चरैवति चरैवति .....हर साल जाते - जाते यही तो कहता है ।
३१ दिसम्बर
धारावाहिकों और फिल्मों का बीमार व्यक्ति बातें करता है, हँसता है, रोता है, बच्चों से खेलता है, सब करता है, बस खाना नहीं खा पाता इसके लिए कोई न कोई चम्मच लेकर तैयार रहता है!!
३१ दिसम्बर
लोक परिचय का दायरा जितना व्यापक होता जाता है, अपने बौनेपन का अहसास उतना ही तीव्र होने लगता है ।
२९ दिसम्बर
सेंकने के लिए उनके पास रोटियां इतनी ज्यादा है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती ....
१७ दिसम्बर
बहुत दिनों बाद घर लौटी , तो दीवार के कोनों में मच्छर थे , कहीं जाले लगे थे , कुछ चीटिंयां भी थीं और भी बहुत कुछ जो अदृश्य हो और मुझे नहीं दिखा होगा .उन सबने आपस में क्या कहा होगा -- रेड अलर्ट ?
१५ दिसम्बर
नातिन के लिए "एकलव्य" से कुछ किताबें खरीदकर लाई हूँ, सुबह से उन्हें पढ़ रही हूँ। बड़ा मजा आ रहा है। एक लम्बे अर्से बाद बाल साहित्य पढ़ने का आनन्द ही कुछ और है। मेरे बचपन में चन्दामामा और पराग ये दो ही पत्रिकाएँ थीं। गाँव में ज्यादा कुछ मिलता भी नहीँ था। सुमन सौरभ और नन्दन आए तब तक किशोरावस्था आ गई। अपने बच्चों के लिए बहुत सारी किताबें खरीदी, पर खुद पढ़ने की फुरसत नहीँ थी। अपने बच्चों को बड़ा करने में हम खुद को भूल जाते हैं।
सचमुच नाती-पोतों के साथ अपना बचपन भी लौट आता है।
१३ दिसम्बर
आज एक दफ्तर में लड़ने का पूरा मन बनाकर गई थी, लेकिन बिना लड़े ही काम हो गया ....मजा नहीँ आया।
१० दिसम्बर
कोई तारीफ करे न करे , gmail जरूर दिल खोलकर तारीफ करता है ...
Woohoo! You've read all the messages in your inbox.
४ दिसम्बर
सोशल साइट्स हो या सड़क पर उतरें , जरुरत स्व-अनुशासन की है। … सब चलता है
… .... या 2/4/5/10 रुपयों में क्या फ़र्क़ पड़ता है … … यह प्रवृत्ति छोड़ना पड़ेगी …… चाहे वह आर टी ओ एजेंट हो , टिकिट बुकिंग एजेंट हो या सब्जीवाला,फलवाला,किरानेवाला,रिक्शावाला हो ………… यहाँ तक कि पवित्र समझे जानेवाले प्रतिष्ठान अस्पताल या स्कूल …… हम अपना काम निकालने के लिए हर कदम पर रिश्वत देते हैं …… ……… हमें यह जान लेना होगा कि रिश्वत का मतलब सिर्फ सरकारी दफ्तर और वहां के बाबू/अफसर नहीं है ……………
३० नवम्बर
भ्रष्टाचार का अर्थ क्या है ?
सन २००३ में अन्ना हजारे ने महाराष्ट्र सरकार में शामिल डॉ पद्मसिंग पाटिल,सुरेश जैन,नवाब मलिक और डॉ विजय कुमार गावित के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाये थे.उनकी जाँच करने के लिए न्यायमूर्ति पी.बी.सावंत की अध्यक्षता में आयोग बनाया गया था.श्री सावंत ने जो रिपोर्ट सरकार को दी, उसमें उन्होंने भ्रष्टाचार की एक व्यापक परिभाषा दी है....."भ्रष्टाचार सिर्फ अफरा-तफरी ही नही वर्ना लापरवाही,सरकारी तन्त्र और प्रशासन के विरुध्ध की शिकायतों को नजरंदाज करना,अपव्यय, अकार्यक्षमता,पक्षपात,सिफारिश,विशिष्ट कृति करने या नही करने के लिए अधिनस्थों पर दबाव डालना,इसके लिए उकसाना,सत्ताधारी दल के हित-संवर्धन के लिए निरंकुश और स्वेच्छाचारी आचरण करना,नियमबाह्य और अवैध कार्यों की ओर ध्यान न देना अथवा उन्हें माफ़ करना,ये और ऐसे ही अन्य कृत्य भ्रष्टाचार की श्रेणी में आते है....."
३० नवम्बर
कोई आ गया तो ?
आजकल कोई भी घर पर अकस्मात नहीं आता , दरवाजा खोलते ही सामने किसी को देखने की ख़ुशी खत्म हो गई है .पर एक बात है कि अब लोग सूचना देकर/पूछकर आते हैं,तो खुद को और घर को ठीक-ठाक करने का समय मिल जाता है . पहले सूचना के साधन नहीं थे और अनौपचारिकता भी थी तो किसी के भी कभी भी आने की आशंका से सुबह से ही घर युद्ध-भूमि बना रहता था . माँ एक मिनिट भी इधर-उधर गंवाने नहीं देती थी . सुबह यानि ६.०० बजे चाय पीते ही सब अपने-अपने काम से लग जाते थे . कोई बिस्तर समेट रहा है, कोई झाडू हाथ में लिए है , कोई नहा रहा है , कोई कपड़ों का गट्ठा गलाकर बैठी है , कोई रसोई में ....इस सबके पीछे माँ का एक वाक्य रहता था --- चलो जल्दी निपटाओ , कोई आ गया तो ? बाद में हम सारे भाई-बहन अलग-अलग हो गए , लेकिन जब भी इकट्ठा होते माँ का अनुशासन वही रहता था . हम पीहर गई बहनों को भी कोई छूट नहीं मिलती थी .जरा कोई गपशप करते दिखा तो ---चलो! पहले सब मिलकर काम निपटाओ , फिर करना बातें कौन मना करता है ?
और आखिर में वह टीप रहती ही थी ---कोई आ गया तो ?
२९ नवम्बर
जब जया बच्चन की गुड्डी, उपहार ये फ़िल्में आई थीं, तब हम लोग कॉलेज में थे. जया जी का अपने घने/लम्बे बालों का सादा-सा जूड़ा बनाना और सूती साडी का दोनों कन्धों को ढकते हुए गर्दन तक लिपटा पल्लू हमारे लिए आदर्श पहनावा हुआ करता था . हम सब लड़कियां वैसा ही जूड़ा बनाते थे (तब सभी के बाल आमतौर पर घने/लम्बे हुआ करते थे) और सूती साडी पहनकर कॉलेज जाते थे . तब से अब तक न सूती साडी छूटी, न जूड़ा(भले ही बाल चार ही बचे हैं),पर जया जी ने साडी करीब-करीब छोड़ दी है और बाल भी अब खुले ही रहते हैं।
२८ नवम्बर
बहुत जल्दी अचारवाला टूथपेस्ट आनेवाला है ....जिस टूथपेस्ट में पहले नमक था, उसमें अब नींबू भी है, बस उसमें थोड़ी-सी लाल मिर्च डाली कि नींबू के अचारवाला टूथपेस्ट तैयार , सुबह-सुबह चटखारे ले सकते हैं .....
२७ नवम्बर
सरकारी कार्यालयों में अधिकारियों के कक्ष के अलावा सामान्यतया बैठने की जगह या कुर्सियां नहीं होती , तो खड़े-खड़े पैर दुखने लगते हैं (वहां कोई काम जल्दी नहीं होता) , तब लगता है कि किसी ग्रामीण महिला की तरह आलथी-पालथी डालकर जमीन पर बैठ जाऊँ. लेकिन मैं ऐसा कर नहीं पाती, अंतत: पैर दुखने की क्रिया को मेरी आभिजात्य आदतें और मध्यमवर्गीय मानसिकता यथास्थिति वाद की तरह स्वीकार कर लेती हैं......
२७ नवम्बर
अपनी जरूरतों को एक कमरे में और
खाने को एक प्लेट में समेट लेने जैसा कोई सुख नहीं !!!
२५ नवम्बर
कल शाम को मैं कहीं जा रही थी.मेरे आगे एक बुजुर्ग महिला चल रही थीं.थोड़ी देर बाद मैं उनकी बराबरी से हो गई,उन्होंने सहज मेरी ओर देखा और सरलता से मुस्कुरा दीं. मैंने भी उनका अभिवादन किया तो उन्होंने पूछा --- मराठी ?
मैंने मराठी में जवाब दिया --- हो काकू ! मी साने ......अलकनंदा ..
फिर हम थोड़ी देर बात करते चलते रहे . कॉलोनी से बाहर आकर मुझे ऑटो पकड़ना था , मैंने उनसे पूछा --आपको कहाँ जाना है ? मैं छोड़ दूँ ?
बोलीं --- नहीं मैं तो घूमने जा रही हूँ .रोज जाती हूँ.
वे जिस कॉलोनी में रहती थीं , वहां से करीब डेढ़ कि.मी. आ चुकी थीं और अभी घूमना बाकी था.मैंने कहा -- अकेले जाती हैं ?
अकेले कहाँ ? ''वो'' जा तो रहे हैं आगे .
सहज ही पूछा -- काकू आपकी उम्र ?
इस दिसंबर में बस 84 की हो जाउंगी (बस 84 ?) और फ़रवरी में वो 90 के (बस 90)
उस बुजुर्ग दंपत्ति की सतर चाल और आत्मविश्वास देखकर कल शाम से मैंने अपना बुढ़ापा स्थगित कर दिया है ......
२३ नवम्बर
जब सुबह पता चलता है कि ईश्वर ने नहीं उठाया है , तो मैं खुद ही उठ जाती हूँ
२३ नवम्बर
यदि चार लोग समर्थन में आ जाय तो चालीस लोगों को तकलीफ होती है ....
२० नवम्बर
सब लोग इतना यहाँ से वहां भाग रहे हैं कि कुछ वर्षों बाद शायद हिरण और चीता एक जगह खड़े होकर आदमी को देखेंगे ....
२० नवम्बर
.चकला-बेलन, सिल-बट्टा,इमाम-दस्ता और मोगरी थामी है इन हाथों ने जीवन भर, अब टच स्क्रीन जैसी नाजुक चीज सम्हालना मुसीबत लगता है .......क्या करें .....कालाय तस्मै नम :
१६ नवम्बर
मुझे याद है , जब घरों में टेलीफोन भी नहीं होते थे तो कार्यालय में किसी के लिए फोन आने पर हलचल मचती थी. चपरासी आकर कहता - मेडम आपके लिए फोन है --तो धड़कते दिल से 'बड़े साहब' के टेबल पर रखा फोन उठाकर,अत्यंत धीमी आवाज में हेलो और बाद में सिर्फ हुं,हाँ , अच्छा,ठीक है,बताती हूँ आदि संक्षिप्त शब्दों के साथ फोन का जवाब दिया जाता था . अपने स्थान पर लौटते हुए सबकी प्रश्नार्थक नजरें और किसी नजदीकी का पूछना - क्या हुआ ? किसका फोन था? महिलाओं के बारे में ज्यादा उत्सुकता रहती थी. एक स्पष्ट और साफ-सुथरा नजरिया रहता था कि वे घर/बच्चे/सास-ससुर आदि को छोड़कर आती हैं, तो कोई परेशानी तो नहीं ?
फिर मोबाईल आए तो सिर्फ ''संकट की घड़ी में होना चाहिए'' इतनी भर उसकी उपयोगिता थी.मोबाईल पर किसीके साथ घंटों गप-शप की है, ऐसा याद नहीं आता. स्मार्ट फोन लिया तब भी फेसबुक/मेल/व्हाट्सएप्प देखने की हिम्मत नहीं हुई. आखिरी दिन भी जब लगातार फोन आ रहे थे,तो कुछ शर्मिंदगी महसूस हो रही थी और मन में यह डर था कि कुछ काम बाकी न रह जाय.
लेकिन अब व्हाटसएप्प और फेसबुक और तमाम नई तकनीक के साथ नौकरी कर रहे आत्मविश्वासी युवाओं को देखकर दोबारा नौकरी करने की इच्छा मुझे होने लगी है.
१४ नवम्बर
भारत रत्न के लिए आजतक किसी लेखक/साहित्यकार/पत्रकार को योग्य नहीं माना गया है सन 1963 में हालाँकि पांडुरंग वामन काणे को भारत रत्न दिया गया , लेकिन लेखक के बतौर नहीं, वरन संस्कृत के प्रकांड विद्वान के रूप में .उन्हें सम्मानित किया गया .
१३ नवम्बर
फेसबुक पर कुछ लोग प्रतिक्रियावादी होते हैं , कुछ सिर्फ लाइकवादी !!!
१२ नवम्बर
शिनपिंग की पत्नी को पुतिन द्वारा शॉल ओढ़ाए जाने पर शोर हुआ और सोशल साइट्स इसकी शिकार हुई . ये तो एक राष्ट्राध्यक्ष का पक्ष हुआ लेकिन बतौर पति शिनपिंग ने घर जाकर क्या कहा होगा ----
क्या जरुरत थी उसके इतना पास खड़े होने की ?
क्या करती रहती हो दिनभर ?
अख़बार/ टीवी पर थोड़ा ध्यान दिया करो, मालूम नहीं वह कैसा है ?
( खूब जोर देकर)तलाकशुदा है वो
और इतना खुश होने की क्या बात थी ?
अरे ! इसमें अब रोने जैसा क्या है ? चलो जो हो गया , सो हो गया, अगली बार ध्यान रखना , पुतिन , सरकोजी जैसे लोगों से अपने को दूर रहना है .
अच्छा चलो खाना लगाओ , बहुत भूख लगी है , तुमने खा लिया ? (पता है वह कभी खाती नहीं है , फिर भी बाद में चापलूसी)
१२ नवम्बर
पहले रोज के कामों में धोबी का आना भी हुआ करता था . एक डायरी या किसी कॉपी के बचे हुए पन्नों पर उसका विवरण लिखा जाता था . इतने कपडे भट्टी के,इतने कलफ के,इतने सादे ....उससे बाकायदा सबकी गिनती करवाई जाती थी , पहले अलग-अलग, फिर कुल कपडे .अपने आंकड़ों से उसका मिलान होता था , उसके बाद ही वह गट्ठर उठाता था. जब वह जाने लगता, तब हिदायतें शुरू होती ----देखो ! सफ़ेद कपड़ों पर नील लगा देना,याद से और वो पीली साडी को जलाना मत,बहुत महंगी है. पिछली बार पिताजी की पेंट के बटन टूट गए थे, मोगरी थोड़ी ध्यान से चलाया करो.....
अब भट्टी,कलफ,नील,मोगरी और खुद धोबी ये शब्द ही हमारे जीवन से गायब हो गए हैं. सारे धोबी ड्रायक्लीनर्स हो गए हैं और ये शब्द जातिवाचक ......
११ नवम्बर
आज मैंने घोषित किया, मैं जीवित हूँ और वह प्रमाणित भी हो गया..तो मैं जीवित हूँ ..!!!
१० नवम्बर
कभी-कभी ऐसा होता है कि हमारे यहाँ कोई महत्वपूर्ण मेहमान आते हैं और उनके साथ पड़ौस का बच्चा भी आ जाता है. हम मेहमानों का परिचय घर आए लोगों से करवाते हैं,तभी किसीका ध्यान उस बच्चे की और जाता है. फिर प्रश्न आता है --- और ये? हम बुझे-से स्वर में कहते हैं - पड़ौस का बच्चा है ! तब लोग भी उसकी ओर ज्यादा ध्यान नहीं देते.
हाल ही में हम कुछ लोग एक कवि - सम्मेलन के लिए जबलपुर गए थे. आयोजक कवियों का परिचय कराते --- ये श्री ..... मुंबई से , ये पुणे से, ये नागपुर से, ये औरंगाबाद से, और ये श्रीमती साने इंदौर से. परिचयदाता का स्वर और परिचयकर्ता की प्रतिक्रिया से मुझे वरिष्ठ होने के बावजूद बार-बार ''पड़ौसी बच्चे'' का अहसास होता रहा
६ नवम्बर
पौराणिक या ऐतिहासिक कथाओं के नाम पर जब फ़िल्मी तरीकों से प्रेम कथा दिखाते हैं तब नया टीवी लेने की योजना को ठन्डे बस्ते में डालने का निश्चय पक्का हो जाता है .....
६ नवम्बर
दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस प्रदीप नन्द्रजोग और मुक्ता गुप्ता ने रजोनिवृत्त महिला से जबरन सम्बन्ध दुष्कर्म नहीं इसी आधार पर ४९ साल के आरोपी अच्छेलाल को बरी कर दिया . ६५/७० साल की एक महिला के साथ दुष्कर्म का दोषी मानते हुए उसे निचली अदालत ने १० साल की कैद की सजा सुनाई थी. इस मामले में हाईकोर्ट के अनुसार धारा३७६ के तहत महिला के साथ जबरन सम्बन्ध दंड योग्य है लेकिन महिला की उम्र ६५/७० साल है , यानि वह रजोनिवृत्त हो चुकी है. ऐसे में उसके साथ बनाया गया सम्बन्ध उग्र तेवर(forceful) का हो सकता है पर इसे जबरन बनाया गया(forcible) सम्बन्ध करार नहीं दिया जा सकता अर्थात रजोवृत्त महिला को दुष्कर्म पीड़ित नहीं माना जा सकता।
रजो निवृत्ति का अर्थ स्त्रीत्व की समाप्ति नहीं होता . अपने को अक्लमंद समझनेवालों को कोई ये बात भी समझाए जाकर ......ऐसे मुद्दों पर तथाकथित स्त्री संगठन चुप ही रहते हैं अक्सर ....
४ नवम्बर
हाल ही में एक मित्र ने पूछा --साइक्लोस्टाइल याद है ?ये तो खैर काफी पुरानी चीज है, अब तो फ्लॉपी भी शायद ही किसी के पास हो .......
मेरी परनानी कहती थीं --- कलयुग में पता नहीं क्या-क्या देखना पड़ेगा और मुझे लगता है पता नहीं क्या-क्या सीखना पड़ेगा ?
३० अक्टूबर
जब हम किसी बड़े व्यक्ति से (यहाँ मेरा आशय है पदासीन या लक्ष्मीपति, वास्तविक बड़ा नहीं ) बात करना चाहते हैं तो हाथ में फोन उठाने से पहले सोचते हैं कि सोकर उठे होंगे कि नहीं? भोजन तो नहीं कर रहे होंगे ?विश्राम का समय तो नहीं होगा ? इतनी रात को करना चाहिए कि नहीं ?वगैरा ,वगैरा ....लेकिन जब किसी मजदूर,मिस्त्री या कम हैसियतवाले व्यक्ति से बात करना हो तो इंसानियत गायब हो जाती है...अपने ऊँचे होने का गरूर हमारे व्यवहार में आ जाता है , एक सामंतवादी सोच दिखाई देती है , जबकि किसी के भी भोजन,विश्राम ,निद्रा में व्यवधान डालने का अधिकार किसी को भी नहीं है ......
३० अक्टूबर
त्यौहार ख़त्म हो गया , लोग-बाग सब अपने काम-धंधे से लग गए ,आधा सप्ताह बीत गया,छठ भी हो गई,पर मराठी धारावाहिकों में दीवाली और दीवाली मिलन अभी भी चल रहा है .... कोठे नेउन ठेवलय माझ्या महाराष्ट्राला ?....
२९ अक्टूबर
त्योहारों के बाद थोड़ा-बहुत वजन तो सभीका बढ़ता है , लेकिन अख़बार का कम हो गया है , एकदम दुबला पतला ....
२९ अक्टूबर
जब ओबामा लोगों के बीच होते हैं या डेविड कैमरॉन सायकल पर घूमते हैं तो हम उनकी सादगी पर मर मिटते हैं , पर हमारे शासकों ने तो राजाओं की तरह ही रहना चाहिए , उन्हें बिलकुल हक़ नहीं है अनौपचारिक होने का ....
२८ अक्टूबर
करीब चालीस साल बाद इस वर्ष बिलकुल शांत , निश्चिन्त दीवाली मनाई ...न एक दिन पहले शाम को घर लौटने की जल्दी थी और न दूसरे दिन सुबह भागने की आपाधापी .....
२७ अक्टूबर
साढ़े साती के सिर्फ सात दिन बाकी रहना
किसी उत्सव का विषय नहीं है
यह शनि के आतिथ्य का उपाख्यान और
उस महाशक्ति के प्रति विश्वास का
मौन संकेत है !!!
२७ अक्टूबर
मेरे यहाँ वही बाई आती है , जो सामने के घर में आती है . वहां सुबह ८.३० बजे और मेरे यहाँ दोपहर २.०० बजे . दोपहर दो बजे तक अपने ही घर में अख़बार , मोबाईल , टीवी , नेट , गैस,माइक्रोवेव , मिक्सर , वाशिंग मशीन आदि की वजह से मेरी ऊर्जा चुकने लगती है , पर मुझे ये अपेक्षा रहती है कि कामवाली बाई उतनी ही ऊर्जावान रहे , चाहे इस बीच उसने ४/५ अन्य घरों में दौड़ते-भागते असीमित काम किया हो ....
२५ अक्टूबर
पुराने मकान के बाथरूम में टाइल्स लगवाई थी, तो बड़ी चिंता रहती थी उनकी कि कोई खरोंच ना आए, दाग ना लगे . बड़ा संयुक्त परिवार था, कोई न कोई आता रहता था .कोई भी जब बाहर से आता था , तो उस समय की जीवन-पद्धति के अनुसार पैर धोकर अंदर आता था . आँगन में एक नल इसके लिए खास तौर पर बना हुआ था , लेकिन जब बाथरूम में टाइल्स लगी तो हर कोई उन्हें देखने के बहाने , उनपर चलने के बहाने वहीँ जाता . बाथरूम नया बनवा लिया , पर बाल्टियां वहीं थी पुरानी , एक लोहे की और एक एल्युमिनियम की. स्वाभाविक रूप से उन बाल्टियों को खिसकाकर नल का उपयोग होता , तो मेरा सारा ध्यान वहीँ लगा रहता कि कोई जोर से बाल्टियों को ना खींचे .उन्हीं दिनों माँ भी मेरे यहाँ आई थी .माँ ने मेरे से पूछा - कितने पैसे लग गए बाथरूम में ? मैंने कुछ गर्व से कहा - माँ ! पूछो मत, पूरे 2000 रुपए लग गए. वे आहिस्ता से बोली -- तो बीस रुपए और खर्च करके प्लास्टिक की बाल्टी क्यों नहीं ले आती? तू भी सुखी और बाकी सब भी ..
ऐसी छोटी-छोटी सीखों के लिए आज भी माँ की जरुरत महसूस होती है ......
२६ अक्टूबर
मेरे यहाँ वही बाई आती है , जो सामने के घर में आती है . वहां सुबह ८.३० बजे और मेरे यहाँ दोपहर २.०० बजे . दोपहर दो बजे तक अपने ही घर में अख़बार , मोबाईल , टीवी , नेट , गैस,माइक्रोवेव , मिक्सर , वाशिंग मशीन आदि की वजह से मेरी ऊर्जा चुकने लगती है , पर मुझे ये अपेक्षा रहती है कि कामवाली बाई उतनी ही ऊर्जावान रहे , चाहे इस बीच उसने ४/५ अन्य घरों में दौड़ते-भागते असीमित काम किया हो ....
२४ अक्टूबर
लूफा के बिना लगता ही नहीं है कि सफाई ठीक से हुई है
और जब लूफा नहीं था तब ?
खुरदुरे ही सही , पर माँ के हाथ थे !!!
२१ अक्टूबर
आज ज़ी न्यूज पर एंकर सुधीर चौधरी के अनुसार -- हम जी न्यूज़ को ऊंचाई पर ले जाने के लिए हमेशा प्रयासरत रहते हैं , आज हमारे संवाददाता कृष्णमोहन मिश्र १४००० फुट की ऊंचाई से आपको बताएंगे कि चीन किस तरह हमारी सीमा पर घुसपैठ कर रहा है -----
हमारे फौजी तो रोज ही इतनी ऊंचाई पर रहते हैं।
१४ अक्टूबर
जब कोई पहली बार घर आनेवाला हो तो मैं उसे घर का पता समझाने लगती हूँ ,कुछ निशानियाँ बताती हूँ ,ज्यादातर तो सुन लेते हैं, पर कुछ ''अधिक बुद्धिमान'' पहले ही वाक्य से ''ढूंढ लेंगे ,ढूंढ लेंगे '' करने लगते हैं और फिर प्रति मिनिट फोन करेगें ''अब?अब कहाँ ? किधर ? कैसे ? मकान न. ?''
गुस्सा तो इतना आता है कि या तो अब जवाब ही न दूँ या फिर गलत-सलत कुछ बता दूँ ..
१३ अक्टूबर
लगभग दो महीने पहले मैंने एक व्यक्ति को कुछ पत्रिकाएं और किताबें लाने के लिए पैसे दिए थे . मैं उसे भूल चुकी थी . आज शाम वह पूरा बण्डल दे गया ....दस बार माफ़ी के साथ ----मैडमजी ! आपने जिसपर पता और मोबाईल न. लिखा था , वह पर्चा कहीं खो गया . पिछले पंद्रह दिनों से रोज आपके इलाके के हर मराठी घर में जाकर पूछा तब आपका पता मिला . मुझे तो आपका पूरा नाम भी मालूम नहीं था , बस बैंक मालूम थी ----
इस ईमानदारी और जिजीविषा को भी नोबल पाने का हक है .....
१० अक्टूबर
आज लोकली ग्लोबल फील हो रहा है ......लेकिन फिर वही रास्ते बंद , वही चाक-चौबंद सुरक्षा.... वही गुलदस्ते , फूलों के हार और कमरे की सजावट के लिए ६ लाख के पौधे ? .....महोदय , अभी दो महीने भी नहीं बीते , जब आप लोक सेवक थे .....प्रेसिडेंट से ही मिलकर आए हैं न ? भगवान से तो नहीं ......कमाल अमरोही को भूल जाइए ......सेवक के पाँव तो जमीन पर ही अच्छे लगते हैं .....कोई मैले-वैले नहीं होते ......
९ अक्टूबर
डॉ प्रकाश आमटे की पत्नी डॉ . मन्दाकिनी आमटे एक समृद्ध परिवार से थीं . दोनों मेडिकल कॉलेज में थे , तभी वे अनुरक्त हुए और विवाह का फैसला किया . डॉ प्रकाश आमटे ने जब हेमलकसा के जंगल में आदिवासियों के लिए काम करना तय किया , तब डॉ . मन्दाकिनी आमटे ने अपनी सारी पृष्ठभूमि को परे रखकर पति के काम में हाथ बंटाना सहर्ष स्वीकार किया .
यदि परिस्थिति इसके उलट होती तो पति होने के नाते डॉ प्रकाश आमटे पत्नी के साथ जंगल जाने को तैयार हो जाते ? डॉ . मन्दाकिनी का ससुराल आमटे- परिवार नहीं होता तो क्या उन्हें ऐसा काम करने की अनुमति मिलती ?
इस तरह के कई प्रश्न मेरे मन में तब भी उठे थे , जब मैं डॉ प्रकाश आमटे का आत्म चरित्र ''प्रकाशवाटा'' पढ़ रही थी . उनके जीवन पर बनी एक मराठी फिल्म (नाना पाटेकर , सोनाली कुलकर्णी) १० अक्टूबर को रिलीज हो रही है , इस फिल्म से सम्बंधित एक कार्यक्रम टीवी पर देखते हुए अभी इन सवालों ने फिर उछाल लिया है . निस्संदेह डॉ प्रकाश आमटे अतुलनीय हैं पर मुझे डॉ . मन्दाकिनी ज्यादा आदरणीय लगती हैं ...
७ अक्टूबर
अक्सर यह होता है कि जब हम बाहर खाने जाते हैं तो घर जैसा तलाशते हैं और घर पर कुछ खास बनता है तो कहते हैं -- वाह ! बिलकुल होटल जैसा बना है , पर आज मैंने बिलकुल नया प्रयोग किया . घर पर टिफ़िन सेंटर जैसा खाना बनाया . बिलकुल पतली दाल , जिसमें दाल ढूंढते - ढूंढते काली-सी जो रोटी थी वह ख़त्म हो गई , सब्जी में ढेर सारी लाल मिर्च झोंक दी और चावल एकदम पनियल
बाद में मुझे लगा ----वजन कम करने का यह एक अच्छा नुस्खा है।
७ अक्टूबर
बचपन में माँ मूंगफली सेंकती या मटर छीलने देती (उसमें खाने का मतितार्थ छुपा रहता था ) या पकोड़े तलती तो ये जताना नहीं भूलती थी कि संभल कर , ये मुंह लग गया तो जल्दी छूटता नहीं है ......फेबु को लॉगऑन करते समय माँ की यह हिदायत बरबस याद आ जाती है ....
६ अक्टूबर
बारिश आजकल हाथों-हाथ हिसाब निपटाने में लगी है .......गर्मी खूब बढ़ी कि बारिश हो जाती है , थोड़ी-सी ठंडक और फिर तेज गर्मी ....फिर बारिश …
४ अक्टूबर
सामान्य जीवन में कोई व्यक्ति यदि किसी तीसरे व्यक्ति के बहकावे में आकर अपनी पत्नी को घर के बाहर कर दें , तो वह सम्माननीय रह पाएगा ? किसी स्त्री द्वारा प्रणय निवेदन करने पर उसके नाक-कान काट लेने में प्रशंसा जैसा क्या है ? सद्दाम को फांसी देना और एक सद्चरित्र , विद्वान ब्राह्मण के राज्य पर बिनावजह हमला करना एक जैसा नहीं लगता? बार-बार भाइयों के बीच बैर करवाना चरित्र के कौनसे पैमाने पर सही है ?
एक व्यक्तित्व को भगवान के पद पर बिठाना और फिर सदैव उसके चरित्र का गुणगान करते रहना भेड़चाल नहीं लगता ?
३ अक्टूबर
कल दशहरा है.... कल फिर रावण दहन कर हम मान लेंगे कि हमने संसार से रावणत्व को खत्म कर दिया है.... पर सच तो यह है कि..इस तरह रावणत्व को खत्म किया जा सकता है, हमारा यह सोच ही उचित नहीं है... रावण.. रावण क्यों बन जाता है ? .. .... इस पर भी विचार करने की जरूरतहै.....एक सप्त द्वीप सम्राट, चारों वेदों का ज्ञाता, महाज्ञानी ऋषि विश्रवा की संतान, संगीत का श्रेष्ठतम मर्मज्ञ , रावण- संहिता जैसे अद्वितीय ग्रंथ की रचना करने वाला .. और रक्ष संस्कृति का पोषक महान राजनीतिज्ञ रावण, समाज के लिये इतना घातक कैसे हो गया कि उसका वध करने के लिये स्वयं ईश्वर को अवतरित होना पडा....तो बात आती है पालन पोषण और बचपन में मिले संस्कारों की... राक्षसी मां केकसी के, पति विश्रवा से अलगाव और समाज के प्रति विद्रोह की भावना ने रावण के कोमल और बाल मन से ही इस विद्वेष का बीजारोपण किया था.. जो जनक की सभा में उसका उपहास किये जाने से अंकुरित हो कालांतर में वृक्ष बन गया.. और संसार एक महान ब्राह्मण की विद्वता से अपरिचित ही रह गया...एक बाल मन में नकारात्मक संस्कारों का बीजारोपण कितने बडे विध्वंस का कारण बन सकता है.. रावण उसका उदाहरण है......|
३ अक्टूबर
वाटरलू की लड़ाई में नेपोलियन हारा था , फिर भी नेपोलियन सबको याद है , जीता कौन ? शायद ही किसीको याद होगा ....सरिता देवी दुखी न हों ....आप हमेशा याद रहेंगी ....
२ अक्टूबर
घट स्थापना के दिन कोल्हापुर के प्रसिद्द महालक्ष्मी मंदिर में थी . एक ''पंडित कम पुजारी ज्यादा'' से बात हुई , बोले सुबह ५.४५ पर पहुँच जाना , दर्शन करवा देंगे , आराम से . फिर एक बार ताकीद दी , देर मत करना , वे खुद ६ बजकर ०५ मिनिट पर आए , बोले-- मैं ऐसे ही बताता हूँ . फिर बोले चलिए देवी को साड़ी वगैरह जो भी चढ़ाना हो फटाफट खरीद लीजिए , प्रसाद , नारीयल सब ( दुकान उनकी ही थी ) , फिर अभिषेक करवाएंगे ....देवी और अभिषेक ? ये कभी सुना नहीं था ... पता चला गणेशजी का अभिषेक... क्यों ? घटस्थापना पर इसका क्या औचित्य ? प्रश्न अनसुना कर दिया गया ...परिसर में जानकारी दी गई , महिलाऐं अंदर नहीं जा सकती ....क्यों ? नवरात्री की भीड़ है न इसलिए ...परम्परा और आस्था के अनुसार नवरात्री में देवी को हल्दी/कुमकुम चढ़ाना और देवी की गोद भरना बहुत शुभ माना जाता है , लेकिन इसी परम्परा को ऐन नवरात्री में दरकिनार कर दिया गया ...बताया गया ---सिर्फ पुरुष गर्भगृह में जायेंगे और जो भी आपको चढ़ाना हो , इन्हें दे दीजिए .. अब पुरुष क्या खाक गोद भरेंगे ? अमूमन तो उन्हें मालूम ही नहीं रहता कि गोद कैसे भरी जाती है ? पहले क्या करना है और बाद में क्या ?
गर्भगृह के बाहर एक बड़े से मंडप में प्रत्येक ''पंडित कम पुजारी'' अपने - अपने ग्राहक के साथ झुण्ड बनाकर तैयार था ...सामूहिक अभिषेक वहीँ हुआ ...''कृपापूर्वक'' महिलाओं को वहां पीछे की तरफ सिकुड़-सिमटकर बैठने की इजाजत दी गई ...मंत्रोच्चार शुरू हुआ .. मुझे करीब-करीब सारे मन्त्र याद हैं ...आदतन मैं भी बोलने लगी ....एक अत्यंत बुजुर्ग तुन्दिल तनु ''पंडित कम पुजारी'' ने मुझे देख लिया. चेतावनी देते हुए सख्त लहजे में बोले ---बाई ! पीछे --पीछे .. और ये मन्त्र आपको नहीं बोलना है ...मैंने त्यौरी चढ़कर पूछा - क्यों ? तो बुरा-सा मुंह बनाकर चले गए ....
पूजा के बाद आरती शुरू हुई . पहली बार देखा आरती के समय किसी को खड़े होने की इजाजत नहीं थी ...
इस तरह की तमाम विसंगतियां मैंने पहले भी महाकालेश्वर , ओंकारेश्वर , रामेश्वर , तिरुपति आदि स्थानों पर देखी है .... ..सारे तीर्थ मेरे घर के गणेशजी में मुझे ज्यादा विश्वसनीय लगते हैं
२९ सितम्बर
नेट बंद था , लेपटोप पर उँगलियाँ नहीं सधती , मोबाईल भी एक कॉल आने के बाद अकस्मात ठंडा पड़ गया , अस्पताल में भर्ती है , टीवी चलाया , बिजली चली गई , इन्वर्टर से चलाऊं , ऐसे खालिस कार्यक्रम टीवी पर नहीं आते .. कुछ किताबें उलटते - पलटते झपकी आ गई ....और वह झपकी तो क्या पूरे ३ घंटे की नींद थी ...अच्छा लगा , सोचा बेकार ही रोज तकनीक से उलझती रहती हूँ .... शाम को यूँ ही पैदल चल पडी , लेकिन मन नहीं माना, तकनीक के अंदर से झांकते कुछ चेहरे याद आ गए , अनायास सामने सायबर दिख गया ...मन को समझाया , सिर्फ मेल चेक करना है , पता नहीं , कोई जरुरी मेल हो .....पर जो मान जाता है उसे मन नहीं कहते ....एफबी पर चक्कर मारा , मित्रों से मिलने का जो सुकून अपने कमरे में है वह उस छोटे से केबिन में कहाँ ? .....बस लौट आई ...मन मसोसकर ......
अभी - अभी नेट चालू हुआ , तो लगा बीच में कितने युग बीत गए .....
२९ सितम्बर
मेरे उनके बीच कोई साम्य नहीं था , सिवाय उम्र के ....वो रंग पुती, कटे बालोंवाली , मैं खिचड़ी , बेतरतीब बालों वाली , उनके चेहरे पर पूरा मेकअप , मैं बमुश्किल एकाध क्रीम की उपभोक्ता , उनके होंठ लिपस्टिक लगे , मैंने चालीस साल पहले लगाया था , उसके बाद मन ही नहीं हुआ , वे जींस और टॉप के साथ आधुनिक वेशभूषा में , मैं हमेशा की तरह सूती साड़ी में , वह हिंदी का एकाध शब्द वापरनेवाली , मैं पूरा - पूरा हिंदी बोलनेवाली .....
पर अहा ! इतनी सारी विसंगतियों के बीच एक चीज भा गई , अपनी सी लगी ....थोड़ी देर बाद उन्होंने अपने पेडिक्योरवाले हाथों से पानी की बोतल निकाली, नेलपेंट लगी उँगलियों से आहिस्ता से ढक्क्न खोला , मुंह लगाया , पानी पिया ,फिर ढक्कन बंद किया ......और ....और ठीक हम बुजुर्गों की तरह बोतल को उल्टा करके देखा ......पानी तो नहीं टपक रहा
२० सितम्बर
मुझे बहुत मजा आता है , जब कोई नया व्यक्ति मुझे समझाने लगता है कि चेक कैसे भरना है . वह दो/तीन बार मुझे हर बात बताता है , फिर जब तक मैं चेक भरकर , फाड़कर उसके हाथों में ना दे दूँ , वह बड़े ध्यान से देखता रहता है कि मैं कुछ गलती तो नहीं कर रही हूँ .....और सबसे ज्यादा मजा तो तब आता है , जब उसे आखिर में पता चलता है कि मैंने कितने ही वर्षों तक यही सब कुछ किया है ...उसका चेहरा ....चलिए छोड़िए ...!!!
१७ सितम्बर
टिफिन , होमवर्क , झूलाघर सारे यातनामय शब्द जो २५ साल पीछे छूट गए थे , फिर सजीव हो रहे हैं ......नातिन बड़ी हो रही है .......
१६ सितम्बर
मेरा शरीर हैरान - परेशान है , कहता है , खुद तो सेवा निवृत्त हो गई , मुझे क्यों तंग कर रही है ? पहले सुबह ५.३०/५.४५ तक चाय मिल जाती थी , अब ८.०० बज जाते हैं . सुबह से प्राणायाम और योगासन ..पता नहीं क्या-क्या करती रहती है ....पहले अच्छा ९.३०/१०.०० बजे बैठने के लिए कुर्सी मिल जाती थी , अब कभी कपडे धुल रहे हैं , कभी रसोई के डिब्बे , दिन में दसियों फोन पर बोलना पड़ता है , शाम को कोई न कोई आ जाता है , शाम की चाय कितने वर्षों से नहीं बनी थी , अब वो भी बनाना पड़ती है , रात का खाना भी मजे-मजेसे बनता है फिर नेट ..उसके बाद किताबें ....उफ़ , ये रिटायरमेंट स्कीम किसके दिमाग की उपज है ?
९ सितम्बर
एक बुजुर्ग (मेरे से भी बुजुर्ग smile emoticon )हैं , जो अक्सर बैंक से संबंधित कोई समस्या या काम हो तो मुझे फोन कर बुलाते हैं . कल भी बुलाया था , पर उनके दिए समय पर मैं जा न सकी . शाम को गई , तो वे निर्णय ले चुके थे , मुझसे बोले - ठीक है न ?. मैंने मज़ाक में कहा - दादा , अब आपको मेरी जरुरत नहीं , आप सही निर्णय लेने लग गए . बोले - ''मुझे बैंक का तो ज्यादा पता नहीं , बस इतना जानता हूँ कि निर्णय दिमाग से और काम भावना से करना चाहिए , सो कर दिया ''... मैं तो मुरीद हो गई उनकी ...हम कितने भी बड़े हो जाय , जो हमसे भी बड़े हैं , उनसे कुछ न कुछ तो सीखने को मिलता ही है.......
७ सितम्बर
हास्य/विनोद ऐसे शब्द हैं, जिनके बारे में सोचने मात्र से अच्छा लगता है , पर कल मेरे मन में इन शब्दों ने दहशत पैदा कर दी ..... एक कवि सम्मेलन का निमंत्रण था ....आयोजकों की ओर से पहले से कोई जानकारी नहीं थी और उन्होंने इसे हास्य-कवि सम्मेलन के नाम से प्रचारित किया था .....दोपहर तक कुछेक फोन मेरे पास आ गए थे , जो मुझे और मेरी कविताओं को जानते हैं , वे आश्चर्य चकित थे कि मैं हास्य-कवितायेँ कबसे लिखने लगी ? मैं निमंत्रण स्वीकार चुकी थी, सो तनाव में थी . पहली कविता ऐसे ही चलताऊ सुनाई और बाद में क्षमा-याचना के साथ बता दिया कि लेखन में हास्य/व्यंग्य से मेरा दूर-दूर तक नाता नहीं है .....लेकिन लोगों ने बड़े ध्यान से मुझे सुना और दाद भी दी ......तब जाकर मुझे हंसी आई ....
६ सितम्बर
आज पढ़ते-पढ़ते एक नई जानकारी मिली . अक्सर लोग MADAM का लघु रूप Mam या Ma'am करते हैं और यह अमेरिकन अंग्रेजी है , पर मूल अंग्रेजी में इसका उपयोग Mother यानि माँ के अर्थ में होता है , Madam के अर्थ में नहीं ....
५ सितम्बर
दो दिनों में कम से कम २५ लोगों ने पूछ लिया है -- अब क्या करोगे ? मन में आता है कहूँ -- पहले झक मारती थी , अब भाड़ झोंकूंगी .....
२ सितम्बर
आज से मैं भी ग्राहकों की कतार में !!!......
१ सितम्बर
जो व्यक्ति मां की सुनता है , पत्नी की नहीं उसे Mama's boy कहते हैं . जो पत्नी की सुनता है , मां की नहीं उसे जोरू का गुलाम कहते हैं, पर जो मां की भी नहीं सुनता , पत्नी की भी नहीं उसे क्या कहते हैं ?
२६ अगस्त
आज जी मराठी पर एक बहुत अच्छा कार्यक्रम ''उंच माझा झोका'' ( आसमान छूता (ऊँचा) मेरा हिंडोला) देखा . विविध क्षेत्रों में अतुलनीय काम कर रही महिलाओं का सम्मान समारोह था . अत्यंत गरिमामय . कोई तेंदुए की मानसिकता पर काम कर रही है , तो कोई मूक-बधिर बच्चों को अभिनय सिखा रही है . कोई कुपोषित महिला एवं बच्चों का भार सम्हाले हैं , तो कोई पिछड़ी जाति की महिलाओं को निशुल्क कानूनी सहायता दे रही है . गजब का कार्यक्रम था . समझ में नहीं आता कि मराठी में ऐसे कार्यक्रम हो सकते हैं तो हिंदी में क्यों नहीं ? हिंदी दर्शकों को कमतर क्यों आँका जाता है ? स्वयं ''जी '' चैनल मराठी में ऐसे कार्यक्रमों की संकल्पना करता है , तो हिंदी में क्यों भड़कीले कार्यक्रम तैयार करता है ?
२५ अगस्त
आज एक व्यक्ति मेरे घर के फाटक के बाहर खड़ा होकर तांक-झांक कर रहा था . उसे देखकर मेरे सामने रहनेवाले सज्जन अपनी बालकनी में आए , थोड़ी देर तक देखते रहे, फिर उससे पूछा - क्या बात है भाई ? वह व्यक्ति बोला - मेडम से मिलना है , उनके दरवाजे की घंटी ढूंढ रहा हूँ . सामनेवाले बोले - घंटी बाहर नहीं, अंदर है . वह व्यक्ति बड़ी झिझक के साथ फाटक खोलकर अंदर आया ( जैसा कि उन्होंने मुझे बाद में बताया ) और घंटी बजाई . मैंने उन्हें देखा और कहा -- आइए ! तब सामनेवाले घर के अंदर गए . वे चले गए , तब सामनेवाले आए - बोले भाभी ! माफ़ कीजिए , मैं भी तांक- झांक कर रहा था , ये देखने के लिए कि वे आपके मेहमान हैं या कुछ और , आजकल घटनाएं बहुत होती हैं न इसलिए ...
मुझे दोनों की तांक-झांक अच्छी लगी . एक को अकस्मात घर में घुसने की झिझक थी और दूसरे को मेरी चिंता .
२४ अगस्त
ये समाप्त होगा , वो समाप्त होगा , सबसे पहले शिलान्यास , उदघाटन आदि पर रोक लगनी चाहिए , जो काम जनहितार्थ है और जिन्हें करने के लिए ही उन्हें चुना गया है , उसका इतना शोर-शराबा क्यों ? और "सेवकों" को तो बिलकुल ही नहीं करना चाहिए . हम ''जॉब'' करनेवाले रोज अपना काम चुपचाप करते ही हैं .किसी मजदूर , शिक्षक,नर्स, कर्मचारी , डॉक्टर , वकील , पत्रकार , न्यायाधीश , उद्योगपति आदि किसी , किसी की भी कभी उनके निर्धारित काम करते हुए तस्वीर छपती है क्या ? यदि 'कर्तव्य' (जॉब) चुपचाप किया जा सकता है तो 'सेवा' का ढिंढोरा क्यों ?
१९ अगस्त
जैसे पेड़ की छाल देखकर उसकी उम्र तय की जाती है , वैसे ही मेरे बिना रंगे बालों को देखकर लोग मेरी उम्र का अंदाज लगाते हैं . फिर पूछते हैं - रिटायरमेंट हो गया क्या ? और जब मैं जवाब देती हूँ - नहीं अभी कहाँ, तो बिचारे .....
१९ अगस्त
एक उपहार खरीदने गई थी, तो उसने कुछ मूर्तियां बताईं मैंने पूछा - संगमरमर है ? वो बोला - नहीं आंटी , इसे मार्बल कहते हैं . मैंने कहा- अच्छा ? हम इसे संगमरमर कहते हैं . फिर कीमत पूछी . उसने बताई - इलेवन सेवन्टी. मुझे सेवन्टी सुनाई नहीं दिया . मैंने फिर पूछा - ग्यारह सौ कितना ? बोला -सेवन्टी. मैंने उसे पूरा किया - ग्यारह सौ सत्तर ? वो जोर देकर बोला - वन थाउजेंड वन हंड्रेड सेवन्टी . वो मूर्ती मेरी गरिमा और रिश्ते के अनुकूल नहीं थी . उसी समय मेरी नजर गणेशजी की एक सुंदर मूर्ती पर पड़ गई . मैंने पूछा - और वो लॉर्ड गणेशा ? वो चकरा गया . थोड़ा सकुचाते हुए बोला - मतलब गणेशजी ? उस समय उसकी झेंप देखने लायक थी .मुझे बाद में लगा मोबाईल से फोटो ले लेना था ....
१७ अगस्त
आज एक कार्यक्रम में गई थी , एक युवा ने मुझे सीढ़ी चढ़ते देख पूछा- सीढ़ी चढ़ पाएंगी आप ? उधर लिफ्ट भी है .जैसे ही ऊपर पहुंची एक परिचित युवा ने खड़े होकर अभिवादन किया और मेरे बैठने तक खड़ा रहा . बाद में चाय आई तो किसी और ने कहा - आंटी , मीठी चाय चलेगी न ?
वो तो थोड़े -से ही होंगे , जो ख़राब हैं , फिर पूरी पीढ़ी को क्यों कोसा जा रहा है ? और जो कोसते हैं उनकी पीढ़ी के शत - प्रतिशत लोग अच्छे हैं क्या ?
१६ अगस्त
क्या बच्चे अब भी रखते हैं ,अपनी कॉपी-किताब में मोरपंख या पीपल के पत्ते ?
१४ अगस्त
अक्सर स्त्री लेखिकाओं पर ये आक्षेप रहता है कि उनका लेखन दायरे में बंधा रहता है , लेकिन यह बहुत स्वाभाविक है , क्योंकि जो उस दर्द को समझ सकता है वही तो लिख पाएगा . कवि भवानीप्रसाद मिश्र भी यही कहते हैं --
''जिसका दुःख लिखना है , उसका दुःख जानो तो ''
१३ अगस्त
मेरे पास वाटर प्यूरीफायर है , पर भारत रत्न या पद्म अलंकारों में से कुछ भी नहीं , क्या मैं किसी विज्ञापन में काम कर सकती हूँ ?
१२ अगस्त
अभी जिसने नमस्ते की कौन था वह ? अनिल.सुनील या राजेश ? शायद राजेश था , पर राजेश कौन ? मिश्रा , गुप्ता या जैन ? शायद गुप्ता .....नाम तय हो जाता है , फिर कुछ दिनों बाद किसी सन्दर्भ में पता चलता है , ना तो वह राजेश था और ना ही गुप्ता , वह तो कोई और ही था ....हाहाहा.....
स्मृति-विस्मृति के हिंडोले में झूलती यह देह अवस्था कभी-कभी बड़ा आनंद दे जाती है !
११ अगस्त
फिल्मों में या धारावाहिकों में जब किसी के यहाँ पुलिस का छापा पड़ता है तो अक्सर कई दराजें खाली या बड़े करीने से जमी दिखाई देती है . कौन होता है उन घरों में इतनी फुर्सत में ?
०९ अगस्त
ये एक दिली इच्छा है कि जो लोग अपने मोबाईल के संवाद , सीडी प्लेयर , कार के बेहूदा रिवर्स इंडिकेशन आदि मुझे जबरदस्ती सुनाते रहते हैं, उनको पं. ओंकारनाथ ठाकुर, बड़े गुलाम अली खां , मोघुबाई कुर्डीकर या गंगुबाई हंगल का गायन लाऊड स्पीकर लगाकर सुनाऊँ ......
०८ अगस्त
एक समाचार के अनुसार ऐसा कानून लाने की तैयारी चल रही है , जिसके द्वारा अब माँ-बाप अपने बच्चे को दण्डित नहीं कर पाएंगे और यदि उन्होंने ऐसा किया तो वे स्वयं दंड के अधिकारी होंगे .
यानी एक खींचकर दूंगा तो अकल ठिकाने आ जाएगी , बताऊँ तेरे को , एक पड़ेगी न तब समझ में आएगा , रुक जा अभी बताता/बताती हूँ जैसे वाक्य पूरी तरह हमारी जिंदगी से बाहर हो जायेंगे , वैसे अभी तो यही चलन है कि बच्चों को कुछ नहीं कहना , लेकिन हमारी पीढ़ी और उसके बाद की पीढ़ी ने ये 'प्रसाद'खाया है , हम लड़कियां तो फिर भी बची रहती थी पर लड़का तो शायद ही कोई वंचित रहा हो .
ये सब कहनेवाले लोग जब जीवन में नहीं रहते , तब उनका महत्व पता पड़ता है . कितनी ही गलतियां हो जाती हैं और लगता है कि काश ! कोई कहे... एक खींचकर दूंगा ...........
७ अगस्त
कभी-कभी लगता है कि अब झगड़ा होनेवाला है और ठीक उसी समय सामनेवाला शांति बनाए रखता है .....बड़ा अपमानास्पद अनुभव होता है .......वह कुछ बुरा-भला कहता उससे ज्यादा बुरा इस बात का लगता है कि इस लायक भी नहीं ?
०७ अगस्त
डॉ प्रकाश आमटे की पुस्तक ''प्रकाशवाटा'' (आलोकित राहें) में एक बहुत ही करुण प्रसंग का वर्णन है . उनकी कर्मस्थली हेमलकसा और आसपास के गांवों में सन १९९१ में हैजा फैल गया . उनके पास इलाज के लिए रोज ही मरीज आते थे .एक दिन एक औरत अपने छोटे बच्चे को लेकर आई . रातभर उसका इलाज किया , सुबह तक वह खतरे से बाहर हो गया तो वो औरत उसे वहीँ छोड़कर जाने लगी . हेमलकसा के कार्यकर्ताओं ने जब उसे टोका तो उसने रोते-रोते जो बताया वह सुन्न कर देनेवाला था . एक दिन पहले ही उसके पति की हैजे से मृत्यु हो गई थी . दोनों बच्चे भी बीमार थे , तो उसने सोचा कम से कम उनका इलाज तो हो जाय , इसलिए वह दोनों को लेकर चल पड़ी, लेकिन रास्ते में एक बच्चा चल बसा , उसे वहीँ जंगल में एक पेड़ के नीचे रखकर वह इस बच्चे को लेकर अस्पताल आई थी , इसे डॉ आमटे के हवाले कर उस बच्चे को दफ़नाने जाना चाहती थी .
०७ अगस्त
हमारे बचपन में जब बाल लम्बे और घने हुआ करते थे , चोटी ज्यादा देर तक सलामत रखना हो तो मेहनत से ''खजूर चोटी'' बनाते थे . अमूमन दो चोटी का जमाना था . पहले बालों को दो हिस्सों में बांटकर फिर हरेक हिस्से के पांच भाग करते चोटी गूंथते थे (सामान्यतया तीन भाग किए जाते हैं ) , उसमें देर बहुत लगती थी तो विशेष अवसरों पर ही गुंथी जाती थी ......यू ट्यूब पर हमारा ये देसी तरीका 'बालों को दीजिए मॉडर्न पार्टी लुक' के नाम से उपलब्ध है ....
०६ अगस्त
सुबह जगजीतसिंग और पं. भीमसेन जोशी को सुनकर बहुत अच्छे मूड में घर से निकली थी . ग़ज़ल और आलाप का अद्भुत मिश्रण कानों में गूँज रहा था ....लेकिन ....लेकिन जब भरी बारिश में ऑटो रिक्शा की तलाश में करीब एक किलोमीटर चलना पड़ा , तो जगजीतसिंग की जगह रिक्शा चालक और पंडितजी के आलापों की जगह रिक्शा की घर - घर ने ले ली ....ऐसा दिन ईश्वर किसी को न दिखाए .....
०५ अगस्त
मालकौंस सुबह-सुबह भी अच्छा लगता है , बशर्ते पं. भीमसेन जोशी गा रहे हों .....
०५ अगस्त
कभी - कभी बड़ा यक्षप्रश्न खड़ा हो जाता है ......दही-चावल खाना हो तो चावल में नींबू का अचार मिलाया जाय या दही में भुना जीरा और काला नमक ......जिव्हा हमेशा परेशानी का सबब होती है , खाए तो , बोले तो और नहीं बोले तब भी ....
०५ अगस्त
जैसे जहाज को पंछी उडी पुनि-पुनि जहाज पर आवै .......५००/६०० कितने भी चैनल घुमा लो आखिर डीडी के अलावा कहीं गुजारा नहीं है .....दूरदर्शन के चेनल्स का कोई विकल्प नहीं .....
०४ अगस्त
मित्रता की व्याख्या करते हुए मराठी के प्रसिद्द लेखक पु.ल.देशपांडे कहते हैं "रोज याद आना जरुरी नहीं, रोज भेंट होना भी जरूरी नहीं ,यहीं नहीं रोज बातचीत करना भी जरूरी नहीं. मैं तुम्हें भूल नहीं पाउँगा यह तुम्हारे प्रति मेरा विश्वास है और इस विश्वास का तुमको अहसास होना यही हमारी मित्रता है "
कुल मिलाकर यह कि मिलने से ज्यादा जरूरी है , जुड़ना .....
३ अगस्त
तुम मेरे स्टेटस पर कोई टिप्पणी करो न करो , उसे पसंद भी करो न करो , पर उस पर नज़र जरूर डालते होगे , मेरा तुम्हारे प्रति यह विश्वास ही मेरी तुम्हारी मित्रता है .....
०३ अगस्त
कभी बल्ब गया , कभी घड़ी की बैटरी , कभी नल गायब , तो कभी बिजली , कभी कम्प्यूटर नहीं चल रहा तो कभी वाशिंग मशीन ........और फिर एक दिन ............................
०२ अगस्त
आज मन्ना डे के बारे में एक लेख पढ़ रही थी , तो एक रोचक जानकारी मिली .....उनकी पत्नी सुलोचना केरल से थी और वे स्वयं बंगाली , लेकिन सुलोचना रविन्द्र संगीत से प्रभावित थी . मन्ना डे को लगा कि इसी मुद्दे पर परिवार से विवाह के लिए आसानी से सहमति मिल जाएगी , परन्तु ऐसा नहीं हुआ . परिवार के बुजुर्गों (पिता, चाचा आदि ) की टिप्पणी थी -- कोई बंगाली लड़की नहीं मिली ?
किन्तु उनकी माँ ने उन्हें एक ओर ले जाकर कहा - जा ! शादी कर ले , ये तेरी शादी है , तेरे पिताजी की नहीं ......
०१ अगस्त
पुराने कपड़ों को यदि बिना प्रेस किए रखा जाय तो वे बिलकुल दीन-हीन गरीब व्यक्ति जैसे दिखाई देते हैं और उन्हीं कपड़ों पर प्रेस घुमा दें , तो वे उन लोगों जैसे लगते हैं , जो अपनी तड़क-भड़क से धनाढ्यों में शामिल होने का दावा करते तो हैं , पर कहीं न कहीं उनकी पोल खुल ही जाती है ......
०१ अगस्त
मुझे सीआयडी धारावाहिक देखना अच्छा लगता है , कभी भी चालू करो , कभी भी बंद करो .....प्रद्युम्न , दया , अभिजीत क्या करेंगे , क्या बोलेंगे सब तय होता है और सबसे आखिर में अपराधी को एक झन्नाटेदार तमाचा पड़ेगा यह भी ....गौरवशाली १७ साल ....
३१ जुलाई
मेरे पिता स्व. र.वि.शिरढोणकर की स्मृति में गत २० जुलाई को आयोजित कार्यक्रम में एक बात हुई , जिसका उल्लेख मैं विशेष रूप से इसलिए करना चाहती हूँ क्योंकि मैं ऐसा मानती हूँ कि समाज में सकारात्मक भी बहुत कुछ होता है और उसका प्रसार होना चाहिए .
मेरे दोनों भाई ४२ वर्ष से स्मृतिदिन का आयोजन करते रहे हैं . अब वे दोनों अपनी उम्र के ७ दशक पार कर चुके हैं , ऐसे में पिछले वर्ष एक स्वाभाविक प्रश्न आया कि इस आयोजन का भविष्य क्या है ? ऐसे में हमारे बच्चे स्वस्फूर्त आगे आए और अपनी-अपनी जमा पूँजी से जून २०१३ में ''र.वि.शिरढोणकर स्मृति न्यास'' का गठन किया , ताकि आगे भी स्मृति समारोह हो सके. पिताजी मराठी मासिक हितचिंतक ( १९३३ - १९३७) निकालते थे , जिसका पानीपत विशेषांक बहुत चर्चित हुआ था और जिसका उपयोग आज भी सन्दर्भ ग्रन्थ की तरह होता है . नव गठित ''र.वि.शिरढोणकर स्मृति न्यास'' के युवा सदस्यों ने इस अंक के पुनर्मुद्रण का बीड़ा उठाया , साथ ही पिताजी की पांडुलिपियों का संगणिकीकरण कर उनकी सीडी बनाई . इस वर्ष के कार्यक्रम की शुरुआत से पहले मैंने न्यास के गठन की घोषणा सभी भाई-बहनों की ओर से की और सारे सूत्र न्यास को सौंप दिए . इस वर्ष का कार्यक्रम न्यास के तत्वावधान में हुआ .
न्यास के सदस्य हैं -- स्मिता वाजपेयी (इंदौर), श्रद्धा टिल्लू (पुणे), यशदा शेकदार(अहमदाबाद), मेधा कोरान्ने (बड़ोदा), स्वरांगी साने पुराणिक (पुणे) और विभास साने (भोपाल ) .
इस सारे अभियान में मेरी बहु तृप्ति हर तरह से हमारे साथ थी ही , लेकिन विशेष उल्लेख मैं सभी दामादों का करना चाहूंगी , जिन्होंने हर कदम पर बेटियों को सहयोग दिया . अभी भी जहाँ समाज में लड़कियों को सताने की घटनाओं में कोई कमी नहीं आई है , उस परिप्रेक्ष्य में दामाद अजय वाजपेयी , अरविंद टिल्लू , नीलेश शेकदार , विवेक कोरान्ने और अभिनय पुराणिक के प्रति हम गर्व अनुभव करते हैं .
३१ जुलाई
नौकरी सात घंटे की होती है , पर आज छुट्टी के दिन सात घंटे काव्यमय बीते . शाम को कवि-मित्रों के साथ बैठक और बाद में अकस्मात मराठी के विख्यात कवि श्री अरुण म्हात्रे और उनकी पत्नी श्रीमती अनुया म्हात्रे से भेंट ......दिन ऐसे निकले तो जिंदगी मैं एक बार फिर जीना चाहूंगी
२९ जुलाई
सुबह अख़बार के बिना आँख नहीं खुलती , रात को फेसबुक के बिना आँख नहीं लगती .....अजब माया है भगवन !!!
२८ जुलाई
कहीं पढ़ा था कि धीमा चलने पर याददाश्त भी धीमी हो जाती है , अब तेज चलती हूँ तो पचास साल पुरानी बात भी याद आ जाती है ......कुल मिलाकर स्मृति का होना / नहीं होना दोनों तकलीफदेह ही होता है ......
२८ जुलाई
मैंने माँ की झांझ को बुढ़ापे के लिए सम्हालकर रखा था , सोचती हूँ जुकरबर्ग को पार्सल कर दूँ ......
२५ जुलाई
दो/चार दिन बच्चों के साथ रह लो तो भाषा का स्तर ''कादम्बिनी''से गिरकर सीधे ''भास्कर'' पर आ जाता है ......
२४ जुलाई
कर दो प्रकार के होते हैं , प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर . मुझे उन पत्रकारों के प्रति हमदर्दी हैं , जो रोटी-रोजी के लिए नेताओं को प्रत्यक्ष कर की तरह बर्दाश्त करते हैं , बाकी हम सबको तो भुगतना ही है अप्रत्यक्ष कर .....
२३ जुलाई
बारिश के दिनों में खुद गीला होने पर उतना अफ़सोस नहीं होता , जितना अपनी लापरवाही या आलस की वजह से अध सूखे कपड़ों के गीला होने पर होता है !!!
१८ जुलाई
मेरी माँ दूध की भगोनी को खाली करने के बाद उसमें गरम पानी डालती थी , फिर उस पानी को या तो चावल में डालती या आटे में (कैल्शियम का पूरा उपयोग) , तब भी नीचे मलाई बच जाती , उसे हाथ से निकालकर चेहरे और हाथ पैरों पर मलती थी .....
मेरी माँ कभी ब्यूटी पार्लर नहीं गईं , पर आखिर तक (८२ वर्ष) उनका चेहरा दमकता रहा
१७ जुलाई
पिछले दिनों मराठी कविता समूह का वार्षिक सम्मलेन हुआ था , जिसमें अधिकांश युवा थे, वे मुझे शुद्ध मराठी में ''काकू'' (मराठी में ताई या चाची दोनों को काकू कहते हैं ) कह रहे थे , मुझे अच्छा लगा , पढ़े - लिखे थे तो अंग्रेजी तो आती ही थी , पर किसीने भी आंटी नहीं कहा ..............काश कोई कहता तो मैं कह पाती ---''मुझे आंटी मत कहो !!!''
१५ जुलाई
आँख में जबसे मोती आया है , रोशनी में हीरे चमकने लगे हैं .....
११ जुलाई
कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है .......बारिश आने पर बिजली का जाना लाज़मी है ....
१३ जुलाई
आज नया चश्मा लेकर आई , लेकिन नज़र वही है पुरानी ....
१० जुलाई
अश्वत्थामा हतो , नरो वा कुंजरो वा .......नर हो या हाथी मरना अश्वत्थामा को ही है ....मानसून ,बजट , अर्थ व्यवस्था ,राजनीती , गुंडा-गर्दी ,अपराध ,कुछ भी हो उन सबका प्रभाव लिंग, जाती ,धर्म, सम्प्रदाय से परे, भुगतना आम जनता को ही है ....
७ जुलाई
फेसबुक की मित्रता सूची में भले हजारों नाम हों , फिर भी मित्रता एक दायरे में सिमट जाती है.....
७ जुलाई
कुछ लोग हमारे जीवन में टीवी की तरह होते हैं , हमें पता होता है कि वाहियात और बकवास है , फिर भी हटा नहीं पाते हैं ....
६ जुलाई
आजकल सुबह - सुबह अख़बार पढ़ने का मन नहीं होता रोज वही मनहूस ख़बरें .....अख़बार भी अब टीवी धारावाहिक जैसे लगने लगे हैं ,.......
५ जुलाई
मेरी माँ मुझे बहुत होशियार समझती थी (आज की भाषा में स्मार्ट ) , वो यदि आज अपनी नाती-पोती / पड़नाती -पड़पोती को देख लेती तो मुझसे कहती --- तू तो निरी मूर्ख है ....
४ जुलाई
पिछले साल जरा ज्यादा उत्पात किया था इसलिए बोलना पड़ा था , बड़े-बुजुर्गों की बात का ऐसे बुरा नहीं मानते अब आजा जल्दी से कोई कुछ नहीं कहेगा..... कुछ और परेशानी है क्या ? और डरता क्यों है , तुझे बगदाद जाने के लिए थोड़े ही कह रहे हैं , ना ही तिर्कित जाना है अपने सीधे-सादे मालवा में आना है बस ! मूंग के भजिये , दाल-बाफले,गर्मागर्म जलेबी कितने सारे काम रुके पड़े हैं भिया ....अब इस शनिवार-रविवार की छुट्टी मत बिगाड़ना....आजा हो
४ जुलाई
वे कह रही थीं --- आजकल तो बच्चों को डांटने में भी डर लगता है , कुछ कहा और उन्होंने कुछ कर लिया तो ?
मेरी तो समझ में ये बात नहीं आई कि डरना बच्चों ने चाहिए कि माँ-बाप ने ? उन्हें बचपन से ही डांट की आदत रहेगी तो बड़े होने पर वे कुछ कर नहीं बैठेंगे , बल्कि कोई भी गलत काम करने से पहले वे सोचेंगे , एक लिहाज रखेंगे .होता यह है कि पहले तो माँ - बाप सोचते हैं कि उनके बच्चा लाखों में एक है और उसके तमाम कारनामे न सिर्फ बर्दाश्त करते हैं , बल्कि उसका बखान भी करते हैं और फिर जब पानी सर से गुजरता है तो यकायक उसे भरपूर बातें सुनाते हैं .तब बड़ा हो चुका बच्चा अपने को अपमानित महसूस करता है और इसी वजह से जीवन से खेल जाता है .
अभी नई पीढ़ी में तो यही प्रचलन हो गया है कि बच्चे को कुछ नहीं कहना , लेकिन यदि हम बड़े उसे अच्छा - बुरा नहीं बताएँगे , तो कौन बताएगा ?
३ जुलाई
अभी क्या रमजान का महीना है न , इसलिए फल महँगे हो गए हैं
अभी क्या बड़ी (देवशयनी) ग्यारस है न , इसलिए फल महँगे हो गए हैं
सावन शुरू हो गया न आंटी , इसलिए फल महँगे हो गए हैं
आप तो 'मराठी' हो आपको क्या बताएं ,गणेशजी आये हैं न , इसलिए फल महँगे हो गए हैं
वो जैनियों के पचूषण (पर्युषण) चल्लू हो गए हैं , इसलिए फल महँगे हो गए हैं
नवरात्री है मॅडम , फल तो महँगे होंगे ही
दीवाली में तो हमेशा ही फल-सब्जी महँगी होती है
बड़ी ग्यारस (देवउठनी) फिर आ गई आंटी , फल तो इसी भाव बिकेंगे
वो क्या दत्त जयंती हैं न कुछ , उसी की वजह से फल महँगे हैं
संक्रांति है और मावठा भी गिर गया , फल कम है मार्किट में , भाव तो बढ़ना ही है
शिवरात्रि के कारण थोड़े चढ़ गए हैं फलों के भाव , क्या करें हम भी
होली-दीवाली , वार-त्यौहार , इसी समय तो हम थोड़ा कमा पाते हैं
नवरात्री हैं न , अब रामनवमी तक यही भाव रहेंगे
गर्मी कैसी पड़ रही है , आप तो एसी में रहते हो दिनभर हें हें हें हें , आम का तो ऐसे ही चलता है
अभी क्या रमजान का महीना है न , इसलिए फल महँगे हो गए हैं
२ जुलाई
बचपन में मैथिलीशरण गुप्त की कविता पढ़ी थी
कुछ काम करो , कुछ काम करो
जग में रहकर कुछ नाम करो
और बचपन में अनेक चीजों की छाप ऐसे पड़ती है कि ---देखन में छोटी लागे , घाव करे गंभीर...... और ऐसा ही कुछ हुआ कि नाम-वाम तो क्या मिलना था , काम करना जरूर आदत में आ गया .....
१ जुलाई
नदी जोड़ो अभियान से हो सकता है कि जलसंकट ना रहे , लेकिन बारिश और बहते पानी का आनंद तो कुछ और ही होता है ....
३० जून
जबसे मैंने बालों को रंगना छोड़ दिया है , पहली बार मिलनेवाले ज्यादातर लोगों को विश्वास ही नहीं होता कि मैं अभी भी नौकरी कर रही हूँ . शुक्र है , बैंक का नियामक मंडल ऐसा नहीं सोचता , अन्यथा हर माह का वेतन खटाई में पड़ जाता ........
३० जून
शाम के खाने में क्या बनेगा ? ..... शाश्वत और चिरंतन प्रश्न , जितने कम लोग घरमें उतना ज्यादा विकराल ....
२९ जून
सरोकार मुझे हर चीज से है , पर सिर्फ फेसबुक तक ....
२९ जून
गूगल पर कुछ भी खोजा जा सकता है और ज्ञान वृद्धि हो सकती है , पर क्या खोजना है इतना ज्ञान तो हो .....
२८ जून
अभी एक बेहतरीन बांग्ला फिल्म देख रही थी ( नाम छूट गया ) . इस फिल्म में उस समय का घटनाक्रम था , जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया था . नायिका का पति इराक में नौकरी करता है . टीवी पर हमले की खबर देख नायिका चिंतित हो जाती है . पति की कोई खबर नहीं . वह यहाँ -वहाँ दौड़ती फिरती है , तभी उसे माँ के पड़ौस में रहनेवाली सहेलीनुमा भाभी मिलती है , जो किसी एनजीओ में काम करती है . भाभी उससे कहती है कि यह एनजीओ नायिका की भी मदद कर सकता है .वे दोनों चलते -चलते बात करती है .
भाभी कहती है इस एनजीओ को अमेरिका से मदद मिलती है . अमेरिका उसे कपड़े, खिलौने, खाना तमाम चीजें देता है . नायिका हौले से कहती है -----और अमेरिका युद्ध भी देता है . नायिका यह कहकर आगे बढ़ जाती है और भाभी स्तब्ध वहीँ ठिठक जाती है
इस फिल्म की कई और खासियतें भी थी . नायिका दुखी है , पर दहाड़ें मारकर रोती नहीं है , सास उसे कोई तानाकशी नहीं करती . नेपथ्य में ढेण -ढेण बजनेवाला कोई संगीत नहीं , कोई गाना नहीं , अनावश्यक पात्र नहीं, नायिका की साड़ी न तो बिलकुल फटी पुरानी , न ही एकदम चमकीली , मेकअप सामान्य .सबकुछ बिलकुल प्राकृतिक , कोई कृत्रिमता नहीं .
२८ जून
आज इंदौर में रास्ता रोको अभियान .....कल महामहिम जो आ रहे हैं .....
हम यदि एक/डेढ़ घंटे में हवाई अड्डे से घर तक सही -सलामत पहुंचकर अपने काम धंधे कर सकते हैं , तो इनके लिए रास्ता बिलकुल साफ़ होने की क्या जरुरत है ? वैसे भी इन्हें कौनसे काम रहते हैं , कौनसी नौकरी करना है , धंधा-पानी करना है , मजदूरी करना है . वो तो सायरन बजाती गाड़ियां निकलती हैं इसलिए , वर्ना पूरे शहर में सौ लोग भी नहीं पहचानेंगे .......
२७ जून
मै पक्की हिन्दू हूँ और अपने ब्राम्हणत्व पर मुझे गर्व है , लेकिन सोमवार को शिव मंदिर , मंगल - शनि हनुमान मंदिर , बुधवार गणेश मंदिर , गुरुवार दत्त मंदिर , शुक्रवार देवी के दर्शन मैंने कभी नहीं किये .... हिंदुत्व और ब्राम्हणत्व की अवधारणा पर मेरा विश्वास है . मठ और मठाधीशों से चिढ है और सिर्फ धार्मिक नहीं , साहित्य , संस्कृति , कला , तमाम सामाजिक विषयों , अनेक प्रतिष्ठानों और बहुत सारी जगहों पर जो जबरन कब्ज़ा जमाये हैं , उन सभी से मुझे चिढ है
२४ जून
रोज रोज सिर्फ बादल देखने से तो अच्छा हैं , चमकीली धूप निकले . हम उसे कम से कम कोस तो सकते हैं ....
२३ जून
किसीका भी बिछुड़ना ख़ुशी का सबब नहीं हो सकता और विधवा होने के मायने हैं , पति से हमेशा के लिए वियोग . हमारे देश में तो आज भी पति के जाने का अर्थ सब कुछ समाप्त हो जाना होता हैं . उसे अलग जमात का , अस्पृश्य -सा मान लिया जाता हैं .विधवा हुई महिला शुरू के कुछ दिनों तक एक अपराध बोध में जीती हैं , उसके प्रति सबकी अपेक्षा भी यही होती हैं , मानो पति की मृत्यु के लिए वही जिम्मेदार हैं . आर्थिक रूप से सक्षम हुई तो जीवन कुछ सुसह्य होता हैं , नहीं तो वृन्दावन जैसा नरक उसे अपने ही परिवार में , समाज में भुगतना पड़ता हैं .विधवा होना क्या होता हैं , यह एक विधवा ही जानती हैं .
ऐसे दुर्दिन जिसे देखना पड़ते हैं , उसका भी दिवस --''विधवा दिवस''मनाये जाने का क्या औचित्य हैं ?
२३ जून
आज बारिश की पूर्व तैयारी के बतौर पेड़ पौधों की कटाई-छटाई करवाई . माली डालियों को काटकर बाहर डालता जा रहा था . थोड़ी देर बाद एक गाय आई और हरे पत्ते खाने लगी . जैसा कि आम तौर पर होता है , गाय को देखकर एक कुत्ता भी आ गया . कुत्ते को भी कुछ खाना था .उसने इधर-उधर मुँह मारा , कुछ सूंघा और चला गया , पर पत्ता एक भी नहीं खाया .
इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है ----कि गाय, गाय होती है और कुत्ता, कुत्ता
२२ जून
सेवाभावी चिकित्सकों से क्षमाप्रार्थना सहित एक वाकया ......
दो/तीन दिन पहले एक महिला चिकित्सक बैंक आईं और जमा पर्ची के साथ रुपये देकर चली गईं . हमेशा आती हैं तो उन्हें हम पर भरोसा था , मैंने वैसे के वैसे काउंटर पर उनके रुपये भेज दिए . थोड़ी देर बाद काउंटर क्लर्क ने आकर बताया कि उन्होंने जितने रुपये पर्ची में भरे थे , उससे बीस हजार रुपये ज्यादा थे . मैंने वे बीस हजार रख लिए और महोदया को फोन किया . वे आईं , अपने नोट लिए और निर्विकार भाव से बॅग में रख लिए . ना चेहरे पर ख़ुशी , न धन्यवाद के दो शब्द .
हम सभी का मत यही रहा कि ये लोग कमाते ही इतना और इस तरह से हैं कि उनके लिए जैसे इंसान की कीमत नहीं वैसे ही पैसों की भी कीमत नहीं , हमारा अनुभव यह रहा है कि कोई भी व्यक्ति जब बड़ी रकम जमा करता है तो कम से कम दो बार गिनता है और उसे यदि इस तरह से पैसे वापस मिलें, चाहे सिर्फ सौ रूपये ही क्यों न हों , तो उसका चेहरा ख़ुशी से दमकने लगता है ....
२१ जून
वर्गीस चाचा ने ताजा दूध और उससे बनी चाय यह संकल्पना करीब-करीब ख़त्म ही कर दी ....
१९ जून
पिछले दिनों नन्हीं नातिन को राजबाड़ा दिखाने ले गई थी .अंदर जाने के बाद तुलसी उद्यान दिखा , तो उसने पूछा -- ये कौनसा गार्डन है ? मैंने कहा - गार्डन नहीं बेटा . उसने फिर अपनी बालसुलभ बुद्धि से पूछा -- बगीचा ? मैंने अनमनी सी गर्दन हिलाई ,क्योंकि मुझे ''उद्यान '' शब्द याद ही नहीं आ रहा था . आज करीब दो हफ़्तों के बाद अचानक '' तुलसी उद्यान'' यह पूरा नाम याद आ गया . यहाँ-वहाँ गलत भाषा सुनने/ पढ़ने की वजह से अंग्रेजी शब्द तो याद आ जाता है , पर कई बार हिंदी शब्द याद नहीं आता और तत्सम शब्द तो भाषा से बिलकुल बाहर ही हो गए हैं .
१७ जून
बारिश शुरू हुई और बिजली गुल ....मुझे अच्छा लगा ...कोई भ्रम नहीं रहा , ये पक्का हो गया कि मैं मेरे अतुल्य इन्दौर में ही हूँ ....( अब उम्र गुल खिलाने लगी है , सो भूलने का डर हमेशा बना रहता है और फिर भ्रम की स्थिति भी )
१५ जून
आज हमारी ताई सुमित्रा महाजन का टीवी पर अनुराधा प्रसाद साक्षात्कार ले रहीं थीं , अमूमन पूरे समय वे उन्हें ''ताई'' कहती रहीं . शायद अब ताई यह शब्द वैश्विक हो जाय , ऑक्सफोर्ड के शब्दकोष में आ जाय ......
१५ जून
आज दैनिक भास्कर में बाल नाट्य शिविर का फोटो छपा है , जिसका कैप्शन है ---- ''वे अभिनय के लिए एक्टिंग सीख रहे हैं'' .....इसका अर्थ मेरी समझ में तो नहीं आया .....
११ जून
इस उम्र में कभी मौका मिला तो इलेक्ट्रिकल इंजिनीयर बनने की इच्छा है , ताकि पहरों , घंटों , दिनों तक बिजली गुम रहने की असली वजह पता चल सके .....
६ जून
पहली बार 4 D फिल्म देखी मेरी समझ से परे थीं सारी चीजें ..वास्तविकता का अनुभव करने के लिए वीभत्स और भयानक दृश्य ही क्यों होना चाहिए ? और ऊपर से यह सब बच्चों के लिए .......? उन्हें अच्छी अनुभूतियाँ भी तो कराई जा सकती हैं ...मोगरा या चमेली की सुगंध , पहली बारिश की फुहारें , झूले की पींग , मोर का नाचना , चंद्रोदय , लहलहाते खेत , आम के बौर , कोयल की कूक , लड्डू के लिए बेसन सेंकती स्त्री , हल चलाता किसान , पंक्चर सुधारता मेकेनिक , हथोड़ा चलाता लुहार , लकड़ी चीरता सुतार ...... और बहुत कुछ
४ जून
बचपन कोई बहुत ख़ास नहीं बीता , उस समय बच्चों पर ध्यान देने की परम्परा भी नहीं थी , पर इन दिनों नातिन के साथ बचपन जी रही हूँ ...डोरेमॉन , निंजा , आइसक्रीम ,पिज्जा , पानीपुरी , सिर्फ दाल-चावल , कहानी , लोरी , चकमक और ज्ञान वृद्धि भी कि अब बच्चों का परफ्यूम भी अलग आता है . इस युग की है तो उसके साथ मोबाईल के गेम्स , व्हाट्स एप्प पर पिता से माँ की शिकायतें ....बड़ा रंग-बिरंगा बीतता है दिन ....
१ जून
कम से कम भाजपा के सारे मंत्री तो हिंदी में शपथ ले लेते .....इतने वर्षों बाद भी दक्षिण भारतीय अपनेआप को अलग साबित क्यों करते हैं ?
२६ मई
रविवार कहती हूँ तो लोग सोचते हैं , मराठीभाषी हूँ इसलिए , इतवार कहती हूँ तो पुराने ज़माने की समझा जाता है , पर जब संडे कहती हूँ तब लोगों को मैं सामान्य लगती हूँ !!!
१४ मई
अबकी बार...... क्या होगा ये तो नहीं मालूम ,पर राजनीति से परे जाकर सोचें तो ''अच्छे दिन आने वाले हैं '' यह वाक्य निश्चित ही बहुत सकारात्मक है .......
११ मई
जाति नहीं जाती ......
ऑफिस में जब ड्यूटी बदलती है या कहीं दूसरी जगह स्थानांतरण होता है तो पुराने साथी की जगह को हम अपने हिसाब से साफ़ - सुथरा कर लेते हैं , इसके लिए किसी चतुर्थ श्रेणी व्यक्ति का इंतज़ार भी अमूमन नहीं करते , पर यदि टॉयलेट गन्दा हो तो एक विशिष्ट जाति के व्यक्ति का इंतज़ार आज भी किया जाता है और उसके आने तक गंदे टॉयलेट का उपयोग करने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती ...
१० मई
बहुत साल पहले दोपहर में फिल्मों के मेटिनी शो चलते थे , उनमें पुरानी क्लासिक फ़िल्में लगती थीं। दो आँखें बारह हाथ , नया दौर , हम हिन्दुस्तानी , हम दोनों , ये रास्ते हैं प्यार के , जिस देश में गंगा बहती है जैसी फ़िल्में मेटिनी में ही देखी हैं। बड़ा कड़क समय था वह। १६/१७ साल की उम्र , लेकिन साड़ी पहनना पड़ती थी। हमारे पास मतलब उस दौर की सारी लड़कियों के पास एक काला और एक सफ़ेद ब्लाउज हुआ करता था और फिर साड़ी किसी की भी पहन लो , भाभी / बहन , सहेली , रिश्ते की भाभी /बहन , पड़ौस की भाभी/बहन सब चलता था। फिल्म देखने के लिए माँ से अनुमति लेना पड़ती थी और फिल्म के कलाकारों के नाम बताना पड़ते थे। ५० पैसे का टिकिट , २० पैसे तांगे के और २०/२५ पैसे का पॉपकॉर्न या समोसा। कुल जमा एक रूपया भी नहीं , फिर भी कभी माँ नाश्ते के २५ पैसे बचाने के लिए घर से नाश्ता करके जाने पर जोर देती थी और नाश्ता क्या तो रात की रोटी /अचार या ज्यादा लाड़ जताया तो मुरब्बा। कोई सहेली घर से जल्दी आ जाती तो उसे भी इसी नाश्ते का आग्रह किया जाता , कोई भी बुरा नहीं मानता था। रोटी ज्यादा बचती तो उन्हें चूरकर प्याज - हरी मिर्च का बघार देकर ''कुस्करा '' बनाया जाता और हम लोग पूरी तरह संतुष्ट होकर घर से जाते थे। जाते समय माँ न सिर्फ मेरा बल्कि मेरी सहेलियों का भी पल्लू देखती कि ठीक से लिया है या नहीं ? उस ज़माने में फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं समझा जाता था वैसे ही फ़िल्में देखना भी। रिश्ते का कोई भाई या कोई परिचित दिखता तो हम नज़रें बचाते थे , ताकि कुनबे में ये बात न फैले की अमुक की लड़की सहेलियों के साथ फिल्म देखती है।
आज ये सब न केवल कल्पनातीत है , वरन कपोलकल्पित भी लग सकता है ...
१० मई
साहित्य/पत्रकारिता से जुड़े स्थानीय युवा जब मुझसे पूछते हैं --
आप स्वरांगी / विभास की माँ हैं ? तो मुझे हरिवंशराय बच्चन होने का अहसास होने लगता हैं ....
६ मई
कूकरी शो में बर्तन कितने सारे बर्तनों का उपयोग करते हैं ...अब हम इसे एक बाउल में रखते हैं , अब हम एक प्लेट लेते हैं , फिर एक बड़ा बाउल , फिर दूसरी प्लेट .....घर में यदि बर्तनों का ऐसा दुरुपयोग किया तो कामवाली दूसरे ही दिन भाग जाएगी ....
२८ अप्रैल
नेट पर काम करते हुए बीच-बीच में
फेसबुक पर झांकना
मानो पढाई कर रहे बच्चे का
माँ की आँख बचाकर खेलने भाग जाना !!!
२७ अप्रैल
मैं उनके सामने थी और वे कह रहे थे फेसबुक पर आपको देखकर अच्छा लगता है .....
२७ अप्रैल
विश्व पुस्तक दिवस पर ....
मैं शादी के बाद पहली बार मायके गई थी ( करीब ४० साल पहले की बात है ) , भाई के क्लिनिक का उदघाटन था तो भाभी के मायके से भी लोग आये थे , उन्हीं में पुणे से आई भाभी की मौसी थी। लम्बे सफर की वजह से वे एक किताब भी लेकर आईं थीं। वीर सावरकर के जीवन पर आधारित उस किताब ''सागर प्राण तळमळला '' में 687 या 637 ऐसे ही कुछ पृष्ठ थे। वे मात्र डेढ़ दिन रुकनेवाली थीं . मुझे उस किताब को पढ़ने की जिज्ञासा और लालसा दोनों थी। मैंने इतने कम समय में वह पूरी किताब पढ़कर उनके जाने के एक घंटा पहले लौटा दी। साथ में उसके कुछ अंश कॉपी में लिखे भी ( हमारे समय में ऐसा रिवाज था , अच्छे लगे संवाद या वाक्य लिखकर रखना ) अब तो एक पृष्ठ पढ़ना भी मुश्किल है , ना तो समय मिलता है / ना नज़र साथ देती है ..
२३ अप्रैल
गोरी गोरी पान , फुलासारखी छान
दादा मला एक वहिनी आण
मराठी के इस अत्यंत लोकप्रिय गीत का भावार्थ ये है कि एक बहन अपने भाई से कह रही है -- भैया ! मेरे लिए एक भाभी लेकर आओ , गोरी गोरी और फूल जैसी ख़ूबसूरत .....ये पंक्तियाँ मुझे इन दिनों बरबस याद आ जाती है। भाषाई संस्कारों का अपना महत्व होता है न। हिंदी में ऐसा कोई गीत होता तो राजपुत्र को उनकी बहन यह गाकर सुनाती , फिर उस राज परिवार में एक सुन्दर , सुघड़ , सलोनी बहू आती। बहू आती तो राजपुत्र थोड़ा व्यवहारिक हो जाते , कुछ जिम्मेदारी उठाना सीखते। राजमाता के चेहरे का तनाव कुछ ढीला होता , नंदोई भी कुछ लिहाज करना सीख जाते। बारिश में नंदोई के खेतों में ''भुट्टा पार्टी '' का लुफ्त भी उठा सकते थे ...घर में एक बहू का होना बहुत जरूरी होता है , वही होती है , जो आते ही घर को व्यवस्थित करने में जुट जाती है , किफ़ायत से रहती है। आखिर चाबी सम्हालनेवाला भी तो कोई हो। पुराना आजमाया हुआ नुस्खा है। जहाँ थोड़ा सा भी ऐसा लगा कि लड़का भटक रहा है , उसकी शादी करा दो। बस एक गीत की कमी से सब बिगड़ रहा है , अब मराठी तो क्षेत्रीय भाषा है , राज घराने के लोग थोड़ी जानते हैं , पर अंग्रेजी में इसका अनुवाद करके भी बहना को किसीने नहीं बताया .....
बुद्धिजीवियों ! अब भुगतो बावले राजपुत्र को , जरासा अनुवाद कर देते तो क्या बिगड़ जाता ?
२२ अप्रैल
करीब ३५ साल पहले जब मैं आकाशवाणी रिकॉर्डिंग के लिए जाती या मेरी कोई रचना कहीं छपती तो नगद राशि मिलती थी ... आज की तुलना में बेहद मामूली। नवभारत टाइम्स से १० रु का मनीऑर्डर आया था , पर टाइम्स समूह में छपने की ख़ुशी ज्यादा थी। धर्मयुग से २५ रु मिले थे। आकाशवाणी से हर रिकॉर्डिंग के बाद ४० रु मिलते थे। नगद पैसे अपने लगते थे और उनका क्या करना है , यह तय रहता था , सपने उसीके अनुसार बुने जाते थे , फिर चेक मिलने लगे , तब भी चेक पर अपना नाम देखना अच्छा लगता था , पर राशि बढ़ने के बावजूद उसे छू न पाने का मलाल रहता था , अब तो ज्यादातर जगहों से खाते में सीधे अंतरित हो जाते हैं। फिर किसी दिन खाता देखने पर या एस एम एस के जरिये पता चलता है ....अब न तो उतना मज़ा आता है , ना कोई योजना बनती है ..
ख़ुशी बाले - बाले आती है और बाजार पहुँच जाती है .....
१९ अप्रैल
छोटी थी तो माँ के कहने पर कितने ही लोगों के पैर चाहे-अनचाहे छूना पड़ते थे। शादी के बाद माँ की जगह सासू माँ ने ले ली। तब कई बार चिढ आती थी कि कितनी बार साड़ी का पल्लू सम्हाल-सम्हाल के कितने लोगों के पैर छूना पड़ते हैं। अब ना माँ हैं , ना सासू माँ . पूरी की पूरी पीढ़ी गुजर गई। अब बहुत कम लोग बचे हैं , जिनके पैर छूने का अवसर मिलता है .....
अब समझ में आता है कि सिर पर , पीठ पर आशीष देता कोई हाथ जीवन में कितना जरूरी होता है ....
१४ अप्रैल
आज रंजनाकुमारी ने बड़े पते की बात कही -- महिलाओं के लिए नीयत और नीति दोनों ही साफ नहीं है ....उसमें मेरी ओर से एक शब्द और ---आज भी
१२ अप्रैल
एकांत में याद भी आंसुओं के सैलाब में बह जाती है , उसे जिलाये रखने के लिए कम से कम कोई एक साथ चाहिए !!!
१९ मार्च
मुझे प्लायवुड के पुराने दरवाजे और रातभर जलनेवाले 5 वॉल्ट के सीएफएल पर खुद से ज्यादा विश्वास है, इन कमजोर-सी दो चीजों के भरोसे रातभर आराम से सोती हूँ ....
१८ मार्च
दिनभर तड़पाता है
रात को रुलाता है
टूटने पर भी चैन
कहाँ आता है
क्या सखी -- रिश्ता ?
नहीं सखी -- दांत
१८ मार्च
बाप रे ! एक दिन घर पर रहो तो कितने काम रहते हैं ....ध्यान से अख़बार पढना , बहुत दिनों से पडी पत्रिकाएं पलटना , किताबें पढना , मोबाईल पर बात करना , सन्देश भेजना / पढना , व्हाट्स एप्प टटोलना , टीवी देखना - उस पर भी समाचार अलग , धारावाहिक अलग , नेट पर बैठना , मेल चेक करना , जवाब देना , फेसबुक अपडेट्स ....गिनाते-गिनाते ही थक गई...
१७ मार्च
महिलाओं को बारे में कोई भी कुछ भी सोच सकता है ....ये स्वतंत्रता जैसे ईश्वर प्रदत्त है .....प्रसिद्द विचारक अरस्तु सोचते थे कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के मुँह में दाँत कम होते हैं ...... (पढ़ते-पढ़ते).....
१६ मार्च
छोटे रास्ते से चलने का चलन हो गया है , पर उसकी कोई सीमा नहीं ...आज मराठी के वरिष्ठ एवं अत्यंत लोकप्रिय कवि सुधीर मोघे नहीं रहे .....उनकी लिखी कविताओं और गीतों ने अनेक लोगों को रस सिक्त किया होगा , लेकिन छोटे रास्ते से चलने के आदी लोगों को उनके लिए देवनागरी या रोमन में '' श्रद्धांजलि'' लिखने का समय नहीं है ... RIP लिखा और पल्ला झाड़ लिया ....और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है …
१५ मार्च
दिनभर अलग-अलग तरह के लोगों से पाला पड़ता है। औरतें अक्सर पति के साथ, भाई या बेटे के साथ आती हैं। खाता खोलना हो तो उनके दस्तावेज पति / भाई/ बेटे के पास रहते हैं, पेन भी इन्हीं लोगों के पास रहता है। कई बार तो चष्मा भी पति देता है। आज तो गजब हो गया, जब एक महिला खाता खोलने आई तो मैंने पूछा नॉमिनेशन फॉर्म नहीं भरा ? अव्वल तो उसे इसकी जानकारी ही नहीं थी, फिर मैंने जब उसे समझाया तो पति से पूछती हैं - किसका नाम लिखूँ ? पति का जवाब - मेरा लिख दे और किसका लिखेगी ?
और कुछ चुनिंदा महिलाओं को देखकर हमने मान लिया है कि महिलाएं काफी आगे बढ़ गई हैं .
११ मार्च
अभी दो दिन पहले संत गाडगे महाराज की शोभायात्रा से सारा ट्रॅफिक जाम था, उसके पहले गजानन महाराज का प्रगटोत्सव भी ऐसी ही धूमधाम से मनाया गया ....रिक्शावालों का साईंबाबा से क्या सम्बन्ध है, पता नहीं पर लगभग हर रिक्शा स्टेंड पर साईंबाबा की मूर्ती और मंदिर दिखाई देता है और वहाँ भी बड़े जोर-शोर से पूजा-पाठ,आरती, प्रसाद वितरण वगैरा चलता रहता है। विडम्बना यह है कि गाडगे महाराज, गजानन महाराज या साईंबाबा, सभी बेहद सादगी भरा जीवन जीते थे और उनमें बाबाओं के कोई लक्षण नहीं थे ..........
१ मार्च
जब दो समझदार लोग लड़ते हैं , तो समझाने की गुंजाईश ख़त्म हो जाती है !!!
२८ फरवरी
हमारी युवावस्था में उपन्यास पढ़ना अच्छा नहीं माना जाता था। अपने कॉलेज के पुस्तकालय से वृंदावनलाल वर्मा का '' मृगनयनी '' लेकर आई थी तो माँ को यह समझाने में ही हफ्ता निकल गया था कि ये वैसा नहीं है, जैसा वे समझ रही हैं। ऐसे ही आज भी कुछ लोग फेसबुक को घटिया माध्यम समझते हैं , लेकिन मित्र- सूची में अच्छे लोग हों तो इससे ज्यादा त्वरित और विविधांगी माध्यम कोई नहीं है।
२७ फरवरी
पिछले दिनों एक पत्र लिखना पड़ा, अंग्रेजी में ...बेटा बोला --माँ ! व्याकरण की गलतियाँ बहुत हैं ! मुझे पता था कि गलतियाँ तो होंगी क्योंकि मेरे स्कूल के दिनों में मुलायमसिंह यादव, लालूप्रसाद यादव जैसे उस समय के अच्छे नेताओं ने एक बड़ा और देशव्यापी 'अंग्रेजी हटाओ आंदोलन' चलाया था और हिन्दी भाषी प्रदेशों के स्कूलों से अंग्रेजी करीब-करीब हट गई थी, सो मेरी अंग्रेजी की नींव कमजोर है, लेकिन मौका पड़ता है तो मैं गलत-सलत अंग्रेजी का इस्तेमाल पूरे आत्मविश्वास से करती हूँ .....लोगों को हिंदी/मराठी नहीं आने पर भी शर्म कहाँ आती है , मैं अपने सामने उन्हीं का आदर्श रखती हूँ ..
२३ फरवरी
लगभग पैंतीस साल पहले, जब मैं पत्रकारिता करती थी तो रात को लौटते हुए अक्सर देर हो जाती थी, उस समय के अनुसार बहुत देर। उन दिनों रात दस / ग्यारह बजे तक लड़कियां तो ठीक, लड़कों का भी घर से बाहर रहना अच्छा नहीं समझा जाता था। सड़क पर कोई इक्का- दुक्का ही दिखाई देता था। अक्सर किसी कार्यक्रम के बाद प्रेस में जाकर लिखना और फिर उसका पहला प्रूफ पढ़ना, कर्तव्यों में आता था। तब कम्पोजिंग हाथ से होती थी और अनेक गलतियाँ भी उसमें हुआ करती थी। इसीके मद्दे नज़र मैंने लूना खरीदी थी और पूरे शहर में मुश्किल से ४/५ महिलाएं ही दुपहिया चलाती थीं .......तो ६/७ कि.मी.दूर से रात को दस/ग्यारह बजे जब मैं लौटती तो एक तो लूना और दूसरे उस पर एक युवती ...सड़क पर चलते इक्का-दुक्का लोग, पान की दुकानों पर खड़े ''अच्छे न समझे जानेवाले युवा'', यहाँ तक कि देशी शराब की दुकान से निकलते निम्न मध्य वर्ग के कुछ पुरुष ....सभी कौतुहल से देखते जरुर, पर किसीने कोई अभद्रता की हो या फ़िक़रा कसा हो, यह याद नहीं आता ....बाद में तो यह भी होने लगा कि अपने क्षेत्र में आने के बाद , पलासिया से आगे के रास्तों पर लोग सादर अभिवादन भी करते थे ....यह सिलसिला सन ९३ तक, जब तक मैंने पत्रकारिता की चलता रहा ....तब भी सामाजिक परिस्थितियाँ कुल मिलाकर बहुत ज्यादा बदली नहीं थी ......
अब मुझे बहुत ताज्जुब होता है, क्षोभ होता है, असहायता अनुभव होती है, जब मैं पढ़ती हूँ ---- शाम को छ: बजे कार से खींचकर अभद्रता की, दोपहर चार बजे ऐन चौराहे पर जबर्दस्ती करने की कोशिश की आदि..आदि ..मेरी पीढ़ी के माता-पिता कहाँ चूक गए , जो संस्कार नहीं दे पाये, जबकि अब तो किसी लड़की या महिला का घर से बाहर निकलना कोई अजूबा नहीं रहा ....
२१ फरवरी
कुत्ते काटते हैं, उन्हें गोली मार दो, तेंदुआ गाँव की सीमा में दिखा, उसको पकड़कर चिड़ियाघर में ठूंस दो, सुन्दर चिड़िया और मछलियों को पाल लो ...मच्छर , तिलचट्टे और छिपकलियां हो गई हैं घर में, पेस्ट कंट्रोल करा लो ... औरत बोलती है, खत्म कर दो ....बस ! हम जियेंगे , हम सर्वश्रेष्ठ हैं .... आदमी और सिर्फ आदमी !!!
१७ फरवरी
लोग अक्सर राजनीती और राजनीतिज्ञों की बुराई करते रहते हैं . ये एक प्रिय शगल है . इससे लोगों को अनुभव होनेवाली एकरसता को तोड़ने के लिए हम बैंक कर्मी बीच-बीच में हड़ताल करते रहते हैं , ताकि निंदा रस का बहाव दूसरी ओर मोड़ा जा सके . ग्राहकों से प्रतिदिन दुर्व्यवहार , रोज के दाल-चावल के साथ अचार का काम करता है , इसलिए हम ग्राहक सेवा , कार्य तत्परता , लगन , सुहास्य मुद्रा , आदि के आस-पास भी नहीं फटकते . हमें अच्छा वेतनमान, सुविधाएँ या भत्तों से क्या लेना-देना , हमें तो निरपेक्ष भाव से सिर्फ सेवा करना चाहिए , यह छोटी सी बात हम कमअक्ल लोगों की समझ में नहीं आती. बेचारे हमारे देशवासी कितने दयालु और सहनशील हैं , जो लाखों की तादाद में सरकारी बैंकों में खाता खोलते हैं .....हे ईश्वर ! हमें क्षमा करना , हम नहीं जानते हम क्या कर रहे हैं !!!
११ फरवरी
एक मराठी फ़िल्म '' दुनियादारी'' का यह संवाद बेहद भा गया ---
खुले आसमान की ओर देखना अच्छा लगता है, पर आसमान के नीचे घर नहीं बसाया जा सकता , उसके लिए दीवारों की जरूरत होती है .....
२ फरवरी
आज अलस्सुबह कुछ पढ़ रही थी, उसमें किसी सन्दर्भ में यह शानदार व्यंग्य था .....
एक सेठ जिस रास्ते से गुजरता था, वह रास्ता एक पगडंडी के जरिए जंगल की तरफ जाता था। सेठ जिस समय वहाँ से निकलता, उसी समय एक गड़रिया जंगल की तरफ से '' भेड़िया आया .. भेड़िया आया '' चिल्लाते हुए आता था, लेकिन भेड़िया कहीं दिखाई नहीं देता था। करीब एक सप्ताह तक सेठ ने रोज यह नज़ारा देखा। अगले हफ्ते सेठ ने उस उस गड़रिया को बुलाकर गाड़ी में बिठाया और अपने मीडिया ग्रुप के ऑफिस ले जाकर उसे सम्पादक की कुर्सी पर बिठा दिया।
१ फरवरी
बेचारे फूल से राजकुमार के पीछे ही पड़ गए हैं सब ! जिसे खानदानी काम भी नहीं आता , वह अब दूसरा कौन सा काम करेगा ? पढाई - लिखाई ज्यादा है नहीं , उम्र भी चालीस के पार , कहीं नौकरी तो मिलने से रही ..तो करे तो क्या करे ? वास्तव में तो वह तारीफ का हक़दार है कि तमाम पुश्तैनी जायदाद के बावजूद आराम तलब नहीं है, पैदल बोलो तो पैदल घूम लें, झोपड़ी में खाना खा लें, जात - धर्म, अमीर - गरीब कोई भेदभाव मन में नहीं। इतना गुणी बेटा हजारों साल में एक बार पैदा होता है और लोग है कि .....तौबा - तौबा
३१ जनवरी
नेट पर कुछ काम करना हो तो पहले फेसबुक पर क्लिक हो जाता है .....स्वाभाविक है कहीं भी जाना हो तो पहले हम अपना चेहरा ही तो देखते हैं ....
१९ जनवरी
जंगल में लौट जाने को मन करता है ..... जहाँ न कोई सरकार हो न जनता हो, न टीवी हो न अख़बार हो, न मालिक हो न नौकर हो, न घोटाले न भ्रष्टाचार हो , न नेता हो न उनके मूर्खता पूर्ण दाम्भिक भाषण हो, न सड़कें हों न ट्रेफिक हो, न बाज़ार हों न भीड़ हो,न महंगाई हो न कोई खरीदारी करना हो, न मोबाईल हो न कम्प्यूटर हो,न फेसबुक हो न नकली सम्बन्ध हो, न लाइक हो न शेअर हो .......बस एक अवलिया - सा जीवन हो ...
१८ जनवरी
ईश्वर न करें किसी के साथ कोई दुर्घटना हो ......पर यदि होती है तो ईश्वर ने इतना रहम करना चाहिए कि वह दिल्ली में घटित हो, ताकि बड़े - बड़े माध्यम , उनके पत्रकार, संवाददाता, संपादक, प्रबंध निदेशक आदि का सारा ध्यान देश की तमाम अन्य समस्याओं को छोड़कर, चौबीसों घंटे उसी एक घटना पर केन्द्रित हो .....
१८ जनवरी
हम सुनाने को तरसते हैं
और वो बात करते हैं लिखने की !!!
ठण्ड के दिन, कोहरे में डूबी सुबह के सवा सात बजे। मोबाईल बजा।
हाँ ! मैं ....... बोल रहा हूँ, हमारी पत्रिका के लिए आपकी कविता चाहिए।
मैंने कहा - देखती हूँ , २/३ दिन में ....
२/३ दिन ? मैडम पत्रिका प्रेस में है, मैं अभी आ जाता हूँ घर पर ( लहजा ऐसा मानो पहले कई बार कह चुके हैं )
अभी ? ( आश्चर्य से खुला अपना ही मुँह मुझे कल्पना में दिखाई दिया ) तो क्या हुआ, आपके उधर ही तो रहता हूँ ...
वो ठीक है, पर अभी मेरे पास कविता तैयार नहीं है और मुझे ऑफिस के लिए भी निकलना है ....
तो ऐसा कीजीये डायरी ऑफिस ले जाइये, वहीं लिख लीजीये। मैं शाम को आता हूँ, पर शाम को बिलकुल तैयार रखना ....(इस आदेश के बाद मुझे लगा कि अब यदि मैंने संवाद जारी रखा तो मेरा मुँह विस्मय से फट जायेगा )
१७ जनवरी
मेरी ओर मुखातिब हो वे बोले - आपको देखकर लगता नहीं है कि आप नेट सेवी - टेक सेवी हैं ....मेरी समझ में नहीं आया देखकर क्या लगना है ? दिखने के लिए क्या मैं जींस पहनूँ ? बाल खुले रखूं ? हरी लिपस्टिक और नीला नेलपेंट लगाऊं ? मोटे -मोटे पत्थर गले में लटकाऊं ?
साड़ी पहनना और हिन्दी बोलना पिछड़ेपन का पर्यायवाची बनता जा रहा है ...
१२ जनवरी
''आजतक '' ने आज देश में एक सर्वे करवाया , 24 राज्यों की राजधानियों के कुल 1856 लोगों के अनुसार ''आप'' आगे है ....क्या शानदार सर्वे है ! 120 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले देश में कुल जमा दो हजार लोग भी नहीं मिले .....
९ जनवरी
बचपन में सर्दी-खांसी से बचने के लिए माँ कुछ गरम पीने को देती तो मिन्नतें करती रहती -- ले बेटा पी ले ! पर मज़ाल है , जो कभी एक घूँट भी पिया हो , लेकिन अब वही सब अच्छा लगता है -- अदरक-तुलसी का काढ़ा , टमाटर -गाज़र का सूप , यहाँ तक कि गरम पानी भी और पीठ पर महसूस होता रहता है --माँ का खुरदरा पर स्नेहिल हाथ ...
८ जनवरी
सरकारी बैंकों और खासकर भारतीय स्टेट बैंक से लोग अक्सर नाराज़ रहते हैं और कार्यशैली का मखौल भी उड़ाया जाता है, पर कल एक मजेदार वाकया हुआ।
अपने बैंक के एटीएम से पैसे निकालना भूल गई, रास्ते में २/३ एटीएम और छूट गए, घर के नज़दीक पहुंचकर याद आया, सिर्फ सौ रुपये बचे हैं। सामने एक्सिस बैंक का एटीएम दिखा। झट से रुक गई। कोई नहीं था। तसल्ली से कार्ड स्वॅप किया, प्रक्रिया पूरी की, खड़ी रही तो स्क्रीन पर सन्देश था -- Your transaction is timed out ....४/५ बार यही सन्देश। इतनी देर में बाहर २/३ लड़के आ गए थे। एक ने झिझकते हुए पूछा - आंटी कुछ प्रॉब्लम ? मदद करूँ ? मैंने कहा - नहीं। फिर वह कहने लगा - आंटी कार्ड ठीक से डालिये। मैंने बताया - मैं बैंक में हूँ, तो वह खुद का कार्ड डालने लगा, पर कोई फायदा नहीं हुआ। तभी गार्ड आया - बोला क्या हुआ ?
हमने जब उसे बताया तो वह बोला --आखिर में YES का बटन दबाते हो क्या ? हमने कहा -- हाँ। तो बोला - इस मशीन में गड़बड़ है। NO का बटन दबाओ। पैसा निकल आएगा ..हम सबने वही किया और राजी- ख़ुशी घर वापस !
७ जनवरी
ठण्ड के मौसम की तसदीक़ के लिए गाजर का हलवा और मेथी के परांठे बहुत जरूरी है !!!
६ जनवरी
ऑफिस में , सड़क पर , बाज़ार में , फेसबुक पर , सब जगह युवा हैं ,(युवावस्था की सीमा युवराज की वजह से बढ़कर पचास जो हो गई है ) समवयस्क कम ही दिखते हैं ...इनसे बात करते हुए डर लगता है कि कहीं दो/तीन वाक्यों से ज्यादा बोला तो ये न सोच लें कि ----
१. इनका क्या इनके पास तो समय ही समय है
२. बहुत पकाती है
३. सठिया गई है
४. इतनी फुर्सत किसे है अब ? इनके ज़माने गए , समझना चाहिए न !
५. बढ़ लो ! आ रही है ...
६. बेटा ! तैयार हो जा , भाषण सुनने को
२ जनवरी
ये फ्री , वो फ्री तो ठीक है, लेकिन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह ने उनके एक कार्यकाल में सारे छात्रों को बिना परीक्षा दिए उत्तीर्ण किये जाने का तोहफा दिया था ....इससे ज्यादा मूर्खतापूर्ण छूट मैंने जिंदगी में नहीं देखी......
१ जनवरी
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