तो पानी कहाँ से लाऊं ?
नाराज होकर निराला , बिना हाथ धोये , बिना पानी पिये , एक कि.मी. दूर सरजूपुर ताल गए और पानी पीकर आये।
१ अप्रैल
ये साड़ी भी क्या चीज है ? ..कमतरी के दिनों में दिन में लिबास होती है, रात में बन जाती है ..लिहाफ
३१ मार्च
सजा ''भोगते'' हैं या ''भुगतते'' हैं ???
इन दिनों संजय दत्त को मिली सजा चेनल्स पर छाई हुई है , अधिकांश यह कह रहे हैं कि उन्होंने डेढ़ साल की सजा पहले ही ''भोग'' ली है .....ऐसा ही कई बार अख़बारों में भी छपा है और दूसरे सन्दर्भों में भी इसका इस्तेमाल होता रहता है .......अकेलेपन की सजा ''भोग'' रहे बुजुर्ग......वैधव्य ''भोग''रही महिला .....भाषा की अति शुद्धता का ध्यान ना भी रखें , तो भी कम से कम अर्थ का अनर्थ तो ना होने दें ....
२९ मार्च
किसी चीज के घटने से दुःख होता है और बढ़ने से ख़ुशी होती है , पर दवाइयों और उम्र के बारे में ऐसा नहीं है ...जैसे-जैसे दवाइयों की संख्या बढ़ती है, वैसे-वैसे '' एक दिन और कट गया '' यह सोचकर ख़ुशी होती है ...
२७ मार्च
हर बार यह सुनने में आता है कि अब त्योहारों में मज़ा नहीं आता ...वह बात नहीं रही ....रहेगी भी कैसे ? हम 24 *7 *365 दिन मिठाई खाते हैं....जब मन हुआ या जब भी बाज़ार गए , कपडे खरीद लाते हैं...पूजा-पाठ के लिए हमारे पास समय नहीं है/ रूचि नहीं है ...रिश्तेदार हमारे यहाँ नहीं आते/ हम उनके यहाँ नहीं जाते ....और फिर हम न तो चन्दा खोर है , न हुड़दंगी है …
२६ मार्च
एक स्वनामधन्य पत्रकार मोहतरमा हैं . हमेशा बन्दुक की दुनाली पुरुषों की ओर ...पत्रकार हैं तो कुछ पत्रकारों की तरह उन्हें भी गुमान है कि वे सब जानती हैं ....लेकिन शायद अभी कन्या है, इसलिए नहीं जानती कि स्त्री पुरुष का रिश्ता सिर्फ ''उस क्रिया'' तक सीमित नहीं है ,...एक सुखमय जीवन के लिए दोनों एक दूसरे के लिए आवश्यक हैं ...१६ दिसम्बर के बाद से तो उन पर उन्माद छाया हुआ है ...लगातार पुरुष विरोधी स्टेटस ....
अब उन्होंने एक नया फतवा जारी किया है ...स्त्रियों के सौन्दर्य उपचारों को लेकर ....ब्यूटी पार्लर का विरोध तो फिर भी समझ में आता है , किन्तु उबटन (फेशियल), मेनीक्योर , पेडिक्योर का विरोध समझ से परे हैं ...बाकायदा सांख्यिकीय विश्लेषण किया गया है कि किसमें कितना समय बर्बाद होता है ... सौन्दर्य उपचार बेशक न करें क्योंकि वे मानती हैं कि यह सब पुरुषों के लिए हैं ...पर इन सारी विधियों से सफाई भी होती है ...यह जानकारी शायद उनके ज्ञान कोष में नहीं है...
२४ मार्च
गुलामी के उन दिनों में कितने सारे असाधारण व्यक्तित्वों से संपन्न था हमारा देश....और आजाद भारत व्यक्तियों के बौनेपन से विपन्न हो गया है ...
२३ मार्च
मेरी बेटी जब छोटी थी तब हमारे यहाँ भी यु.पी.ए. की सरकार थी, याने संयुक्त परिवार था। बड़े परिवार की वजह से रिश्तेदारों की आमद भी रहती थी। सुबह परिवार के सदस्यों और बाहर से आये रिश्तेदारों के घर से निकलने का समय हुआ करता था। मेरी बेटी हरेक साथ जाने के लिए तैयार रहती थी, तब उसे कोई ना कोई गोद में लिए बहलाता था। कोई उसे फूल दिखाता, कोई तितली, कोई आसमान में उड़ता हवाई जहाज। यदि ज्यादा जिद करती तो बिस्किट, चॉकलेट , वगैरा का भी लालच दिया जाता ..बस उद्देश्य ये रहता कि उसका ध्यान मूल समस्या से हट जाये ...
हमारी सरकारें हमें ऐसे ही बच्चा समझती आ रही है .....पूरे तिरेसठ साल से ....
१८ मार्च
हमारी पीढ़ी याने एक डरपोक पीढ़ी ....संस्कारों के नाम पर अपने-से बड़ों के आगे हमेशा गर्दन ''झुकाकर'' हाँ ही कहा और अपने से छोटों को कुछ कहना ही नहीं चाहते ...ऊपर से तुर्रा यह कि ---- वे सुनेंगे क्या ? क्यों नहीं सुनेंगे ? कहकर तो देखें ...या तो आपको अपनी बात पर यकीन नहीं है या फिर अपने संस्कारों, अपने खून पर ..यह सही है कि नए लोग हाँ में हाँ नहीं मिलाते , पर उनके लिए ये कहना कि ''वे सुनेंगे क्या ?'' सरासर ज्यादती है ....मेरा अनुभव तो हमेशा अच्छा रहा है ...युवा लोग न सिर्फ आदर से, ध्यान पूर्वक सुनते हैं , बल्कि अनुसरण भी करते हैं ....वे पता नहीं क्या प्रतिक्रिया देंगे यह सोचकर चुप रहना नितांत गलत है ....आखिर अच्छा/बुरा उन्हें हम नहीं बताएँगे , तो कौन बताएगा ... उनकी आधी जिन्दगी अनुभवों से सीखने के लिए व्यर्थ जाने दें ?
१७ मार्च
यह एक दिन भी कर लो तुम तुम्हारे ही नाम
और जीने दो मुझे जीवनभर
मनुष्य की तरह !
७ मार्च
हाल ही में मेरी २ किताबें छपीं। उसके बाद कुछ विशिष्ट अनुभव मुझे आया। किताबों पर अधिकांश महिलाओं ने टिप्पणी दी और वह भी त्वरित। अधिकांश पुरुषों ने कोई राय नहीं दी। उन्होंने भी नहीं , जिन्होंने साग्रह मुझसे किताब/किताबें मांगी थी। अधिकांश पुरुषों ने तो उन्हें किताब मिली या नहीं ये बताने की जहमत भी नहीं उठाई , सिर्फ दो पुरुषों ने अपना मत जाहिर किया। स्वाभाविक रूप से तारीफ़ की ( सिर्फ तारीफ़ मुझे अपेक्षित नहीं थी, फिर भी ) और दोनों ने साथ में यह भी जोड़ा कि मेरी कविताओं में स्त्री का दुःख प्रमुखता से है और वह बहुत प्रभावी तरीके से मेरी कविता में आता है ..लेकिन… लेकिन पुरुष के भी अपने दुःख होते हैं, और मुझे कुछ व्यापक होकर उनके बारे में भी लिखना चाहिए ...
1 .मै मानती हूँ कि मनुष्य होने के नाते पुरुष के अपने दुःख होते होंगे / होते हैं, पर ये मेरी समझ से परे है कि पुरुष अपना रोना खुद क्यों नहीं रो सकता और रोता भी है तो विरह प्रेम भंग तक ही क्यों सीमित है ?
2. मै यदि स्त्री होने के नाते अपना दुःख व्यक्त करती हूँ तो संकुचित कैसे हो गई ?
3 . मै यदि अपनी जमात के बारे में नहीं बताऊंगी तो दूसरों को पता कैसे चलेगा ?
३ मार्च
उस दिन माली ने कहा कि वह १५ दिन की छुट्टी पर जा रहा है, तो सबसे पहले यह सवाल मन में उठा कि अब पौधों को पानी कौन देगा ? उस हफ्ते धूप भी काफी तेज हो गई थी , निकम्मा हो गया एक हाथ ज्यादा कुछ करने नहीं देता और महाराष्ट्र साहित्य सभा इंदौर का शारदोत्सव, फिर भोपाल में मराठी साहित्य संघ का प्रांतीय सम्मलेन ....तमाम व्यस्ततायें ....शारदोत्सव समाप्त हुआ और मै सोच ही रही थी कि अब दूसरे दिन सुबह किसी तरह पानी डाल ही दूँगी, पर रात को ही तमाम गर्जनाओं के साथ धूम-धाम से पानी बरस गया, मेरा छोटा-सा बगीचा निहाल हो गया ........फिर कल लगा कि पत्ते मुरझा रहे हैं तो कल फिर रात भर बारिश .....
मुझे अचानक माणिक वर्मा का गाया पुराना मराठी गीत याद आ गया -----कबीराचे विणतो शेले , कौशल्येचा राम बाई, कौशल्येचा राम.......इस गीत में यह कल्पना की गई है कि कबीर चूँकि जुलाहा थे तो उनका ''शेला'' (उत्तरीय) बुनने का काम स्वयं भगवान श्री राम पूरा कर देते थे ....
भगवान को इस युग में भी दया आती है, वे मेरे बगीचे में बारिश बनकर आये ..
१२ फरवरी
जब हम छोटे थे, हमसे बड़े कहते थे हमारी बात सुनो, क्योंकि तुम्हे अभी कुछ पता नहीं है।हम भी उनकी बात मान लेते थे , क्योंकि उनके पास अनुभवों की थाती थी। अब छोटे कहते हैं हमारी बात न सिर्फ सुनो , बल्कि उसे समझने की कोशिश करो, क्योंकि वे जानकारियों के मामले में, तकनीक के मामले में अद्यतन हैं, उन्हें हमारे अनुभवों की जरुरत नहीं हैं।
तकनीक इस सूक्ति को गलत साबित कर रही है ..I am only 16 years old with 44 years experience ....
Now I am only 16 years old with zero valued 44 years experience.
२४ जनवरी
मराठीभाषी परिवारों में मकरसंक्रांति पर नई बहु के लिए काली साड़ी खरीदी जाती है। साल भर के सारे त्योहारों पर अलग-अलग और सुहाने रंग के साथ एक त्यौहार पर काला रंग नई -नवेली को शायद यह समझाने के लिए कि जीवन रंग-बिरंगा होता है, सुन्दर होता है, साथ ही इसमें कभी उदासी, दुःख भी आ सकता है, जिसे आज की भाषा में ग्रे कलर कहा जाता है ।
हमारे इलाके में यह माना जाता है कि मराठीभाषी महिलाएं बहुत मजबूत होती हैं, इसके पीछे संभवतया यही तथ्य हो।
१४ जनवरी
''तिळ-गुळ घ्या, गोड -गोड बोला''
मराठीभाषी परिवारों में संक्रांति का त्यौहार लम्बे समय तक मनाया जाता है, मकर संक्रांति से रथ सप्तमी याने वसंत पंचमी के तीसरे दिन जो सप्तमी आती है उस दिन तक। मकर संक्रांति के दिन कन्यायें और विवाहिताएँ ( निश्चित ही सुहागिन, तथाकथित प्रगतिशील समाज में भी) ' नई फसल की सारी चीजें ......गन्ने की गिन्डोरी , हरे चने, मटर, गाजर,चावल और मूंग की दाल मिलाकर कच्ची खिचड़ी, तिल-गुड के लड्डू आदि 'सुगड''(मिटटी के मटकेनुमा कुल्हड़) में रखकर एक दूसरे को देती हैं , साथ ही एक किसी चीज का दान किया जाता है। आजकल प्लास्टिक से बनी फेंसी चीजों का चलन है, पर पहले मुख्य रूप से नई फसल की इन्हीं चीजों में से किसी एक का दान किया जाता था। एक महिला के लिए ''सुगड'' सिर्फ पांच खरीदे जाते थे , जो उसी दिन दे दिए जाते थे, बाकी पूरे महीने जो भी महिला घर पर आती उसे हल्दी-कुंकुम लगाकर दान वाली चीज दी जाती और उसे तथा उसके साथ आये पुरुष, बच्चों को तिल - गुड के लड्डू दिए जाते थे और कहा जाता था ''तिळ-गुळ घ्या, गोड -गोड बोला'' यानि तिल -गुड खाओ मीठा बोलो। यह एक रस्म की तरह प्रचलित था। परिवार के, रिश्ते के, परिचय के सभी बड़ों से तिल -गुड आशीर्वाद स्वरुप मांगकर लिया जाता था। यदि किसी वर्ष कोई किसी के घर नहीं जा पाया तो बाकायदा उसकी खोज-खबर ली जाती थी और उसके लिए तिल -गुड बचाकर रखा जाता था। ....
अब ये सारी बातें एक दिन में और अपने परिवार तक सिमट कर रह गई हैं। अब छोटों को तिल -गुड मांगने में शर्म आती है और बड़े भी बाँटने में हाथ खींच लेते हैं। संबंधों में ना तो तिल का स्नेह है और ना ही गुड की मिठास ...
१३ जनवरी
लड़के लेंगे अपना हक़ , भूलो मत , भूलो मत ! ....आज करो अभी करो, वर्ना कुर्सी छोड़ दो ! ....
ट्रेड यूनियन के ज़माने में ऐसे नारे खूब लगाए, इनसे एक जोश एक आशा जगती थी। उसके भी पहले जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति, अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन ....और पीछे जाये तो नेहरूजी का पंचशील का सपना ....कितनी उम्मीदें थी, कितना विश्वास था, .....पर इतने लम्बे रास्ते के बाद एक गहन खामोशी, गहन चुप्पी , लगता है सारे सपने जो मेरी पीढ़ी ने देखे थे ....व्यर्थ हुए ....
और फिर याद आते हैं पाश .....सबसे खतरनाक है सपनों का मर जाना .....
एक गीत था बचपन में बड़े जोश से गाते थे--- हम लाये हैं तूफानों से कश्ती निकाल के ......
अब शायद वह गीत ऐसे बनेगा -----हमने धकेल दी है कश्ती तूफानों में / तुम इसे सम्भालो चाहे झोंक दो भाड़ में ...
१० जनवरी
आज एक वाहिनी पर बहस चल रही थी, तमाम बड़े-बड़े वकील थे और उनसे पूछा जा रहा था कि आरोपी किन मुद्दों पर बच सकते हैं ? इस तरह के मुद्दे सार्वजनिक किये जाने की क्या जरुरत है ?.....लगता है कि एक को नाबालिग घोषित करने के बाद , दूसरों को भी बचाने की अन्दर ही अन्दर तैय्यारी चल रही है। यदि किसी की उम्र कम है लेकिन उसने काम तो वहशी और बालिग जैसा किया है तो क्या उसे माफ़ करना चाहिए ? हम घरों में तो बच्चों को डाँटते हैं ---जरा--सा है पर अक्ल तो देखो ! लेकिन न्यायालयों में सब कुछ तरीके से होगा .....हाय कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट,दया याचिका ...और लोकतंत्र ..
२ जनवरी
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