सम्भावित लहर के दृष्टिगत इंदौर में रात का कर्फ्यू लगा हुआ है और कल दिन में रणजीत हनुमान अष्टमी महोत्सव में हजारों की संख्या में लोग सम्मिलित हुए। 😥
सही भी है - तुम रक्षक हो, काहू को डरना ।
२८ दिसंबर
Thankew antiji, अंग्रेजी का हिन्दीकरण। जैसा बोला, वैसा लिखा।
२१ दिसंबर
ये मिठाई के दुकानदार सबको कम मीठी मिठाई क्यों खिलाते हैं ? मोतीचूर के लड्डू क्या कम मीठे खाने की चीज है ? हमने तो एक किलो बेसन के लिए पौने दो/दो किलो शकर की चाशनी के साथ रसीले लड्डू खाये हैं। अब तो शायद एक किलो बेसन के लिए एक किलो भी शकर नहीं लेते हैं। एकदम फीके, बेस्वाद लड्डू 🙄🙄
१७ दिसम्बर
#पढ़ते #पढ़ते
यह वांछनीय है कि जीवन नौका धन रूपी पानी पर चले, लेकिन नाव में पानी जमा नहीं करना चाहिए ,अन्यथा नाव डूब जाएगी।
----डॉ. आनन्द नाडकर्णी, मनोचिकित्सक एवं प्रसिद्द मराठी लेखक
१३ दिसम्बर
बची हुई रोटी जो सड़क पर फेंक देते हैं, उनसे बड़ा वीतरागी कोई नहीं हो सकता है। मुझे उनसे ईर्ष्या होती है। उन्हें जीवन में कभी भी मोह-माया नहीं सता सकते।
१० दिसम्बर
आता कोणी न्हाणं धुणं, पावडर कुंकू, वेणी फणी करतं का ?
८ डिसेंबर
सावधान ! ये तीन चीजें भूलकर भी फ्रीज में न रखें।
सावधान ! रात के खाने में ये कभी भी नहीं खायें।
सावधान ! यदि आप रोज केला, पपीता (कुछ भी हो सकता है ) खाते हैं तो पहले ये जान लें।
आजकल गूगल पर कुछ ढूँढना हो तो पहले ऐसी चेतावनियों से पाला पड़ता है। विद्यार्थी दशा में 'सावधान' 'विश्राम' कई कई बार करते थे, लेकिन अब इतनी बार सावधान सावधान देखकर मैं पहले ही विश्राम अवस्था में चली जाती हूँ।
८ दिसम्बर
जयपुर घराने के कथक गुरू ८२ वर्षीय डॉ. पुरु दाधीच नृत्य के विद्वान् कलाकार और कुशल अध्यापक हैं। कथक नृत्य की सर्वप्रथम प्रामाणिक पाठ्यपुस्तक उनके द्वारा लिखी गयी है, जो आज भी देश विदेश के विश्वविद्यालयाओं में इस्तेमाल की जाती है। उन्होंने अब तक नृत्य विषय में १४ किताबें लिखीं हैं और उनके द्वारा लिखित अनगिनत शोध प्रबंध प्रकाशित हुए हैं । डॉ. पुरु दाधीच विश्व के सर्वप्रथम कथक नृत्य संगीताचार्य (Doctorate of Music) हैं।
इतना सब होते हुए भी वे अत्यंत सरल स्वभाव के और मृदुभाषी हैं। वे मेरे शहर में रहते हैं और लगभग चार दशकों से उनसे वैयक्तिक परिचय है। नृत्य के प्रति उनकी आस्था और समर्पण को करीब से देख पाने का सुअवसर मिलता रहा है।
इतने वर्षों की कड़ी साधना के बाद अब उन्हें पद्मश्री के योग्य समझा गया ।
कंगना का ऐसा क्या योगदान रहा है, जो इतनी जल्दी पद्मश्री से विभूषित की गयी ?
१२ नवम्बर
समाचार माध्यमों की चिन्ता अब भी वही है, लेकिन सोच बड़ी हो गयी है। पहले नन्हे तैमूर के बारे में जानकारी मिलती थी कि ये खाया, वह पहना। अब आर्यन छाया रहता है।
२० अक्टूबर
दो दिन पहले फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप बन्द थे। आज जियो बन्द रहा। सारा लिखा-पढ़ा, सहेजा हुआ, सब बेकार । कुल मिलाकर यह समझ आया कि कागज और कलम जैसा अक्षुण्ण कुछ नहीं।
हो सकता है कि कागज की अत्यधिक खपत के कारण पर्यावरण सुरक्षा के दृष्टिगत, अगली पीढियाँ फिर देवदार वृक्षों की ओर लौट जाय और अगले जन्म में हम पोथी पढ़ते दिखायी दें।
६ अक्टूबर
विगत ३६ वर्षों से प्रकाशित प्रतिष्ठित मराठी द्वैमासिक #कविता #रती में कविताएँ प्रकाशित। मेरे लिये अत्यंत गौरव का क्षण है। प्रकाशन के लिए कविताएँ भेजने के मामले में मैं बहुत आलसी हूँ, लेकिन वरिष्ठ कवि Kapur Wasnik जी ने साधिकार आग्रह के साथ कविताएँ भिजवायीं और वे प्रकाशित हो गयीं।
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=4269888213066103&id=100001348988975
१४ सितम्बर
जिन्हें हिन्दी की वास्तव में चिन्ता है, इस पटल पर अपना नाम तो कम से कम हिन्दी में लिखें।
१४ सितम्बर
हिन्दी के एक जाने माने विद्वान हैं। उन्होंने आज लिखा कि हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ बनाकर उसे हिन्दी प्रेमियों से दूर कर दिया गया है।
हिन्दी के लिए इस तरह कहा जाना एक लम्बी अवधि से जारी है। मेरी अल्प मति में कभी यह बात नहीं आयी कि एक ही अक्षर के अलग-अलग उच्चारण, किसी शब्द में कोई अक्षर लुप्त (सायलेंट) आदि नियमों के साथ अन्य भाषा ग्राह्य है तो संस्कृतनिष्ठ हिन्दी (हिंदी नहीं) क्लिष्ट कैसे ?
१४ सितम्बर
सन २०१२ में बनी अरबी फिल्म वाज़दा (Wadjda) देखी। एक किशोरी की बेहद खूबसूरत दास्तां है। बात इतनी-सी है कि उसे एक सायकल चाहिए और इस बहाने अरब की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक सारी व्यवस्थाओं की जानकारी मिल जाती है। सायकल के लिए पैसे बचाने/जुटाने के लिए उसके प्रयास और संघर्ष को बहुत सादगी से दिखाया गया है। दृश्य दर दृश्य हिन्दी फिल्में याद आती हैं और बरबस तुलना होने लगती है। न कोई अति भावुक दृश्य हैं, न नेपथ्य में तेज आवाज में संगीत है। अरब की लड़कियाँ भी लंगड़ी खेलती हैं, यह देखकर अपनापा लगा। कुरआन की सस्वर प्रस्तुति का संगीत हमारे शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत का स्मरण करवाता रहा। एक और बात नयी पता चली कि वहाँ भी मासिक धर्म के दौरान अलग व्यवहार किया जाता है। लड़कियाँ कुरआन को सीधे छू नहीं सकती, लेकिन हाथ पर टिश्यू पेपर लपेटकर पढ़ सकती हैं। यह मजेदार लगा। बाकी सब तो देखकर ही अनुभव किया जा सकता है । फिल्म नेटफ्लिक्स पर अंग्रेजी उप संवाद के साथ उपलब्ध है।
१३ सितम्बर
आपका नाम ?अलकनंदा साने ? महाराष्ट्रीय? रा. स्व. संघ से जुड़ी होंगी ? चित्पावन हैं? तब तो निश्चित ही गोडसे समर्थक , पक्का । आप काँग्रेस या काँग्रेस के किसी नेता के विरोध में लिखती हैं ? तब तो भाजपा की आजीवन सदस्य भी होंगी। ऐसा कुछ भी नहीं है ? हो ही नहीं सकता। भाजपा के विरोध में भी लिखा है आपने ? अच्छा ? हमने तो कभी नहीं देखा।
आप इंदौर से हैं ? इंदौर तो बड़ा शहर है। स्त्रियों को पर्याप्त स्वतंत्रता होगी, फिर भी आप स्त्रियों की खराब स्थिति को लेकर ही कविताएँ लिखतीं हैं? पुरूष विरोध ही क्यों ? जरूर आपकी वैयक्तिक समस्या होगी। पुरूषों और अन्य विषयों पर भी लिखीं हैं ? हमने तो नहीं पढ़ी।
वैसे आपका रूझान समझ में आता है। आपको सारे लोगों, सारे विषयों पर लिखना चाहिए।
क्या कहा ? हम भी दायरे में लिखते हैं ? यह तो सरासर आरोप है।
अच्छा, चलिये ! छोड़ दीजिये। फेसबुक को इतनी गम्भीरता से लेने की क्या जरूरत है ?
१३ सितम्बर
कल नेटफ्लिक्स पर LION देखी। खण्डवा (म.प्र.) से गुम हुये पाँच वर्षीय एक भारतीय बच्चे की सच्ची कहानी है, जो ऑस्ट्रेलिया के एक दम्पत्ति द्वारा गोद लिया जाता है। बच्चा बड़ा हो जाता है, लेकिन अपनी माँ, अपने भाई को भूल नहीं पाता है। उसकी मनोदशा देखकर बार-बार आँख भर आती है। तीस वर्ष बाद सन २०१२ में वह भारत आकर अपने मूल परिवार को ढूँढ लेता है। बहुत मार्मिक फिल्म है। वैसे ही फिल्मायी गयी है। कहानी की गति और स्वाभाविक अभिनय, रात दो बजे तक फिल्म देखते रहने को बाध्य करते हैं । फिल्म किसी ऑस्ट्रेलियाई कम्पनी ने सन २०१६ में बनायी है। फिल्म का शीर्षक LION क्यों है ? यह अन्त में समझ आता है। एक दुखद जानकारी भी मिलती है कि हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग ८०००० बच्चे अपने परिवार से बिछुड़ जाते हैं।
आधे-आधे हिस्से में संवाद हिन्दी और अंग्रेजी में हैं। हिन्दी संवादों के उप संवाद अंग्रेजी में उपलब्ध हैं, लेकिन अंग्रेजी संवाद हिन्दी में नहीं हैं। कारण स्पष्ट है। अंग्रेजी तो हमारी मूल भाषा है, वह सबको आती है। मैं तो अनपढ़ हूँ, सो पात्रों के अभिनय के बूते सिर्फ दृश्य देखकर सन्तोष कर लिया।
बहरहाल फिल्म देखी जाना चाहिए।
३० अगस्त
आज सुबह दादी का एक दाँत बलि चढ़ गया। चार साल की पोती समझ नहीं पा रही है कि ऐसा कैसे हुआ ? माँ तो कहती है कि चॉकलेट खाने से दाँत खराब होते हैं और दादी तो मुश्किल से साल में एक-दो बार चॉकलेट खाती है। सुबह से इसी दुविधा के साथ गहन चिंतन और शोध कार्य चालू है। दादी को बार-बार मुँह खोलकर दिखाने के लिए कहा जा रहा है। बचे हुए दाँतों में शायद कहीं चॉकलेट का कोई कण हो और 'युरेका, युरेका' चिल्लाने का अवसर मिल जाय। देखते हैं क्या होता है !
२४ अगस्त
बहुत सारे अख़बारों में/ सामाजिक माध्यमों पर स्वतंत्रता दिवस का ७५ वां वर्ष शुरू होने के उपलक्ष्य में चिह्नित/ अचिह्नित स्वातंत्र्य सेनानियों के बारे में कुछ न कुछ प्रकाशित किया गया।
१.उनमें से जो अख़बार मैंने देखे उनमें कुछ बातें विशेष तौर पर अनुभव हुई -- स्वातंत्र्य वीर सावरकर को अनुल्लेखित किया गया। सावरकर के विरोध में बार-बार यह प्रचारित किया जाता है कि उन्होंने माफीनामा दिया था। इसके साथ में हेतु पुरस्सर यह भुला दिया जाता है कि वह श्रीकृष्ण की तरह उनकी कूटनीति थी। दूसरी बात यह भी है कि जिन राजनयिकों को स्वतंत्रता प्राप्ति का श्रेय दिया जाता है और जिनके साथ सावरकर की तुलना की जाती है , क्या उनमें से किसी एक को भी काले पानी की सजा हुई थी ? क्या उन्हें दो-दो आजीवन कारावास का दण्ड भुगतना पड़ा था ? क्या किसी को कोल्हू के बैल की तरह जुतना पड़ा था ?
इसके विपरीत वे सारे तत्कालीन पंचतारांकित सुविधाओं के साथ जेल में रहे थे। सावरकर को तो लिखने के लिये कलम दवात तक नहीं थी और उन्होंने दीवारों पर काव्य रचा।
२.उपरोक्त अख़बारों में सावरकर के साथ ही लोकमान्य तिलक,चाफेकर बंधु, वासुदेव बळवंत फडके, तात्या टोपे, जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की भी उपेक्षा की गयी। जबकि अन्य प्रदेशों के स्वतंत्रता सेनानियों को ढूंढकर छापा गया। जिन्हें छापा गया, उनके प्रति नितांत आदर है। अत्यंत छोटी आयु में कारावास या छाती पर गोली झेलना, फाँसी पर झूलना निश्चित ही आसान नहीं है, लेकिन एक प्रदेश विशेष की जानबूझकर उपेक्षा की जाना अत्यंत निन्दनीय है।
३. गलीज़ विचारधारा का आलम यह कि फेसबुक पर रवीश कुमार के एक आलेख पर एक पत्रकार की टिप्पणी में विभाजन के लिये जिम्मेदारों की सूची में लोकमान्य तिलक और सावरकर को भी जोड़ा गया, जबकि लोकमान्य तिलक की तो १९२० में ही मृत्यु हो गयी थी और सावरकर की आँखों में आजीवन "अखण्ड भारत" का स्वप्न था। पत्रकारों को तो कम से कम तथ्यात्मक टिप्पणी करना चाहिये। बहुतेरे लोगों को आज भी पत्रकारों के ज्ञान पर भरोसा होता है।
१७ अगस्त
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक की अध्यक्षता करेंगे।
१७ जनवरी १९४६ को स्थापित सुरक्षा परिषद की बैठक की अध्यक्षता करनेवाले वे पहले भारतीय प्रधानमंत्री होंगे। इसके अलावा एक पहलू यह भी है कि चीन और पाकिस्तान पर दबाव बढ़ेगा तथा सीमाओं पर होनेवाले हमले और उनसे फैलने वाली अशान्ति भी कुछ सीमा तक प्रतिबन्धित हो सकती है।
सारी असहमतियों को भुलाकर इस बात पर गर्व अनुभव किया जाना चाहिए।
९ अगस्त
पौ फटते-फटते चिड़ियों की आवाज़ आने लगती है। सबसे पहले और काफी देर तक एक ही चिड़िया बोलती है। धीरे - धीरे चहचहाहट से पूरा आकाश गुंजायमान होने लगता है। इस बीच करीब पन्द्रह-बीस मिनट निकल जाते हैं।
बाद में आने वाली चिड़िया, सबसे पहले जागने वाली चिड़िया के बारे में यह सोचती होगी कि क्या करना है इतनी जल्दी उठकर ? न खुद सोती है और न ही हमें सोने देती है !
२७ जुलाई
अब फेसबुक पर भी आधार कार्ड जरूरी कर देना चाहिए।
मेरे पास एक मित्रता अनुरोध आया है। नाम है -- दैत्य संशय 🙄
कैसे स्वीकार किया जा सकता है ?
१९ जुलाई
आता मुली लाजतात का ? लाजताना 'इश्श्य' म्हणतात का ? 😁😁😁
१९ जुलाई
कल रात एक मच्छर बड़ी देर तक आसपास भिनभिनाता रहा। मैंने दो-तीन बार उसे हाथ से दूर भगाया। थोड़ी देर बाद वह बिना काटे कहीं चला गया।
सोचती हूँ कि आज अपने खून की जाँच करवा लूँ😀😀😀
१७ जुलाई
इन दिनों सुनने में थोड़ी तकलीफ होती है। मास्क पहने कोई बोल रहा हो तो दो-तीन बार आँ आँ करना पड़ता है, लेकिन यदि किसी की बातचीत में कोरोना, लॉकडाऊन, तीसरी लहर जैसे शब्द आ रहे हों तो सौ-पचास फीट से भी साफ सुनाई देता है 😀😀😀
१६ जुलाई
जो कभी भी कहीं भी नज़र नहीं आते, किन्तु हर बार टैग ईमानदारी से करते हैं, उनका क्या इलाज है ?
८ जुलाई
आयुर्वेद में बुद्धि के तीन योग बताये गये हैं। अति योग आवश्यकता से अधिक बुद्धि, हीन योग बुद्धि कम होना एवं मिथ्या योग अर्थात बुद्धि ना होने पर भी बुद्धि का भ्रम पालना। अंतिम सर्वाधिक घातक योग है।
२ जुलाई
प्रति माह निवृत्ति वेतन (पेंशन) आता है और बाद में मेल से उसकी विवरणी आती है। इस माह की विवरणी देखी तो पता चला अन्तिम तीन आंकड़े ९९९ हैं। मुझे शक हुआ कि कहीं गलती से बाटा कम्पनी का कोई बिल तो नहीं आया है ? लेकिन ध्यान से पढ़ा और SBI PENSION SLIP लिखा देखकर राहत महसूस हुई।
कुछ बातें हमारे मन में पक्की होती है। ९९ यानि बाटा भी ऐसे ही पैठ किये हुए है। 😀😀
२८ जून
दुखद है किसी अख़बार का बन्द होना
हाँगकाँग से प्रकाशित होनेवाले ‘एप्पल डेली’ अखबार का प्रकाशन कल २४ जून से बन्द हो गया। इस अख़बार की प्रतिदिन ८० हजार प्रतियाँ बिकती थी। अन्तिम दिन उसी अख़बार की देखते ही देखते १० लाख प्रतियाँ बिक गयीं। ७५ लाख की आबादी में अख़बार की १० लाख प्रतियाँ बिकना अपनेआप में एक उदाहरण है, लेकिन यहाँ भी सिर्फ भीड़ की मानसिकता दिखाई देती है। यही १० लाख लोग यदि अख़बार से सम्बन्धितों की गिरफ्तारी पर एकजुट होकर चीनी शासकों का विरोध करते तो यह नौबत नहीं आती।
दरअसल हाँगकाँग में प्रेस की स्वतंत्रता को कानूनी मान्यता प्राप्त है और यही बात चीनी शासकों की आँख की किरकिरी है। ‘एप्पल डेली’ लोकतंत्र का प्रबल समर्थक एवं मानवाधिकार के पक्ष में बोलनेवाला समाचारपत्र था। महज २६ सालों में उसने अपना परचम लहरा दिया था। चीन में तो ये शब्द एक तरह से वर्जित है, अत: चीन समर्थित हांगकांग प्रशासन और पुलिस ने लगातार कार्रवाई कर पहले दौर में पाँच शीर्ष सम्पादकों सहित मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) को और दूसरे दौर में अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद ही सत्ता के आगे झुकने की बजाय अख़बार को बन्द करने का निर्णय लिया गया।
२५ जून
कधी केसांना तेल लावलं.
कधी हाता पायांना
आणि पोळ्यांना तर नेमाने.
अख्खं आयुष्य तेल लावण्यात गेलं.
२४जून
-- स्त्री कहीं भी कैसे भी पाकशाला से बाहर नहीं आयेगी।
-- भारतवर्ष से विलायती भाषा का गमन नहीं होगा ।
-- और मैं आजीवन इन्हीं और ऐसे ही गतप्राय विषयों के तन्तु जाल में उलझी रहूँगी।
कल रात्रि बोधिशैया पर इस अद्भुत ज्ञान की प्राप्ति हुई और चक्षु खुलकर मोतियाबिंद भी अंतर्ध्यान हो गया।
२४ जून
जब भी अतिथि आगमन होता है, परम्परागत पद्धति से यजमान गृहिणी पाकशाला में व्यस्त हो जाती है। केवल चाय-नाश्ता हो तो कम समय के लिये और भोजन हो तो अधिकतम एवं अनिश्चित समय के लिये, लेकिन व्यस्त गृहिणी को ही रहना है। इस परिस्थिति में पारस्परिक सम्बन्धों के अनुसार अतिथि गृहिणी भी पाकशाला में व्यस्त हो जाती है।
यजमान गृहस्थ ने कभी भी पाकशाला का गृहपाठ किया नहीं होता, अतः वह बैठक में ही आसीन रहता है और फिर स्वाभाविक रूप से अतिथि गृहस्थ भी बैठक में आसनस्थ हो जाता है।
खाद्य सामग्री सुसज्जित हो जाने के बाद यजमान एवं अतिथि गृहस्थ अकस्मात सक्रिय हो जाते हैं और उदर भरण का पवित्र भार साधिकार वहन करने लगते हैं।
विभिन्न पाककृतियों का चयन यजमान गृहस्थ ने परिश्रमपूर्वक तथा अत्यंत बुद्धिमत्ता से किया होता है। अतिथि गृहस्थ अपनी सीमा पहचानता है। इस कारण दोनों गृहस्थ भोजन की प्रशंसा करने के दायित्व का पूरी कर्त्तव्य निष्ठा से निर्वाह करते हैं।
अतिथि गृहिणी और यजमान गृहिणी विलम्ब से अन्न प्राशन करती हैं, इसलिये तत्पश्चात की जानेवाली स्वच्छता का उत्तरदायित्व उनका ही होता है।
यह कोई प्राचीन कथा नहीं है। वर्त्तमान काल में भी अवस्थित अत्यंत पीड़ादायी जीवन शैली है।
२२ जून
एक पुरानी मराठी फिल्म ''सुराज्य'' देख रही थी। उसमें नायक अपने मूर्तिकार मित्र से कहता है --
"क्या हमेशा देवी देवताओं की मूर्तियाँ बनाते रहते हो?"
मूर्तिकार कहता है --
"क्या करूँ?इस देश में पिछले पचास साल में ऐसा कोई हुआ ही नहीं है, जिसकी मूर्ति बनायी जा सके।"
१४ जून
आज एक युवा #हिन्दी #कवि की कवितायें एक फेसबुक समूह पर साझा की गयी हैं। कवि ने समूह प्रशासक के प्रति अपनी भित्ती पर #राष्ट्रीय #भाषा में धन्यवाद ज्ञापित किया है ---
Thank you so much for your generosity ❤️
This is an encouragement I will cherish a lot 🌻
१३ जून
बालों का झरना दुखदायी होता है, पर वे बहुत बुद्धिमान होते हैं। पंखा चलाने या प्राकृतिक हवा आने पर, गिरने के बाद जहाँ कहीं भी हो, वहाँ से निकलकर अपने प्रस्थान की तैयारी कर लेते हैं। बिस्तर के ऊपर से, पलंग के नीचे से, दीवारों के कोने से, दरवाजों के पीछे से धीरे-धीरे सब अत्यंत अनुशासित तरीके से बालकनी के दरवाजे के पास इकट्ठा हो जाते हैं। झाड़ू के आने या दरवाजा खुलने तक वे शांत भाव से रूके रहते हैं। कुछ नटखट वहीं गोल-गोल घूमते हैं, लेकिन स्थान नहीं छोड़ते।
मोक्ष की प्रतीक्षा कैसे की जाना चाहिए, कोई इनसे सीखे।
१२ जून
फिल्मों में, धारावाहिकों में अक्सर यह देखा है कि किसी गम्भीर विषय पर वार्तालाप के दौरान जब कोई पात्र अपनी बात समाप्त कर प्रत्युत्तर के लिये सामने वाले की ओर देखता है, तो वह पात्र यदि आँखों पर चष्मा हो तो पहले उसे उतारता है।
इसका कोई मनोवैज्ञानिक पहलू है क्या ?
१० जून
ईश्वर ने प्राणियों के दाँत पहले बनाये कि चबाये जाने वाले पदार्थ ?
दाँत दर्द से अचानक नींद खुलने के बाद कल रात उपजी जिज्ञासा !
८ जून
समय के अनुसार प्राथमिकता बदल "जाती है", लेकिन प्राथमिकता (स्त्री.) के अनुसार समय (पु.) "नहीं बदलता"।
५ जून
आज बहू को बाहर जाना था तो पूरा खाना मैंने बनाया। यह करीब ७/८ महिनों बाद हुआ। जबसे बेटे के यहाँ आयी हूँ तो अकेले पूरा खाना बनाने की नौबत ही नहीं आयी। कभी सब्जी छौंक दी, कभी कुकर चढ़ा दिया,कभी दाल बघार दी। कभी रोटी बनायी तो कभी सलाद काट दिया, लेकिन आज सब अकेले किया।
अच्छा लगा। खाना भी अच्छा बना और पुराना आत्मविश्वास लौट आया। लगभग साठ साल का अनुभव व्यर्थ नहीं गया।
४ जून
दो दिन पहले २८ मई को स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर की १३९वीं जन्मतिथि थी। २६ फरवरी को उनकी पुण्यतिथि होती है। इन दोनों तिथियों को फेसबुक, व्हाट्सएप की दीवारें सावरकर जी की गाथाओं से भरी रहती है। इन सामाजिक माध्यमों पर विचरण करते मुझे दस वर्ष से अधिक का समय हो गया। प्रतिवर्ष वही सारी जानकारी और उनपर वैसी ही प्रतिक्रियाएँ, शब्द-शब्द एक जैसा होता है। कोरोना काल में फेसबुक और यूट्यूब पर सीधे प्रसारण की बाढ़ में सावरकर जी को भी सम्मिलित किया गया। अब फरवरी २०२२ तक इनमें से ज्यादातर उनको भूल जायेंगे। मेरी समझ में नहीं आता कि इन दो दिनों में उन्हीं-उन्ही शब्दों के माध्यम से उनके प्रति भावनाएँ व्यक्त करने से क्या हासिल होता है ? इनमें न सिर्फ व्यक्ति, वरन पर्याप्त रूप से प्रसिद्द संस्थाएं भी सम्मिलित होती हैं।
सरकार तो भूल चुकी है,लेकिन इनमें से किसी एक को भी यह सुध नहीं आती कि वीर विनायक दामोदर सावरकर को ''भारत रत्न'' की उपाधि से सम्मानित करने के मुद्दे को आगे बढ़ाया जाय। ये सारे लोग मात्र अपनेआप को करने के लिए शब्द जंजाल बिछाते हैं। उनके लिए सावरकर न होते तो कोई और मिल जाता।
यदि उन सबके मन में इस महान विभूति के प्रति थोड़ा भी आदर हो तो उन्होंने संगठित होकर भारत रत्न की माँग को जोर-शोर से उठाना चाहिए।
३० मई
धार्मिक विश्वास के अंतर्गत व्रत, उपवास आदि करनेवाले अधिकांश लोग एक दिन पहले से ही सोचना शुरू कर देते हैं कि कल क्या खायेंगे ?
२९ मई
बढ़ती उम्र के साथ खाने-पीने, उठने-बैठने, चलने-फिरने आदि के साथ-साथ गाने-गुनगुनाने पर भी प्रतिबन्ध आता है।
शास्त्रीय गायक/गायिका संगीत की प्रारंभिक शिक्षा से लेकर जीवन की अन्तिम प्रस्तुति तक
"पिया की नजरिया जादूभरी" या "ए री आली पिया बिन, कल न पड़त दिन रैन" गाते हैं और श्रोता हाथ से ताल देते हुए, गर्दन हिलाते श्रद्धा पूर्वक सुनते हैं।
मेरे जैसी गुनगुनायिका को "पँख होते तो उड़ आती रे" या " आजा रे ! परदेसी" से परहेज करना पड़ता है। कभी अनजाने में गले से निकल गया तो घर में सन्नाटा छा जाता है और नज़रों में सवाल होता है -- अरे ! इनको क्या हुआ ?
पर जुबान पर तो यही गीत चढ़े हुए हैं। यादों के संसार से भजन वगैरा चुनना यानि ओटीटी पर पसंदीदा फिल्म ढूँढने जैसा दुरूह काम लगता है।
२६ मई
फेसबुक बन्द होने की चर्चा है, व्हाट्सएप की धमकियाँ अलग चल ही रही हैं यानि फिर से कॉपी पेन पकड़ने के दिन आनेवाले हैं।
बच्चों की तरह हम पर कहीं अक्षर लिखने का अभ्यास करने की नौबत न आ जाय। 😁😁
#सावधान #इंडिया क्योंकि भारत को इससे कुछ फर्क नहीं पड़नेवाला है।
२५ मई
घर के सामान में अब, दरवाजे का ताला और घण्टी सबसे अनुपयोगी लगने लगी है।
१८ मई
जो सखियाँ अभी अभी कोरोना से उबरकर आयी हैं, उन्हें साधिकार सलाह देना चाहती हूँ कि वे एकाध महिना अपने #गृहिणी #भाव को भूल जायें।
परिवार के अन्य सदस्य स्वेच्छा से मदद कर रहे हों तो मदद अवश्य लें
और यदि मदद नहीं कर रहे हों तो बिना हिचकिचाहट के उनसे मदद माँग लें ।
दोनों ही परिस्थिति में उनके काम में मीन मेख न निकालें , बल्कि शुक्र मनायें कि आप अकेली नहीं हैं।
माना कि आपके जैसा गुणवत्ता पूर्ण काम वे नहीं कर सकते,
लेकिन जीवनभर की परेशानी से बचने के लिए, थोड़े समय की असुविधा सहन कर लें।
अभी अपने आप को सँवार लें, घर अपने आप सँवर जायेगा। इस सत्य को स्वीकार कर लें कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। बीमारी बीत चुकी है, पर उसके दुष्परिणाम देह में बने हुए हैं, जिनके लिए शरीर को दण्ड न दें।
१८ मई
जो मास्क नहीं लगाते, दूरी बनाए नहीं रखते या किसी भी तरीके से कोविड दिशानिर्देशों का पालन नहीं करते, उन्हें शारीरिक या आर्थिक दण्ड देने के बजाय, गुरूद्वारे में कारसेवा की तरह, एक दिन पीपीई किट पहनाकर उनकी किसी वार्ड में ड्यूटी लगाना चाहिए।
१७ मई
आया तूफान, भागा शैतान। बचपन में ऐसा कुछ बोलते थे। काश ! ऐसा हो।
ताऊ ते तूफान कुछ समय के लिए आ जाय और साल भर से जमे हुए शैतान को भगा ले जाय ।
१७ मई
अमेरिका की जनसंख्या लगभग ३३ करोड़ और भारत की लगभग १३५ करोड़, लेकिन हर मामले में हमारे लोग तुलना ऐसे करते हैं, मानो मात्र सौ दो सौ का फर्क है।
१६ मई
रिजर्व बैंक ने कोरोना काल में पटरी से उतरी अर्थव्यवस्था के दृष्टिगत नये दिशानिर्देश जारी किये हैं, जिनके अंतर्गत बैंकों को निर्देशित किया है कि ऋण चुकाने के लिए छोटे कर्जदारों को अधिक समय दें।
बड़े कर्जदारों ने तो ऋण चुकाना नहीं है और ज्यादा कठोर कार्रवाई होते दिखी तो देश से भाग जाना है।
कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था का दारोमदार मध्यम वर्ग पर है।
५ मई
किसी निर्धारित काम को पूर्णत्व की ओर ले जाने के लिए जीवन के प्रति नहीं, मृत्यु के प्रति आश्वस्त भाव होना चाहिए।
३ मई
सामान्यतः बीमारी या मृत्यु शरीर के ऊपरी अंगों, जैसे मस्तिष्क, ह्रदय, फेफड़े, यकृत,आमाशय (पेट), वृक्क (किडनी) में बिगाड़ होने से होती है।
प्रदेश अथवा देश के बनने-बिगड़ने में भी ऊपरी हिस्से ही जिम्मेदार होते हैं।
२ मई
सामान्यतः बीमारी या मृत्यु शरीर के ऊपरी अंगों, जैसे मस्तिष्क, ह्रदय, फेफड़े, यकृत,आमाशय (पेट), वृक्क (किडनी) में बिगाड़ होने से होती है।
प्रदेश अथवा देश के बनने-बिगड़ने में भी ऊपरी हिस्से ही जिम्मेदार होते हैं।
१ मई
पिछले लगभग एक साल से किसी बाहरी व्यक्ति से भेंट नहीं हुई है। अभी भी कहा जा रहा है कि यह लहर दो ढाई साल तक चलेगी। स्वाभाविक रूप से सर्वाधिक बंधन हम वरिष्ठ नागरिकों पर रहेगा। सन २०१९ में भी मैं निजी कारणों से अल्प समय के लिए ही इंदौर रह पायी हूँ। अर्थात स्थितियाँ सामान्य होने तक लगभग चार वर्ष का समय निकल जायेगा। कोई बहुत समय बाद मिलता है तो इस आयु में वैसे ही संशय बना रहता है। कभी किसी का नाम याद नहीं आता, तो कभी परिचय कैसे हुआ इसका विस्मरण होता है।
अब यदि चार-पाँच वर्ष बाद किसी हम उम्र से मुलाकात हुई तो न वे मुझे पहचान पायेंगे और न मैं उनको। मैं कहूँगी - आप पद्मा जी ( Padma Singh ) जैसी दिखती हैं और वे मुझसे पूछेंगी - अलकनंदा साने आपकी रिश्तेदार हैं क्या ?
फेसबुक, व्हाट्सएप जैसे सामाजिक माध्यमों पर रोज फोटो देखेंगे तो इतना तो याद रहेगा।
देखते हैं क्या होता है ? और कुछ नहीं तो फेसबुक तो इस पोस्ट की याद करा ही देगा ।
२८ अप्रैल
तथाकथित पण्डित अनेक बार सलाह देते हैं - इसकी शान्ति करा लो, उसकी शान्ति करा लो, पितृदोष है, कालसर्प योग है आदि आदि....
स्वयं यमराज की शान्ति का कोई उपाय नहीं है क्या ?
२६ अप्रैल
कल की मेरी पोस्ट पर कुछ लोग प्रोटोकॉल का समर्थन करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँच गये कि मैं वामपंथी हूँ। कुछ ने मेरे निजी जीवन को आधार बनाकर मुझे सीख दी।
उन लोगों से मेरे कुछ प्रश्न हैं --
१. क्या मेरे जैसे 'बिन पैंदी के' एक आम नागरिक को, जो अटल जी, इंदिरा गांधी, पीलू मोदी, राम मनोहर लोहिया आदि का एकसाथ आदर करता है, उसे सरकारी तंत्र पर कोई प्रश्न उठाने का अधिकार नहीं है ?
२. मेरा व्यवसाय क्या था और मैं वहाँ क्या करती थी इसका उल्लेख करने इतने मेरे आपके सम्बन्ध हैं क्या ?
३. #और #सर्वाधिक #महत्त्वपूर्ण यह कि प्रोटोकॉल इतना जरूरी था तो प्रधानमंत्री कार्यालय क्या कर रहा था ? व्हाट्सएप समूह को प्रशासित करनेवाले हम अदने-से नागरिक Only for admins का उपयोग कर समूह को नियंत्रित कर सकते हैं तो क्या प्रमं कार्यालय के पास भी एक बटन इस बात का नहीं होना चाहिए, ताकि कोई 'दुरूपयोग' न कर सकें ?
२४ अप्रैल
मूल मुद्दे से जनता का ध्यान हटाना ही असली राजनीतिज्ञ की पहचान है।
२३ अप्रैल
ऑक्सीजन को भूल जाईये, प्रोटोकॉल अधिक महत्त्वपूर्ण है।
२३ अप्रैल
इस वेबसाइट पर "प्रमुख लेखिकाएं'' शीर्षक के अंतर्गत मेरा जीवन परिचय एवं साहित्य विचार के अंतर्गत "मराठी साहित्य में लेखिकाओं का योगदान" विषय पर एक शोध परक लेख सम्मिलित है।
धन्यवाद Palash Surjan जी, Sarika Thakur
https://www.swayamsiddha.co/
१७ अप्रैल
कुछ लोग सुबह "ओमकार" का जाप करते हैं और कुछ लोग दिनभर "मैंकार" का ।
११ अप्रैल
स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए जो स्वातंत्र्य सेनानी, क्रांतिकारी अपना सब कुछ छोड़कर आगे आये, उन्हें विदेशी शासकों के विरोध में लड़ना था और उसके परिणाम भी भुगतना थे। फिर भी वे रूके नहीं।
आज हमारे 'अपने' शासक, नेता जगह जगह भीड़ इकट्ठा कर रहे हैं, बिना मास्क के लोगों के बीच जा रहे हैं, उनका विरोध करने की हिम्मत किसी में भी नहीं है ?
वे व्यक्ति, वे संस्थायें कहाँ हैं जो समाज सेवा का दम भरती हैं और अखबारों में फोटो सहित अपना नाम छपवाने को आकुल-व्याकुल रहती हैं एवं छपने के बाद वे फोटो सबको दिखाने की कर्मठता भी परिलक्षित होती है। उनमें से किसी को भी सामाजिक जिम्मेदारी या कर्त्तव्य का अनुभव नहीं हो रहा है ?
पूरे देश में कहीं से भी कोई आवाज नहीं उठ रही है । क्या राजनेताओं की कुर्सी और उसके लिए चुनाव, देश की जनता से भी ज्यादा जरूरी है ? क्या सामाजिक संस्थाओं, उनके पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं के लिए व्यक्तिगत हित उसी समाज से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं, जिसके कारण वे साध्य होते हैं ? क्या हमारा समाज भी इतना आत्म केन्द्रित मृत प्राय हो गया है कि वह भी इसी परिस्थिति को मान्य करना अपना इति कर्त्तव्य समझता है ?
१० अप्रैल
कोरोना को न तो राजनीति मानना चाहिए और न ही उसके निराकरण के लिए राजनीतिज्ञों की ओर ताकना चाहिए। जो न तो स्वयं मास्क लगाते हैं और न ही विलगीकरण का पालन करते हैं, यदि उन्हें आदर्श माना जाता है तो भुगतने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
जो लोग इसे राजनीति, चुनाव आदि से जोड़ते हैं वे उनके बारे में सोचें जिन पर इस वायरस ने धावा बोला है और उनके बारे में भी सोचें जिन्होंने अपने परिजनों को खोया है।
अब वक्त आ गया है कि "दो गज की दूरी, मास्क है जरूरी'' को सरकारी नारा नहीं, जन-जन का नारा समझकर आत्मसात किया जाय।
पढ़े-लिखे बिना मास्क के कितने भी सुन्दर दिखते हों , कहलायेंगे गँवार ही।
बिना मास्क वाले परिचित/अपरिचित को मैंने टोकना शुरू कर दिया है। अपने स्तर पर इतना तो कर ही सकते हैं।
८ अप्रैल
हमारे बचपन में हम प्लेग, चेचक यहाँ तक कि विषम ज्वर (टायफाइड) के किस्से सुनते थे। हमारे नाती-पोते, पड़पोते कोरोना की कहानियाँ सुनेंगे। इतिहास अपने आप को दोहराता रहता है।
ये दिन भी जायेंगे निकल .......!!
४ अप्रैल
कुछ माह पहले एक परिचित युवक कोरोना ग्रस्त था। बीमारी के दौरान और बाद में भी उससे फोन पर संपर्क बना रहा। कल बहुत दिनों के बाद बात हुई । उसी बीच मैंने पूछा -- मम्मी कैसी हैं ? वह बोला -- ठीक हैं। बीमार मैं था और कमजोर वे हो गईं हैं।
सीधा-सादा, सामान्य जिंदगी जीनेवाला लड़का अनायास एक मार्मिक सत्य कह गया।
१२ मार्च
हमारी नन्ही को जब भी दादी पैर पसारे दिखती है तब एक तो छोटे छोटे हाथों से पैर दबाकर दादी का दर्द दूर करने की कोशिश की जाती है, दूसरे यदि दादी पर ज्यादा प्यार आ गया तो दादी के पैर यानि घोड़ा और स्वयं वह घुड़सवार। अभी तक सामान्य रूप से यही होता रहा। कल उसमें एक नवाचार हुआ।
उसकी माँ ने कल उसे कागज की नाव और हवाई जहाज बनाकर दिये तो वे भी घोड़े पर सवार थे। मजे से टकबक टकबक कहते घुड़सवारी चल रही थी।
मैंने पूछा -- नाव और हवाई जहाज क्यों ?
उत्तर आया --- घोड़े से उतरूँगी तो कहाँ बैठूँगी ?
कुछ दिन पहले हवाई जहाज से ननिहाल गयी थी और वहाँ नाव की सैर की थी। इन दिनों ये दो वाहन ही उसके लिए परिवहन के प्रमुख साधन हैं।
११ मार्च
राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर सामान्य नागरिकों तक टीकाकरण के खिंचे गये फोटो की संख्या को देखते हुए, कहीं यह सूचना न जारी हो जाय कि दूसरे डोस के लिये सरकार द्वारा दिये गये प्रमाणपत्र नहीं, हितग्राही ने खिंचवाये छायाचित्र मान्य होंगे
४ मार्च
टीकाकार तो जन्मजात थी, आज "टीकावान" हो गई 😁😁
३ मार्च
३ वर्ष २ महीने की पोती को कहानियाँ सुनाते समय कुछ बातें विशेष रूप से अनुभव हुई। प्राणियों में हाथी,हिरन, खरगोश, कुत्ता, बिल्ली उसके खिलौनों में हैं, शेर,घोड़ा, भालू, सियार, लोमड़ी, साँप, मगर वगैरा उसने टीवी पर देखे हैं, लेकिन कहानियों में चींटी, छिपकली, तिलचट्टा, कौवा, तोता, मेंढक, गधा आदि का वर्णन आने पर वह समझ नहीं पाती है, क्योंकि ये प्राणी उसे न खिलौनों में दिखते हैं, न ही टीवी पर, घरों में तो होते ही नहीं है। चिड़ियाघर में भी नहीं दिखेंगे।
पेस्ट कंट्रोल के जमाने में क्या वह चींटी, तिलचट्टा, छिपकली को कभी नहीं जान पायेगी ?
शहर की हवा में क्या उसे कौवा, तोता, मेंढक कभी नहीं दिखेंगे ?
गधे की उपयोगिता क्या वह कभी नहीं जान पायेगी ?
ये प्रश्न इन दिनों मथते हैं।
२६ फरवरी
अपने मूल प्रदेश से जन्मत: दूर रहनेवाले मेरे जैसे अनेक जन, भाषा के संदर्भ में कृष्ण की तरह दो माताओं वाले होते हैं। जैसे मराठी मेरे लिए देवकी,मेरी मूल माँ है और हिन्दी यशोदा है, जिसने पालन-पोषण कर जीवन को कुछ सार्थक रूप दिया है।
आज #मातृभाषा #दिवस पर दोनों माताओं को प्रणाम।
२१ फरवरी
२१ फेब्रुवारी १९५२ रोजी ढाका विद्यापीठाच्या विद्यार्थ्यांनी मातृभाषा बांग्लाच्या संरक्षणासाठी एक प्रदर्शन केले. पाकिस्तान सरकारने प्रदर्शन रोखण्यासाठी गोळीबार करण्याचे फर्मान काढले. त्यात १६ विद्यार्थी ठार झाले. त्या विद्यार्थ्यांच्या सन्मानार्थ सन १९९९ मध्ये युनेस्कोने २१ फेब्रुवारी हा "मातृभाषा दिवस" म्हणून जाहीर केला.
महामहोपाध्याय दत्तो वामन पोतदार यांनी "स्वभाषानियमाष्टक" तयार केले होते. ह्या प्रसंगी ते वाचू या. त्यातले नियम आजही विचार करायला लावतात. त्यांचे पालन केले तर मराठीला प्रयत्नपूर्वक वाढवता - बलिष्ठ करता येईल .
१. मी प्रत्यही काही उत्कृष्ट मराठी मजकूर वाचीन .
२. मी एक तरी चांगले पुस्तक प्रतिमासी विकत घेईन.
३. मी एक तरी प्रतिष्ठित मराठी मासिक वर्गणी भरून घेईन.
४. मी आपला सर्व लेखी - तोंडी व्यवहार होता होईतो मराठीत करीन.
५. मी आपल्या मुलाबाळांत,आप्तेष्टांत मराठीचा योग्य अभिमान जागृत करण्यासाठी झटेन.
६. मी एक तरी मराठी वर्तमानपत्र विकत घेईन.
७. मी शक्य असेल तर माझ्या अज्ञानी बांधवांकरता मराठीत ग्रंथ लिहीन.
८. मी मराठीच्या अभ्युन्नतीकरता झटणाऱ्या संस्थांना शक्य ती मदत करीन.
२१ फरवरी
निजी बैंकों में न्यूनतम जमा राशि १००००/- हो तो कोई बात नहीं
चेक खारिज होने पर ७००-८००/- कट जाते हैं, कोई बात नहीं
सरकारी विभागों में रिश्वत देना पड़ती है, कोई बात नहीं
व्याख्याताओं, प्राध्यापकों का वेतन छ: अंकों में होकर भी पढ़ाई नहीं होती, परीक्षाओं में धांधली होती है, कोई बात नहीं
लेकिन यदि राष्ट्रीयकृत बैंकों और विशेषकर भारतीय स्टेट बैंक में किसी भी तरह की असुविधा होती है तो वह जघन्य अपराध है।
६ फरवरी
बड़े बड़े निजी विद्यालय, उनकी बहुत सारी बसें या अलग से चलने वाले ऑटो रिक्शा, मिनी बस आदि के पहले बच्चों को पहुँचाने और लाने के लिये समीप ही रहनेवाले दादाजी/नानाजी, दादी/नानी, मौसी/बुआ अपनी सेवायें देते थे। ये सशुल्क/ निशुल्क दोनों होती थीं, लेकिन विश्वसनीयता हर हाल में होती थी।
आज एक ऐसी ही मौसी याद आ गयी जो मेरे पडौसी बेटे को लाने ले जाने का काम करती थी। एक दिन पडौसन को किसी काम से बाहर जाना पड़ा और वह समय पर लौट नहीं पायी। वह जमाना न दुपहिया, चौपहिया का था और न ही टेलीफोन, मोबाईल का।
मौसी ने दरवाजे पर ताला देखा तो बच्चे को अपने साथ ले गयी। हाथ मुँह धुलाकर, कहीं से दूध बिस्किट की व्यवस्था कर उसे खिलाया पिलाया। खा-पीकर बच्चा भी सो गया। इधर पड़ौसन लौटी और घड़ी देखी तो सीधे मौसी के घर गयी। बच्चा मजे से सो रहा था और माँ की आँखें झर रही थीं।
अभी भी सब लोग बुरे नहीं है, लेकिन अविश्वास की झीनी ही सही एक लकीर दोनों तरफ दिखाई देती है।
४ फरवरी
मन में बहुत सारे अर्जुन हैं......पर यहाँ कोई कृष्ण समझाने नहीं आता ....
डार्विन के रास्ते बहुत सारी चीजें खत्म होते सुना था...पर कृष्ण भी ? कृष्ण अपेंडिक्स नहीं है....वे जरूरी हैं यकृत की तरह…
३१ जनवरी
एक मित्रता अनुरोध आया है। श्रीमान मेरे अनुयायी (फेसबुक की भाषा में फॉलोअर) हैं और बिग बॉस टीवी शो पसन्द करते हैं। 🙂🙂
क्या अनुरोध स्वीकार करना चाहिए ?
२७ जनवरी
लगभग 50-55 साल से खाना बना रही हूं लेकिन आज की तरह कभी भी खाना बनाना सजा की तरह अनुभव नहीं हुआ। हम करीब करीब सभी गृहिणियाँ सामान्य तौर पर एक ही तरीके से काम करते हैं। उसीके अनुसार पहले दाल चावल का कुकर चढ़ाना, फिर सब्जी काट कर छौंकना और फिर आटा गूंधना। लगभग यही क्रम रोज होता है आटा गूंधते गूंधते बीच-बीच में सब्जी हिला दो, कुकर की सीटी हो जाए तो दाल छौंक दो और दाल सब्जी जब तक बनती है तब तक रोटी बनाना भी शुरू कर दो, लेकिन आज ऐसा नहीं हो पाया और तकलीफ वहीं से शुरू हुई।
जितना समय खाना बनाने बनाते हो गया है उससे भी ज्यादा समय से सुबह-सुबह अखबार और उस में आने वाला राशिफल भी पढ़ने की आदत है। आज के राशिफल में लिखा था कि दो काम एक साथ नहीं करें। अब हुआ क्या कि मैंने सब्जी काट के छौंक दी तो जब तक वह पकी नहीं तब तक मैं कुकर नहीं चढ़ा सकती थी और कुकर की सीटी आने तक मैं आटा नहीं गूंध सकती थी । आटा गूंधने के दौरान सब्जी को बीच-बीच में हिला नहीं सकती थी तो बार-बार मुझे रुकना पड़ा, क्योंकि मुझे आज दो काम एक साथ नहीं करने थे ।
अब सोच रही हूँ कि कल से अखबार पहले पढूँ या पहले खाना बना लिया करूँ ? 🙄🙄
१८ जनवरी
हम लगभग पाँच साल पहले मिले थे। उसके पहले और बाद में न तो मुलाकात हुई और न ही फोन पर कोई बातचीत हुई।
कल किसी कारण से फोन किया और करीब पैंतालीस मिनट हम दुनियाभर की बात अविरत करते रहे। बीच का फासला यकायक मिट गया।
यही तो सच्ची मित्रता है !
१५ जनवरी
माझी नात (वय अवघे वर्षे तीन) खूप बोलते आणि जास्त करून हिन्दीत बोलते. अनेकदा आम्हीही तिच्यासारखे हिन्दी बोलू लागतो पण तरीही मी कटाक्षाने मराठी बोलण्याचा प्रयत्न करते. हे तिला कळतं. त्या अनुषंगाने आज घडलेली गंमत. सुनेनं म्हणजे तिच्या आईने तिला म्हटले -- जा , आजीला जेवायला बोलवून आण. तिने बहुतेक ह्या वाक्याला हिन्दीत समजून घेतले. जा, दादी को खाना खाने के लिये बुला. मग त्याचा मराठीत अनुवाद केला -- आजी, जेवण खायला चल. 😀😀
८ जनवरी
मेरी पीढ़ी ऐसी भाग्यशाली पीढ़ी है, जिसने अपने जीवन में अधिकतम वाहनों का सुख प्राप्त किया है। हमने बैलगाड़ी, छकड़ा, घोड़ागाड़ी, तांगा, सायकिल,सायकिल रिक्शा,सिटी बस, टेम्पो, ऑटो रिक्शा, मिनी बस, मेट्रो, लोकल ट्रेन, मोपेड, स्कूटर, स्कूटरेट, मोटर सायकिल, कार, जीप, राज्य परिवहन निगम की और निजी एजेंसियों की बसें,बच्चों की रेलगाड़ी, रेलवे के जनरल डिब्बे से लेकर एसी के डिब्बों तक,नाव, स्टीमर, जहाज, हवाई जहाज आदि २५ से अधिक माध्यमों से सफर किया है।
ना तो हमारे पूर्वजों को यह सब प्राप्त था और ना ही हमारे वंशजों को यह आनन्द मिला है।
८ जनवरी
उम्र है, कोई बैंक की ब्याज दर नहीं, जो घटेगी !
वह तो महँगाई है जिसने हमेशा बढना ही है !!
७ जनवरी
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